अप्रैल 1971 इंदिरा गांधी सेना प्रमुख से मानिकशाह और कैबिनेट मंत्रियों की एक सीक्रेट मीटिंग बुलाती हैं। इसमें वह कहती हैं, हम पूर्वी पाकिस्तान यानी बांग्लादेश को आजाद कराएंगे। इसके लिए मीटिंग में तय किया जाता है कि सारी तैयारियां करने के बाद नवंबर में पाकिस्तान पर हमला किया जाएगा। उस समय अमेरिका, चीन और ब्रिटेन तीनों ही पाकिस्तान के साथ खड़े थे और पाकिस्तान पर हमला करना इतना आसान था नहीं। लेकिन इंदिरा गांधी के दिमाग में इसको लेकर कुछ और ही चल रहा था।
इसके बाद जैसे ही नवंबर का महीना आया तो इंदिरा गांधी ने नवंबर के आखिरी हफ्ते में हमला करने का आदेश दे दिया और यहीं से दोनों देशों के बीच युद्ध शुरू हो गया। युद्ध शुरू होने के बाद जिस बात का डर था वही हुआ। पहले पत्र लिखकर अमेरिका इंदिरा गांधी को देता है जिसका जवाब इंदिरा गांधी 15 दिन बाद देती हैं। अमेरिका की सिर्फ पत्र तक सीमित नहीं रहती बल्कि पाकिस्तान के बदले अपना बंगाल की खाड़ी में वो भेज देता है। तभी इंदिरा गांधी एक ऐसा दस्तावेज सामने लाती हैं जिसके डर से अमेरिका का हिंद महासागर में होने के बावजूद कुछ नहीं कर पाता।
यह लगभग 13 दिन तक चलता है। जिसके बाद 16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान के करीब 90 हजार से ज्यादा सैनिक भारत के सामने आत्मसमर्पण कर देते हैं। उस समय पाकिस्तानी सेना के आत्मसमर्पण की ये आइकॉनिक फोटो ली जाती है। इस आत्मसमर्पण के साथ ही भारत-पाकिस्तान का यह समाप्त हो जाता है। पाकिस्तान दो हिस्सों में टूट जाता है।
साल 1947 लगभग 150 सालों के बाद अंग्रेजी शासन का खात्मा होता है। लेकिन देश दो हिस्सों में टूट जाता है। भारत और पाकिस्तान। बंटवारे के बाद पाकिस्तान राजनीतिक रूप से तो एक देश था लेकिन भौगोलिक रूप से दो अलग-अलग हिस्सों में बंटा हुआ था। पश्चिमी पाकिस्तान और पूर्वी पाकिस्तान जो एक दूसरे से लगभग 2000 कि.मी. दूर थे। पूर्वी पाकिस्तान की आबादी पश्चिमी पाकिस्तान से ज्यादा थी लेकिन पूरी राजनीतिक शक्ति पश्चिमी पाकिस्तान में ही केंद्रित थी।
पश्चिम पाकिस्तान के लोग और वहां की सरकार शुरू से ही पूर्वी पाकिस्तान के लोगों के साथ भेदभाव करती आ रही थी। कम आबादी होने के बावजूद पश्चिमी पाकिस्तान को ज्यादा बजट मिला करता था। दोनों हिस्सों में ज्यादातर लोग मुसलमान ही थे। लेकिन उनकी भाषा काफी अलग थी। पश्चिम में ज्यादातर लोग उर्दू और पंजाबी बोलते थे। जबकि पूर्वी पाकिस्तान में ज्यादातर लोग बंगाली बोला करते थे।
लेकिन 1948 में पाकिस्तान सरकार ने इन बंगालियों पर उर्दू थोपने की कोशिश की। पाकिस्तानी सरकार ने उर्दू को राष्ट्रीय भाषा घोषित कर दिया और सरकारी दस्तावेजों से बंगाली भाषा को हटाना शुरू कर दिया। इस भाषाई भेदभाव ने पूर्वी पाकिस्तान में पश्चिम के खिलाफ विद्रोह की भावना पैदा कर दी। हालांकि इस सब के बावजूद अगले 20 सालों तक पाकिस्तान की स्थिति काफी हद तक स्थिर रही।
लेकिन ये स्थिति बहुत जल्द बदलने वाली थी। अब साल आता है 1969। पाकिस्तान में सैन्य शासन चल रहा था। देश के राष्ट्रपति और सैन्य प्रमुख जनरल खान थे। खान ने घोषणा की कि वे जल्द ही पाकिस्तान में चुनाव करवाकर लोकतंत्र वापस लाएंगे। चुनाव होंगे और इस बार जो नेशनल असेंबली बनेगी उसमें पहली बार पूर्वी पाकिस्तान का प्रतिनिधित्व ज्यादा सीटों के साथ होगा। क्योंकि पूर्वी पाकिस्तान की आबादी भी ज्यादा है। ये चुनाव दिसंबर 1970 में हुए थे और जब नतीजे आए तो पूरा पाकिस्तान सदमे में था। पूर्वी पाकिस्तान की एक राजनीतिक पार्टी आवामी लीग ने पूर्वी पाकिस्तान की 169 में से 167 सीटें जीत ली थी। 313 सीटों वाली नेशनल असेंबली में उन्होंने बहुमत का आंकड़ा पार कर लिया था और आवामी लीग के नेता शेख मुजीब उर रहमान प्रधानमंत्री बनने वाले थे।
मतलब पूरे पाकिस्तान पर राज करने वाला प्रधानमंत्री अब पूर्वी पाकिस्तान से आने वाला था। जाहिर है पश्चिम में बैठे राजनेताओं और सैन्य नेताओं को यह बिल्कुल पसंद नहीं आया। पश्चिम की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी पाकिस्तान पीपल्स पार्टी के नेता जुल्फिकार अली भुट्टो ने अन्य पार्टियों के साथ मिलकर इस चुनाव के नतीजों को मानने से इंकार कर दिया। नतीजतन नेशनल असेंबली नहीं बुलाई गई और आवामी लीग सरकार नहीं बना पाई। यह पूरी घटना पूर्वी पाकिस्तानियों के लिए एक बड़ा मजाक थी। वे सब ठगा हुआ महसूस कर रहे थे। इसीलिए शेख मुजीब उर रहमान ने पूर्व में असहयोग आंदोलन शुरू कर दिया। बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन और हड़तालें हुई।
नागरिकों और सेना के बीच झड़पें हुई और जल्द ही एक मजबूत बंगाली राष्ट्रवादी आंदोलन ने आकार लेना शुरू कर दिया। इस पूरे आंदोलन की मांग एक अलग देश बांग्लादेश की थी। खान को समझ आ गया था कि पूर्वी पाकिस्तान पर उनकी पकड़ ढीली पड़ रही है। इसलिए मार्च 1971 में उन्होंने इस आंदोलन को रोकने के लिए एक विशेष सैन्य ऑपरेशन चलाने का फैसला किया। सच लाइट यह आधिकारिक तौर पर 25 मार्च 1971 की रात को शुरू हुआ। अगले दिन शेख मुजीब उर रहमान को पूरे पाकिस्तान से गिरफ्तार कर पश्चिमी पाकिस्तान भेज दिया गया। लेकिन गिरफ्तार होने से पहले ही उन्होंने एक प्रसारण संदेश के जरिए बांग्लादेश को स्वतंत्र घोषित कर दिया। पाकिस्तानी सेना ने पूरे पूर्वी पाकिस्तान में नरसंहार शुरू कर दिए। नागरिकों पर बाहरी हथियारों का इस्तेमाल करते हुए अंधाधुंध गोलीबारी की गई। आवामी लीग के नेताओं और समर्थकों की बेरहमी से कर दी गई। ऑपरेशन सर्च लाइट के जवाब में बंगाली सेना के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने बंगाली प्रतिरोध शुरू किया। उन्होंने पाकिस्तानी सेना से लड़ने के लिए एक सेना का गठन किया और इस सेना का नाम मुक्ति वाहिनी रखा गया। लेकिन मुक्तिवाहिनी पाकिस्तानी सेना के उन्नत के सामने ज्यादा कुछ नहीं कर पा रही थी।
इस दौरान आवामी लीग के कई महत्वपूर्ण नेता सीमा पार कर भारत में घुसने लगे। उन्होंने भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मुलाकात की और मदद की गुहार लगाई। पाकिस्तानी सेना की बर्बरता से बचने के लिए लाखों नागरिक भी शरणार्थी बनकर भारत आने लगे। कुछ ही महीनों में लगभग लाखों की संख्या में शरणार्थी भारत आ गए। भारत ने इन लोगों के लिए उदारता पूर्वक अपनी सीमाएं खोल रखी थी।
लेकिन शरणार्थियों की इतनी बड़ी आबादी भारत के लिए एक बड़ी चुनौती थी। इन लोगों के आवास, भोजन, चिकित्सा और दूसरी जरूरतों का पूरा बोझ भारत पर आ चुका था। साथ ही शरणार्थी शिविर और आसपास के इलाकों में कानून व्यवस्था बनाए रखना भी बहुत मुश्किल हो रहा था। इसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भारत को इस शरणार्थी संकट से और पूर्वी पाकिस्तान को नरसंहार से बचाने की ठान ली।
अप्रैल 1971 में इंदिरा गांधी ने भारत के सेना प्रमुख सैम मानिकशाह और कैबिनेट मंत्रियों की बैठक बुलाई। इस बैठक में तय हुआ भारतीय सेना पाकिस्तान पर नवंबर में हमला करेगी। तत्काल हमला ना करके नवंबर में हमला करने के पीछे कई कारण जैसे ये मानसून का समय था। इस समय पूर्वी पाकिस्तान की सीमा दलदली हो जाती है। जिससे भारतीय सेना की चाल कई गुना धीमी हो जाएगी। वहीं बर्फ पिघलने से हिमालय के कई दर्रे खुल जाएंगे। जिससे चीन के लिए भारत पर हमला करना बेहद आसान हो जाएगा। साथ ही अमेरिका, चीन और ब्रिटेन तीनों ही पाकिस्तान के साथ थे जो पाकिस्तान के बदले में कभी भी भारत के खिलाफ युद्ध में कूद सकते थे। इसलिए इनका तोड़ निकालना भी जरूरी है।कि हमला नवंबर में करने वाले थे तो इंदिरा गांधी के पास अमेरिका, चीन और ब्रिटेन का तोड़ निकालने के लिए काफी समय भी था।
समय का सही इस्तेमाल करते हुए इंदिरा गांधी युद्ध से पहले कूटनीतिक समर्थन जुटाने में लग गई। साथ ही पिछले दरवाजे से बांग्लादेश मुक्ति वाहिनी को हथियार पहुंचाने के लिए 15 मई 1971 को ऑपरेशन जैकपॉट शुरू कर दिया गया। इसमें भारतीय सेना मुक्ति वाहिनी को हथियार के साथ-साथ प्रशिक्षण भी देने लगी। दूसरी ओर इंदिरा गांधी के नेतृत्व में विदेश मंत्री स्वर्ण सिंह और अन्य कैबिनेट मंत्री दुनिया भर के विभिन्न देशों में भारतीय प्रतिनिधि मंडल लेकर गए और वहां की सरकारों से पाकिस्तान पर दबाव बनाने के लिए कहते रहे। संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के खिलाफ प्रस्ताव भी रखा गया था। शरणार्थी संकट के कारण भारत को हर जगह सहानुभूति मिलती है।
लेकिन पाकिस्तान के खिलाफ कोई भी सख्त कदम नहीं उठाता है। इन सबके बीच अगस्त 1971 में भारत को एक बड़ी कूटनीतिक जीत मिलती है। भारत और सोवियत संघ ने शांति, मित्रता और सहयोग की भारत, सोवियत संधि पर हस्ताक्षर किए। अब अमेरिका, चीन और ब्रिटेन को काउंटर करने के लिए भारत के साथ रूस था। बस सही समय का इंतजार था। फिर आए नवंबर का वो महीना जिसे हमला करने के लिए तय किया गया था। लेकिन इंदिरा गांधी चाहती थी कि हमला करने से पहले वह अमेरिका को पूर्वी पाकिस्तान से भारत आ रहे शरणार्थियों के बारे में जानकारी दे दें ताकि अमेरिका युद्ध के बीच में अड़ंगा ना लगाएं।
जब इंदिरा गांधी अमेरिका पहुंची तो उस समय के अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निकसन यह जानते थे कि इंदिरा गांधी यहां क्यों आई हैं। अमेरिका का रुख पाकिस्तान की ओर था। इसलिए रिचर्ड निकन ने इंदिरा गांधी को जानबूझकर 45 मिनट तक अपने दफ्तर के बाहर इंतजार कराया। 45 मिनट बाद मीटिंग शुरू हुई लेकिन रिचर्ड निकन ने सीधे मुंह बात नहीं की और इस मीटिंग का कोई नतीजा नहीं निकल सका। कहा जाता है जब इंदिरा गांधी रिचर्ड निकन के ऑफिस के बाहर आ गई तो रिचर्ड निकसन और उनके सुरक्षा सलाहकार हेनरी किसेंजर ने इंदिरा गांधी के लिए अभद्र भाषा का प्रयोग किया जो बाद में सार्वजनिक हुई टैप रिकॉर्डर से पता चला। खैर, इंदिरा गांधी ने इस बेइज्जती का बदला लेने की ठान ली थी। वह भारत वापस आई और की तैयारियों में जुट गई। भारत को पता था कि शुरू होते ही पाकिस्तान पूर्वी और पश्चिमी दोनों मोर्चों से उन पर हमला कर देगा।
इसलिए भारतीय सेना दोनों मोर्चों पर लड़ने के लिए तैयार थी। नवंबर के आखिरी हफ्ते में इंदिरा गांधी ने सेना को हमले के अंतिम आदेश दे दिए। तय किया गया कि पहला हमला 4 दिसंबर को करेंगे। इसके लिए सेना हमले से पहले ही पूरा बंदोबस्त करने में जुट गई। सोवियत संघ इसमें भारत के साथ खड़ा था। भारत की तैयारी देखकर अमेरिका के राष्ट्रपति रिचर्ड निकन ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और सोवियत संघ के नेता एलेक्सी कोसगिन को एक पत्र लिखकर चेतावनी दी थी कि अगर आपने पाकिस्तान के खिलाफ कोई कारवाई की या युद्ध छेड़ा तो हमें हस्तक्षेप करना पड़ेगा। इस पर सोवियत संघ की ओर से राजदूत निकोलाई पेगोव इंदिरा गांधी के पास आते हैं और कहते हैं कॉमरेट्स ने मुझे बताया है कि अमेरिका की तरफ से ऐसा एक पत्र आया है। इस पर आपका क्या उत्तर है? आप बताइए। इंदिरा गांधी मुस्कुराकर कहती हैं, “मुझे इस पत्र का जवाब देने के लिए 15 दिन का समय चाहिए।
दूसरी ओर भारत की तैयारी देखकर पाकिस्तान भी घबराया हुआ था। पाकिस्तानी राष्ट्रपति यामा खान समझ गए थे कि भारत कभी भी पूर्वी पाकिस्तान पर हमला कर सकता है। इसलिए उन्होंने घबराकर 3 दिसंबर 1971 को ऑपरेशन चंगेज खान ल्च किया। जिसमें उन्होंने खुद पश्चिम से भारत पर हमला कर दिया। पाकिस्तान ने यह हमला भारतीय वायुसेना के पठानकोट, अमृतसर और आगरा जैसे कई एयरबेसों पर किया। इस पूरे हमले में सिर्फ एयरबेसों के रनवे को नुकसान पहुंचाया जिसे भारतीयों ने कुछ ही घंटों में ठीक कर लिया। इसमें भारत के लिए बढ़िया बात यह रही कि पाकिस्तान ने पहले हमला करके का पूरा दोष अपने ऊपर ले लिया और अब जवाब देने की बारी भारत की थी। रात के पौ:45 बजे से मानक शाह इंदिरा गांधी को ब्रीफ करते हैं और हमले की औपचारिक अनुमति मांगते हैं। कुछ देर बाद इंदिरा गांधी हमले का अंतिम फैसला ले लेती है और इसके बाद ऑल इंडिया रेडियो के जरिए देश को संबोधित करती हैं।
पाकिस्तान ने हमारे खिलाफ बड़े पैमाने पर युद्ध छेड़ दिया। आज बांग्लादेश में चल रहा युद्ध भारत के खिलाफ युद्ध बन गया है। इसके साथ ही भारत आधिकारिक तौर पर बांग्लादेश मुक्ति संग्राम का हिस्सा बन गया। अगले दिन यानी 4 दिसंबर की सुबह भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान पर दो बार और आक्रामक हमला किया। इस हमले में कुल 120 उड़ाने भरी गई जिसमें पाकिस्तान के एयरवेज और उसके विमानों को काफी नुकसान पहुंचा। दूसरी ओर भारतीय नौसेना का पूर्वी बेड़ा पूर्वी पाकिस्तान के दो बंदरगाहों, चटगांव और कॉक्स बाजार पर हमला करने के लिए आगे बढ़ रहा था। भारत के विमान वाहक पोत आईएएस विक्रांत से 12 विमानों ने उड़ान भरी। दोनों बंदरगाह पर हवा से जमीन पर रॉकेट से हमला किया जा रहा था और उन्हें काफी नुकसान पहुंचाया जा रहा था। उसी रात भारतीय नौसेना ने पश्चिमी मोर्चे पर ऑपरेशन ट्राइडेंट ल्च किया जिसका उद्देश्य कराची बंदरगाह पर हमला करना था। उस समय भारत के पास एक भी ऐसा नहीं था जो रात में मिसाइलों से हमला कर सके। लेकिन भारत ने हाल ही में सोवियत संघ से ओसा क्लास बोट खरीदी थी जो आकार में बहुत छोटी थी लेकिन P15 टर्मिनेट जैसी खतरनाक मिसाइलों से हमला कर सकती थी लेकिन इसमें एक दिक्कत थी ये बहुत कम दूरी तक ही जा सकती थी मतलब ये अपने आप कराची बंदरगाह तक नहीं पहुंच सकती थी इसलिए नौसेना ने मिसाइल बोट को अपने बड़े युद्धपत आईनेस स्केलन से बांध दिया और कराची पोर्ट के पास पहुंचने तक उन्हें खींचा।
बोट तभी शुरू की गई जब कि कराची पोर्ट के बहुत करीब पहुंच गई। रात करीब 10:30 बजे इन मिसाइल बोट ने भीषण हमला कर दिया। पोर्ट में खड़े पाकिस्तान के युद्धपोत पीएनएस खैबर और पीएनएस मुहाफिज पूरी तरह नष्ट होकर डूब गए और उनका वीनस चैलेंजर भी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। इसके साथ ही भारतीय सेना ने वहां रखे तेल के टैंकरों पर भी सफलतापूर्वक हमला किया जिसके कारण पूरे कराची पोर्ट में भयानक आग लग गई जो कई दिनों तक जलती रही।
6 दिसंबर की रात तक पाकिस्तानी सैनिकों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। 7 दिसंबर तक भारतीय सेना ने पूर्वी पाकिस्तान में भी बड़ी सफलता हासिल कर ली। पूर्वी पाकिस्तान का पहला बड़ा शहर जैसोर आजाद हो गया था। यह एक बड़ी जीत थी क्योंकि यहां एक पाकिस्तानी एयरबेस था जिसका इस्तेमाल अब भारतीय वायुसेना अपने आगे के हमलों के लिए करने वाली थी। बांग्लादेश को पूरी तरह से आजाद कराने के लिए भारतीय सेना के लिए ढाका पर कब्जा करना बेहद जरूरी था। क्योंकि ढाका पूर्वी पाकिस्तान की राजधानी थी। लेकिन डायरेक्ट वहां पहुंचना आसान भी नहीं था। इसलिए भारतीय सेना की टुकड़ियों ने पहले 10 दिसंबर तक सिलहट डाउन इलाके को अपने कब्जे में लिया। अब उन्हें मेघना नदी पार करके ढाका की ओर बढ़ना था। भारतीय सेना ने अपने एमआई हेलीकॉप्टरों का इस्तेमाल करते हुए मेघना नदी को भी पार कर लिया।
भारतीय सेना हर तरफ से आगे बढ़ रही थी और अब भारत के लिए ढाका दूर नहीं था। लेकिन तभी दुनिया का सबसे ताकतवर देश अमेरिका पाकिस्तान के समर्थन में युद्ध में उतर जाता है। अमेरिका ने पाकिस्तान के समर्थन में अपने नेवी टास्क फोर्स 74 को बंगाल की खाड़ी में भेज दिया। इस बेड़े में दुनिया का सबसे बड़ा एयरक्राफ्ट करियर, आठ नेवी शिप और एक न्यूक्लियर अटैक सबमरीन शामिल थी। इसके साथ ही ब्रिटेन ने भी अपना ईगल एयरक्राफ्ट कैरियर और कुछ नेवी शिप भारत के खिलाफ अरब सागर की तरफ भेज दिए। पाकिस्तान, अमेरिका और ब्रिटेन तीनों से एक साथ निपटना भारत के लिए नामुमकिन था। नेक्स्ट टू इंपॉसिबल।
लेकिन पाकिस्तान और अमेरिका शायद भूल गए थे कि इंदिरा गांधी इसके लिए पहले से ही तैयार थी। इंदिरा गांधी ने सोवियत संघ के साथ जो मैत्री संधि की थी, उसका उपयोग करते हुए उनसे सहायता मांगी। सोवियत संघ ने बिना किसी देरी के अपना प्रशांत बेड़ा भारत की सहायता के लिए भेज दिया।
इस बेड़े में पांच से छह क्षमता वाली पनडुंबियां थी। सोवियत बेड़े ने अमेरिकी बेड़े को घेर लिया और ब्रिटेन के बेड़े का रास्ता रोक दिया। परमाणु युद्ध के डर से अमेरिका और ब्रिटेन ने आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं की और भारत के लिए एक बहुत बड़ा खतरा टल गया। 11 दिसंबर तक भारतीय सेना तेजी से आगे बढ़ रही थी। यह देखकर पाकिस्तान की सेना उत्तर से ढाका की ओर पीछे हटने लगी। 14 दिसंबर आते-आते ढाका पूरी तरह से घिर चुका था और भारत ने पाकिस्तान के सामने सरेंडर की मांग कर दी।
लेकिन पाकिस्तान ने अभी तक सरेंडर नहीं किया था। ऐसे में भारतीय वायुसेना को एक खुफिया जानकारी मिली। जिसके मुताबिक पूर्वी पाकिस्तान के गवर्नर ढाका के गवर्नमेंट हाउस में एक उच्च स्तरीय बैठक करने वाले थे जिसमें वो युद्ध जारी रखने पर फैसला लेने वाले थे। लेकिन इस बैठक के दौरान भारतीय वायुसेना ने कुछ ऐसा किया जिससे पाकिस्तान की जड़े हिल गई। भारतीय वायुसेना ने अपने मिग 21 से चलती मीटिंग के दौरान जोरदार हवाई कर दिया। पूरा गवर्नमेंट हाउस धुएधुएं में तब्दील हो गया।
गवर्नर एएम मलिक ने हवाई हमले के दौरान भागकर अपनी जान जैसे तैसे बचा ली। कांपते हाथों से अपना इस्तीफा लिखना शुरू कर दिया। गवर्नर के इस्तीफे के साथ ही पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सरकार की रीड अब टूट गई। 15 दिसंबर तक पाकिस्तानी सैनिकों ने अंदर से हार मान ली। भारतीय सेना ने ढाका पर कब्जा कर लिया था और भारतीय नौसेना ने समुद्री मार्ग भी बंद कर दिया था। असल में पाकिस्तानियों के लिए भागने का कोई अब मौका था ही नहीं। पाकिस्तानी सैनिक अपनी जान बचाने के लिए ढाका विश्वविद्यालय और दूसरी इमारतों में छिपे हुए थे।
इस दौरान से मौनिक शाह ने पाकिस्तानी सैनिकों और पाकिस्तान के पूर्वी सेना कमांडर जनरल नियाजी को संदेश प्रसारित किए जिसमें उन्होंने पाकिस्तान से बिना शर्त आत्मसमर्पण करने की मांग की। 16 दिसंबर को भारतीय सेना के पूर्वी कमान के चीफ ऑफ स्टाफ स्टाफ मेजर जनरल जैकब को पाकिस्तानी जनरल नियाजी के पास आत्मसमर्पण के लिए बातचीत करने के लिए भेजा गया। कई घंटों की गहन बातचीत के बाद जनरल नयाजी आत्मसमर्पण करने के लिए राजी हो गए।
उसी दिन ढाका के रमना रेस कोर्स में पाकिस्तान का आत्मसमर्पण समारोह किया गया। समारोह की शुरुआत में पाकिस्तानी सेना ने भारतीय सैन्य टुकड़ी को गार्ड ऑफ ऑनर दिया। फिर जनरल नियाजी ने लेफ्टिनेंट जनरल जे एस अरोला की देखरेख में सरेंडर के दस्तावेज पर सार्वजनिक रूप से हस्ताक्षर किए।
इसी दिन इंदिरा गांधी ने रिचर्ड निकन के उस पत्र का जवाब दिया और यह आइकॉनिक तस्वीर भी। इस ने बांग्लादेश को आजादी दिलाकर भारत को शरणार्थी शिविरों से होने वाली दिक्कतों से तो बचाया लेकिन इसमें जो सबसे ज्यादा उभर कर आई थी वो थी इंदिरा गांधी की स्मार्ट प्लानिंग सोवियत संघ से दोस्ती और सेना की जबरदस्त ताकत जिसने अमेरिका, चीन और ब्रिटेन जैसे बड़े देशों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।