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कैलाश से क्यों लौटाए गए संन्यासी मोदी ? सच जानकर चौंक जाएंगे

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कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर जाना सनातन धर्म पर चलने वाले हर व्यक्ति का सपना होता है वर्तमान में यह स्थान चीन के कब्जे वाले तिब्बत में है इसलिए वहां तक पहुंचना अत्यंत कठिन होता है हिमालय का पहाड़ी रास्ता होने के कारण कठिनाई और भी बढ़ जाती है कई स्थानों पर समुद्र तल से ऊंचाई 15 से 20 हज फीट तक होती है उन स्थानों पर सांस लेने में भी समस्या होती है इसलिए बहुत कम लोग ही कैलाश मानसरोवर तक जा पाते हैं कम लोग जानते हैं कि नरेंद्र मोदी ने तब कैलाश मानसरोवर यात्रा पूरी कर ली थी जब आज की तरह इतनी सुविधाएं और सड़कें नहीं हुआ करती थी ।

सबसे पहले बात कैलाश यात्रा के इतिहास की 1962 के भारत चीन युद्ध के पहले तक भारत से लोग बड़ी आसानी से तिब्बत जाकर कैलाश के दर्शन किया करते थे उन दिनों केवल साधु संत ही वहां जाया करते थे यात्रा में जानलेवा खतरों के कारण सामान्य लोग जाने का साहस नहीं कर पाते थे तिब्बत पर चीन के कब्जे के बाद यह यात्रा भी पूरी तरह बंद हो गई 1981 में कैलाश मानसरोवर यात्रा एक बार फिर से आरंभ हुई तब पहले जत्थे में सुब्रह्मण्यम स्वामी भी वहां पर गए थे तभी से हर वर्ष इस यात्रा का आयोजन होता है ।

आरंभ में कैलाश यात्रा केवल उत्तराखंड के लिपुलेख पास के रास्ते ही होती थी किंतु 2014 में भाजपा सरकार बनने के बाद सिक्किम के नातुला पास से होकर एक नया मार्ग खोल दिया गया यह ऐसा रास्ता है जिस पर कहीं भी पैदल नहीं चलना पड़ता अब बात मोदी जी की कैलाश माना सरोवर यात्रा की तब उनकी आयु लगभग 38 वर्ष थी भारत से कैलाश यात्रा आरंभ होने के सात वर्ष बाद 1988 में नरेंद्र मोदी उत्तराखंड में लिपुलेख पास के रास्ते कैलाश मानसरोवर तक गए थे उन दिनों मोदी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से भाजपा में आए थे उन्हें भाजपा की गुजरात यूनिट का संगठन मंत्री बनाया गया था ।

इससे पहले वे संघ में प्रचारक का काम कर चुके थे इसलिए सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में थोड़े बहुत लोग ही उन्हें जानते थे 1988 में भारत आज की तरह नहीं हुआ करता था देश भर में आधारभूत सुविधाओं की भारी कमी थी भारत की आर्थिक स्थिति बहुत खस्ता थी उन दिनों उत्तराखंड अलग राज्य नहीं बना था लिपुलेख का पूरा कैलाश यात्रा मार्ग उन दिनों उत्तर प्रदेश में हुआ करता था धार चुला नारायण आश्रम मालपा गूंजी कालापानी और ओम पर्वत होते हुए लिपुलेख दर्रे पर पहुंचते थे और वहां से आगे तिब्बत जाते थे नरेंद्र मोदी का यह चित्र अल्मोड़ा के पास ही एक फॉरेस्ट गेस्ट हाउस में किसी सहयात्री ने खींचा था।

कुछ दिन पहले यह चित्र सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ था यह दूसरा चित्र उत्तराखंड में अल्मोड़ा का ही कोई स्थान है मोदी जी इसमें बहुत सहज रूप से कुर्ता और लुंगी पहने देखे जा सकते हैं यह चित्र मोदी जी के साथ यात्रा में गए एक सहयात्री ने अपने कैमरे से लिया था बताते हैं कि भूस्खलन के कारण यात्रा कुछ समय तक रोकी गई थी यह चित्र उसी अवधि का है कैलाश यात्रा मार्ग का यह चित्र नरेंद्र मोदी के पर्सनल एल्बम से लिया गया है मालपा के पास किसी स्थान पर रुककर आराम करते अपने सहयात्री का यह चित्र मोदी जी ने ही अपने कैमरे से क्लिक किया था।

देखा जा सकता है कि वे सभी रुककर कुछ खा पी रहे हैं जिन पत्थरों पर वे बैठे हैं उनके नीचे से कोई पहाड़ी नदी बह रही है और एक गाय और उसका चरवाहा पीछे नदी को पार कर रहा है और यह चित्र रास्ते में पड़ने वाली चयाले वैली में आईटीबीपी के कैंप का है इस चित्र में नरेंद्र मोदी के साथ आईटीबीपी के कुछ जवानों और सहयात्री हों को देखा जा सकता है हल्के फुलके अंदाज में फोटो खिंचवाने के लिए उन्होंने किसी जवान से उसकी 303 राइफल ली है उन दिनों आज की तरह अच्छे हाइकिंग शूज नहीं आया करते थे मोदी जी ने सैनिकों द्वारा पहना जाने वाला मिलिट्री शू पहन रखा है नरेंद्र मोदी की कैलाश यात्रा का यह चित्र उनके ही पर्सनल एल्बम से लिया गया है।

मोदी जी एक ऊंची जगह पर खड़े हैं और नीचे उफनती हुई काली नदी है यह चित्र उत्तरा खंड में धार चुला के आगे किसी स्थान का है यहां पर भारत नेपाल सीमा से आने वाली काली नदी बहुत वेग से बहती है यहां पर मोदी गेरुआ वस्त्र धारण किए हुए हैं उनके कंधे पर आप मोटा कंबल भी देख सकते हैं कैलाश यात्रा में धार छुला के आगे ही ठंडा मौसम आरंभ होता है मोदी जी द्वारा अपने कैमरे से क्लिक किया गया यह चित्र बहुत विशेष है यह महाकाली मंदिर का चित्र है यहीं से काली नदी का उद्गम होता है जो भारत और नेपाल के बीच सीमा का काम करती है यहां पर बने इस मंदिर की देखरेख आईटीपीपी के जवान करते हैं चीन के उकसावे पर नेपाल सरकार इस स्थान पर अपना दावा करने लगी है।

जबकि इस चित्र से पता चलता है कि 1988 में भी यह स्थान भारत के पास ही था और अब यह चित्र देखिए यह मानसरोवर झील के किना लिया गया है मोदी जी इस चित्र में बिल्कुल किसी साधु की तरह दिखाई देते हैं जहां पर यह चित्र लिया गया है वहां पर काफी सर्दी रहती है दिन में भी तापमान बहुत कम होता है मानसरोवर झील का यह चित्र कुछ दूरी से लिया गया है इसे भी नरेंद्र मोदी ने अपने कैमरे से क्लिक किया है मानसरोवर किनारे के स्थान से कैलाश पर्वत का दक्षिणी मुख दिखाई देता है मोदी जीने ने संभवत उसी का चित्र लेने का प्रयास किया है लेकिन उस समय इतने पावरफुल लेंस नहीं आते थे चित्र में केवल बादल दिख रहे हैं कैलाश का चित्र नहीं आ पाया है और यह चित्र कैलाश पर्वत के परिक्रमा मार्ग में किसी स्थान का है इसमें पीछे वे कैंप देखे जा सकते हैं जो उन दिनों यात्रियों को रात्रि विश्राम के लिए लगाए जाते थे आजकल इन कैंपों के स्थान पर पक्के गेस्ट हाउस बन चुके हैं यह एकमात्र चित्र है।

जिसमें मोदी गर्म जैकेट पहने हुए हैं यह चित्र भी संभवत कैलाश परिक्रमा मार्ग में उसी स्थान का है क्योंकि पीछे यात्रियों के टेंट लगे देखे जा सकते हैं मोदी जी ने यह चित्र तब अपने ही कैमरे से लिया था कैलाश यात्रा करके लौटने के बाद जीवन कभी पहले जैसा नहीं रहता मोदी जी जब कैलाश यात्रा पर गए थे उन दिनों वे सन्यासियों सा ही जीवन जिया करते थे कैलाश से वापसी के बाद जब वे घर लौटे तो पता चला था कि उनके पिता दामोदर दास मूलचंद मोदी का निधन हो चुका है उन्हें बोन कैंसर हुआ था इसके ही बाद पारिवारिक उत्तरदायित्व से पूरी तरह मुक्त होकर व राजनीति में कूद पड़े कैलाश यात्री के रूप में उन्होंने उत्तराखंड के उन सीमावर्ती क्षेत्रों की स्थिति देखी थी।

यही कारण था कि प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने सबसे पहले धार चुला से लेकर लिपुलेख पास तक पक्की सड़क बनवाई यह सड़क 2020 में बनकर तैयार हो चुकी है इसी कारण अब कैलाश मान सरोवर की यात्रा पहले की तुलना में आसान है।

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