शर्म नहीं आती? जा, जाकर किसी नदी नाले में डूब मार। अरे ऊपर वाले ने दो हाथ दिए हैं। आज हम बात करेंगे एक ऐसी शख्सियत की जिसके सामने उम्र, समाज, तहजीब और डर सब छोटे पड़ जाते हैं। जिसकी जिंदगी नवाबी ठाट से शुरू होकर थिएटर, सिनेमा, आजादी, प्यार, अकेलेपन और तक बेखौफ चलती है। नाम है जोहरा सहगल। यह कहानी किसी साधारण इंसान की नहीं है। यह कहानी उस दौर की है जब भारत में असली भारत और एक अलग इंडिया बसता था। वो इंडिया जहां नवाबी खानदान थे जिनके पास इतना पैसा था कि अंग्रेज हुकूमत भी सलाम ठोकती थी। जोहरा सहगल उसी नवाबी दुनिया में पैदा हुई।
27 अप्रैल 1912 सहारनपुर पूरा नाम साहिबजादे जोहरा मुमताज उल्ला खान बेगम नाम जितना भारी जिंदगी उससे कई ज्यादा बिंदास। जोहरा सिर्फ 102 साल तक जिंदा नहीं रही। उन्होंने 102 साल खुलकर जिया और खुलकर बोल भी दिया। जब उनसे पूछा गया कि जिंदगी में सबसे ज्यादा क्या एंजॉय किया तो बिना पलक झपकाए बोली और बहुत सारा लोग सं रह गए क्योंकि यह बात उन्होंने 101 साल की उम्र में कही थी। उनका मानना था जिंदगी आगे बढ़ाने के लिए ह्यूमर और दोनों जरूरी है और यही जोहरा थी किसी फ्रेम में फिट ना होने वाली। उनका खानदान रोहिलखंड के नवाबों से जुड़ा था। इतिहास के पन्नों में उनका नाम विवादों से भी जुड़ा रहा।
लेकिन जोहरा ने अतीत का बोझ कभी अपने ऊपर नहीं लिया। बचपन से ही वह अलग थी। लड़कियों जैसी नहीं लड़कों जैसी बेबाक। जवाब तुरंत डर बिल्कुल नहीं। छोटी उम्र में ही मां का साया उठ गया। लेकिन जाते-जाते मां एक बात कह गई। मेरी सारी बेटियां पढ़ेंगी और पिता ने यह बात गांठ बांध ली। लाहौर के क्वीन मैरी स्कूल में जोहरा पढ़ी जहां सिर्फ राजा नवाबों के बच्चे पढ़ते थे। पढ़ाई में अवल अंग्रेज टीचर्स की फेवरेट। लेकिन जैसे ही पिता ने शादी की बात सोची, टीचर्स डर गए। उन्हें पता था शादी मतलब पढ़ाई खत्म। इसलिए जानबूझकर जोहरा को तीन बार फेल किया गया।
जब पिता को सच्चाई समझ आई तो उन्होंने शादी की ज़िद छोड़ दी और यहीं से जोहरा की जिंदगी ने रफ्तार पकड़ ली। पहले पायलट बनने का सपना देखा फिर इंग्लैंड गईएक्टिंग सीखने। कार से भारत से इंग्लैंड का सफर आज सुनकर भी रही का अंदाजा आप लगा सकते हैं। वहां एक्टिंग के साथ-साथ डांस का चसका लगा।
जर्मनी जाकर बेली डांस सीखा। जर्मन भाषा तक सीख ली और वही उनकी मुलाकात हुई उदय शंकर से। भारतीय नृत्य से पहली बार जुड़ाव हुआ। यहीं से उनकी असली पहचान बनने लगी। 1935 में उदयशंकर के साथ दुनिया घूमी।
मंच परफॉर्मेंस शो जोहरा हर जगह छा गई। बाद में अल्मोड़ा के कल्चरल सेंटर में पढ़ाने लगी। यही मिले कामेश्वर सहगल। उम्र में 8 साल छोटे। समाज बोला रिश्ता नहीं चलेगा लेकिन जोहरा ने कहा बिल्कुल चलेगा और प्रेम विवाह कर लिया। यही थी जोहरा जो दिल कहे वही किया। कुछ साल लाहौर में डांस स्कूल चलाया। फिर दंगे भड़क उठे। एक साल की बेटी को लेकर मुंबई आना पड़ा और यहीं से शुरू हुआ उनका थिएटर और फिल्मी सफर। पृथ्वी थिएटर, आईबीटीए, नाटक, एक्टिंग की बारीकियां। जोहरा यहां भी सबसे अलग निकली। फिल्म धरती के लाल, फिर नीचा नगर जिसने अंतरराष्ट्रीय अवार्ड जीते। जोहरा रातोंरात स्टार बन गई। लेकिन घमंड नाम की चीज कभीपास नहीं आई। कमाल की बात तो यह है कि इतनी कामयाबी के बावजूद उन्होंने कभी अपना घर नहीं खरीदा।
किराए के घर में रही क्योंकि उन्हें कहींटिकना पसंद नहीं था। जिंदगी को बात कर नहीं खुला छोड़कर जीना चाहती थी। 1959 में पति का देहांत हुआ और जोहरा फिर अकेली हो गई। मुंबई छोड़कर दिल्ली फिर इंग्लैंड चली गई। सालों विदेश में रही बीबीसी के साथ काम किया। ढेर सारे ड्रामा फिल्में सीरीज की लेकिन भारत कभी दिल से नहीं गया।
90 के दशक में जब वो बहुत बुजुर्ग हो चुकी थी तब भारत लौटी और एक नई पारी शुरू की। दादी नानी के किरदार दिल से वीर जारा हम दिल दे चुके सनम सावरिया हर रोल में जान डाल दी सांवरिया उनकी आखिरी फिल्म बनी भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री पद्म भूषण से सम्मानित किया लेकिन जोरा इन सबसे ऊपर थी को लेकर भी उतनी ही बेबाक कहा मुझे शोक नहीं चाहिए अस्थियां नहीं चाहिए और अगर जरूरत पड़े तो टॉयलेट में बहा देना मेरी अस्थियां उन्होंने एक बार कहा था मैं के लिए खुद को तैयार कर रही हूं जब सोती हूं तो मुस्कुरा कर सोती हूं ताकि कि अगर मौत आए तो चेहरे पर मुस्कान हो।
102 साल की उम्र में जब जोहरा सैगल गई तो वह सिर्फ एक एक्ट्रेस नहीं थी। वो आजादी थी, बेबाक थी और इस बात का सबूत थी कि जिंदगी उम्र सेनहीं सोच से बड़ी होती है। जोहरा सैगल चली गई लेकिन सिखा गई जिंदगी को डर कर नहीं खुलकर जियो।