एक समय था जब लंदन में बसना लाखों लोगों का सपना हुआ करता था। दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियां, ऊंची सैलरी, बेहतरीन शिक्षा, आधुनिक जीवन शैली और अंतरराष्ट्रीय अवसर। इन सब ने लंदन को दुनिया का सबसे आकर्षक शहर बना दिया था। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है।
ब्रिटेन की राजधानी लंदन से जुड़ी एक चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है। कोविड महामारी को छोड़ दें तो 1988 के बाद पहली बार ऐसा हुआ है जब लंदन की आबादी में गिरावट दर्ज की गई। सवाल यह है कि आखिर दुनिया के सबसे बड़े फाइनेंशियल हब से लोग पलायन क्यों कर रहे हैं? आखिर ऐसा क्या बदल गया कि लोग खुद लंदन छोड़कर दूसरे शहरों में बसना बेहतर समझ रहे हैं। ब्रिटेन के ऑफिस फॉर नेशनल स्टैटिक्स ओएस के ताजा आंकड़ों के मुताबिक लंदन की आबादी में करीब 0%3 माफ़ कीजिएगा 0.3% की कमी आई है। आंकड़ों के अनुसार शहर ने लगभग 27,000 स्थानीय निवासी खो दिए हैं। और अब लंदन की कुल आबादी घटा घटकर लगभग 91.23 लाख रह गई है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि पूरे इंग्लैंड में केवल लंदन ऐसा क्षेत्र है जहां आबादी कम हुई है। जबकि देश के लगभग सभी अन्य हिस्सों में आबादी बढ़ी है। यानी लोग ब्रिटेन छोड़ नहीं रहे बल्कि सिर्फ लंदन छोड़ रहे हैं।
और इस बदलाव के पीछे सबसे बड़ी वजह महंगाई और रहने की बढ़ी बढ़ती लागत। लंदन में रहना अब पहले की तुलना में कहीं ज्यादा महंगा हो चुका है। घरों का किराया लगातार रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच रहा है। खासकर इन्हें लंदन में रहने वाले लोगों की कमाई का लगभग 40 से 50% हिस्सा केवल किराया देने में ही खर्च हो जाता है। यानी जो पैसा लोग पहले बचा लेते थे वह अब सिर्फ रहने में खर्च हो रहा है। ऐसे में मध्यम वर्ग और युवा पेशेवरों के लिए लंदन में रहना लगातार मुश्किल होता जा रहा है। सिर्फ किराया ही नहीं बल्कि घर खरीदना भी लगभग सपना बन चुका है। लंदन में एक औसत घर की कीमत लगभग 5 लाख पाउंड यानी भारतीय मुद्रा में करीब ₹.5 करोड़ तक पहुंच गई है।
यह पूरे ब्रिटेन के औसत घर की कीमत से लगभग दोगुनी है। दूसरी ओर बैंक ऑफ इंग्लैंड की ऊंची ब्याज दरों के कारण होम लोन भी काफी महंगे हो गए हैं और इसका मतलब यह है कि नौकरी होने के बावजूद बड़ी संख्या में लोग अपना घर खरीदने की स्थिति में नहीं है। लंदन से पलायन की दूसरी बड़ी वजह है वर्क फ्रॉम होम और हाइब्रिड वर्क कल्चर। कोरोना महामारी के बाद काम करने का तरीका पूरी तरह बदल गया। कई कंपनियां अपने कर्मचारियों को सप्ताह में सिर्फ दो या तीन ऑफिस बुलाती है तीन दिन। बाकी काम घर से हो जाता है और पहले लोगों को रोज ऑफिस पहुंचने के लिए लंदन में रहना जरूरी था। लेकिन अब ऐसा नहीं है और यही कारण है कि हजारों कर्मचारी लंदन छोड़कर आसपास के छोटे शहरों या ग्रामीण इलाकों में बस रहे हैं। वहां उन्हें कम किराए, बड़े घर, साफ वातावरण, बेहतर जीवनशैली मिल रही है। जबकि उनकी सैलरी लगभग वही बनी हुई है। पिछले एक साल में 4 लाख से ज्यादा लोगों ने लंदन छोड़कर ब्रिटेन के दूसरे हिस्सों का रुख किया। यह संख्या बताती है कि यह कोई छोटी या
अस्थाई प्रवृत्ति नहीं है बल्कि जीवन शैली में बड़े बदलाव का संकेत है। लोग अब केवल ऊंची सैलरी नहीं बल्कि बेहतर जीवन की तलाश कर रहे हैं। और इस पूरी तस्वीर में एक और महत्वपूर्ण कारण है ब्रिटेन के सख्त वीजा और इमीग्रेशन नियम। पहले लंदन छोड़ने वाले लोगों की कमी विदेशों से आने वाले नए प्रवासी पूरे कर देते लेकिन अब ब्रिटिश सरकार ने वीजा नियम काफी खड़े कर दिए हैं। विदेशी छात्रों और कुशल कर्मचारियों और प्रवासियों के लिए ब्रिटेन आना पहले की तुलना में कठिन हो गया है और इसका असर सीधे लंदन की आबादी पर दिखाई दे रहा है। पहले जितने लोग बाहर से आकर बसते थे अब उनकी संख्या काफी कम हो गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल आबादी का मामला नहीं बल्कि एक लंदन की अर्थव्यवस्था के लिए भी बड़ी चुनौती बन सकता है। लंदन लंबे समय से दुनिया के प्रमुख वित्तीय केंद्रों में शामिल रहा। यहां बैंकिंग, निवेश, टेक्नोलॉजी, कानून, मीडिया और अंतरराष्ट्रीय व्यापार का बड़ा नेटवर्क है। अगर बड़ी संख्या में कर्मचारी और युवा पेशेवर लगातार शहर छोड़ रहे हैं तो इसका असर स्थानीय कारोबार, रियलस्टेट, ट्रांसपोर्ट और सेवा क्षेत्र पर भी पड़ सकता है।
हालांकि दूसरी तरफ कुछ विशेषज्ञ इसे एक सकारात्मक बदलाव भी मानते हैं। उनका कहना है कि इससे ब्रिटेन के दूसरे शहरों का शहरों का विकास होगा और रोजगार और आर्थिक गतिविधियां केवल लंदन तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि छोटे शहरों में निवेश बढ़ेगा और वहां की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। क्षेत्रीय असमानता कम हो सकती है। कुल मिलाकर तस्वीरें साफ हैं कि लंदन की चमक अभी भी बरकरार है। लेकिन वहां रहने की कीमत इतनी बढ़ चुकी है कि बड़ी संख्या में लोग अब दूसरे विकल्प तलाश रहे हैं। महंगे किराए, करोड़ों के घर, ऊंची ब्याज दरें, सख्त वीजा नियम, हाइब्रिड वर्क कल्चर इन सभी कारणों ने मिलकर लंदन के दशकों पुरानी आबादी वृद्धि की कहानी को पलट दिया। जिस शहर में कभी पूरी दुनिया बसना चाहती थी, अब वहीं के लोग बेहतर और सस्ती जिंदगी की तलाश में दूसरे शहरों की ओर रुख कर रहे हैं। और यही वजह है कि 1988 के बाद पहली बार लंदन की आबादी में आई यह गिरावट केवल एक आंकड़ा नहीं बल्कि बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था और बदलती जीवन शैली का बड़ा संकेत मानी जा रही है।