Cli

देवानंद की वो फिल्म जो आज भी है एक रहस्य? जिसके गायब होने का मलाल आज भी फिल्म प्रेमियों को है?

Uncategorized

नमस्कार आप सुन रहे हैं द बॉलीवुड रेडियो और मैं हूं आपके साथ आकाश। दोस्तों आज के इस पॉडकास्ट में किस्सा है देवानंद की उस फिल्म का जो कभी रिलीज ही नहीं हुई। लेकिन उसके गाने आप आज भी सुन सकते हैं। देववानंद और साधना की जोड़ी हिंदी सिनेमा की उन खूबसूरत जोड़ियों में गिनी जाती है जिन्हें दर्शकों ने पर्दे पर भले ही बहुत कम फिल्मों में देखा लेकिन उनकी मौजूदगी हमेशा यादगार रही। देवानंद अपनी दिल फेक अदाओं तेज चाल अलग हेयर स्टाइल गर्दन झुकाकर डायलॉग बोलने का अंदाज और सदाबहार व्यक्तित्व के लिए मशहूर थे। जबकि साधना अपने आधुनिक फैशन आकर्षक स्क्रीन प्रेजेंस और मशहूर साधना कट हेयर स्टाइल की वजह से युवाओं की पसंद बन चुकी थी। दोनों ने साथ में सबसे पहले साल 1961 में आई फिल्म हम दोनों और फिर 1962 में असली नकली फिल्म में काम किया। लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि इन दोनों की एक तीसरी फिल्म भी बनने जा रही थी। साजन की गलियां। यह फिल्म पूरी हो जाती और रिलीज हो जाती तो शायद देवांद और साधना की जोड़ी को दर्शक एक बार फिर बड़े पर्दे पर देख पाते। लेकिन किस्मत को कुछ और मंजूर था।

साजन की गलियां अधूरी रह गई। और इसकी पूरी कहानी आज हिंदी सिनेमा के उन खोए हुए अध्यायों में शामिल है जिनके बारे में जानकर फिल्म प्रेमियों को हमेशा अफसोस होता है। जो मौजूद उपलब्ध डाटा है उसके मुताबिक इस फिल्म का निर्माण मशहूर सिनेमेटोग्राफर फली मिस्त्री कर रहे थे और निर्देशन की जिम्मेदारी राज खोसला के पास थी। राज खोसला उस दौर के बहुत प्रतिभाशाली निर्देशकों में थे और साधना के साथ उनकी जोड़ी भी खास रही थी। दोनों ने एक मुसाफिर एक हसीना बाद में वो कौन थी जैसी चर्चित फिल्मों में काम भी किया था। साजन की गलियां में देववानंद और साधना के साथ एक नई अभिनेत्री जहीदा भी महत्वपूर्ण भूमिका में थी। जहीरा को अभिनेत्री नरगिस के परिवार से जुड़ा बताया जाता है और यह फिल्म उनके करियर के शुरुआती बड़े अवसरों में से एक मानी जाती है। बाद में जहीदा ने देवांद के साथ प्रेम पुजारी और गैंबलर जैसी फिल्मों में काम किया। साजन की गलियां की सबसे बड़ी खासियत इसका संगीत था। संगीतकारों की महान जोड़ी शंकर जयकिशन फिल्म का संगीत तैयार कर रहे थे और गीतों के लिए हसरत जयपुरी का नाम है। फिल्म के कम से कम दो गाने आज भी फिल्म संगीत के शौकीनों के बीच चर्चा का विषय हैं।

क्योंकि भले फिल्म रिलीज ना हुई हो लेकिन उसके कुछ फुटेज और गीत बाद में सुरक्षित रूप से सामने आए। पहला गीत था हमने जिनके ख्वाब सजाए। आज वह मेरे सामने हैं जिसे मोहम्मद रफी ने अपनी मखमली आवाज दी और यह रोमांटिक गीत था और इसके बोल हसरत जयपुरी ने लिखे थे जबकि धुन शंकर जयकिशन ने तैयार की थी। आज उपलब्ध रिकॉर्डिंग के बाद और इन संकलनों में इस गीत को साजन की गलियां फिल्म से जोड़कर पहचाना जाता है। दूसरा जो गीत था वह था हम खूब जानते हैं क्या दिल में है तुम्हारे। जिसकी खासियत यह थी कि इसमें मोहम्मद रफी, गीता दत्त और सुमन कल्याणपुर जैसी अलग-अलग आवाजों का संगम सुनाई देता है। यह गीत देवानंद, साधना और जहीदा पर फिल्माया गया था। इस गीत के बोल भी हसरत जयपुरी ने लिखे थे और संगीत शंकर जयकिशन का था। बाद में यह गीत और इससे जुड़े सीन एक दूसरी फिल्म में इस्तेमाल किए गए। जिसकी वजह से साजन की गलियां पूरी तरह इतिहास में गुम हो गई।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि साजन की गलियां का निर्माण का जो समय है वह 1960 के दशक के मध्य का माना जाता है और फिल्म अधूरी रह जाने का कारण इसका सही रिलीज वर्ष तय नहीं हो पाया। यही वजह रही कि अलग-अलग स्रोतों से इसे 1966 से 1968 के आसपास का प्रोजेक्ट बताया जाता है। और इतना जरूर स्पष्ट है कि फिल्म की शूटिंग शुरू हो चुकी थी। देवांद और साधना और जहीदा के कुछ सीन फिल्माए भी जा चुके थे। फिल्म आखिर अधूरी क्यों रह गई इस बारे में कोई आधिकारिक और सर्वमान्य कारण सार्वजनिक रिकॉर्ड में उपलब्ध नहीं दिखता। इसलिए यह कहना ज्यादा सही होगा कि फिल्म किन परिस्थितियों में बंद हुई इसका निश्चित कारण अब भी एक रहस्य है। कई पुरानी फिल्म संदर्भों में इसे अधूरा या छोड़ दिया गया प्रोजेक्ट बताया जाता है। लेकिन वित्तीय समस्या रचनात्मक मतभेद या निर्माण संबंधी किसी खास कारण की पक्की पुष्टि करना बहुत मुश्किल है। यही अधूरापन साजन की गलियां फिल्म को और रहस्यमय बना देता है। फिल्म से जुड़ा एक बेहद रोचक तथ्य यह भी है कि अगर साजन की गलियां पूरी होकर समय पर रिलीज हो जाती और रंगीन फिल्म के रूप में दर्शकों के सामने आती तो देवानंद के करियर की रंगीन फिल्मों के इतिहास को लेकर चर्चा अलग हो सकती थी। देवांद की गाइड 1965 में आई और वह उनके करियर की प्रमुख रंगीन फिल्मों में गिनी जाती है। लेकिन साजन की गलियां का अधूरा रह जाना इस संभावित उपलब्धि

को हमेशा के लिए अधूरा छोड़ गया। हालांकि इस तरह के दावों में फिल्म के निर्माण और रिलीज क्रम को लेकर जो डाटा है उसमें अंतर मिलता है। इसलिए इसे फिल्म इतिहास के एक रोचक क्या होता अगर वाले प्रसंग के रूप में देखना ज्यादा उचित है। देववानंद और साधना की जोड़ी के प्रशंसकों के लिए सबसे बड़ा अफसोस यह रहा कि हम दोनों और असली नकली के बाद उन्हें इस जोड़ी को तीसरी बार देखने का मौका नहीं मिला। साजन की गलियां के बाद दोनों फिर किसी नई फिल्म में साथ नजर नहीं आए और एक संभावित सफल स्क्रीन जोड़ी का यह सफर दो फिल्मों के बाद खत्म हो गया। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। करीब डेढ़ दशक बाद साल 1983 में रिलीज हुई एक बेहद अनोखी फिल्म साजन की गलियां के बचे हुए अंशों को दर्शकों के सामने पहुंचाया गया। उस फिल्म का नाम था फिल्म ही फिल्म। यह कोई सामान्य फिल्म नहीं थी और इसका पूरा विचार ही हिंदी सिनेमा के उन अधूरे सपनों और अधूरी फिल्मों के इर्द-गिर्द तैयार किया गया था जिनकी शूटिंग तो शुरू हुई लेकिन वह कभी थिएटर तक नहीं पहुंच सकी। फिल्मी फिल्म में इन अधूरे प्रोजेक्ट्स के कुछ सीन गीत कहानी के हिस्से के रूप में शामिल किए गए। फिल्मी फिल्म का निर्देशन हिरेन नाग ने किया था और इसका निर्माण शाहब अहमद ने फिल्म 13 मई 1983 को रिलीज हुई जिसमें प्राण ने लीड रोल किया और उनके साथ रमेश देव, सीमा देव, मोहन चोटी, बीरबल और अन्य कलाकार रहे। फिल्म की कहानी एक ऐसे पुराने फिल्मकार और निर्माता के इर्द-गिर्द घूमती है जिसका नाम ज्ञानचंद शाह है और उसके किरदार में प्राण है। ज्ञानचंद फिल्मों के प्रति जुनूनी है लेकिन फिल्म बनाने की राह में उसे आर्थिक परेशानियों और कई बाधाओं का सामना करना पड़ता है। कहानी में वह नए कलाकारों के साथ फिल्म बनाने और उन्हें सिनेमा की

दुनिया से परिचित कराने की कोशिश करता है। और इसी कहानी के बहाने फिल्म के भीतर फिल्मों का संसार रचा गया और कई अधूरे या पुराने प्रोजेक्ट्स के फुटेज इस्तेमाल हुए। यही फिल्म ही फिल्म की सबसे अनोखी खूबी थी। प्राण का किरदार नए कलाकारों को फिल्मों की दुनिया समझाने और उन्हें प्रशिक्षण देने के दौरान पुराने अधूरे प्रोजेक्ट्स के सीन दिखाता है। और इस तरह साजन की गलियां के देवानंद, साधना और जहीदा वाले सीन का जो हिस्सा है वह भी फिल्म का हिस्सा बन जाता है। यानी जिस फिल्म को देवानंद और साधना के प्रशंसक कभी पूरी तरह थिएटर में नहीं देख सके, उसके कुछ अंश कम से कम दूसरी फिल्म के माध्यम से दर्शकों तक पहुंचे। हमने जिनके ख्वाब सजाए और हम खूब जानते हैं क्या दिल में है तुम्हारे जैसे गीतों के फिल्माए गए हिस्से इसी वजह से बाद में फिल्म ही फिल्म से जुड़े और फिल्मी फिल्म में सिर्फ साजन की गलियों के ही अंश नहीं थे इसका विचार व्यापक था और इसमें हिंदी सिनेमा के दूसरे

भी जो अधूरे और अप्रकाशित प्रोजेक्ट थे उनके भी फुटेज इस्तेमाल हुए और इस तरीके से देवंद साधना जहीदा अमिताभ बच्चन राजेश खन्ना परवीन बॉबी और दूसरे कलाकारों से जुड़े जो अधूरे प्रोजेक्ट थे जो फिल्में बन नहीं सकी जो पर्दे पर नहीं आई वो सब फिल्मी फिल्म इस फिल्म में इस्तेमाल हुआ। फिल्मी फिल्म आज एक सामान्य व्यावसायिक फिल्म से ज्यादा हिंदी सिनेमा के खोए हुए फुटेज और अधूरे प्रोजेक्ट्स के दस्तावेज जैसे दिलचस्प फिल्म बन जाती है। फिल्मी फिल्म का संगीत मुख्य रूप से बप्पी लहड़ी ने दिया था। जबकि फिल्म में शामिल कुछ पुराने गीत और मूल अधूरे प्रोजेक्ट्स के संगीतकारों के थे। लेकिन यह बात सही है कि बहुत सारी फिल्में बनती हैं लेकिन वह पर्दे पर नहीं आती। लेकिन फिल्म ही फिल्म ने उन सभी अधूरी फिल्मों को इकट्ठा कर कर एक फिल्म बना दिया जो अपने आप में काबिले तारीफ है। सुनते रहिए द बॉलीवुड रेडियो। सुनता है सारा इंडिया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *