सौबा की एक बात यह कि इतने सारे नेताओं की खबरों और खिलाड़ियों की खबरों और फिल्मी सितारों की खबरों में हकीकत तो यह है कि लोगों का खबरों के उन चेहरों पर ध्यान नहीं जाता जो वाकई देश का नाम ऊंचा कर रहे हैं। याद कीजिए कुछ टाइम पहले तक कितनी खबरें आती थी कि विजिबिलिटी कम थी तो हवाई जहाज लैंड ही नहीं कर सका एयरपोर्ट पर।
बारामती जैसे छोटे हवाई पट्टियों पर तो कोई एयरपोर्ट नहीं है। तो ऐसी जगहों पर तो अब भी ऐसा होता है और अजीत पवार का दुखद हादसा हुआ था। सब जानते ही हैं। लेकिन बड़े एयरपोर्ट पर ऐसा क्यों नहीं होता कि अब हमने ध्यान देना ही बंद कर दिया है। पहले क्या होता था? कोहरे के टाइम तो रोज खबरें आती थी कि विजिबिलिटी नहीं थी। प्लेन उड़ ही नहीं पाए। या इतनी तूफानी बारिश थी कि दिख नहीं रहा था तो प्लेन लैंड नहीं कर पाए। या कहीं पर रेत का बवंडर आ जाता था तो उतने टाइम तक दिखता नहीं था.
तो प्लेन उड़ नहीं पाते थे। दिल्ली में तो याद है खबरें आती थी कि कोहरे की वजह से प्लेन को लखनऊ ले गए वहां लैंड करवाया। जयपुर ले गए कहीं और ले गए। लोग कहते थे अमेरिका और यूरोप में देखो बर्फ में भी प्लेन लैंड करते रहते हैं। वो सिस्टम हम क्यों नहीं लगवाते? और यह तो पब्लिक की उड़ानों की बात है। सेना का सोचिए अगर धुंध के टाइम युद्ध हो जाए तो ऐसे में फाइटर प्लेन लैंड करवाना तो फिर जोखिम का काम हुआ। लेकिन अब वह खबरें क्यों नहीं आती?
क्या हमने भी अपने हवाई अड्डों पर वह सिस्टम लगवा लिए जो बाकी देशों में होते हैं? जी। अब हमारे हवाई अड्डों पर भी प्लेन को लैंड करवाने के सिस्टम लग गए हैं। लेकिन वो वाले नहीं जो पहले विदेश से मंगाने पड़ते थे। हमने अपना खुद का बना हुआ ट्रांसमिसोमीटर सिस्टम लगाया हुआ है। यानी जब दिख ना रहा हो तब भी प्लेन लैंड करवाने या उड़ाने का सिस्टम दिख ना रहा हो तब भारत में बनाया है और विदेशी सिस्टम से बेहतर है। किसने बनाया जानते हैं? डॉक्टर शुभा अंगार ने।
हमारी अपनी साइंटिस्ट ने विदेशी सिस्टम 50 या 75 मीटर तक जब दिख रहा हो इस बेस लाइन पर काम करते हैं। और हमारा सिस्टम जिसका नाम है दृष्टि ये 30 मीटर तक दिख रहा हो इस बेसलाइन पर भी काम कर लेता है। प्लेन की स्पीड जानते हैं कितनी होती है? 30 मीटर की बेसलाइन पर काम करता है ये।
ऑस्ट्रेलिया और फिनलैंड वाले सिस्टम इससे पांच गुना महंगे होते थे। पांच गुना और पांच सात साल चलते थे। फिर नए लगाने पड़ते थे। लेकिन डॉक्टर शुभा ने दिल्ली में जो लगाया था सबसे पहला वह 15 साल से काम कर रहा है और अब तो देश के लगभग हर एयरपोर्ट पर यह सिस्टम लग चुका है और आप है कि प्लेन आराम से लैंड कर जाता है जब दिख भी ना रहा हो तो पायलट के लिए तालियां बजाते रहते हो क्योंकि पब्लिक ने तो नाम भी नहीं सुना था डॉक्टर शोभा अंगार का क्या हम उन्हीं वैज्ञानिकों का नाम जानेंगे जो अमेरिका में जाकर वहां के लिए कुछ बनाएंगे और नाम कमाएंगे हम कहेंगे देखो हमारा है भारतीय डॉक्टर शुभा कभी विदेश गई ही नहीं।
उनकी कई रिसर्च आप जानते हैं कहां छापी जा चुकी है। अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा के जर्नल में। दुनिया सलाम करती है उनको। 1974 में एनए एएल नेशनल एयररोस्पेस लैबोरेटरीज में साइंटिस्ट के तौर पर काम करना शुरू किया था उन्होंने। सोच सकते हैं आप। 1974 50 साल से भी ज्यादा हो गए। तब उनके माता-पिता ने अपनी बेटी को साइंटिस्ट बनाया। नौ संतानों में सबसे छोटी थी वह।
जिस जमाने में लोग सोच भी नहीं सकते थे कि लड़कियां एयररोस्पेस साइंटिस्ट भी हो सकती हैं। तब एक पिता ने अपनी बेटी के सपनों को पंख दिए। हमारी छोरियां चोरों से कम है क्या? यह तो आज आज सुन रहे हो ना? वो 1974 में दिग्गज वैज्ञानिकों के साथ काम करने निकल पड़ी थी। धुंध को हराने डॉक्टर शुभा ने सालों मेहनत की। इसमें बाकी दुनिया में जो मशीनें थी उनसे अलग तकनीक का रास्ता खोजा।
उन्होंने क्या किया? दो बिंदुओं के बीच रोशनी भेजकर लाइट भेजकर वहां से कैलकुलेशन शुरू की। लाइट भेज दी। कोहरा, बारिश या धूल जितनी ज्यादा होती है, लाइट दूसरे बिंदु तक उतनी कम पहुंचती है। इस सिद्धांत पर उन्होंने पूरा सिस्टम खड़ा किया और नाम दिया दृष्टि।
इससे पायलट और एयर ट्रैफिक कंट्रोल को रियल टाइम उसी टाइम पता चलता रहता है अभी कितनी दूर तक देखा जा सकता है। हर सेकंड पता चलता रहता है इस सिस्टम से कि अभी कितनी दूर तक देख सकते हैं और उस डाटा से लैंडिंग सिस्टम के जरिए सुरक्षित लैंडिंग करवाई जाती है। विदेशी मशीनें खासकर बर्फ के लिए बनी होती हैं। वहां स्नो होती है। लेकिन यह सिस्टम भारत के कोहरे, स्मोग, धुंध, धूल, बवंडर सब में काम कर रहा है। और अब ऐसा नहीं है कि खराब हो जाए तो विदेश से पुरजे और इंजीनियर आने का इंतजार करना पड़े। हमारा अपना है स्वदेशी। हमारे सारे एयरपोर्ट और सेना के एयरबेस तक इसका इस्तेमाल कर रहे हैं। और यह हाल है कि कई और देश अब इस पूरे से पूरी तरह भारत में बने सिस्टम को लगाने की सोच रहे हैं।
वो मांग रहे हैं। हीरो वो ही नहीं होते जो नजरों के सामने कोई कमाल करके दिखाते हैं। असली हीरो तो डॉक्टर शुभा जैसे होते हैं जो चकाचौंध की धुंध को साफ करके देश का नाम रोशन करते हैं। इस साल डॉक्टर शोभा को पद्मश्री से नवाजा गया और न्यूज़ 18 को भी गर्व है कि उन्हें न्यूज़ 18 के अमृत रत्न से सम्मानित किया गया क्योंकि अकेली झांसी की रानी ही खूब नहीं लड़ी थी वीरांगनाएं साइंटिस्ट भी होती हैं और हीरो हैं डॉक्टर शुभा जैसे हमारे रत्नों के माता-पिता भी जिन्होंने 1970 के दशक में भी अपनी बेटी को यह सपना जीने दिया। डॉक्टर शुभा ने बताया कि उन्हें तब तब 70000 की तनख्वाह पर अमेरिका में काम करने का ऑफर मिला था। 70000 मतलब आज के ₹5 लाख ₹5 लाख तनख्वाह का ऑफर था।
वो नहीं गई। सोचिए आप छोड़ दोगे आज भी ऐसा कोई ऑफर आया। आप छोड़ दोगे ऐसा ऑफर 65 लाख की तनख्वाह का और एक सरकारी कंपनी में वह काम करती रही। जीवन भर सरकारी तनख्वाह पर इससे बड़ा देश प्रेम और क्या हो सकता है? इससे बड़ी देशभक्ति और क्या हो सकती है? और कुछ हम ना भी कर सकते हो। इतना जरूर करना।
अपने बेटियों के सपनों को सुनते वक्त याद रखना उस पिता को भी जिन्होंने डॉक्टर शुभा का पूरा साथ दिया। और जब भी आपका हवाई जहाज खराब मौसम में सही लैंड कर जाए ना तो जो आप भगवान को हाथ जोड़ते हो और पायलट के लिए तालियां बजाते हो ना एक बार मन में ही सही बोल दिया कीजिए। थैंक यू डॉक्टर शुभा अयंगार