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एक फोन ने बदल दी किस्मत, और दूसरे फोन ने सब कुछ छीन लिया; ए आर रहमान की दर्दभरी कहानी!

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दिल ये [संगीत] बेचैन वे रस्ते पे नैन वे हो जानेमन तू ही [संगीत] मेरा दिल एक ऐसे संगीतकार जिनकी धुनें सीधा आत्मा में उतर गई और जिनका जयकारा पूरी दुनिया में गूंज उठा आजा आजा जिंद शालेरी वाले [संगीत] नीले आसमाने के तले जिसने अपनी रूहानी आवाज और जादुई संगीत से सात समंदर पार बैठे लोगों को भी भारतीयता का मुरीद बना दिया तेरे [संगीत] बिना रिया ओ सजना लेकिन क्या आप जानते हैं कि दुनिया को जय हो का नारा देने वाले ये शांत संगीतकार आज अपनी ही इंडस्ट्री में गैंग वॉर का शिकार हो चुके हैं। कैसे मुझे तुम [संगीत] मिल गई? क्या आप यकीन करेंगे कि बॉलीवुड के सबसे बड़े शोमैन सुभाष गई को इस संगीतकार ने मुंह पर कह दिया कि तुम्हारी फिल्म का म्यूजिक मैंने नहीं मेरे ड्राइवर ने बनाया है। ये क्या हुआ? क्यों ऐसे हमें सताएं? क्या आपको पता है कि जिस ऑस्कर को पाने के लिए लोग मरते हैं, उसे जीतने के बाद बॉलीवुड ने इन्हें ऐसा झटका दिया कि इनका करियर ही खत्म हो गया। मैं प्रेम [संगीत] का प्याला पिया एक पल में सदिया जिया। पर क्या वजह रही कि शादी के 29 साल बाद इनकी पत्नी को इनसे तलाक लेना पड़ा। चॉइस ऑफ़ बीइंग इन पब्लिक लाइफ इज इंटेंशनल। एवरीबडी गेट्स रिव्यु रिचेस्ट पर्सन और इवन अ गॉड गेट्स रिव्यू। सो हु एम आई? आखिर कैसे एक हिंदू बच्चा दिलीप दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम संगीतकार बन गया। क्यों अलका यािक ने इनका फोन यह कहकर काट दिया कि कौन हो तुम?

मैं तुम्हें नहीं जानती और आखिर क्यों सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद इन्हें चीख-चीख कर कहना पड़ा कि बॉलीवुड में एक पूरा गैंग इनके खिलाफ काम कर रहा है। बताएंगे और भी बहुत कुछ आप बने रहिए हमारे साथ। कहीं आग लगे [संगीत] लग जावे। कोई नाग डसे डस जावे कभी गगन के। दोस्तों आज हम बात कर रहे हैं इंडियन म्यूजिक इंडस्ट्री के वन ऑफ द मोस्ट टैलेंटेड आर्टिस्ट सुरों के बादशाह ए आर रहमान की। छयां छयां [संगीत] छयां छयां चल छयां छयां छयां छयां तो इससे पहले कि हम इनकी जिंदगी के अनसुने किस्से जहां सिर्फ सुरीली धुनें नहीं बल्कि अपमान बहिष्कार, धर्म परिवर्तन और एक टूटे हुए रिश्ते का दर्द और उसकी गहराइयों को समझे सबसे पहले जानते हैं कि इस कहानी की शुरुआत कहां से हुई। आरा भवरे [संगीत] जो हले-हले गाए। ए आर रहमान का जन्म 6 जनवरी 1967 को चेन्नई के एक हिंदू परिवार में हुआ। उस वक्त इनका नाम रखा गया दिलीप कुमार। पिता आर के शेखर खुद मलयालम फिल्मों के संगीतकार थे। इसलिए संगीत तो जैसे दिलीप को विरासत में मिला था। लेकिन खुशियों की यह धुन बहुत जल्द मातम में बदलने वाली थी। जब रहमान बहस छ साल के थे तो इनके पिता गंभीर रूप से बीमार पड़ गए। अस्पतालों के चक्कर लगते रहे। शरीर कंकाल बनता गया और फिर एक दिन वह चल बसे। 9 साल के दिलीप के लिए पिता का वह अंत किसी डरावने सपने से कम नहीं था। जब नन्हे रहमान ने अपने पिता को मुखाग्नि दी तो इस चिता में सिर्फ एक शरीर नहीं बल्कि रहमान के सपने भी जलकर खाक हो गए। और यहीं से शुरू हुई गरीबी और जिल्लत की वो कहानी जो आज भी रहमान को याद आती है तो इनकी रूह कांप उठती है। घर चलाने के लिए पिता के म्यूजिक इंस्ट्रूमेंट्स किराए पर देने पड़े। हालात इतने बदतर हो गए कि 11 साल की उम्र में जब बच्चे खिलौने से खेलते हैं, रहमान को काम करना पड़ा। यह अपने पिता के दोस्त एमके अर्जुन के साथ मलयालम आके में कीबोर्ड बजाने लगे। लेकिन संघर्ष सिर्फ पैसों का नहीं था, सम्मान का भी था। काम के बोझ के चलते रहमान का ध्यान पढ़ाई से हटता गया

और नंबर कमाने लगे। तब स्कूल की प्रिंसिपल ने इनकी मां कस्तूरी को बुलाकर वो शब्द कहे जो किसी भी स्वाभिमानी इंसान के दिल में खंजर की तरह चुभ जाए। प्रिंसिपल ने कहा, “मुझे तुम्हारे हालात पता है, लेकिन बच्चे की पढ़ाई खराब हो रही है। इसे स्कूल से निकाल लो और सड़कों पर जाकर भीख मांगो। यह बात उस बच्चे के दिल में ऐसी चुभी कि उसने किताबों को हमेशा के लिए बंद कर दिया और संगीत को अपना मुकद्दर बना लिया। लेकिन उस दौर में इन पर डिप्रेशन इस कदर हावी था कि रहमान के मन में अक्सर अपने जीवन का अंत करने और गलत रास्ते पर चलने के बुरे ख्याल आते रहे। गनीमत रही कि इन्होंने संगीत का दामन थामे रखा। हंसती रहे तू [संगीत] हंसती रहे हया के लाले खिलती रहे। दोस्तों, बॉलीवुड में अक्सर यह चर्चा रहती है कि आखिर एर रहमान ने धर्म क्यों बदला था? क्या यह कोई पब्लिसिटी स्टंट था या रूहानी पुकार? सच यह है कि इसके पीछे एक बहुत बड़ी पारिवारिक मजबूरी थी। 1989 का साल था। रहमान की छोटी बहन अचानक इतनी बीमार पड़ गई कि डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए। हर दवा बेअसर साबित हो रही थी और डॉक्टरों ने कह दिया कि अब इनके बचने की कोई उम्मीद ही नहीं है। पूरा परिवार हताश हो चुका था। तब डूबते को तिनके का सहारा मिला। रहमान की मां एक मुस्लिम फकीर के संपर्क में आई। कहा जाता है कि उस फकीर की दुआओं ने वो कर दिखाया जो मेडिकल साइंस नहीं कर सका। यानी कि रहमान की बहन पूरी तरह ठीक हो गई। इसे मां और रहमान ने एक चमत्कार माना और 23 साल की उम्र में दिलीप कुमार और इनके पूरे परिवार ने हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम कबूल कर लिया और इस तरह दिलीप कुमार बन गए। अल्लाह राखा रहमान मुकाबला सुभान अल्लाह हालांकि इनकी बायोग्राफी द स्पिरिट ऑफ म्यूजिक में एक और दिलचस्प किस्सा सामने आता है। रहमान को अपना नाम दिलीप कभी पसंद ही नहीं था। शादी से पहले जब इनकी मां इनकी बहन की कुंडली दिखाने एक हिंदू ज्योतिष के पास गई थी तो उस ज्योतिष ने सलाह दी थी कि इस लड़के का नाम बदल दो तो इसकी किस्मत भी बदल जाएगी। तब इनकी मां ने अल्लाह राखा नाम चुना और रहमान ने उसमें अपना पसंदीदा सरनियम जोड़ लिया। नाम बदलने के बाद जैसे किस्मत के दरवाजे खुल गए। 1992 में इन्होंने चेन्नई में अपना खुद का रिकॉर्डिंग स्टूडियो शुरू किया। पंचथन रिकॉर्डिंग। हालांकि तब किसे पता था कि यह एक दिन एशिया का सबसे शानदार स्टूडियो बनेगा। इसी दौरान मणि रत्नम अपनी फिल्म रोजा बना रहे थे। अब तक उनकी फिल्मों का संगीत दिग्गज हिलैया राजा दिया करते थे। लेकिन इस बार मणि रत्नम ने जिंगल्स बनाने वाले एक नए लड़के ए आर रहमान पर दांव खेला। आपको जानकर हैरानी होगी कि जिस एल्बम ने रहमान को रातोंरात स्टार बना दिया। जिस एल्बम ने इन्हें पहली ही फिल्म में नेशनल अवार्ड दिला दिया उसके लिए इन्हें फीस के तौर पर महज ₹25,000 मिले थे। दीवा दिया ये खुला आसुआ आ गए हम कहां है लेकिन बॉलीवुड का अहंकार देखिए जब रहमान इस फिल्म के गानों के लिए उस दौर की टॉप सिंगर्स को अप्रोच कर रहे थे तो इसी दौरान इन्होंने अलका याग्निक को भी फोन किया। अलका ने एक इंटरव्यू में खुद कबूला कि जब रहमान का फोन आया तो उन्होंने यह कहकर मना कर दिया कि मैं किसी ए आर रहमान को नहीं जानती। मेरे पास डेट्स नहीं है। यही हाल कुमार सानू का भी था। लेकिन जब रोजा रिलीज हुई और अलका ने उसके गाने सुने तो उन्हें लगा कि वह अपना सर दीवार पर दे मारे। वो गाने इतने सुंदर थे कि आज तक अलका को उस फैसले पर पछतावा होता है। दिल है छोटा सा [संगीत] छोटी सी आशा। हालांकि शुरुआत में हिंदी फिल्म मेकर्स को लगता था कि ए आर रहमान का संगीत सिर्फ साउथ में चलेगा। हिंदी वालों को यह हजम नहीं होगा। लेकिन रामगोपाल वर्मा ने यह रिस्क लिया। 1994 की फिल्म रंगीला के लिए प्रोड्यूसर अनु मलिक को साइन कर चुके थे। लेकिन रामू अड़ गए और रहमान को ले आए। रिजल्ट यह हुआ कि रंगीला के संगीत ने पूरे देश को नचा दिया और ए आर रहमान को पहला हिंदी फिल्म फेयर अवार्ड भी मिला।

रे रे चोर लगा के नाच रे बताया जाता है कि रहमान अपनी आस्था और उसूलों के काफी पक्के हैं। इसका सबूत मिलता है दीपा मेहता की 1996 की विवादित फिल्म फायर के किस्से से। इस फिल्म का कंटेंट होमोसेक्सुअलिटी पर था जिसे लेकर देश भर में हंगामा मचा हुआ था। जब दीपा मेहता ने प्रोड्यूसर से कहा कि मुझे संगीतकार के तौर पर ए आर रहमान चाहिए तो प्रोड्यूसर हंसने लगे। उन्होंने कहा कि रहमान बहुत ही कंजर्वेटिव माइंडसेट के आदमी है और वह ऐसी फिल्म में काम नहीं करेंगे। लेकिन दीपा मेहता ने हार नहीं मानी और रहमान से मिली। रहमान ने शर्त रखी कि पहले वह पूरी फिल्म देखेंगे और इन्होंने अपनी पत्नी और दीपा मेहता के साथ घर पर फिल्म देखी और जब इन्हें फिल्म की थीम समझ आई तो यह राजी हो गए। रहमान ने इस फिल्म के लिए 14 इंस्ट्रूमेंटल साउंड ट्रैक तैयार किए और साबित कर दिया कि कला किसी बंधन की मोहताज नहीं है। [संगीत] इसके बाद साल 1997 में इनका वंदे मातरम एल्बम आया और साल 1998 में दिल से [संगीत] वंदे मातरम [संगीत] छया छया गाने ने शाहरुख खान, सुखविंदर सिंह और रहमान तीनों को अमर कर दिया। छया छया छया [संगीत] छया चल छया छया छया छया बताया जाता है कि रहमान का मिजाज बेहद शांत है और यह कम बोलते हैं लेकिन जब बात स्वाभिमान की आती है तो यह किसी बड़े से बड़े शोमैन को भी नहीं बखशते। यह किस्सा है साल 2008 की फिल्म युवराज का। डायरेक्टर सुभाष गई और रहमान के बीच एक गाने को लेकर ऐसी ठन गई कि बात तू तू मैंम पर जा पहुंची। हुआ यूं कि सुभाष गई को एक गाना अर्जेंटली चाहिए था। लेकिन रहमान अपने बिजी स्ेड्यूल और लंदन ट्रिप्स के कारण उसे टाल रहे थे। तंग आकर एआर रहमान ने कह दिया कि मैं लंदन से लौटकर सुखविंदर सिंह के स्टूडियो में मिलूंगा और वहीं धुन दे दूंगा। रहमान ने सुखविंदर को फोन करके कहा कि तुम एक डमी ट्यून बना करके रखो। जब सुभाष घई स्टूडियो पहुंचे तो देखा कि रहमान गायब है और सुखविंदर सिंह धुन बना रहे हैं। सुभाष घ गई घई का पारा सातवें आसमान पर जा पहुंचा। जैसे ही ए आर रहमान आए सुभाष घ गई उन पर बरस पड़े। उन्होंने चिल्लाकर कहा कि करोड़ों रुपए की फीस मैंने तुम्हें दी है और तुम ट्यून सुखविंदर से बनवा रहे हो। तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई? इस पर एआर रहमान ने जवाब दिया, आप पैसे मेरे नाम के दे रहे हैं मेरे म्यूजिक के नहीं। अगर मैं इसे एंडोर्स कर रहा हूं तो यह मेरा है। आपको क्या पता कि आपकी हिट फिल्म ताल का म्यूजिक मैंने बनाया था या मेरे ड्राइवर ने। रहमान की ड्राइवर वाली बात से इन दोनों के बीच तल्खी इतनी बढ़ गई कि वो गाना युवराज से हटा दिया गया। लेकिन किस्मत का खेल देखिए कि वही रिजेक्टेड गाना बाद में स्लम डॉग मिलेनियर का जय हो बना और रहमान को ऑस्कर दिला गया। जय हो जय हो ने भारत का नाम रोशन तो किया लेकिन इसके पीछे भी एक दर्दनाक सच और एक बड़ा विवाद छुपा है। 17 दिसंबर 2008 को जब यह गाना ऑस्कर के लिए नॉमिनेट हुआ तो रहमान ने सबसे पहले सुखविंदर सिंह को फोन किया और कहा कि सुखी तैयारी कर लो हम लॉस एंजेल्स में परफॉर्म करने वाले हैं। सुखविंदर और गीतकार गुलजार साहब के लिए यह जिंदगी का सबसे बड़ा पल होने वाला था। सुखविंदर ने पासपोर्ट से लेकर कपड़े सब तैयार कर लिए। लेकिन जैसे-जैसे तारीख नजदीक आती गई, ए आर रहमान का फोन नॉट रीचेबल होता गया। ना कोई टिकट आया, ना ऑस्कर कमेटी की तरफ से कोई वर्क परमिट मिला। नतीजा यह हुआ कि जिस दिन पूरी दुनिया भारत का डंका बजते देख रही थी, उस दिन इस गाने के असली हीरो सुखविंदर सिंह और गुलजार साहब भारत में टीवी के सामने मायूस होकर बैठे थे। ऑस्कर सेरेमनी में जिस गाने को सुखविंदर सिंह को गाना था, वहां उसे किसी फीमेल सिंगर ने गाया और लोग हंस रहे थे। आजा आजा जी [संगीत] शाम यानी के तल्ले आजा सारी वारे नीले आसमान के [संगीत] तल्ले। आरोप लगे कि ए आर रहमान सारा क्रेडिट अकेले लेना चाहते थे। इसलिए इन्होंने सुखविंदर सिंह का नाम आगे भेजा ही नहीं। और हद तो तब हो गई

जब स्टेज पर भी यह स्पीच देते वक्त सुखविंदर का नाम लेना भूल गए। हालांकि सुखविंदर ने बड़ा दिल दिखाया और मीडिया में ए आर रहमान के खिलाफ कुछ नहीं कहा। 13 साल बाद रहमान ने अपनी गलती मानी और सुखविंदर से माफी मांग ली कि मुझे माफ करना मैं उस वक्त घबराहट में तुम्हारा नाम लेना ही भूल गया। रहमान का कॉन्फिडेंस किस लेवल का था इसका अंदाजा साल 2009 के किंग ऑफ पॉप माइकल जैक्सन वाले किस्से से लगता है। जब माइकल जैक्सन के मैनेजर ने रहमान से कहा कि एमजे उनसे मिलना चाहते हैं तो रहमान ने ईमेल पर इसका एक टका जवाब दिया कि मैं उनसे अभी नहीं मिलना चाहता। अगर मैं ऑस्कर जीता तभी मिलूंगा वरना नहीं। रहमान को पूरा यकीन था कि यह जीतेंगे और ऑस्कर मिलने के बाद ही यह माइकल जैक्सन से मिलने पहुंचे। एमजे ने घर का दरवाजा खुद खोला और उन्होंने जय हो की तारीफ की और रहमान को अपने डांस मूव्स दिखाए। दोनों मिलकर फिल्म रोबोट के लिए एक गाना भी तैयार करने वाले थे। लेकिन अफसोस कि इससे पहले ही माइकल जैक्सन का निधन हो गया। लेकिन जानकारों की मानें तो जिस ऑस्कर ने इन्हें दुनिया का सरताज बनाया उसी ने बॉलीवुड में इनके करियर को खत्म कर दिया। शेखर कपूर ने रहमान के ऑस्कर जीतने के बाद एक ट्वीट किया था। रहमान तुम्हारे साथ दिक्कत यह है कि तुम ऑस्कर ले आए। बॉलीवुड में ऑस्कर किस ऑफ डेथ यानी मौत का बुलावा है। तुम में इतना टैलेंट है कि बॉलीवुड उसे हैंडल नहीं कर सकता। सुशांत सिंह राजपूत की फिल्म दिल बेचारा के समय डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा ने खुलासा किया कि जब वह रहमान के पास गए तो इंडस्ट्री के कई बड़े लोगों ने उन्हें रोका था। उन्हें भड़काया गया कि रहमान के पास मत जाओ। वह अब काम नहीं करेगा। तब रहमान का दर्द छलका और इन्होंने दुनिया के सामने कहा, “मैं अच्छी फिल्मों को मना नहीं करता, लेकिन बॉलीवुड में एक पूरा गैंग मेरे खिलाफ काम कर रहा है। मेरे बारे में झूठी अफवाहएं फैलाई जा रही हैं ताकि मुझे काम ना मिले।” तो आखिर इस गैंग में कौन था? कुछ लोग कहते हैं कि करण जौहर और सुभाष घई जैसे दिग्गजों से रहमान की अनबन इन्हें भारी पड़ गई। करण जौहर ने कल हो ना हो के लिए रहमान को अप्रोच किया था। लेकिन रहमान अपने गानों की पब्लिशिंग राइट्स अपने पास रखना चाहते थे जो कि करण जौहर को मंजूर नहीं था। तो उन्होंने इन्हें हटा करके रातोंरात शंकर एहसान लोय को साइन कर लिया। इसके अलावा एक कारण यह भी था कि रहमान ने चेन्नई में अपना वर्ल्ड क्लास स्टूडियो बनाया था और यह चाहते थे कि बॉलीवुड वाले रिकॉर्डिंग के लिए चेन्नई में इनके स्टूडियो में ही आए।

यह भी बताया गया कि रहमान रात के 12:00 बजे के बाद रिकॉर्ड करते थे। जो कि कुमार सानू जैसे दिग्गज सिंगर्स को पसंद नहीं था। इन सभी वजहों से धीरे-धीरे बॉलीवुड ने ए आर रहमान के लिए सभी दरवाजे बंद कर दिए और साल 2010 के बाद इन्हें रॉकस्टार, तमाशा, हाईवे और अतरंगी रे जैसी कुछ चुनिंदा बड़ी फिल्मों में ही काम करने का मौका मिला। मीठे पान गौरी [संगीत] सूट लहरी हट्टे मारती। और अब करियर के इस उतार-चढ़ाव के बीच रहमान की निजी जिंदगी भी बिखर गई। साल 1995 में सायरा बानू के साथ इनकी अरेंज मैरिज हुई थी। शादी के लिए रहमान ने अपनी मां के सामने तीन शर्तें रखी थी कि लड़की पढ़ी लिखी हो, संगीत प्रेमी हो और उसमें विनम्रता हो। इनकी मां ने सायरा को चुना जो गुजरात से ताल्लुक रखती थी। रहमान ने सायरा को पहली मुलाकात में ही एक अनोखी शर्त बता दी कि अगर हम डिनर कर रहे हो और मुझे कोई धुन सूझी हो तो मुझे डिनर बीच में ही छोड़कर जाना पड़ेगा। सायरा ने यह शर्त मान ली और 29 साल तक इस जीनियस का साथ भी दिया। इनके तीन बच्चे भी हुए खदीजा, रहीमा और अमीन। लेकिन शादी के 29 साल बाद वकीलों के बयानों और रहमान के सोशल मीडिया पोस्ट ने पुष्टि करदी कि इनका रिश्ता टूट चुका है। रहमान ने लिखा कि इन्हें उम्मीद थी कि शादी के 30 साल यह जरूर पूरे करेंगे लेकिन ऐसा नहीं हो सका और हैरान करने वाली बात यह भी है कि रहमान के ऐलान के कुछ ही घंटों बाद इनके ट्रूप की लीड गिटारिस्ट मोहिनी डे ने भी अपने पति से अलग होने का ऐलान कर दिया। सोशल मीडिया पर लोग इन दोनों घटनाओं को जोड़कर देखते रहे और तरह-तरह की अटकलें भी लगाते रहे। हालांकि इसमें कितनी सच्चाई है वह तो वक्त ही बताएगा। मेरी तरफ आता [संगीत] हर गम भी सर।

दोस्तों आज ए आर रहमान के पास दो ऑस्कर, दो ग्रेमी, एक गोल्डन ग्लोब, एक बाफटा और सात नेशनल अवार्ड्स हैं। कनाडा के मरखम शहर में इनके नाम पर एक सड़क भी है। यह दुनिया के टॉप 10 संगीतकारों में गिने जाते हैं। लेकिन क्या यह शर्म की बात नहीं कि जिस टैलेंट को पूरी दुनिया पूजती है, उसे हमारे अपने ही बॉलीवुड ने गैंगज्म और पॉलिटिक्स का शिकार बना दिया। इनकी दुनिया आज भी रूह में उतरती है। चाहे वो कुन फाया कुन हो या मां तुझे सलाम। लेकिन अफसोस हिंदी सिनेमा इस नायाब हीरे की कदर ही नहीं कर पाया। [संगीत] तो आपको क्या लगता है? क्या रहमान का बॉलीवुड से दूर होना इनका घमंड और जिद थी या इंडस्ट्री की गंदी राजनीति? और क्या 29 साल पुरानी शादी इस तरह टूट जाना कामयाबी की असल कीमत है? अपनी राय हमें कमेंट्स में जरूर बताएं। और इस अद्भुत संगीतकार को डेडिकेटेड इस वीडियो पर आपका एक लाइक तो बनता ही है। बॉलीवुड की किसी बेबाक स्टोरी के साथ अगले वीडियो में आपसे फिर होगी मुलाकात। तब तक के लिए नमस्कार। तू मेरी [संगीत] अधूरी प्यास प्यास तू आ गई मन को रास रास अब तो [संगीत] तर

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