देश की सुप्रीम कोर्ट ने नरेंद्र मोदी सरकार के एक फैसले को असंवैधानिक बताया है। यह आज की सबसे बड़ी खबर है। यह फैसला पर्यावरण की मंजूरियों से जुड़ा हुआ था और रेट्रोस्पेक्ट में भी लागू होता था। यानी अगर आप कोई बड़ा प्रोजेक्ट लगा रहे हैं, कोई फैक्ट्री डाल रहे हैं, कंस्ट्रक्शन कर रहे हैं और इसके लिए आपने पर्यावरण मंत्रालय से एनवायरमेंटल क्लीयरेंस वाली मंजूरी नहीं ली है तो आप डिफॉल्टर हो रहे हैं।
लेकिन एक योजना आई जिसके तहत आप रेट्रोस्पेक्ट में जाकर मंजूरी ले सकते हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ऐसे नहीं चलेगा। 2021 में नरेंद्र मोदी सरकार जो मेमोरेंडम लेके आई थी एनवायरमेंटल क्लीयरेंस को लेके कि रेट्रोस्पेक्ट में मंजूरी ले सकते हैं। 29 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत, जस्टिस जयमाला बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की बेंच ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन बताया। यानी कानून को सबसे ऊपर रखने और जीवन के अधिकार को सुनिश्चित करने वाले अनुच्छेद का हवाला दिया।
कैसे? इसके लिए अदालत की टिप्पणियों पर नजर डालते हैं। बेंच ने साफ कहा कि 1986 के पर्यावरण संरक्षण कानून के तहत सरकार अगर चाहे तो जनहित में कुछ प्रोजेक्ट्स को अपवाद मानकर पिछली तारीख से मंजूरी दे सकती है। पर ऐसा करने के लिए बाकायदा एक कानूनी प्रक्रिया का पालन होना चाहिए। सिर्फ एक प्रशासनिक आदेश या ऑफिस मेमोरेंडम के जरिए पूरे के पूरे कानून को बाईपास नहीं कर सकते हैं।
अदालत का तंज और भी तीखा था। कोर्ट ने कहा कि 2021 का यह मेमोरेंडम तो एक तरह की परपेचुअल एमनेस्टी स्कीम यानी हमेशा के लिए माफी योजना सा बन गया। कोई भी प्रोजेक्ट डेवलपर आए बिना पर्यावरण की फिक्र किए अपना काम शुरू करे और उसे पता हो कि सरकार का यह मेमोरेंडम उसे बाद में बचा ही लेगा। दरअसल इस मेमोरेंडम ने 2006 के एनवायरमेंटल क्लीयरेंस नोटिफिकेशन के पूरे क्राइटेरिया को बदल कर रख दिया था। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि एक प्रशासनिक निर्देश के जरिए पहले से तय किसी कानून की जगह लेना पूरी तरह से अस्वीकार्य है।
अब इस पूरे मामले की टाइमलाइन को समझते हैं ताकि आपको अंदाजा लगे कि इस कहानी की जड़े 2021 तक नहीं जाती 2017 तक पहुंचती हैं। दरअसल पिछली तारीख से मंजूरी देने का यह रास्ता सरकार ने 2017 में खोला था और तब इसके लिए बाकायदा एक नोटिफिकेशन निकाला था। बाद में इसी 2017 के नोटिफिकेशन को आधार बनाते हुए और इसके नियम तय करने के लिए सरकार ने 2021 में ऑफिस मेमोरेंडम जारी कर दिया। जिसने इस छूट को हमेशा के लिए एक परमानेंट शॉर्टकट बना दिया।
जब यह मामला वनशक्ति बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के नाम से सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो कोर्ट ने 16 मई 2025 को अपने पहले फैसले में इन दोनों यानी 2017 और 2000 के नोटिफिकेशन और 2021 के मेमोरेंडम को रद्द कर दिया था। लेकिन कहानी में ट्विस्ट तब आया जब 18 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने कुछ कानूनी खामियों का हवाला देते हुए अपने ही 16 मई के फैसले को रिकॉल किया। तब कोर्ट ने कहा था कि पिछला फैसला पर्यावरण न्यायशास्त्र के मूल सिद्धांतों की अनदेखी करता है। इसके बाद फिर से रिव्यू पिटीशन दाखिल हुई और अब 29 जुलाई 2026 को इस लंबी कानूनी लड़ाई का आखिरी नतीजा आया।
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों चीजों को अलग-अलग तराजू पर तोला। कोर्ट ने 2017 के नोटिफिकेशन को तो वैध माना यह कहते हुए कि वो टाइम बाउंड था और सेक्शन तीन के दायरे में कानूनन सही था। पर 2021 के मेमोरेंडम को सिरे से नकार दिया। सुप्रीम कोर्ट ने जन विश्वास अधिनियम 2023 का भी जिक्र किया जिसने 1986 के पर्यावरण कानून के तहत कुछ नियमों के उल्लंघन को डीिनलाइज कर दिया था। अदालत ने कहा कि इस कानून से साफ हो जाता है कि सरकार के पास नोटिफिकेशन जारी करने की ताकत तो है लेकिन उसे तार्किक होना चाहिए। ऐसा ना हो कि आदेश जारी करने की ताकत और सस्टेनेबल डेवलपमेंट के बीच का संतुलन बिगड़ जाए। कोर्ट ने एक रियायत भी दी।
कहा कि यह फैसला प्रोस्पेक्टिव तरीके से लागू होगा। मतलब जिन प्रोजेक्ट्स को 2021 के मेमोरेंडम के तहत क्लीयरेंस मिल चुकी है, उन पर कोई असर नहीं होगा। लेकिन आज के बाद कोई भी नया प्रोजेक्ट इस शॉर्टकट का फायदा नहीं उठाएगा। अब चलते हैं आज के एक दूसरे फैसले पर। बरसों तक जिस कोयला घोटाले ने मनमोहन सिंह सरकार की छवि खराब करने का काम किया। जिस मामले ने यूपीए टू की जड़ों में मट्ठा डाला। आज सुप्रीम कोर्ट ने उसी से जुड़े एक मामले में डॉ. मनमोहन सिंह गुजर चुके हैं। दिवंगत हैं। उनको क्लीन चिट दी। 29 जुलाई को सीजीआई सूर्यकांत, जस्टिस बागची और जस्टिस वी मोहिना की तीन जजों की बेंच ने मनमोहन सिंह के खिलाफ चल रहे आपराधिक मामले को हमेशा के लिए बंद कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत की उस 1 अप्रैल 2015 के समन को भी खारिज कर दिया।
जिसके तहत पूर्व प्रधानमंत्री को बतौर आरोपी अदालत में पेश होने को कहा गया था। इस मामले को भी आप थोड़ा विस्तार से समझिए जिसे सुप्रीम कोर्ट ने अभी प्रस्तुत किया है सिस्टेटिक फेलर। सीबीआई ने बड़ी तल्लीनता से मामले की जांच की। अक्टूबर 2014 में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की। केंद्रीय एजेंसी का साफ कहना था कि मनमोहन सिंह के खिलाफ कोई सबूत नहीं है। कोई केस नहीं बनता है। लेकिन मार्च 2015 में स्पेशल जज ने इस क्लोजर रिपोर्ट को कूड़ेदान में डाल दिया और अपनी तरफ से संज्ञान लिया और 1 अप्रैल 2015 को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत छह लोगों के खिलाफ केस चलाने का आदेश दिया जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह का नाम भी शामिल था।
उन्हें ट्रायल फेस करने के लिए समन भेजा गया। पिछली कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ डॉक्टर सिंह ने अपील की। बरसों बरस तारीख पढ़ती रही। फिर 26 दिसंबर 204 को उनका निधन भी हो गया और उसके बाद अब सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला आया है 29 जुलाई को सुनवाई के दौरान। डॉ. मनमोहन सिंह की तरफ से इस मुकदमे में आज पेश हुए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंह भी।
एक भाव कानूनी तर्क रखा गया। सिब्बल ने कहा कि पूर्व पीएम के निधन के बाद तो इस मामले का कोई मतलब नहीं। लेकिन स्पेशल जज ने उनके खिलाफ जो टिप्पणियां की थी, जो सम्मन जारी किया था, उसे रिकॉर्ड से हटाया जाना चाहिए। सिंघवी ने भी अदालत से गुजारिश की कि एक दिवंगत प्रधानमंत्री के दामन पर यह दाग नहीं रहना चाहिए। अदालत ने दोनों अधिवक्ताओं की दलीलें मानी और कहा कि अपीलकर्ता यानी मनमोहन सिंह के दुर्भाग्यपूर्ण निधन के कारण इस अपील को निष्प्रभावी मानकर निपटाया जा सकता था। लेकिन यह देखते हुए कि स्पेशल जज ने कैसे संज्ञान लिया और समन जारी किया।
हमने की तरफ से दाखिल क्लोजर रिपोर्ट को गहराई से पढ़ा और हम इस बात से पूरी तरह संतुष्ट हैं कि स्पेशल जज के पास क्लोज़र रिपोर्ट को ठुकराने का कोई भी कारण मौजूद नहीं था।