तुम आ गए हो नूर आ गया डूबने दे मुझे तुझको साहिल मिले अपनी बेहतरीन अदायगी के लिए मशहूर मीनिंगफुल फिल्मों में काम करने के लिए प्रसिद्ध संजीदगी के मिसाल संजीव कुमार को आप सब जानते ही होंगे सन 16 के ठाकुर को कोई कैसे भूल सकता है अब भी तुम्हे वही हिम्मत और ताकत है या वक्त की दीमक ने तुम्हारे बाजुओं को खोखला कर दिया खिलौना की पागल शायर विजय कमल सिंह को कोई कैसे भूल सकता है मेरे दिल से ना लो बदला फिल्म आंधी में बेइंतहा मोहब्बत करने वाले जेके को कोई कैसे बोल सकता है तेरे बिना जिंदगी भी लेकिन जिंदगी फिल्म कोशिश के हरि चरण को कोई कैसे भल सकता है जब भी भारतीय सिनेमा की बात होगी इन आइकॉनिक फिल्मों का जिक्र जरूर होगा और जिक्र होगा संजीव कुमार का जो इन फिल्मों की जान थे भोले वाले दिखने वाले और अपने अभिनय में भी उसी भोले पल को दिखाने
वाले संजीव कुमार स्क्रीन पर जब भी नजर आते दर्शकों को उनसे लगाव हो जाता जब वह जीवित थे तब उनके प्रशंसकों में बड़ी पूछ थी जिस हालत में आप इस वक्त है इसी हालत में नोस हालांकि वह अपनी फिल्मों के जरिए अभी भी जिंदा है और हम सब उनको पसंद करते हैं तुम जो कह दो तो आज की रा चांद नमस्कार आपका स्वागत है अचीव जंक्शन सिनेमा के इस खास शो में जिसका नाम है सिल्वर स्क्रीन की कहानियां अगर आप चैनल पर नए हैं तो इसे सब्सक्राइब कर लीजिए और आइकन जरूर दबा दीजिएगा ताकि हमारी कोई भी वीडियो मिस ना हो यह मत कहना कि मुझसे कुछ नहीं हो सकता है ऐसी कविता लिख सकता हूं कि तुम झूम के दोबारा शादी करने पर तैयार हो जाओगी एक बहाना बन गया अच्छा अक्सर फिल्मों में कलाकार अपने हाथ पैर और पूरे बदन का इस्तेमाल करके अभिनय करता है लेकिन फिल्म सोले में संजीव कुमार ने सिर्फ आंखों और चेहरे से ठाकुर की किरदार को अमन कर दिया ये हाथ मुझे दे दे उनकी फिल्म कोशिश भी ऐसी ही एक शानदार अभिनय की फिल्म थी संजीव कुमार चैलेंजिंग रोल करने के लिए जाने जाते थे वह जब थिएटर करते थे तो उन्हें अधिकांशत बूढ़े विकलांग या पागल के रोल दिए जाते थे क्योंकि यह रोल आम अभिनेता तो करने से कतराते भी
थे बोलती आंखों वाले अभिनेता बहुत कम पैदा होते हैं संजीव कुमार उनमें से एक थे हरि भाई और संजीव कुमार का जन्म 9 जुलाई 1936 को सूरत के एक गुजराती परिवार में हुआ था उनके दो छोटे भाई और एक बहन थी जब वह छोटे थे तभी उनके पिता की मृत्यु हो गई इसलिए उन पर जिम्मेदारियां भी बहुत जल्दी आ गई वह कम उम्र में ही मुंबई चले आए उनकी मां चाहती थी कि वह पढ़ लिखकर डॉक्टर या वकील बने लेकिन उनका सारा ध्यान एक्टिंग और फिल्मों में लगा रहता था यही देखकर उनकी मां ने अपने जेवर गिरवी रखे और उनका एडमिशन सशधर मुखर्जी के एक्टिंग स्कूल में करा दिया यह वही सशधर मुखर्जी थे जिनकी बदौलत दादा मुनि यानी अशोक कुमार फिल्मों में आए बाद में सदर मुखर्जी ने फिल्मिस्तान नाम का फिल्म स्टूडियो भी खोला जिसने बड़ी-बड़ी फिल्में बनाई ठंडे ठंडे पानी से नहाना चाहिए ना आए या ना आए संजीव कुमार थिएटर की दुनिया में धीरे-धीरे मशहूर होने लगे थे उन्होंने इफट मुंबई से अपना करियर शुरू किया और 19 साल की उम्र में 60 साल के बूढ़े का रोल करके सबको चौका दिया था संजय कुमार को अपने जीवन में बहुत सारे संघर्ष करने पड़े बचपन में पिता के चले जाने के बाद गरीबी से जूझना पड़ा बाद में हिंदी फिल्मों में काम तलाशने के लिए संघर्ष करना पड़ा यहां
तक कि उन्हें अपने नाम के कारण भी काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा वह अपने असली नाम हरि ह जेठालाल जरी वाले के नाम से थिएटर में काम करते थे 1960 में हिंदी फिल्म हम हिंदुस्तानी में एक छोटा सा रोल मिला इसमें सुनील दत्त और आशा पारिक भूमिका में थे और संजीव कुमार का इसमें मात्र दो सेकंड का क्लोजप शॉर्ट लगा था इस काम के बाद उनको कई साल तक कोई कांग ही नहीं मिला वह इस स्टूडियो से उस स्टूडियो तक कान की तलाश में घूमते रहे उनके दोस्तों ने उन्हें सलाह दी कि तुम अपना नाम बदल लो तभी काम मिलने के आसार बनेंगे उन्होंने काफी सोच विचार किया ताकि कोई सही स्क्रीन नेम मिल सके तब दिलीप कुमार और अशोक कुमार का टाइम चल रहा था इसलिए उन्होंने फैसला किया कि अपना नाम कुमार टाइटल से ही रखेंगे उसके बाद नाम भी रख दिया गया हरिहर जेठालाल जरीवाला अब संजय कुमार हो गए थे फिर किस्मत से लगभग चार साल बाद उन्हें अपनी दूसरी फिल्म आओ प्यार करें मिले यह फिल्म
1964 में रिलीज हुई और संजय कुमार नाम से उनका टाइटल गया तुझे बिन जाने बन पहचाने कमाल अमरोही तब एक फिल्म बना रहे थे और उन्हें एक नए चेहरे की जरूरत थी फिल्म का नाम था संकर हुसैन उन्होने संजय कुमार नाम सुनकर कहा कि यह नाम कुछ खास नहीं है उन्होंने संजय कुमार से उनका स्क्रीन नाम बदल गौतम राजवंश रख दिया फिल्म शुरू हुई और उसके कुछ एक सीन के शॉर्ट्स ही लिए गए उसके बाद कमाल रोनी अपनी महत्वाकांक्षा फिल्म पाकिसान में इतने व्यस्त हो गए कि यह फिल्म आगे बढ़ नहीं पाए इसलिए हरि भाई को लगा कि गौतम राजवंश नाम भी अच्छा नहीं यह बात 1964 के आसपास की है हरि भाई से संजय कुमार बने संजीव कुमार अभी वे फिल्मों में अपने स्थान तलाश रहे थे तभी अभिनेता संजय खान की फिल्म दोस्ती सुपरहिट हो गई और संजय खान लोकप्रिय अभिनेताओं में सुमार होने लगे हरी भाई जरी वाले को लगा कि संजय कुमार नाम रखना अब उनके लिए मुश्किल ही पैदा करेगा इसलिए उन्होंने आखिरकार अपना नाम रखा संजीव कुमार जैसे प्यासी हर आत्मा और यह नाम सच में उनके लिए काम कर गया उनको 1965 में लीड रोल की फिल्म मिली जिसका नाम था निशान इसमें उनके डबल रोल थे उन्हें फिर 1966 और 1967 में लगभग 10 फिल्मों में काम मिला हालांकि उनकी पहचान बनी 1968 की फिल्म संघर्ष से इस फिल्म में वह सहायक भूमिका में थे इसके हीरो हीरोइन थे
दिलीप कुमार व अ जंती माला इस फिल्म ने संजीव कुमार को देश भर में पहचान दिलाई पुरखों से चली आई दुश्मनी को खत्म करने आया था द्वारका मुझे क्षमा कर दो साल 1972 में उन्होंने हिंदी ईरानी फिल्म सुबह और शाम में काम किया जिसके बाद गीत का निर्देशक गुलजार की नजर इन पर पड़ी फिर कुलजार ने अपनी नौ सफर फिल्मों में उन्हें रोल दिए वह फिल्में थी 1972 में आई फिल्म परिचय 1973 में आई फिल्म कोशिश 1975 में रिलीज हुई फिल्म आंधी और फिल्म मौसम छड़ी रे छड़ी कैसी गले में पड़ी इन फिल्मों में संजीव कुमार ने वैसे रोल किए जिसे करने में कोई भी स्थापित हिरो कन्नी काटेगा लेकिन संजीव कुमार किसी और मिट्टी के बने थे उनके लिए अच्छे किरदार इंपॉर्टेंस होते थे उनके उम्र और फिल्म में ड्यूरेशन नहीं है संजीव कुमार ने गुलजार के साथ दो और सुपरहिट फिल्में की 1981 में अंगूर और 1982 में नमकीन उनकी बॉक्स ऑफिस पिन हिट फिल्मों में मंजनी सीता और गीता तथा फिल्म आपकी कसम भी थी संजीव कुमार ने शुरू से वैसे ही किरदार किए जिन्होंने उन्हें अभिनेता के रूप में चैलेंज किया सत्यजीत राय की फिल्म सतरंज के खिलाड़ी या फिर और कई फिल्में जैसे चरित्रहीन चेहरे पे चेहरा अंगने सवाल और यादगार जैसी फिल्मों में उनका काम करना यह बताता है कि वह स्टार हीरो के साथ साथ एक बेहतरीन अभिनेता भी थे संजीव कुमार ता उम्र अकेले रहे लोग इसके पीछे कई कारण बताते हैं कुछ मीडिया रिपोर्टर्स कहते हैं कि संजीव कुमार को पता था कि उनकी मृत्यु जल्दी हो जाएगी इसलिए वह शादी नहीं कि है जबकि कुछ का कहना है कि संजीव कुमार मालिनी से सच्ची मोहब्बत करते थे और जब उन्होंने उनके प्रस्ताव को ठुकरा करर धर्मेंद्र से शादी कर ली तो उनका दिल टूट गयाल मेरे साथ चल तू ले हाथों में हाथ चल तू हालांकि संजीव कुमार बड़े मिलनसार इंसान थे इसलिए उनके दोस्तों की लिस्ट काफी लंबी थी जैसे शत्रुगन सिन्हा अमिताभ बच्चन सुनील द राजेश खन्ना शर्मिला टैगोर तनुजा शिवाजी गणेशन सन पलगांव पर आदि थे संजीव कुमार और हेमा मालनी के अफेर के चर्चे तब मैगजीन में खूब छपते थे
रिपोर्टर्स की माने तो हेमा मालिनी ने उनसे शादी करने के लिए भी हां कह दिया था लेकिन हेमा की माप संजीव कुमार पसंद नहीं थे उधर उनका नाम जितेंद्र के साथ भी जुड़ा था लेकिन इसमें बाजी धर्मेंद्र मान ले गए हालांकि हेमा माननी संजीव कुमार की ता उम्र दोस्त बनी रही संजीव कुमार ने एक साक्षात्कार में कहा था कि जरीवाला परिवार के पुरुष 50 साल से ज्यादा नहीं जीते शायद उनके मन में भी अपने लिए यही भय था अब अंधविश्वास माना जाए या विधि का विधान संजीव कुमार के मृत्यु हु 47 साल की उम्र में भीषण हार्ट अटैक की चलती हुई थी जीवन भर बुजुर्गों का रोल करने वाले संजीव कुमार बूढ़े होने से पहले ही इस दुनिया से चले गए उनसे छोटे एक भाई की मृत्यु उनसे पहले ही हो गई थी और दूसरे भाई की मृत्यु उनके मरने के छ महीने बाद हुई यह सच में भयानक इत्तेफाक था हालांकि संजीव कुमार के दोस्तों की संख्या तो काफी थी लेकिन वह अपने आखिरी सालों में अकेले पड़ गए थे उन्हें 4042 की उम्र में पहला हार्ट अटैक आया था फिर उनकी बाईपास सर्जरी भी हुई थी संजीव कुमार ने अपने आखिरी दिनों तक काम किया था उनके इस दुनिया से जाने के बाद उनकी 10 फिल्म में रिलीज हुई संजीव कुमार अपनी सादगी और रियलिस्टिक एक्टिंग के लिए हमेशा याद किए जाएंगे उन्हें यही स्टार स्टार्स नहीं कहा जाता वह सच में थे संजीदा संजीव कुमार जागी अख में रात ऐसी ही इंटरेस्टिंग सिलवर स्क्रीन की कहानियों के लिए सब्सक्राइब कर लीजिए हमारे चैनल अचप जंक्शन सिनेमा को नमस्कार [संगीत]