द्वारका भगवान कृष्ण का शहर वो नगरी जहां सोने के महल थे जहां हजारों जहाज बंदरगाह पर खड़े रहते थे जहां हर गली में जीवन था रोशनी थी शक्ति थी वो एक रात में समुंदर में समा गई ना कोई बचा ना कोई निशान बस पानी हजारों साल से लोग सोचते रहे क्या यह सच था क्या सच में कोई शहर था या बस एक कहानी आज हम उसी सवाल का जवाब ढूंढेंगे और जो सच सामने आएगा वह आपको हिला देगा। पहले यह समझो द्वारका बसी क्यों? कृष्ण मथुरा में थे। लेकिन मगध का राजा जरासंध उनका सबसे बड़ा दुश्मन उसने मथुरा पर 17 बार हमला किया था।
17 बार और हर बार यदुवंश बचते-बचते निकलता था। कृष्ण जानते थे 18वां हमला आखिरी होगा। इसलिए उन्होंने एक फैसला लिया मथुरा छोड़ो पश्चिम की तरफ चलो समुंदर के किनारे एक ऐसी जगह जहां तीन तरफ पानी हो जहां दुश्मन केवल एक दिशा से आ सके जहां एक ऐसा किला बने जिसे कोई तोड़ ना सके। उस जगह का नाम था कुशस्थली और वहां कृष्ण ने समुद्र से 12 योजन जमीन मांगी। ग्रंथ कहते हैं समुद्र ने वह जमीन दी और उस जमीन पर द्वारका उठी। महाभारत में लिखा है अर्जुन जब पहली बार द्वारका आए तो उन्होंने दूर से देखा एक शहर
जो क्षितिज पर सूर्य की तरह चमक रहा था। चारों तरफ ऊंची दीवारें, चार विशाल दरवाजे और हर दरवाजे पर सशस्त्र पहरेदार, अंदर, सोने के महल जो आसमान को छूते थे। वैदुर्य मणि से जड़ी दीवारें, नीलमणि के भरश, हाथी दांत के पलंग और बंदरदाह पर हजारों जहाज जो अरब से, मिस्र से, सीरिया से आते थे। द्वारका दुनिया का व्यापार केंद्र था। हरिवंश पुराण में एक और बात लिखी है। द्वारका में हर नागरिक के पास एक विशेष मुद्रा होती थी। एक सील बिना उस सील के कोई भी शहर में प्रवेश नहीं कर सकता था। 3500 साल पहले एक शहर जिसमें पहचान पत्र था। यह था द्वारका। यह था कृष्ण का घर।
लेकिन हर शहर की एक उम्र होती है और द्वारका की उम्र कृष्ण की सांसों से बंधी थी। कुरुक्षेत्र का महायुद्ध खत्म हो गया था। पांडव जीत गए थे। कृष्ण द्वारका लौट आए थे। लेकिन एक मां थी गांधारी जिसके 100 बेटे उस युद्ध में मारे गए थे। उसने कृष्ण को देखा और उसकी आंखों से आंसू नहीं आग निकली। जैसे मेरे पुत्रा नष्ट हुए वैसे तुम्हारा पूरा कुल नष्ट होगा। कृष्ण ने वो श्राप सुना और चुप रहे क्योंकि वो जानते थे गांधारी गलत नहीं थी। और फिर महाभारत के मौसल पर्व में लिखा है द्वारका में अजीब घटनाएं होने लगी। रात को आसमान में भयानक आकृतियां दिखती थी। पक्षी उल्टी दिशा में उड़ने लगे। सूर्य और चंद्रमा एक साथ ग्रहण में चले गए और यदुवंशियों के बीच कृष्ण के अपने लोगों के बीच आपस में युद्ध शुरू हो गया। एक उत्सव में नशे में चूर वो एक दूसरे पर टूट पड़े। भाई ने भाई को मारा, बाप ने बेटे को और देखते-देखते पूरा यदुवंश अपने ही हाथों से मिट गया। बलराम कृष्ण के भाई तट पर बैठ गए और अपने प्राण त्याग दिए। कृष्ण अकेले जंगल में चले गए। एक पेड़ के नीचे बैठ गए। थके हुए शांत। एक शिकारी ने दूर से उनका पैर देखा। उसने सोचा हिरण है। तीर चलाया और इस संसार में भगवान कृष्ण का अंत हो गया। द्वारका अब अनाथ थी। अपने भगवान के बिना
और समुंदर समुंदर जाग रहा था। कृष्ण के जाने के बाद अर्जुन द्वारका आए। बचे हुए लोगों को रानियों को हस्तिनापुर ले जाने शहर खाली होने लगा। गलियां जो कभी भरी रहती थी सुनसान हो गई। मंदिरों की घंटियां बंद हो गई। बंदरगाह के जहाज चले गए और जैसे ही अर्जुन अंतिम लोगों को लेकर निकले, समुंदर ने अपनी सीमा तोड़ दी। महाभारत में अर्जुन ने खुद इसे देखा था और युधिष्ठिर को बताया समुंदर जो हमेशा अपनी सीमा में रहता था। अचानक उस सीमा को तोड़ दिया। वो शहर में घुस आया। गलियों में, महलों में, मंदिरों में, एक के बाद एक इमारतें डूबती गई। कुछ ही पलों में सब खत्म। जहां पूरा शहर था, वहां बस एक शांत झील थी। द्वारका बस एक नाम रह गया, बस एक याद। विष्णु पुराण यही कहता है हरिवंश भी तीन अलग-अलग ग्रंथ एक ही बात लेकिन अब एक सवाल क्या सच में ऐसा हुआ था या यह सिर्फ एक कहानी है सच आज भी समुंदर के नीचे दफन है और ऐसी ही कहानियों की परतें खोलने के लिए चैनल को सब्सक्राइब कर लो क्योंकि जो अगला रहस्य है वह आपको सोचने पर मजबूर कर देगा हां।