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NASA ने सुना शिव का डमरू? सामने आया ब्रह्मांड का सबसे खौफ!नाक रहस्य।

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जब शिव का डमरू बजता है तो षष्टि जन्म लेती है। ऊर्जा जागती है और ब्रह्मांड की लय बदल जाती है। अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा ने अंतरिक्ष से एक ऐसी ध्वनि को डिकोड किया है जिसे सुनकर पूरी दुनिया के वैज्ञानिक और शिव भक्त हैरान हैं।

यह आवाज किसी और की नहीं है बल्कि हूबहू भगवान शिव के डमरू की आवाज है। एक तारा जो प्रति सेकंड, सैकड़ों बार घूम रहा है, वह अंतरिक्ष में एक ऐसी लय पैदा कर रहा है जो सीधे केदारनाथ और कैलाश की गूंज से मेल खाती है।

आपने जब इस आवाज को सुना क्योंकि यह आवाज अभी आपको थोड़ी सी सुनाई दी है। मैं इस आवाज को आपको और सुनवाऊंगा लेकिन आपने जब यह छोटी सी आवाज सुनी तो कहना नहीं होगा कि आपको डमरू की आवाज लगी है। यह किसी को भी डमरू की आवाज ही लगेगी। अमेरिका में इस डमरू का सिर्फ ध्वनि से कांसेप्ट हो सकता है सनातन धर्म में इसका सीधा संबंध शिव से होता है।

जी हां, वैज्ञानिक भाषा में इसे आप समझ लें तो नासा के पल्सर नाम के एक तारे के डाटा को तकनीक से ध्वनि में बदला तो जो ताल सुनाई दी उसने पूरी दुनिया में तहलका मचा दिया। यह लयबद्ध थाप ठीक वैसी ही है जैसी शिव के डमरू से निकलती है। एक बार गौर से सुनिए इसकी आवाज। उसके बाद मैं आपको फिर समझाऊंगा। । है ना सन्न कर देने वाली ये आवाज है ना आश्चर्यजनक जी आवाज आप सुनिए के एक ऐसी आवाज जिसमें प्रकाश निकल रहा है और डमरू की तरह आवाज कर रहा है और आप देखिए कि भगवान भगवान शिव भी जब तांडव में थे और कर रहे थे उस वक्त भी ठीक ऐसी ही आवाज निकल रही थी उनके डमरू से जैसी आवाज ब्रह्मांड के एक तारे से निकल रही है और जो तस्वीर इस वक्त आपकी टीवी स्क्रीन पर बनी हुई है यह वैसी ही आवाज है और वैसा ही प्रकाश है चमकता हुआ प्रकाश और चमकती हुई आवाज जो आप देख रहे हैं यह इस तारे से निकल रही है दुनिया भर के दार्शनिक और विचारक इसे नटराज के कॉस्मिक डांस यानी कि ब्रह्मांडीय नृत्य की वह थाप मान रहे हैं जिससे सृष्टि का सृजन और तय होता है। समझिए डॉट में यह पल्सर तारे की ध्वनि है या शिव का डमरू है? नासा के वैज्ञानिकों ने इसे कैसे रिकॉर्ड किया?

शिव के डमरू का रहस्य आखिर है क्या? और क्यों कॉस्मिक डांस की अवधारणा आधुनिक विज्ञान से मेल खाती दिखती है? सब कुछ इस सिलसिलेवार तरीके से मैं आपको समझाऊंगा क्योंकि इसकी ताल, इसकी लय और इसकी दोहराव वाली बीट ने दुनिया भर में आध्यात्मिक बहस छेड़ दी है। एक बार फिर सुनिए गौर से ब्रह्मांड में शिव के डमरू की आवाज। असल में एक छोटी सी कहानी है वो आपको सुनाता हूं। ब्रह्मा, विष्णु, महेश और सबसे बड़ी बात है कि ब्रह्मा और विष्णु में जब इस बात को लेकर लड़ाई हो गई। यह पौराणिक कथा है। इसके बारे में धार्मिक कथा है।

मैं पहले इसको बता देता हूं। उसके बाद नासा पोस्ट के सोनिफिकेशन के बारे में भी बताऊंगा। लेकिन जब झगड़ा हो गया, लड़ाई हो गई कि बड़ा कौन? तो फिर यह हुआ कि एक प्रकाश उत्पन्न हुआ और उस प्रकाश में एक प्रकाश के छोर पर ब्रह्मा को लगाया गया और एक प्रकाश के छोर पर विष्णु को लगाया गया और यह कहा गया कि जो भी इसके छोर को पकड़ लेगा.

वही सबसे बड़ा होगा। तो एक छोर को पकड़ते हुए ब्रह्मा पाताल में चले गए। क्योंकि षष्ठी का सृजन तो उन्होंने ही कहा। उनका दावा था कि षष्ठी को मैंने बनाया है तो मैं सबसे बड़ा हूं। विष्णु का अलग दावा था और एक छोर को पकड़ कर विष्णु चले गए और दोनों जब छोर को पकड़ कर निकले उस छोर पर दाग के देखा कि नीचे भी यानी कि पाताल में और आकाश में उस छोर का अंत नहीं मिला। और जब वापस लौट कर आए और पूछा कि यह था क्या? तो पता चला कि यह कोई और नहीं बल्कि महेश हैं, शिव हैं। जिनका ना आदि है, ना अंत है और यह हमेशा अनंत हैं और यही सबसे बड़े हैं।

सृष्टि में ना तो इनका जन्म हुआ और ना इनका अंत है और आज भी ब्रह्मांड में यह साफ तौर पर देखे जा सकते हैं। लेकिन ब्रह्मा भी जन्म के तौर पर देखे गए और इसके साथ-साथ विष्णु भी जन्म के तौर पर देखे गए। लेकिन शिव ना उनकी कभी मृत्यु हुई ना कभी जन्म हुए। आज भी वह अनंत हैं और इसलिए उन्हें अनंत कहा जाता है। लेकिन नासा ने क्या कहा? नासा के फैक्ट को मैं आपको समझाता हूं। पर नासा ने क्या कहा?

नासा और चंद ने कई स्पेस प्रोजेक्ट जारी किए। जिनमें ब्लैक होल, और नेबुला के डाटा को ध्वनि से बदला गया। नासा ने असल में यह कहा है कि यह रियल साउंड इन स्पेस है। यानी कि जो ध्वनि आ रही है ब्रह्मांड में यह ब्रह्मांड में जैसी ध्वनि रिकॉर्ड की गई है, जो प्रकाश रिकॉर्ड किया गया है, यह हकीकत में ब्रह्मांड में ऐसी ही ध्वनि आ रही है जैसे शिव के डमरू में बजती है। अंतरिक्ष में सामान्य ध्वनि नहीं चलती बल्कि वहां पर हवा होती ही नहीं है। से आने वाली यह एक तारा है से आने वाली रेडियो और एक्सरे तरंगों को कंप्यूटर द्वारा ऑडियो में बदला गया। इस प्रक्रिया को सोनिफिकेशन कहा जाता है और हूबहू वैसे ही रिकॉर्ड करके नासा ने जारी किया है। नासा के वैज्ञानिकों ने जारी किया है और मैं आपके लिए लेकर आया हूं जो अभी तक कोई आपको नहीं बता पाएगा।

अब अंतरिक्ष हमेशा शांत दिखाई देता है। वहां पर कोई आवाज नहीं होती है। वहां पर हवा नहीं होती है। लेकिन वैज्ञानिक कहते हैं कि वहां पर ऊर्जा है। वहां पर तरंगे हैं। वहां पर कंपन है जो लगातार हो रहा है, जो लगातार चल रहा है और किन्हीं तरंगों ने एक रहस्यमई ताल को पैदा किया है। और वह ताल है डमरू की आवाज। नासा ने पल्सर के डाटा को ध्वनि में बदला और यहीं पर ऑडियो इंटरनेट पर वायरल हो गया है। जैसे ही लोगों ने इस ताल को सुना इसे शिव के डर्मू जैसी ध्वनि बताया। तमाम वैज्ञानिक चौंक गए। उन सभी ने शिव की कल्पना की और वह महसूस करने लगे कि ब्रह्मांड में शिव है, उनकी ध्वनि है, उनका डमरू है और उनकी ताल भी है।

यह ध्वनि विज्ञान की भाषा में एक पल्सर तारे की कॉस्मिक धड़कन है। जो लगातार ऊर्जा की पल्स छोड़ रहा है। एक तरह विज्ञान इसे अंतरक्षीय डाटा बता रहा है। दूसरी तरफ अध्यात्म इसे ब्रह्मांडलीय संकेत बता रहा है। इसी पर बहस छिड़ी हुई है। वैज्ञानिकों में बहस छिड़ी हुई है कि क्या यह सिर्फ संयोग है या कोई गहरा रहस्य है? सवाल यह है कि क्या वाकई एक तारे की धड़कन और शिव के डमरू की ताल एक जैसी हो सकती है?

कुछ लोग इसे ब्रह्मांड की दिव्य लय से मिला रहे हैं। जो हजारों साल पुराने भारतीय दर्शन से हूबहू मेल खाती है। भारतीय दर्शन में भी इस तरह की व्याख्या है। इस तरह की चर्चा की गई है। लेकिन होता क्या है? पल्सर पर चर्चा कर लेते हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझ लेते हैं। पल्सर अंतरिक्ष का सबसे रहस्यमई और शक्तिशाली तारिक अवशेष माना जाता है। जब कोई विशाल तारा खत्म होता है। उसका अंदरूनी हिस्सा बच जाता है।

वही बन जाता है। विशाल l या सुपरनोबा के बाद यह अत्यंत घना न्यूटन स्टार बनाता है। जिसका घनत्व इतना ज्यादा होता है कि एक चम्मच पदार्थ का वजन अरबों टन हो सकता है। एक चम्मच पदार्थ का वजन अरबों टन हो सकता है। कल्पना कीजिए आप। पल्सर बहुत तेजी से घूमता है। कुछ तो प्रति सेकंड सैकड़ों बार घूमता है। इसका मैग्नेटिक फील्ड पृथ्वी से खरबों गुना अधिक और ताकतवर हो सकता है। घूमते हुए यह रेडियो और एक्सरे तरंगे अंतरिक्ष में छोड़ता है।

वैज्ञानिक इसे कॉस्मिक लाइट हाउस कहते हैं क्योंकि इसके बीच घूमते हुए कई बार दिखाई देती है। यह हर बीम पृथ्वी की दिशा में आती है और यह वैज्ञानिकों को नियमित पल्स भी दिखाई देती है। वैज्ञानिक इसे रिकॉर्ड करते हैं, महसूस करते हैं, देखते हैं प्रति सेकंड कितने चक्कर लगाती होगी यह पल्स। कुछ इतने तेज घूमते हैं कि हर सेकंड में यह सैकड़ों बार चक्कर लगाते हैं। इन्हें मिली सेकंड पल्सर भी कहा जाता है क्योंकि इनकी पल्स मिली सेकंड में दर्ज होती है।

इसकी टाइमिंग इतनी सटीक होती है कि घड़ियों से इनकी तुलना की जाती है। इसके वजन से वैज्ञानिक इन्हें ब्रह्मांडीय घड़ी यानी कि कॉस्मिक क्लॉक भी कहते हैं। यूं समझिए कि ऊर्जा का विस्फोट इसमें होता है। इनमें निकलने वाली ऊर्जा बेहद शक्तिशाली होती है। इनका चुंबकीय क्षेत्र इतना विशाल होता है कि पदार्थ की संरचना तक बदल जाती है। इसी से ब्रह्मांडीय बीट का निर्माण होता है। यानी कि इन्हीं लगातार पल्स से एक ऐसी ताल ऐसी लय बनती है जो भगवान शिव के डमरू जैसी होती है और डमरू कैसे बनी? कैसे बनी डमरू की आवाज? ये भी मैं आपको सुना देता हूं। अंतरिक्ष में सीधे तौर पर कोई भी आवाज सुनाई नहीं देती है।

वैज्ञानिकों का कहना है कोई आवाज अंतरिक्ष में सुनाई नहीं देती है क्योंकि अंतरिक्ष की ध्वनि तरंगों के लिए कोई माध्यम नहीं होती। नासा के तारे से निकलने वाले एक्सरे और रेडियो डाटा जो लिया गया है इस डिजिटल डाटा को ऑडियो फ्रीक्वेंसी में कन्वर्ट किया गया है। जब डाटा को ऑडियो में बदला गया तो एक रिदमम पैदा हुई। यह रिदमम तेज और लगातार थाप की थी। ऐसा लग रहा था कि कोई डमरू बजा रहा है। इस थाप की फ्रीक्वेंसी और रिदमम डमरू से हूबहू मेल खा रही थी।

नासा के इस प्रोजेक्ट ने अंतरिक्ष को एक नया संगीत दे दिया है और यह संगीत वैसा ही है जैसा कि शिव का डमरू बजता है जो कि तांडव के समय शिव ने डमरू बजाया था। एक बार मैं फिर कहूंगा अपने दर्शकों को कि डमरू की इस थाप को जो कि ब्रह्मांड में लगातार बज रही है। गौर से सुनिए। सुना आपने शिव के डमरू से कैसे यह मेल खाती है? असल में सनातन परंपरा में डमरू को षष्ठी का पहला वाद्य यंत्र माना गया है। डमरू की थाप से ही ब्रह्मांड की सभी ध्वनियां पैदा हुई हैं

नासा के की आवाज में भी एक निश्चित अंतराल है और यह अंतराल डमरू बजाने की लय से पूरी तरह से मिलता है। की आवाज में एक रहस्यमई ठहराव और गति भी है। डमरू भी एक खास रिदमम और संतुलन के साथ बचता है। दोनों ही ध्वनियां सुनने वाले के मन में एक कंपन पैदा करती हैं। वैज्ञानिक भी मानते हैं कि यह ब्रह्मांड की अपनी लय है।

अध्यात्म कहता है कि यह शिव का सीधा ब्रह्मांडीय संकेत है जो ब्रह्मांड के साथ-साथ पृथ्वी पर भी कंपन महसूस कराता है। लेकिन शिव के डमरू का असली रहस्य है क्या? वो भी आपको बताता हूं। शिव का डमरू केवल एक वाद्य यंत्र नहीं है। यह ब्रह्मांड की रचना का बड़ा प्रतीक है। डमरू का आकार दो त्रिकोणों से मिलने से बनता है और आकार सृजन और विनाश के संतुलन को भी दर्शाता है। डमरू के बजने से ही समय चक्र की शुरुआत होती है।

इसके नाद से ही 14 महेश्वर सूत्राणी उत्पन्न हुए हैं। महेश्वर सूत्र ही संस्कृत व्याकरण और भाषा का आधार माना गया है। यानी कि पूरी वर्णमाला और ज्ञान का स्रोत डमरू ही है। डमरू की आवाज शून्य से शुरू होकर अनंत तक जाती है और यही कारण है कि पल्सर तारा पल्सर की आवाज को इससे जोड़ा गया है और यह भी शून्य से लेकर अनंत तक जा रही है। पर ये पल्सर तारा है कहां? आप कहेंगे कि जिस तारे से भगवान शिव के डमरू की आवाज आ रही है। ब्रह्मांड में वो तारा है कहां? तो यह भी आपको बता देता हूं।

असल में नासा ने जिस मुख्य पल्सर की ध्वनि जारी की वह खास तारा सुदूर अंतरिक्ष के क्रेब नेबुला में स्थित है। क्रेब नेबुला पृथ्वी से लगभग 6500 प्रकाश वर्ष दूर है। यह हमारी आकाशगंगा का बेहद सक्रिय हिस्सा है। इसके केंद्र में स्थित पल्सर प्रति सेकंड 30 बार घूमता है। कुछ अन्य पल्सर तारे प्रति सेकंड 700 बार घूमते हैं।

इतनी दूर स्थित तारे की आवाज को रिकॉर्ड करना चमत्कार है। नासा के चंद्र एक्स रे वैधशाला ने इसके डाटा को जुटाया और इतनी दूरी के बावजूद भी इसकी गूंज पृथ्वी तक महसूस की गई है। 65 हजार प्रकाश वर्ष दूर है। लेकिन इतनी दूर तक भी पृथ्वी तक इसकी आवाज को रिकॉर्ड किया गया है। किसने खोजा? कब खोजा? नासा ने कब और कैसे खोजा? यह भी बता देता हूं पल्सर तारे की खोज का इतिहास बेहद दिलचस्प है

और पुराना भी है। पहली बार 1967 में जोसलिन बेल बर्नेल ने इसे खोजा था। तब इसे एलियन का भेजा गया कोई गुप्त संदेश माना जा रहा था। नासा ने हाल के वर्षों में डाटा सोनिफिकेशन प्रोजेक्ट शुरू किया और उसके तहत हवरचंद और जे डब्ल्यूएसटी का डाटा इस्तेमाल हुआ। साल 2020 के बाद से नासा ने इन आवाजों को जारी करना शुरू किया। पहले रिकॉर्ड किया फिर जारी करना शुरू किया। चंद्रा एक्सरे वैधशाला ने क्रेब नेबुला का गहरा अध्ययन किया। जिटल डाटा के साउंड वेव में बदलने पर ध्वनि जो निकली वो डमरू की मिली।

नासा का एक प्रोजेक्ट अंतरिक्ष को देखने नहीं बल्कि सुनने का भी है। अंतरिक्ष में जितनी भी आवाज आती हैं नासा का प्रोजेक्ट वहां पर काम करता है कि कौन सी आवाज में क्या संदेश छुपा हुआ है। लेकिन वैज्ञानिक तब चौंक गए जब शिव के डमरू की ध्वनि उन्हें एक तारे में सुनाई दी। नासा ने इस ध्वनि को लेकर कोई धार्मिक दावा तो नहीं किया है। अब वैज्ञानिक है तो वैज्ञानिक कोई धार्मिक दावा नहीं करेगा लेकिन नासा का यह कहना है कि यह केवल तारकीय डाटा का रूपांतरण है।

वैज्ञानिक भाषा में इसे क्रेब नेबुला सोनिफिकेशन कहा जाता है। नासा के मुताबिक यह ऊर्जा तरंगों की अपनी प्राकृतिक लय है। नासा ने यह माना है कि ब्रह्मांड में एक अद्भुत संगीत छुपा हुआ था जिसे हमने खोजा। एजेंसी ने इसे आम लोगों को विज्ञान समझाने का जरिया भी बताया। हालांकि नासा ने ध्वनि की लयबद्धता को बेहद अनोखा माना और कहा कि अब तक हमने इस तरह की ध्वनि नहीं सुनी है। नासा के वैज्ञानिक भी ब्रह्मांड के इस रिदमम से बेहद प्रभावित हैं।

आधिकारिक तौर पर इसे प्रकृति का एक अद्भुत नियम कहा जा रहा है और वैज्ञानिक भी मानते हैं कि ये जो ध्वनि है इस ध्वनि में कुछ तो है। कुछ तो अद्भुत है। कुछ अविश्वसनीय है जो इससे पहले हमने कभी नहीं देखा। विज्ञान से लेकर अध्यात्म तक का सफर कैसे यह भी आपको बता देता हूं। विज्ञान जहां पर रुकता है, अध्यात्म वहीं पर सोचना शुरू करता है। नासा के लिए केवल एक घूमते हुए तारे का डाटा मात्र है ये।

लेकिन भारतीय जो मनीषी हैं, भारतीय मनीषियों के लिए यह साक्षात शिव का नाद है। पल्सर तारे की यह आवाज साबित करती है कि ब्रह्मांड मृत नहीं है। ब्रह्मांड लगातार धड़क रहा है। ब्रह्मांड में जीवन है और इसमें एक खास चेतना है। यह चेतना ही सनातन धर्म में शिव के नाम से जानी जाती है। बिना किसी माध्यम के भी ऊर्जा अपनी लय को बनाए रखती है।

किसी माध्यम की जरूरत नहीं है। और यही बात हजारों साल पहले ऋषियों ने ध्यान में देखी थी। आज नासा की मशीनें उसी ध्यान के सच को रिकॉर्ड कर रही हैं। पहले ऋषि जब ध्यान लगाते थे तो उन्हें भी ब्रह्मांड में इस तरह की आवाज सुनाई देती थी। अब जो शिव का कॉस्मिक डांस है। आपने नटराज की मूर्ति देखी होगी। अब मैं उस पर आता हूं। भगवान शिव का नटराज स्वरूप आपने देखा होगा। नट नटराज स्वरूप जो कि ब्रह्मांडीय नृत्य का प्रतीक है। उनके इस दिव्य नृत्य को आनंद तांडव भी कहा जाता है।

यह आनंद तांडव के तौर पर जाना जाता है। नटराज की एक साथ में डमरू है तो दूसरे में सृजन का प्रतीक है। दूसरे हाथ में है और ब्रह्मांड के को दर्शाती है। वो तस्वीर देखिए आप। वैज्ञानिक कार्ल सगन भी नटराज की इस मूर्ति के मुरीद हुए थे। सगन ने यह माना था कि शिव का नृत्य आधुनिक भौतिकी जैसा है। यह नृत्य सब पार्टिकल्स के लगातार बजने से मिटने जैसा है। बनने और मिटने जैसा है। तारा भी लगातार ऊर्जा का सृजन और विनाश का संकेत दे रहा है। तारा जितनी बार घूमता है। मानो कि नटराज एक कदम पर थिरक रहे हैं और नटराज के हाथ में जो डमरू है उस डमरू से जो ध्वनि निकल रही है ठीक वैसा ही प्रतीत हो रहा है। ऐसा वैज्ञानिक मान रहे हैं। अब सबसे बड़ी बात कि सर्ण में नटराज की मूर्ति क्यों? जिनेवा में दुनिया की सबसे बड़ी प्रयोगशाला सर्ण है और सन में जो परिसर है उसका उसमें भगवान नटराज की एक विशाल मूर्ति लगी हुई है। यह मूर्ति भारत सरकार ने वैज्ञानिकों को उपहार में दी थी। वैज्ञानिक मानते हैं कि शिव का नृत्य ष्टि का आधार है। गॉड पार्टिकल्स की खोज के दौरान एक थ्योरी को याद किया गया। भौतिक वैज्ञानिक मानते हैं कि सृष्टि में लगातार कंपन हो रहा है। कणों का यह कंपन ही शिव के डमरू और नृत्य की थाप जैसा है।

दुनिया के बड़े वैज्ञानिक भी नटराज के आगे सिर झुकाते हैं। नासा की यह नई खोज इसी वैज्ञानिक सोच को आगे बढ़ाती है और सनातन से जोड़ती है। इस महान रहस्य से खुलता क्या है? ये जो महान रहस्य है, इससे क्या खुलता है? पल्सर तारे के डमरू की आवाज डमरू जैसी आवाज इस एक बहुत बड़ा इशारा कर रही है। यह इशारा कर रही है कि पूरा ब्रह्मांड एक ही सूत्र से बना हुआ है। ब्रह्मांड की हर वस्तु में एक निश्चित तौर और सटीक फ्रीक्वेंसी है।

यदि यह फ्रीक्वेंसी बिगड़ जाए तो पूरी सृष्टि नष्ट हो सकती है। यह खोज बिग बैंग थ्योरी की शुरुआत के पलों की याद दिलाती है। जब एक महाविस्फोट से पूरी सृष्टि में ध्वनी गूंज उठी थी। डमरू की आवाज भी एक बिंदु से शुरू होकर फैल जाती है। इस रहस्य के खुलने से इंसान को अपनी घूम, अपनी लघुता का एहसास होता है। हम सब उस परम शक्ति के बनाए हुए एक महान संगीत का हिस्सा हैं। वो संगीत का हिस्सा जिसे वैज्ञानिकों ने खोज लिया है। एक बार फिर से आपको सुनाता हूं। ब्रह्मांड की वह आवाज जो भगवान शिव के डमरू के तौर पर गूंज रही है। जिसे वैज्ञानिकों ने रिकॉर्ड किया तो वह भी चौंक गए। ।

तो आपने आवाज को सुना लेकिन एक दैय रहस्य भी है। नासा ने इसके पहले भी कई ग्रहों की आवाजों को रिकॉर्ड किया है। सूर्य की रिकॉर्ड की गई आवाज हूबहू जानते हैं किससे मिलती है। ओम के जाप जैसी लगती है। सूर्य के भीतर उठने वाले तूफानों की गूंज ओम सुनाई देता है। नासा के वाइजर अंतरिक्ष यान ने जब सौरमंडल को पार किया तो ग्रहों की चुंबकीय क्षेत्र में एक गूंजता हुआ संगीत मिला। पृथ्वी की अपनी आवाज किसी गहरे ध्यान की ध्वनि जैसी है। ब्लैक हॉल में आने वाली आवाजें भी बेहद डरावनी और भारी होती हैं।

यह सभी आवाजें प्राचीन भारतीय नाद योग की पुष्टि करती हैं। नाद योग कहता है कि शब्द और ध्वनि ही ब्रह्म का स्वरूप है और शब्द और ध्वनि ही हकीकत है। सूर्य और ओम की ध्वनि का सच क्या है? यह भी आपको बताता हूं। ध्वनि का सच क्या है? नासा ने सूर्य की गूंज जब दुनिया के सामने पेश किया तो तब भी पूरी दुनिया के वैज्ञानिक और शोधकर्ता हैरान रह गए थे। सूर्य के कंपन की आवृत्ति यानी कि फ्रीक्वेंसी बेहद कम होती है और जब इस डाटा की स्पीड बढ़ाकर इंसानी कानों के लायक बनाया जाता है तो उसमें से एक आवाज निकलती है। एक गूंज निकलती है और वह कैसी होती है? ओम के समान।

सनातन धर्म में सूर्य को साक्षात देवता और ऊर्जा का स्रोत माना गया है और ओम को पूरे ब्रह्मांड की आदि ध्वनि यानी कि पहली आवाज कहा जाता है। नासा की खोज ने अनजाने में ही सही लेकिन इस बात पर मोहर लगा दी है कि यह साबित करता है कि हमारे प्राचीन ऋषियों का ज्ञान अचूक था और तब उस समय विज्ञान नहीं था। केवल केवल सनातन था, पौराणिक था और उस समय भी ऋषि मुनियों को इनका आभास था और उन्हीं ऋषि मुनियों ने वेदों में ग्रंथों में इस बात का जिक्र भी किया। सनातन विज्ञान का लोहा मानती दुनिया प्राचीन भारत का विज्ञान केवल कल्पनाओं पर आधारित नहीं था।

ऋषियों ने बिना दूरबीन के ग्रहों की सटीक दूरी की गणना कर ली थी। हनुमान चालीसा में युग सहस्त्र योजन पर भी भानु की दूरी लिखी हुई है। नवक ग्रहों की अवधारणा आधुनिक खगोल विज्ञान से मेल खाती है। नासा की हर नई खोज सनातन मान्यताओं के बेहद करीब आपको पहुंचा देती है। चाहे वो रामसेतु का अस्तित्व हो या फिर अंतरिक्ष की आवाज हो। दुनिया के कई बड़े-बड़े वैज्ञानिक गीता और उपनिषदों के प्रशंसक हैं। ओपेन हाईमर ने परमाणु परीक्षण के समय गीता का श्लोक पढ़ा था। पल्सर की यह आवाज इसी महान वैज्ञानिक विरासत की भी अगली कड़ी मानी जा रही है। पहले पहले सूर्य से निकली हुई ओम की आवाज और अब पल्सर तारे से निकली हुई डमरू की आवाज एक संकेत देती है। सृजन स्थिति और विनाश का महाचक्र ब्रह्मांड का एक ही शाश्वत नियम है जो बना है वो मिटेगा। नए तारों का जन्म होता है।

पुराने तारे मरकर पल्सर बनते हैं। और यही चक्र सनातन धर्म में ब्रह्मा, विष्णु और महेश का है। ब्रह्मा सृजन करते हैं। विष्णु पालन करते हैं और शिव संहारक हैं। पल्सर की आवाज इस महाचक्र की लगातार चलती हुई घड़ी है। हर एक थाप के साथ ब्रह्मांड का एक पल बीत जाता है। यह आवाज हमें याद दिलाती है कि समय बलवान होता है। महाकाल के नियंत्रण में भी यही पूरा ब्रह्मांडीय कालचक्र घूम रहा है। पल्सर की आवाज उस कालचक्र की अपनी आवाज घूंजती हुई प्रतीत होती है और ब्रह्मांड से भी नजर आ रही है। ऋषियों को क्या पता था? सवाल यह भी है कि जो नासा आज खोज रहा है क्या वो ऋषियों को पता था?

प्राचीन प्रतीकवाद को समझिए। जानिए भारतीय परंपरा में ब्रह्मांड को ध्वनि और ऊर्जा से जोड़ा गया। वाइब्रेशन दर्शन की बात अगर करें तो ऋषियों ने कंपन और ऊर्जा को सृष्टि का आधार माना। नाद ब्रह्म सिद्धांत को अगर समझें तो नाद ब्रह्म का अर्थ है। पूरा ब्रह्मांड ध्वनि है। यानी कि ब्रह्मांड। ध्वनि यानी कि षष्टि और जड़ में कंपन और नाद है। यही तो सनातन है। डमरू का आकार सिर्फ कलात्मक नहीं है। प्रतीकात्मक है। इसके दोनों हिस्से घंटे के आकार जैसे दिखते हैं। इसे ब्रह्मांड के फैलने और सुड़ने से जोड़ा जाता है। कई परंपराएं इसे ब्रह्मांड की स्वास मानती हैं। जिसमें सृजन और विनाश का चक्र होता है। यानी कि एक ओर सृजन है।

दूसरी ओर विनाश का संकेत है। द्वैत का संकेत भी है। यानी कि जीवन और मृत्यु का। प्रकाश और अंधकार का दोनों साथ है। डमरू समय और ऊर्जा के संतुलन का प्रतीक है। इसकी बनावट में कॉस्मिक समरूपता की कल्पना देखी जाती है। यही वजह है कि डमरू को साधारण वाद्य यंत्र नहीं माना जाता और यही वजह है कि क्यों भगवान शिव ने अपने हाथ में डमरू लेकर तांडव किया था।

शिव को महाकाल कहा जाता है। यानी कि समय के स्वामी भारतीय दर्शन में शिव समय से परे हैं। वहीं विज्ञान में पल्सर समय मापने जैसे व्यवहार करते हैं। हर पल्स निश्चित समय अंतराल पर आती है और इसलिए पल्सर को कॉस्मिक क्लॉक भी कहा जाता है। ब्रह्मांड के पांच अनसुलझे सवाल। ब्रह्मांड के पांच बड़े अनसुलझे रहस्य। ब्रह्मांड रहस्यों का एक बहुत बड़ा और असीम महासागर है। विज्ञान आज तक केवल 5% ब्रह्मांड को ही जान पाया है।

बाकी का 85% ब्रह्मांड का हिस्सा डार्क मैटर और डार्क एनर्जी है। डार्क मैटर क्या है? आज तक कोई वैज्ञानिक जान नहीं पाया उसके बारे में। ब्लैक हॉल के भीतर समय और भौतिकी के नियम काम नहीं करते हैं। ब्रह्मांड लगातार फैल रहा है। लेकिन इसे कौन फैला रहा है किसी को नहीं पता है। क्या मल्टीवरिवर्स यानी कि हमारे जैसे कई और ब्रह्मांड भी मौजूद हैं। इन सभी अनुत्तित सवालों पे जवाब में सनातन दर्शन में इनके जवाब मिलते हैं। जहां पर ब्रह्मांड को अनंत और शिव की अजन्मा अविनाशी कहा जाता है।

और उसी आधार को मानते हुए ब्रह्मांड की धड़कन को भी महसूस किया जाता है। सवाल यह है कि क्या पूरा ब्रह्मांड किसी अदृश्य लय पर चल रहा है? आधुनिक विज्ञान कहता है कि हर वस्तु कंपन में है। स्ट्रिंग थ्योरी भी कंपन करती है और सूक्ष्म स्ट्रिंग की बात करती है। क्वांटम फील्ड में जो ऊर्जा लगातार बदलती रहती है वो ऊर्जा दोलन की बात करें तो इस दोलनों से भी पदार्थ और बल पैदा होता है। ग्रहों से लेकर परमाणुओं तक हर जगह फ्रीक्वेंसी है।

इसलिए वैज्ञानिक कंपन और तरंगों की भाषा इस्तेमाल करते हैं। पूरा ब्रह्मांड गणितीय लय में चलता दिखाई देता है। लेकिन इसके अंतिम रहस्य अब तक इंसान की पकड़ से दूर हैं और मैंने कहा कि इंसान हो या वैज्ञानिक हो सिर्फ 5% ब्रह्मांड को जान पाया है। जहां विज्ञान ब्रह्मांड है। उसी आध्यात्म को आप महसूस कर सकते हैं। और जब दोनों एक ही लय में सुनने लगे, जब दोनों एक ही लय में सुनने लगे, तो समझिए कि इंसान सृष्टि के किसी गहरे सत्य के करीब पहुंच जाता है। चलते-चलते मैं आपको ब्रह्मांड के तारे की उस धड़कन के साथ छोड़ जाता हूं या शिव के डमरू के साथ सोच सो छोड़ जाता हूं जिसमें आप खुद सोचें महसूस करें और जाने के ब्रह्मांड में कोई तो है जो सब कुछ देख रहा है, सुन रहा है और इस पूरी सृष्टि को सुना रहा है और महसूस भी कर रहा है और चला भी रहा है। सुनिए ब्रह्मांड की इस डमरू को। वैज्ञानिकों को सन्न कर दिया है। क्या अंतरिक्ष में कोई महाशक्ति बैठी हुई है जो पूरे ब्रह्मांड को एक लय में नचा रही हैक्या वह महाशक्ति साक्षात शिव हैं? क्योंकि कहते हैं शिव जिनका ना आदि है ना अंत है जो सदैव हैं। जब शिव का डमरू बजता है तो सृष्टि जन्म लेती है। ऊर्जा जागती है और ब्रह्मांड की लय बदल जाती है। अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा ने अंतरिक्ष से एक ऐसी ध्वनि को डिकोड किया है जिसे सुनकर पूरी दुनिया के वैज्ञानिक और शिव भक्त हैरान हैं।

एक निश्चित तौर और सटीक फ्रीक्वेंसी है। यदि यह फ्रीक्वेंसी बिगड़ जाए तो पूरी सृष्टि नष्ट हो सकती है। यह खोज बिग बैंग थ्योरी की शुरुआत के पलों की याद दिलाती है। जब एक महा विस्फोट से पूरी सृष्टि में ध्वनि गूंज उठी थी। डमरू की आवाज भी एक बिंदु से शुरू होकर फैल जाती है। इस रहस्य के खुलने से इंसान को अपनी घूम, अपनी लघुता का एहसास होता है। हम सब उस परम शक्ति के बनाए हुए एक महान संगीत का हिस्सा हैं। वो संगीत का हिस्सा जिसे वैज्ञानिकों ने खोज लिया है। एक बार फिर से आपको सुनाता हूं। ब्रह्मांड की वह आवाज जो भगवान शिव के डमरू के तौर पर गूंज रही है। जिसे वैज्ञानिकों ने रिकॉर्ड किया तो वह भी चौंक गए। सुनिए। तो आपने आवाज को सुना लेकिन एक दैय रहस्य भी है। नासा ने इसके पहले भी कई ग्रहों की आवाजों को रिकॉर्ड किया है। सूर्य की रिकॉर्ड की गई आवाज हूबहू जानते हैं किससे मिलती है? ओम के जाप जैसी लगती है। सूर्य के भीतर उठने वाले तूफानों की गूंज ओम सुनाई देता है। नासा के वाइजर अंतरिक्ष यान ने जब सौरमंडल को पार किया तो ग्रहों की चुंबकीय क्षेत्र में एक गूंजता हुआ संगीत मिला। पृथ्वी की अपनी आवाज किसी गहरे ध्यान की ध्वनि जैसी है। ब्लैक हॉल में आने वाली आवाजें भी बेहद डरावनी और भारी होती हैं। यह सभी आवाजें प्राचीन भारतीय नाद योग की पुष्टि करती हैं। नाद योग कहता है कि शब्द और ध्वनि ही ब्रह्म का स्वरूप है और शब्द और ध्वनि ही हकीकत है। सूर्य और ओम की ध्वनि का सच क्या है? यह भी आपको बताता हूं। ध्वनि का सच क्या है? नासा ने सूर्य की गूंज जब दुनिया के सामने पेश किया तो तब भी पूरी दुनिया के वैज्ञानिक और शोधकर्ता हैरान रह गए थे। सूर्य के कंपन की आवृत्ति यानी कि फ्रीक्वेंसी बेहद कम होती है और जब इस डाटा की स्पीड बढ़ाकर इंसानी कानों के लायक बनाया जाता है तो उसमें से एक आवाज निकलती है। एक गूंज निकलती है और वह कैसी होती है? ओम के समान। सनातन धर्म में सूर्य को साक्षात देवता और ऊर्जा का स्रोत माना गया है और ओम को पूरे ब्रह्मांड की आदि ध्वनि यानी कि पहली आवाज कहा जाता है। नासा की खोज ने अनजाने में ही सही लेकिन इस बात पर मोहर लगा दी है कि यह साबित करता है कि हमारे प्राचीन ऋषियों का ज्ञान अचूक था और तब उस समय विज्ञान नहीं था। केवल केवल सनातन था, पौराणिक था और उस समय भी ऋषि मुनियों को इनका आभास था और उन्हीं ऋषि मुनियों ने वेदों में ग्रंथों में इस बात का जिक्र भी किया है। सनातन विज्ञान का लोहा मानती दुनिया प्राचीन भारत का विज्ञान केवल कल्पनाओं पर आधारित नहीं था। ऋषियों ने बिना दूरबीन के ग्रहों की सटीक दूरी की गणना कर ली थी। हनुमान चालीसा में युग सहस्त्र योजन पर भी भानु की दूरी लिखी हुई है। नवग ग्रहों की अवधारणा आधुनिक खगोल विज्ञान से मेल खाती है। नासा की हर नई खोज सनातन मान्यताओं के बेहद करीब आपको पहुंचा देती है। चाहे वो राम सेतु का अस्तित्व हो या फिर अंतरिक्ष की आवाज हो। दुनिया के कई बड़े-बड़े वैज्ञानिक गीता और उपनिषदों के प्रशंसक हैं। ओपेन हाईमर ने l के समय गीता का श्लोक पढ़ा था। पल्सर की यह आवाज इसी महान वैज्ञानिक विरासत की भी अगली कड़ी मानी जा रही है। पहले पहले सूर्य से निकली हुई ओम की आवाज और अब तारे से निकली हुई डमरू की आवाज एक संकेत देती है। सृजन स्थिति और विनाश का महाचक्र ब्रह्मांड का एक ही शाश्वत नियम है जो बना है वो मिटेगा।

नए तारों का जन्म होता है। पुराने तारे मरकर पल्सर बनते हैं। और यही चक्र सनातन धर्म में ब्रह्मा विष्णु और महेश का है। ब्रह्मा सृजन करते हैं। विष्णु पालन करते हैं और शिव संहारक हैं। पल्सर की आवाज इस महाचक्र की लगातार चलती हुई घड़ी है। हर एक थाप के साथ ब्रह्मांड का एक पल बीत जाता है। यह आवाज हमें याद दिलाती है कि समय बलवान होता है। महाकाल के नियंत्रण में भी यही पूरा ब्रह्मांडीय कालचक्र घूम रहा है। पल्सर की आवाज उस कालचक्र की अपनी आवाज घूंजती हुई प्रतीत होती है और ब्रह्मांड से भी नजर आ रही है। ऋषियों को क्या पता था? सवाल यह भी है कि जो नासा आज खोज रहा है, क्या वो ऋषियों को पता था? प्राचीन प्रतीकवाद को समझिए। जानिए भारतीय परंपरा में ब्रह्मांड को ध्वनि और ऊर्जा से जोड़ा गया। वाइब्रेशन दर्शन की बात अगर करें तो ऋषियों ने कंपन और ऊर्जा को सृष्टि का आधार माना। नाद ब्रह्म सिद्धांत को अगर समझें तो नाद ब्रह्म का अर्थ है पूरा ब्रह्मांड ध्वनि है यानी कि ब्रह्मांड ध्वनि यानी कि षष्टि और जड़ में कंपन और नाद है। यही तो सनातन है। डमरू का आकार सिर्फ कलात्मक नहीं है। प्रतीकात्मक है।

इसके दोनों हिस्से घंटे के आकार जैसे दिखते हैं। इसे ब्रह्मांड के फैलने और सुड़ने से जोड़ा जाता है। कई परंपराएं इसे ब्रह्मांड की स्वास मानती हैं जिसमें सृजन और विनाश का चक्र होता है। यानी कि एक ओर सृजन है। दूसरी ओर विनाश का संकेत है। द्वैत का संकेत भी है। यानी कि जीवन और मृत्यु का। प्रकाश और अंधकार का। दोनों साथ है। डमरू समय और ऊर्जा के संतुलन का प्रतीक है। इसकी बनावट में कॉस्मिक समरूपता की कल्पना देखी जाती है। यही वजह है कि डमरू को साधारण वाद्य यंत्र नहीं माना जाता और यही वजह है कि क्यों भगवान शिव ने अपने हाथ में डमरू लेकर तांडव किया था। शिव को महाकाल कहा जाता है। यानी कि समय के स्वामी भारतीय दर्शन में शिव समय से परे हैं। वहीं विज्ञान में पल्सर समय मापने जैसे व्यवहार करते हैं। हर पल्स निश्चित समय अंतराल पर आती है और इसलिए पल्सर को कॉस्मिक क्लॉक भी कहा जाता है। ब्रह्मांड के पांच अनसुलझे सवाल। ब्रह्मांड के पांच बड़े अनसुलझे रहस्य। ब्रह्मांड रहस्यों का एक बहुत बड़ा और असीम महासागर है। विज्ञान आज तक केवल 5% ब्रह्मांड को ही जान पाया है। बाकी का 85% ब्रह्मांड का हिस्सा डार्क मैटर और डार्क एनर्जी है।

डार्क मैटर क्या है? आज तक कोई वैज्ञानिक जान नहीं पाया उसके बारे में। ब्लैक होल के भीतर समय और भौतिकी के नियम काम नहीं करते हैं। ब्रह्मांड लगातार फैल रहा है। लेकिन इसे कौन फैला रहा है किसी को नहीं पता है। क्या मल्टीवरिवर्स यानी कि हमारे जैसे कई और ब्रह्मांड भी मौजूद हैं। इन सभी अनुचतित सवालों पे जवाब में सनातन दर्शन में इनके जवाब मिलते हैं। जहां पर ब्रह्मांड को अनंत और शिव की अजन्मा अविनाशी कहा जाता है। और उसी आधार को मानते हुए ब्रह्मांड की धड़कन को भी महसूस किया जाता है। सवाल यह है कि क्या पूरा ब्रह्मांड किसी अदृश्य लय पर चल रहा है? आधुनिक विज्ञान कहता है कि हर वस्तु कंपन में है। स्ट्रिंग थ्योरी भी कंपन करती है और सूक्ष्म स्ट्रिंग की बात करती है। क्वांटम फील्ड में जो ऊर्जा लगातार बदलती रहती है वो ऊर्जा दोलन की बात करें तो इस दोलनों से भी पदार्थ और बल पैदा होता है। ग्रहों से लेकर परमाणुओं तक हर जगह फ्रीक्वेंसी है। इसलिए वैज्ञानिक कंपन और तरंगों की भाषा इस्तेमाल करते हैं। पूरा ब्रह्मांड गणितीय लय में चलता दिखाई देता है। लेकिन इसके अंतिम रहस्य अब तक इंसान की पकड़ से दूर हैं और मैंने कहा कि इंसान हो या वैज्ञानिक हो सिर्फ 5% ब्रह्मांड को जान पाया है। जहां विज्ञान ब्रह्मांड है। उसी आध्यात्म को आप महसूस कर सकते हैं। और जब दोनों एक ही लय में सुनने लगे, जब दोनों एक ही लय में सुनने लगे, तो समझिए कि इंसान सृष्टि के किसी गहरे सत्य के करीब पहुंच जाता है।

चलते-चलते मैं आपको ब्रह्मांड के तारे की उस धड़कन के साथ छोड़ जाता हूं या शिव के डमरू के साथ सोच सो छोड़ जाता हूं जिसमें आप खुद सोचें महसूस करें और जाने के ब्रह्मांड में कोई तो है जो सब कुछ देख रहा है, सुन रहा है और इस पूरी सृष्टि को सुना रहा है और महसूस भी कर रहा है और चला भी रहा है। सुनिए ब्रह्मांड की इस डमरू को। अंतरिक्ष में कोई महाशक्ति बैठी हुई है जो पूरे ब्रह्मांड को एक लय में नचा रही है? क्या वह महाशक्ति साक्षात शिव हैं? क्योंकि कहते हैं शिव जिनका ना आदि है ना अंत है जो सदैव हैं। जब शिव का डमरू बजता है तो षष्टि जन्म लेती है। ऊर्जा जागती है और ब्रह्मांड की लय बदल जाती है। अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा ने अंतरिक्ष से एक ऐसी ध्वनि को डिकोड किया है जिसे सुनकर पूरी दुनिया के वैज्ञानिक और शिव भक्त हैरान हैं। यह आवाज किसी और की नहीं है बल्कि हूबहू भगवान शिव के डमरू की आवाज है। एक मृत तारा जो प्रति सेकंड सैकड़ों बार घूम रहा है वो अंतरिक्ष में एक ऐसी लय पैदा कर रहा है जो सीधे केदारनाथ और कैलाश की गूंज से मेल खाती है। आज हम खोलेंगे ब्रह्मांड के उस गर्भगृह का रहस्य जहां पर विज्ञान और शिव का कॉस्मिक डांस हो जाता है। साथ ही जानेंगे कि क्या सनातन धर्म के ग्रंथ हमारे पूर्वज विज्ञान से हजारों साल आगे थे। बने रहिए मेरे साथ.com में। आपने जब इस आवाज को सुना क्योंकि यह आवाज अभी आपको थोड़ी सी सुनाई दी है। मैं इस आवाज को आपको और सुनवाऊंगा लेकिन आपने जब यह छोटी सी आवाज सुनी तो कहना नहीं होगा कि आपको डमरू की आवाज लगी है। यह किसी को भी डमरू की आवाज ही लगेगी। अमेरिका में इस डमरू का सिर्फ ध्वनि से कांसेप्ट हो सकता है। लेकिन सनातन धर्म में इसका सीधा संबंध शिव से होता है। जी हां, वैज्ञानिक भाषा में इसे आप समझ लें तो नासा के पल्सर नाम के एक न्यूट्रन तारे के डाटा को जब सोनफिकेशन तकनीक से ध्वनि में बदला तो जो ताल सुनाई दी उसने पूरी दुनिया में तहलका मचा दिया। यह लयबद्ध थाप ठीक वैसी ही है जैसी शिव के डमरू से निकलती है। एक बार गौर से सुनिए इसकी आवाज।

उसके बाद मैं आपको फिर समझाऊंगा। गौर से सुनिए। है ना सन्न कर देने वाली ये आवाज है ना आश्चर्यजनक ये आवाज आप सुनिए के एक ऐसी आवाज जिसमें प्रकाश निकल रहा है और डमरू की तरह आवाज कर रहा है और आप देखिए कि भगवान भगवान शिव भी जब तांडव में थे और तांडव कर रहे थे उस वक्त भी ठीक ऐसी ही आवाज निकल रही थी उनके डमरू से जैसी आवाज ब्रह्मांड के एक तारे से निकल रही है और जो तस्वीर इस वक्त आपकी टीवी स्क्रीन पर बनी हुई है। यह वैसी ही आवाज है और वैसा ही प्रकाश है। चमकता हुआ प्रकाश और चमकती हुई आवाज जो आप देख रहे हैं यह इस तारे से निकल रही है। दुनिया भर के दार्शनिक और विचारक इसे नटराज के कॉस्मिक डांस यानी कि ब्रह्मांडीय नृत्य की वो थाप मान रहे हैं जिससे सृष्टि का सृजन और विनाश तय होता है। समझिए डॉट में यह पल्सर तारे की ध्वनि है या शिव का डमरू है? नासा के वैज्ञानिकों ने इसे कैसे रिकॉर्ड किया? शिव के डमरू का रहस्य आखिर है क्या? और क्यों कॉस्मिक डांस की अवधारणा आधुनिक विज्ञान से मेल खाती दिखती है। सब कुछ सिलसिलेवार तरीके से मैं आपको समझाऊंगा क्योंकि इसकी ताल, इसकी लय और इसकी दोहराव वाली बीट ने दुनिया भर में आध्यात्मिक बहस छेड़ दी है। एक बार फिर सुनिए गौर से ब्रह्मांड में शिव के डमरू की

आवाज। असल में एक छोटी सी कहानी है वो आपको सुनाता हूं। ब्रह्मा विष्णु महेश और सबसे बड़ी बात है कि ब्रह्मा और विष्णु में जब इस बात को लेकर लड़ाई हो गई यह पौराणिक कथा है। इसके बारे में धार्मिक कथा है। मैं पहले इसको बता देता हूं। उसके बाद नासा पोस्ट के सोनिफिकेशन के बारे में भी बताऊंगा। लेकिन जब झगड़ा हो गया, लड़ाई हो गई कि बड़ा कौन? तो फिर यह हुआ कि एक प्रकाश उत्पन्न हुआ और उस प्रकाश में एक प्रकाश के छोर पर ब्रह्मा को लगाया गया और एक प्रकाश के छोर पर विष्णु को लगाया गया और यह कहा गया कि जो भी इसके छोर को पकड़ लेगा वही सबसे बड़ा होगा। तो एक छोर को पकड़ते हुए ब्रह्मा पाताल में चले गए। क्योंकि षष्ठी का सृजन तो उन्होंने ही कहा। उनका दावा था कि षष्ठी को मैंने बनाया है तो मैं सबसे बड़ा हूं। विष्णु का अलग दावा था।

और एक छोर को पकड़ कर विष्णु चले गए। और दोनों जब छोर को पकड़ कर निकले। उस छोर पर दाग के देखा कि नीचे भी यानी कि पाताल में और आकाश में उस छोर का अंत नहीं मिला। और जब वापस लौट कर आए और पूछा कि यह था क्या? तो पता चला कि यह कोई और नहीं बल्कि महेश हैं, शिव हैं। जिनका ना आदि है, ना अंत है और यह हमेशा अनंत हैं और यही सबसे बड़े हैं। सृष्टि में ना तो इनका जन्म हुआ और ना इनका अंत है और आज भी ब्रह्मांड में यह साफ तौर पर देखे जा सकते हैं। लेकिन ब्रह्मा भी जन्म के तौर पर देखे गए और इसके साथ-साथ विष्णु भी जन्म के तौर पर देखे गए। लेकिन शिव ना उनकी कभी मृत्यु हुई ना कभी जन्म हुए। आज भी वह अनंत हैं और इसलिए उन्हें अनंत कहा जाता है। लेकिन नासा ने क्या कहा? नासा के फैक्ट को मैं आपको समझाता हूं। सोफिकेशन पर नासा ने क्या कहा? नासा और चंद ऑब्जरवेटरी ने कई स्पेस सोनिफिकेशन प्रोजेक्ट जारी किए। जिनमें ब्लैक होल, पल्सर और नेबुला के डाटा को ध्वनि से बदला गया। नासा ने असल में यह कहा है कि यह रियल साउंड इन स्पेस है।

यानी कि जो ध्वनि आ रही है ब्रह्मांड में यह ब्रह्मांड में जैसी ध्वनि रिकॉर्ड की गई है, जो प्रकाश रिकॉर्ड किया गया है, यह हकीकत में ब्रह्मांड में ऐसी ही ध्वनि आ रही है जैसे शिव के डमरू में बजती है। अंतरिक्ष में सामान्य ध्वनि नहीं चलती। बल्कि वहां पर हवा होती ही नहीं है। पल्सर से आने वाली यह एक तारा है पल्सर। पल्सर से आने वाली रेडियो और एक्सरे तरंगों को कंप्यूटर द्वारा ऑडियो में बदला गया। इस प्रक्रिया को सोनिफिकेशन कहा जाता है और हूबहू वैसे ही रिकॉर्ड करके नासा ने जारी किया है। नासा के वैज्ञानिकों ने जारी किया है और मैं आपके लिए लेकर आया हूं जो अभी तक कोई आपको नहीं बता पाएगा। अब अंतरिक्ष हमेशा शांत दिखाई देता है। वहां पर कोई आवाज नहीं होती है। वहां पर हवा नहीं होती है। लेकिन वैज्ञानिक कहते हैं कि वहां पर ऊर्जा है। वहां पर तरंगे हैं।

वहां पर कंपन है जो लगातार हो रहा है। जो लगातार चल रहा है और किन्हीं तरंगों ने एक रहस्यमई ताल को पैदा किया है। और वो ताल है डमरू की आवाज। नासा ने Pulsar के डाटा को ध्वनि में बदला और यहीं पर ऑडियो इंटरनेट पर वायरल हो गया है। जैसे ही लोगों ने इस ताल को सुना इसे शिव के डरमू जैसी ध्वनि बताया। तमाम वैज्ञानिक चौंक गए। उन सभी ने शिव की कल्पना की और वो महसूस करने लगे कि ब्रह्मांड में शिव है, उनकी ध्वनि है, उनका डमरू है और उनकी ताल भी है। यह ध्वनि विज्ञान की भाषा में एक पल्सर तारे की कॉस्मिक धड़कन है। जो लगातार ऊर्जा की पल छोड़ रहा है। एक तरह विज्ञान इसे अंतरक्षीय डाटा बता रहा है। दूसरी तरफ अध्यात्म इसे ब्रह्मांडलीय संकेत बता रहा है। इसी पर बहस छिड़ी हुई है। वैज्ञानिकों में बहस छिड़ी हुई है कि क्या यह सिर्फ संयोग है या कोई गहरा रहस्य है? सवाल यह है कि क्या वाकई एक तारे की धड़कन और शिव के डमरू की ताल एक जैसी हो सकती है?

कुछ लोग इसे ब्रह्मांड की दिव्य लय से मिला रहे हैं। जो हजारों साल पुराने भारतीय दर्शन से हूबहू मेल खाती है। भारतीय दर्शन में भी इस तरह की व्याख्या है। इस तरह की चर्चा की गई है। लेकिन पल्सर होता क्या है? पल्सर पर चर्चा कर लेते हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझ लेते हैं। पल्सर अंतरिक्ष का सबसे रहस्यमई और शक्तिशाली तारकीय अवशेष माना जाता है। जब कोई विशाल तारा खत्म होता है। उसका अंदरूनी हिस्सा बच जाता है। वही पल्सर बन जाता है। विशाल विस्फोट या सुपरनोबा के बाद यह अत्यंत घना न्यूटन स्टार बनाता है। जिसका घनत्व इतना ज्यादा होता है कि एक चम्मच पदार्थ का वजन अरबों टन हो सकता है। एक चम्मच पदार्थ का वजन अरबों टन हो सकता है। कल्पना कीजिए आप पल्सर बहुत तेजी से घूमता है। कुछ तो प्रति सेकंड सैकड़ों बार घूमता है। इसका मैग्नेटिक फील्ड पृथ्वी से खरबों गुना अधिक और ताकतवर हो सकता है। घूमते हुए यह रेडियो और एक्सरे तरंगे अंतरिक्ष में छोड़ता है। वैज्ञानिक इसे कॉस्मिक लाइट हाउस कहते हैं क्योंकि इसके बीच घूमते हुए कई बार दिखाई देती है। यह हर बीम पृथ्वी की दिशा में आती है और यह वैज्ञानिकों को नियमित पल्स भी दिखाई देती है। वैज्ञानिक इसे रिकॉर्ड करते हैं। महसूस करते हैं, देखते हैं।

प्रति सेकंड कितने चक्कर लगाती होगी यह पल्स। कुछ पल्सर इतने तेज घूमते हैं कि हर सेकंड में यह सैकड़ों बार चक्कर लगाते हैं। इन्हें मिली सेकंड पल्सर भी कहा जाता है क्योंकि इनकी पल्स मिली सेकंड में दर्ज होती है। इसकी टाइमिंग इतनी सटीक होती है कि परमाणु घड़ियों से इनकी तुलना की जाती है। इसके वजन से वैज्ञानिक इन्हें ब्रह्मांडीय घड़ी यानी कि कॉस्मिक क्लॉक भी कहते हैं। यूं समझिए कि ऊर्जा का विस्फोट इसमें होता है। इनमें निकलने वाली ऊर्जा बेहद शक्तिशाली होती है। इनका चुंबकीय क्षेत्र इतना विशाल होता है कि पदार्थ की संरचना तक बदल जाती है।

इसी से ब्रह्मांडीय बीट का निर्माण होता है। यानी कि इन्हीं लगातार पल्स से एक ऐसी ताल ऐसी लय बनती है जो भगवान शिव के डमरू जैसी होती है और डमरू कैसे बनी? कैसे बनी डमरू की आवाज? ये भी मैं आपको सुना देता हूं।

अंतरिक्ष में सीधे तौर पर कोई भी आवाज सुनाई नहीं देती है। वैज्ञानिकों का कहना है कोई आवाज अंतरिक्ष में सुनाई नहीं देती है क्योंकि अंतरिक्ष की ध्वनि तरंगों के लिए कोई माध्यम नहीं होती। नासा के तारे से निकलने वाले एक्सरे और रेडियो डाटा जो लिया गया है इस डिजिटल डाटा को ऑडियो फ्रीक्वेंसी में कन्वर्ट किया गया है। जब डाटा को ऑडियो में बदला गया तो एक रिदमम पैदा हुई। यह रिदमम तेज और लगातार थाप की थी। ऐसा लग रहा था कि कोई डमरू बजा रहा है। इस थाप की फ्रीक्वेंसी और रिदमम डमरू से हूबहू मेल खा रही थी।

नासा के इस प्रोजेक्ट ने अंतरिक्ष को एक नया संगीत दे दिया है और यह संगीत वैसा ही है जैसा कि शिव का डमरू बजता है जो कि के समय शिव ने डमरू बजाया था। एक बार मैं फिर कहूंगा अपने दर्शकों को कि डमरू की इस थाप को जो कि ब्रह्मांड में लगातार बज रही है। गौर से सुनिए। सुना आपने शिव के डमरू से कैसे यह मेल खाती है? असल में सनातन परंपरा में डमरू को षष्टि का पहला वाद्य यंत्र माना गया है। डमरू की थाप से ही ब्रह्मांड की सभी ध्वनियां पैदा हुई हैं।

नासा के की आवाज में भी एक निश्चित अंतराल है और यह अंतराल डमरू बजाने की लय से पूरी तरह से मिलता है। पल्सर की आवाज में एक रहस्यमई ठहराव और गति भी है। डमरू भी एक खास रिदमम और संतुलन के साथ बचता है। दोनों ही ध्वनियां सुनने वाले के मन में एक कंपन पैदा करती हैं। वैज्ञानिक भी मानते हैं कि यह ब्रह्मांड की अपनी लय है। अध्यात्म कहता है कि यह शिव का सीधा ब्रह्मांडीय संकेत है जो ब्रह्मांड के साथ-साथ पृथ्वी पर भी कंपन महसूस कराता है। लेकिन शिव के डमरू का असली रहस्य है क्या? वो भी आपको बताता हूं। शिव का डमरू केवल एक वाद्य यंत्र नहीं है। यह ब्रह्मांड की रचना का बड़ा प्रतीक है। डमरू का आकार दो त्रिकोणों से मिलने से बनता है और आकार सृजन और विनाश के संतुलन को भी दर्शाता है। डमरू के बजने से ही समय चक्र की शुरुआत होती है। इसके नाद से ही 14 महेश्वर सूत्राणी उत्पन्न हुए हैं। महेश्वर सूत्र ही संस्कृत व्याकरण और भाषा का आधार माना गया है। यानी कि पूरी वर्णमाला और ज्ञान का स्रोत डमरू ही है। डमरू की आवाज शून्य से शुरू होकर अनंत तक जाती है और यही कारण है कि पल्सर तारा पल्सर की आवाज को इससे जोड़ा गया है और यह भी शून्य से लेकर अनंत तक जा रही है। पर ये पल्सर तारा है कहां? आप कहेंगे कि जिस तारे से भगवान शिव के डमरू की आवाज आ रही है।

ब्रह्मांड में वो तारा है कहां? तो यह भी आपको बता देता हूं। असल में नासा ने जिस मुख्य पल्सर की ध्वनि जारी की वह खास तारा सुदूर अंतरिक्ष के क्रेब नेबुला में स्थित है। क्रेब नेबुला पृथ्वी से लगभग 6500 प्रकाश वर्ष दूर है। यह हमारी आकाशगंगा का बेहद सक्रिय हिस्सा है। इसके केंद्र में स्थित पल्सर प्रति सेकंड 30 बार घूमता है। कुछ अन्य पल्सर तारे प्रति सेकंड 700 बार घूमते हैं। इतनी दूर स्थित तारे की आवाज को रिकॉर्ड करना चमत्कार है। नासा के चंद्र एक्स रे वैधशाला ने इसके डाटा को जुटाया और इतनी दूरी के बावजूद भी इसकी गूंज पृथ्वी तक महसूस की गई है। 65 हजार प्रकाश वर्ष दूर है। लेकिन इतनी दूर तक भी पृथ्वी तक इसकी आवाज को रिकॉर्ड किया गया है। किसने खोजा? कब खोजा? नासा ने कब और कैसे खोजा? यह भी बता देता हूं पल्सर तारे की खोज का इतिहास बेहद दिलचस्प है और पुराना भी है। पहली बार 1967 में जोसलिन बेल बर्नेल ने इसे खोजा था। तब इसे एलियन का भेजा गया कोई गुप्त संदेश माना जा रहा था। नासा ने हाल के वर्षों में डाटा प्रोजेक्ट शुरू किया और उसके तहत हवरलचंद्र और जे डब्ल्यूएसटी का डाटा इस्तेमाल हुआ। साल 2020 के बाद से नासा ने इन आवाजों को जारी करना शुरू किया। पहले रिकॉर्ड किया फिर जारी करना शुरू किया। चंद्रा एक्सरे वैधशाला ने क्रेब नेबुला का गहरा अध्ययन किया। जिटल डाटा के साउंड वेव में बदलने पर ध्वनि जो निकली वो डमरू की मिली। नासा का एक प्रोजेक्ट अंतरिक्ष को देखने नहीं बल्कि सुनने का भी है। अंतरिक्ष में जितनी भी आवाज आती हैं नासा का प्रोजेक्ट वहां पर काम करता है कि कौन सी आवाज में क्या संदेश छुपा हुआ है। लेकिन वैज्ञानिक तब चौंक गए जब शिव के डमरू की ध्वनि उन्हें एक तारे में सुनाई दी। नासा ने इस ध्वनि को लेकर कोई धार्मिक दावा तो नहीं किया है। अब वैज्ञानिक है तो वैज्ञानिक कोई धार्मिक दावा नहीं करेगा लेकिन नासा का यह कहना है कि यह केवल तारकीय डाटा का रूपांतरण है। वैज्ञानिक भाषा में इसे क्रेब नेबुला सोनिफिकेशन कहा जाता है। नासा के मुताबिक यह ऊर्जा तरंगों की अपनी प्राकृतिक लय है। नासा ने यह माना है कि ब्रह्मांड में एक अद्भुत संगीत छुपा हुआ था जिसे हमने खोजा। एजेंसी ने इसे आम लोगों को विज्ञान समझाने का जरिया भी बताया। हालांकि नासा ने ध्वनि की लयबद्धता को बेहद अनोखा माना और कहा कि अब तक हमने इस तरह की ध्वनि नहीं सुनी है। नासा के वैज्ञानिक भी ब्रह्मांड के इस रिदमम से बेहद प्रभावित हैं। आधिकारिक तौर पर इसे प्रकृति का एक अद्भुत नियम कहा जा रहा है और वैज्ञानिक भी मानते हैं कि ये जो ध्वनि है, इस ध्वनि में कुछ तो है। कुछ तो अद्भुत है। कुछ अविश्वसनीय है। जो इससे पहले हमने कभी नहीं देखा। विज्ञान से लेकर अध्यात्म तक का सफर कैसे यह भी आपको बता देता हूं। विज्ञान जहां पर रुकता है, अध्यात्म वहीं पर सोचना शुरू करता है। नासा के लिए केवल एक घूमते हुए तारे का डाटा मात्र है ये। लेकिन भारतीय जो मनीषी हैं, भारतीय मनीषियों के लिए यह साक्षात शिव का नाद है।

पल्सर तारे की यह आवाज साबित करती है कि ब्रह्मांड मृत नहीं है। ब्रह्मांड लगातार धड़क रहा है। ब्रह्मांड में जीवन है और इसमें एक खास चेतना है। यह चेतना ही सनातन धर्म में शिव के नाम से जानी जाती है। बिना किसी माध्यम के भी ऊर्जा अपनी लय को बनाए रखती है। किसी माध्यम की जरूरत नहीं। और यही बात हजारों साल पहले ऋषियों ने ध्यान में देखी थी। आज नासा की मशीनें उसी ध्यान के सच को रिकॉर्ड कर रही हैं। पहले ऋषि जब ध्यान लगाते थे तो उन्हें भी ब्रह्मांड में इस तरह की आवाज सुनाई देती थी। अब जो शिव का कॉस्मिक डांस है, आपने नटराज की मूर्ति देखी होगी। अब मैं उस पर आता हूं।

भगवान शिव का नटराज स्वरूप आपने देखा होगा। नट नटराज स्वरूप जो कि ब्रह्मांडीय नृत्य का प्रतीक है। उनके इस दिव्य नृत्य को आनंद तांडव भी कहा जाता है। यह आनंद तांडव के तौर पर जाना जाता है। नटराज की एक साथ में डमरू है तो दूसरे में सृजन का प्रतीक है। दूसरे हाथ में अग्नि है और ब्रह्मांड के विनाश को दर्शाती है। वो तस्वीर देखिए आप। वैज्ञानिक कार्ल सगन भी नटराज की इस मूर्ति के मुरीद हुए थे। सगन ने यह माना था कि शिव का नृत्य आधुनिक भौतिकी जैसा है। यह नृत्य सब एटमॉस पार्टिकल्स के लगातार बजने से मिटने जैसा है। बनने और मिटने जैसा है। पल्सर तारा भी लगातार ऊर्जा का सृजन और विनाश का संकेत दे रहा है। तारा जितनी बार घूमता है। मानो कि नटराज एक कदम पर थिरक रहे हैं और नटराज के हाथ में जो डमरू है उस डमरू से जो ध्वनि निकल रही है ठीक वैसा ही प्रतीत हो रहा है। ऐसा वैज्ञानिक मान रहे हैं।

अब सबसे बड़ी बात कि सर्ण में नटराज की मूर्ति क्यों? जिनेवा में दुनिया की सबसे बड़ी प्रयोगशाला सर्ण है और सन में जो परिसर है उसका उसमें भगवान नटराज की एक विशाल मूर्ति लगी हुई है। यह मूर्ति भारत सरकार ने वैज्ञानिकों को उपहार में दी थी। वैज्ञानिक मानते हैं कि शिव का नृत्य षष्टि का आधार है। गॉड पार्टिकल्स की खोज के दौरान एक थ्योरी को याद किया गया। भौतिक वैज्ञानिक मानते हैं कि सृष्टि में लगातार कंपन हो रहा है। कणों का यह कंपन ही शिव के डमरू और नृत्य की थाप जैसा है। दुनिया के बड़े वैज्ञानिक भी नटराज के आगे सिर झुकाते हैं। नासा की यह नई खोज इसी वैज्ञानिक सोच को आगे बढ़ाती है और सनातन से जोड़ती है। इस महान रहस्य से खुलता क्या है? ये जो महान रहस्य है, इससे क्या खुलता है? पल्सर तारे के डमरू की आवाज डमरू जैसी आवाज एक बहुत बड़ा इशारा कर रही है।

यह इशारा कर रही है कि पूरा ब्रह्मांड एक ही सूत्र से बना हुआ है। ब्रह्मांड की हर वस्तु में एक निश्चित तौर और सटीक फ्रीक्वेंसी है। यदि यह फ्रीक्वेंसी बिगड़ जाए तो पूरी सृष्टि नष्ट हो सकती है। यह खोज बिग बैंग थ्योरी की शुरुआत के पलों की याद दिलाती है। जब एक महा विस्फोट से पूरी सृष्टि में ध्वनि गूंज उठी थी। डमरू की आवाज भी एक बिंदु से शुरू होकर फैल जाती है। इस रहस्य के खुलने से इंसान को अपनी घूम, अपनी लघुता का एहसास होता है। हम सब उस परम शक्ति के बनाए हुए एक महान संगीत का हिस्सा हैं। वो संगीत का हिस्सा जिसे वैज्ञानिकों ने खोज लिया है। एक बार फिर से आपको सुनाता हूं। ब्रह्मांड की वह आवाज जो भगवान शिव के डमरू के तौर पर गूंज रही है। जिसे वैज्ञानिकों ने रिकॉर्ड किया तो वह भी चौंक गए। सुनिए। हम तो आपने आवाज को सुना लेकिन एक दैय रहस्य भी है। नासा ने इसके पहले भी कई ग्रहों की आवाजों को रिकॉर्ड किया है। सूर्य की रिकॉर्ड की गई आवाज हूबहू जानते हैं किससे मिलती है?

ओम के जाप जैसी लगती है। सूर्य के भीतर उठने वाले तूफानों की गूंज ओम सुनाई देता है। नासा के वाइजर अंतरिक्ष यान ने जब सौरमंडल को पार किया तो ग्रहों की चुंबकीय क्षेत्र में एक गूंजता हुआ संगीत मिला। पृथ्वी की अपनी आवाज किसी गहरे ध्यान की ध्वनि जैसी है। ब्लैक हॉल में आने वाली आवाजें भी बेहद डरावनी और भारी होती हैं। यह सभी आवाजें प्राचीन भारतीय नाद योग की पुष्टि करती हैं। नाद योग कहता है कि शब्द और ध्वनि ही ब्रह्म का स्वरूप है और शब्द और ध्वनि ही हकीकत है। सूर्य और ओम की ध्वनि का सच क्या है? यह भी आपको बताता हूं। ध्वनि का सच क्या है? नासा ने सूर्य की गूंज जब दुनिया के सामने पेश किया तो तब भी पूरी दुनिया के वैज्ञानिक और शोधकर्ता हैरान रह गए थे। सूर्य के कंपन की आवृत्ति यानी कि फ्रीक्वेंसी बेहद कम होती है और जब इस डाटा की स्पीड बढ़ाकर इंसानी कानों के लायक बनाया जाता है तो उसमें से एक आवाज निकलती है। एक गूंज निकलती है और वह कैसी होती है? ओम के समान। सनातन धर्म में सूर्य को साक्षात देवता और ऊर्जा का स्रोत माना गया है और ओम को पूरे ब्रह्मांड की आदि ध्वनि यानी कि पहली आवाज कहा जाता है। नासा की खोज ने अनजाने में ही सही लेकिन इस बात पर मोहर लगा दी है कि यह साबित करता है कि हमारे प्राचीन ऋषियों का ज्ञान अचूक था और तब उस समय विज्ञान नहीं था। केवल केवल सनातन था, पौराणिक था और उस समय भी ऋषि मुनियों को इनका आभास था और उन्हीं ऋषि मुनियों ने वेदों में ग्रंथों में इस बात का जिक्र भी किया। चला भी रहा है।

यानी कि समय के स्वामी भारतीय दर्शन में शिव समय से परे हैं। वहीं विज्ञान में पल्सर समय मापने जैसे व्यवहार करते हैं। हर पल्स निश्चित समय अंतराल पर आती है और इसलिए पल्सर को कॉस्मिक क्लॉक भी कहा जाता है। ब्रह्मांड के पांच अनसुलझे सवाल। ब्रह्मांड के पांच बड़े अनसुलझे रहस्य। ब्रह्मांड रहस्यों का एक बहुत बड़ा और असीम महासागर। विज्ञान आज तक केवल 5% ब्रह्मांड को ही जान पाया है। बाकी का 85% ब्रह्मांड का हिस्सा डार्क मैटर और डार्क एनर्जी है। डार्क मैटर क्या है? आज तक कोई वैज्ञानिक जान नहीं पाया उसके बारे में। ब्लैक होल के भीतर समय और भौतिकी के नियम काम नहीं करते हैं। ब्रह्मांड लगातार फैल रहा है। लेकिन इसे कौन फैला रहा है? किसी को नहीं पता है। क्या मल्टीवरिवर्स यानी कि हमारे जैसे कई और ब्रह्मांड भी मौजूद हैं। इन सभी अनुत्तरित सवालों पे जवाब में सनातन दर्शन में इनके जवाब मिलते हैं। जहां पर ब्रह्मांड को अनंत और शिव की अजन्मा अविनाशी कहा जाता है और उसी आधार को मानते हुए ब्रह्मांड की धड़कन को भी महसूस किया जाता है। सवाल यह है कि क्या पूरा ब्रह्मांड किसी अदृश्य लय पर चल रहा है? आधुनिक विज्ञान कहता है कि हर वस्तु कंपन में है। स्ट्रिंग थ्योरी भी कंपन करती है और सूक्ष्म स्ट्रिंग की बात करती है।

क्वांटम फील्ड में जो ऊर्जा लगातार बदलती रहती है वो ऊर्जा दोलन की बात करें तो इस दोलनों से भी पदार्थ और बल पैदा होता है। ग्रहों से लेकर परमाणुओं तक हर जगह फ्रीक्वेंसी है। इसलिए वैज्ञानिक कंपन और तरंगों की भाषा इस्तेमाल करते हैं। पूरा ब्रह्मांड गणितीय लय में चलता दिखाई देता है। लेकिन इसके अंतिम रहस्य अब तक इंसान की पकड़ से दूर हैं और मैंने कहा कि इंसान हो या वैज्ञानिक हो सिर्फ 5% ब्रह्मांड को जान पाया है।

जहां विज्ञान ब्रह्मांड है। उसी आध्यात्म को आप महसूस कर सकते हैं। और जब दोनों एक ही लय में सुनने लगे, जब दोनों एक ही लय में सुनने लगे, तो समझिए कि इंसान सृष्टि के किसी गहरे सत्य के करीब पहुंच जाता है। चलते-चलते मैं आपको ब्रह्मांड के तारे की उस धड़कन के साथ छोड़ जाता हूं या शिव के डमरू के साथ सोच सो छोड़ जाता हूं जिसमें आप खुद सोचें महसूस करें और जाने के ब्रह्मांड में कोई तो है जो सब कुछ देख रहा है सुन रहा है और इस पूरी सृष्टि को सुना रहा है और

उसके बाद नासा पोस्ट के सोनिफिकेशन के बारे में भी बताऊंगा। लेकिन जब झगड़ा हो गया, लड़ाई हो गई कि बड़ा कौन? तो फिर यह हुआ कि एक प्रकाश उत्पन्न हुआ और उस प्रकाश में एक प्रकाश के छोर पर ब्रह्मा को लगाया गया और एक प्रकाश के छोर पर विष्णु को लगाया गया और यह कहा गया कि जो भी इसके छोर को पकड़ लेगा वही सबसे बड़ा होगा।

तो एक छोर को पकड़ते हुए ब्रह्मा पाताल में चले गए। क्योंकि षष्ठी का सृजन तो उन्होंने ही कहा। उनका दावा था कि षष्ठी को मैंने बनाया है तो मैं सबसे बड़ा हूं। विष्णु का अलग दावा था और एक छोर को पकड़ कर विष्णु चले गए और दोनों जब छोर को पकड़ कर निकले उस छोर पर दा के देखा कि नीचे भी यानी कि पाताल में और आकाश में उस छोर का अंत नहीं मिला। और जब वापस लौट कर आए और पूछा कि यह था क्या? तो पता चला कि यह कोई और नहीं बल्कि महेश हैं, शिव हैं।

जिनका ना आदि है, ना अंत है और यह हमेशा अनंत हैं और यही सबसे बड़े हैं। षष्टि में ना तो इनका जन्म हुआ और ना इनका अंत है और आज भी ब्रह्मांड में यह साफ तौर पर देखे जा सकते हैं। लेकिन ब्रह्मा भी जन्म के तौर पर देखे गए और इसके साथ-साथ विष्णु भी जन्म के तौर पर देखे गए।

लेकिन शिव ना उनकी कभी हुई ना कभी जन्म हुए। आज भी वो अनंत हैं और इसलिए उन्हें अनंत कहा जाता है। लेकिन नासा ने क्या कहा? नासा के फैक्ट को मैं आपको समझाता हूं। पर नासा ने क्या कहा? नासा और चंद ऑब्जरवेटरी ने कई स्पेस सोनिफिकेशन प्रोजेक्ट जारी किए। जिनमें ब्लैक होल, पल्सर और नेबुला के डाटा को ध्वनि से बदला गया। नासा ने असल में यह कहा है कि यह रियल साउंड इन स्पेस है। यानी कि जो ध्वनि आ रही है, ब्रह्मांड में यह ब्रह्मांड में जैसी ध्वनि रिकॉर्ड की गई है, जो प्रकाश रिकॉर्ड किया गया है, यह हकीकत में ब्रह्मांड में ऐसी ही ध्वनि आ रही है जैसे शिव के डमरू में बजती है।

अंतरिक्ष में सामान्य ध्वनि नहीं चलती। बल्कि वहां पर हवा होती ही नहीं है। से आने वाली यह एक तारा है पल्सर। से आने वाली रेडियो और एक्सरे तरंगों को कंप्यूटर द्वारा ऑडियो में बदला गया। इस प्रक्रिया को सोनिफिकेशन कहा जाता है और हूबहू वैसे ही रिकॉर्ड करके नासा ने जारी किया है। नासा के वैज्ञानिकों ने जारी किया है और मैं आपके लिए लेकर आया हूं जो अभी तक कोई आपको नहीं बता पाएगा।

अब अंतरिक्ष हमेशा शांत दिखाई देता है। वहां पर कोई आवाज नहीं होती है। वहां पर हवा नहीं होती है। लेकिन वैज्ञानिक कहते हैं कि वहां पर ऊर्जा है। वहां पर तरंगे हैं। वहां पर कंपन है। जो लगातार हो रहा है, जो लगातार चल रहा है और किन्ही तरंगों ने एक रहस्यमई ताल को पैदा किया है। और वो ताल है डमरू की आवाज। नासा ने Pulsar के डाटा को ध्वनि में बदला और यहीं पर ऑडियो इंटरनेट पर वायरल हो गया है। जैसे ही लोगों ने इस ताल को सुना इसे शिव के डरमू जैसी ध्वनि बताया। तमाम वैज्ञानिक चौंक गए। उन सभी ने शिव की कल्पना की और वह महसूस करने लगे कि ब्रह्मांड में शिव है, उनकी ध्वनि है, उनका डमरू है और उनकी ताल भी है। यह ध्वनि विज्ञान की भाषा में एक पल्सर तारे की कॉस्मिक धड़कन है। जो लगातार ऊर्जा की पल्स छोड़ रहा है। एक तरह विज्ञान इसे अंतरक्षीय डाटा बता रहा है। दूसरी तरफ अध्यात्म इसे ब्रह्मांडलीय संकेत बता रहा है। इसी पर बहस छिड़ी हुई है।

वैज्ञानिकों में बहस छिड़ी हुई है कि क्या यह सिर्फ संयोग है या कोई गहरा रहस्य है? सवाल यह है कि क्या वाकई एक तारे की धड़कन और शिव के डमरू की ताल एक जैसी हो सकती है? कुछ लोग इसे ब्रह्मांड की दिव्य लय से मिला रहे हैं। जो हजारों साल पुराने भारतीय दर्शन से हूबहू मेल खाती है।

भारतीय दर्शन में भी इस तरह की व्याख्या है। इस तरह की चर्चा की गई है। लेकिन पल्सर होता क्या है? पल्सर पर चर्चा कर लेते हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझ लेते हैं। अंतरिक्ष का सबसे रहस्यमई और शक्तिशाली तारकीय अवशेष माना जाता है। जब कोई विशाल तारा खत्म होता है। उसका अंदरूनी हिस्सा बच जाता है। वही पल्सर बन जाता है। विशाल विस्फोट या सुपरनोबा के बाद यह अत्यंत घना न्यूटन स्टार बनाता है।

जिसका घनत्व इतना ज्यादा होता है कि एक चम्मच पदार्थ का वजन अरबों टन हो सकता है। एक चम्मच पदार्थ का वजन अरबों टन हो सकता है। कल्पना कीजिए आप बहुत तेजी से घूमता है। कुछ तो प्रति सेकंड सैकड़ों बार घूमता है। इसका मैग्नेटिक फील्ड पृथ्वी से खरबों गुना अधिक और ताकतवर हो सकता है। घूमते हुए ये रेडियो और एक्सरे तरंगे अंतरिक्ष में छोड़ता है। वैज्ञानिक इसे कॉस्मिक लाइट हाउस कहते हैं क्योंकि इसके बीच घूमते हुए कई बार दिखाई देती है।

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