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कौन था मिस्टर नटवरलाल? जिसने ताजमहल, संसद और राष्ट्रपति भवन तक बेच दिया!

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भारत का एक ऐसा ठग जिसकी धोखाधड़ी के किस्से दुनिया भर में मशहूर थे। जिसके नाम से लेकर मौत की तारीख तक सब कुछ नकली था। कभी उसने जाली हस्ताक्षर करके ताजमहल, लाल किला, संसद भवन और राष्ट्रपति भवन तक बेच दिए तो कभी जाली जमीन के कागज और फर्जी बैंक ड्राफ्ट बनाकर लाखों रुपए की काली कमाई की। एक ऐसा ठग जिसने वैश्याओं तक को नहीं छोड़ा। वह हर रोज वैेश्याओं के पास जाता और उनको नकली शराब पिलाकर उन्हें बेहोश करता फिर उनके पैसे और गहने लूट लेता था। वह अपने शिकार को ऐसे फंसाता कि सामने वाला उसे अपना हमदर्द समझने लगे

और वो पैसों से भरे सूटकेस उसे थमा देते। कभी खुद को फाइनेंस मिनिस्टर का पर्सनल असिस्टेंट बताता तो कभी किसी बड़े अफसर की पहचान दिखाकर लोगों को चूना लगा देता। उसकी ठगी के जाल में फॉरेनर्स, व्यापारी, नेता, पुलिस ऑफिसर्स तक फंस जाते थे। ठगों का सरदार कहे जाने वाले इस शख्स को आठ राज्यों में 100 से ज्यादा मामलों में पुलिस ढूंढ रही थी। आठ बार वो अलग-अलग जेल से फरार हो चुका था और इस ठग का नाम था मिथिलेश कुमार उर्फ मिस्टर नटवरलाल जिसने सालों तक लोगों को बेवकूफ बनाया। एक बार जब पेशी के दौरान जज ने नटवर लाल से पूछा कि तुम यह सब कैसे कर लेते हो? नटवर लाल ने कहा अगर आप मुझे ₹1 दें तो मैं बता दूं तब जज ने उसे ₹1 निकाल कर दिया और नटवरलाल बोला बस ऐसे ही मैं किसी को ठगता नहीं हूं। लोग अपने आप ही मुझे पैसे दे देते हैं। वो कहता है कि जब लोग लालच में अंधे रहेंगे तो मेरा धंधा बंद नहीं होगा। वो इतना मशहूर ठग था कि साल 1979 में उसके जीवन पर बॉलीवुड ने एक फिल्म बनाई। नाम था मिस्टर नटवरलाल जिसमें अहम किरदार निभा रहे थे

अमिताभ बच्चन। फिल्म इतनी सुपरहिट रही कि नटवरलाल के कारनामों की कहानियां विदेश तक फैल गई। लेकिन जब उससे पूछा गया कि आपने अपनी कहानी पर बनी फिल्म मिस्टर नटवरलाल देखी? तो उसने जवाब दिया कि जब मैं खुद ही असली हीरो हूं तो नकली हीरो को क्यों देखूं? बल्कि उसने तो फिल्म के निर्माताओं को ही लीगल नोटिस भेज दिया। लेकिन कैसे बना नटवर लालाल? भारत का सबसे बड़ा ठग। उसने धोखाधड़ी के कैसे-कैसे कारनामों को अंजाम दिया और कैसे हुई थी नटवर लाल की मौत। चलिए जानते हैं। नटवर लाल का असली नाम मिथिलेश कुमार श्रीवास्तव था। साल 1912 में बिहार के सिवान जिले के जिरादेई इलाके के रुया बंगरा गांव में उसका जन्म हुआ। उसके पिता रघुनाथ प्रसाद एक बड़े जमींदार होने के साथ सरकारी सेवा में भी थे। इसलिए घर में पैसों की कभी कमी नहीं रही। पिता चाहते थे कि बेटा पढ़ लिखकर एक अच्छी नौकरी करें। लेकिन मिथिलेश का मन पढ़ाई से ज्यादा फुटबॉल और शतरंज जैसे खेलों में लगता था। पढ़ाई में वह औसत था लेकिन दिमाग बेहद तेज और चालाक। बचपन से ही उसे शतरंज और बुद्धिमानी का ऐसा मिश्रण मिला जो आगे चलकर उसकी पहचान बनने वाला था। कहते हैं कि उसके ठगी के सफर की शुरुआत भी यहीं से हुई। एक बार उसके पड़ोसी सहाय ने उसे बैंक ड्राफ्ट जमा करने भेजा।

वहां उसने देखा कि क्लर्क हस्ताक्षर मिलाकर ड्राफ्ट वेरीफाई कर रहा है। बस यही उसके दिमाग में खतरनाक ख्याल आया। अगर यह सिग्नेचर हूबहू कॉपी किए जा सकते हैं तो पैसे निकालना कितना आसान हो जाएगा। घर लौटते ही उसने पेन उठाया और कुछ ही मिनटों में सहाय के सिग्नेचर की बिल्कुल सटीक नकल उतार ली और इसके बाद उसने धीरे-धीरे करके पड़ोसी के खाते से करीब ₹1000 निकाल लिए। जो उस दौर में बहुत बड़ी रकम थी। लेकिन यह खेल ज्यादा दिन छुप नहीं पाया। जब सच्चाई सामने आई तो उसके पिता ने गुस्से में उसकी जमकर पिटाई कर दी। यह वही मोड़ था जिसने मिथिलेश के अंदर एक विद्रोह जगा दिया। घर की डांट फटकार और मार से तंग आकर उसने घर छोड़ दिया और सीधे कोलकाता का रुख किया। उस समय उसकी जेब में मुश्किल से कुछ रुपए थे। अनजान शहर, ना कोई सहारा, ना कोई पहचान। कई बार उसे भूखे पेट भी रहना पड़ा और यहीं उसकी जिंदगी ने एक नया मोड़ लिया। कहा जाता है कि वह बिजली के खंभे के नीचे बैठकर पढ़ाई करता था। बाद में एक सेठ केशव राम ने उसे अपने बेटे को पढ़ाने के लिए रख लिया। यहीं से उसे शहर की चालें, पैसों का खेल और लोगों की कमजोरियां समझने का मौका मिला। फिर 12वीं पास होने के कारण उसे यूनिवर्सिटी में बीकॉम में दाखिला मिल गया। कुछ समय बाद उसने सेठ से किताबों के लिए एडवांस मांगा लेकिन सेठ ने साफ मना कर दिया। यही बात उसे चुप गई।

गुस्से में उसने ट्यूशन छोड़ दी लेकिन यहां भी उसने सीधे रास्ता नहीं चुना। फर्जी डॉक्यूमेंट्स के दम पर उसने उसी स्कूल में टीचर की नौकरी हासिल कर ली जहां सेठ के बच्चे पढ़ते थे। जब सेठ को पता यह चला तो वह हैरान रह गया। मजबूरी में उसने माफी मांगी और इस बार ज्यादा तनख्वाह देकर फिर से बच्चों को पढ़ाने का ऑफर दिया। मिथिलेश अंदर ही अंदर मुस्कुरा रहा था। उसे पता था कि खेल अब उसके हाथ में आ चुका है। धीरे-धीरे उसने सेठ का पूरा भरोसा जीत लिया और अब उसकी नजर सेठ के कपड़ों के बिजनेस पर थी। उस समय बाजार में कपड़ों की भारी कमी थी और यही मौका उसने बनाया। उसने सेठ को झांसा दिया कि बॉम्बे में उसका एक रिश्तेदार बड़ा कपड़ा व्यापारी है जो सस्ते में माल दे रहा है। सौदा सुनते ही सेठ लालच में आ गया और करीब ₹4.5 लाख देकर अपना एक एजेंट मिथिलेश के साथ बॉम्बे भेज दिया। रास्ते भर मिथिलेश ने उस एजेंट को बॉम्बे के अंडरवर और पुलिस की डरावनी कहानियां सुनाकर इतना डरा दिया कि होटल पहुंचते ही एजेंट ने सारे पैसे उसके हाथ में थमा दिए और खुद पीछे हट गया। बस यही वह पल था जिसका इंतजार मिथिलेश कर रहा था। मौका मिलते ही वह पैसों के साथ फरार हो गया और कुछ समय बाद पटना पहुंचा। वहां उसने अपने पिता को ₹1 लाख दिए और बड़े गर्व से कहा कि अब वह एक बड़ी कंपनी का शेयर होल्डर बन चुका है। थोड़े समय बाद वह फिर कोलकाता लौट आया। लेकिन दिसंबर 1937 में सेठ ने अपने गुंडों से उसे पकड़वाने की कोशिश की। तब उसने सेठ के सामने कहानी गढ़ते हुए कहा, बॉम्बे पुलिस मेरे पीछे पड़ गई थी। इसलिए पैसे छोड़कर भागना पड़ा। मगर इस बार सेठ उसकी बातों में नहीं आया और 4 दिन में पैसे ना लौटाने पर जान से मारने की धमकी दे दी। लेकिन मिथिलेश ने उल्टा पुलिस में शिकायत कर दी और सेठ के काले कारोबार का भांडा फोड़ कर दिया। नतीजा यह हुआ कि सेठ फंस गया

और मिथिलेश बच निकला और यहीं से जन्म हुआ उस शख्स का जिसे आगे चलकर पूरी दुनिया मिस्टर नटवरलाल के नाम से जानने वाली थी। इस तरह सेठ को लूटने के बाद मिथिलेश को ठगी की आदत लग चुकी थी। उसने पहले अनगिनत वैश्याओं को नकली शराब पिलाकर उनके गहने और पैसे लूटे। फिर फोर्स किए गए नकली डॉक्यूमेंट्स का इस्तेमाल करके मेडकब स्ट्रीट पर पड़े करीब 9 टन सरकारी लोहे को बेच डाला। हालांकि इस बार वह पकड़ा गया और 6 महीने जेल की सजा काटी। मगर उसे इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ा। और जेल में ही उसने अगली बड़ी ठगी का प्लान बना लिया। साल 1940 के आसपास कपड़ा बाजार में टेक्सटाइल गुड्स की भारी कमी थी और मिथिलेश ने इसी मौके को अपने सबसे बड़े खेल में बदल दिया। उसने अपने गुजराती साथी नटवर लाल के साथ मिलकर ऐसी योजना बनाई जिसमें दोनों खुद को बॉम्बे के टेक्सटाइल कमिश्नर का अधिकारी बताते थे और सीधे कपड़ा कारोबारियों से संपर्क करते थे। वे उन्हें भरोसा दिलाते कि बहुत सस्ते दाम में बड़े पैमाने पर कॉटन दिलवा सकते हैं। अपनी बात को पक्का दिखाने के लिए वे नकली रेलवे रिसीप्ट्स भी दिखाते और कहते कि माल उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ स्टेशन पर उतरा है। वहीं से जाकर उठा लेना है। कपड़ों की कमी से परेशान व्यापारी उनके जाल में फंस जाते और एडवांस में मोटी रकम दे देते। लेकिन जब वह आजमगढ़ पहुंचते तो वहां माल के नाम पर कुछ भी नहीं होता। यह खेल ज्यादा दिन तक नहीं चला। पुलिस ने छापा मारा और मिथिलेश पकड़ा गया। जबकि उसका साथी फरार हो गया। यहीं पर एक अजीब मोड़ आया। पुलिस को लगा कि यह आदमी नटवर लाल है और केस में उसी नाम से दर्ज कर लिया गया। बस उसी पल से मिथिलेश कुमार श्रीवास्तव हमेशा के लिए नटवर लाल बन गया। जेल से बाहर आने के बाद भी लोग उसे उसके असली नाम से नहीं बल्कि उसके बदले हुए नाम से पहचानने लगे। लेकिन जेल की सजा ने उसे सुधारा नहीं बल्कि और खतरनाक बना दिया। उसने ठगी के नए-नए तरीके अपनाने शुरू कर दिए। कभी रेल्वेज में सस्ते में गाड़ी बुक कराने का झांसा देकर फर्जी रिसीप्ट्स बनाता तो कभी व्यापारियों को नकली कंसाइनमेंट बेच देता। एक बार तो उसने एक बिजनेसमैन को पूरा कंटेनर भेजा लेकिन जब वह खोला गया तो अंदर सामान की जगह सिर्फ ईंट और पत्थर भरे थे। इसके बाद उसने अपने ठगी के खेल को एक और लेवल पर ले जाते हुए शुरू किया नकली बैंक चेकक्स का खेल। उसका तरीका बेहद सिंपल लेकिन खतरनाक था। वो किसी भी नए शहर में पहुंचकर पहले एक नामी बैंक में अकाउंट खुलवाता। फिर ज्वेलरी शॉप से छोटी-मोटी खरीददारी असली चेक से करता ताकि दुकानदार का भरोसा जीत सके। जैसे ही भरोसा बन जाता वो अचानक उसी अकाउंट से बड़ी रकम के गहने खरीदता

और पेमेंट करता बाउंस होने वाले चेक से। जब तक दुकानदार बैंक में जाकर चेक क्लियर होने का इंतजार करते तब तक अकाउंट खाली हो चुका होता और नटवर लाल गहनों समेत गायब होता। इस तरह वो कभी व्यापारी, कभी वित्त मंत्री वीपी सिंह तो कभी वाराणसी के जिला जज तो कभी उत्तर प्रदेश के चीफ मिनिस्टर के नाम पर भी अलग-अलग शहरों में दुकानदारों को चूना लगाता था। ठगी की दुनिया में नटवर लाल का नाम इसलिए भी अलग था क्योंकि उसने सिर्फ लोगों को नहीं बल्कि देश की सबसे बड़ी ऐतिहासिक धरोहरों तक को बेच डाला। कहा जाता है कि उसने तीन बार ताजमहल, दो बार लाल किला और यहां तक कि राष्ट्रपति भवन और संसद भवन तक को ठगों की तरह नहीं बल्कि एक सरकारी अधिकारी बनकर बेच दिया। वह खुद को कभी बड़े अफसर के रूप में पेश करता तो कभी मंत्रालय से जुड़ा हुआ आदमी बताता। विदेशी खरीदार उसकी बातों में आ जाते और फर्जी कागजों के दम पर वह इन ऐतिहासिक इमारतों का सौदा कर देता। एक किस्से के अनुसार उसने राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के नकली हस्ताक्षर तक इस्तेमाल कर लिए थे। उसकी पहचान इतनी बदलती रहती थी कि कहा जाता है कि उसके 50 से ज्यादा नाम थे। उन्हीं में से एक नाम था नटवर लाल। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि जो आदमी दुनिया के लिए खतरनाक ठग था वही अपने गांव के लिए किसी रॉबिन हुड से कम नहीं था। जैसे कि एक बार जब वो ठगी से कमाए पैसों के साथ अपने गांव बंगरा लौटा तो उसका अंदाज बिल्कुल किसी राजा जैसा था। तीन कारों के काफिले के साथ गांव में एंट्री, महंगे इत्र की खुशबू और फिर पूरे गांव के लिए बड़े भोज का आयोजन। उसने ना सिर्फ लोगों को खिलाया पिलाया बल्कि हर गरीब को ₹100 भी दिए जो उस वक्त के हिसाब से काफी बड़ी रकम थी। इसलिए गांव वालों के लिए कोई अपराधी वो नहीं था बल्कि ऐसा आदमी था जो अमीरों को ठग कर गरीबों की मदद करता था। शायद यही वजह थी कि उसके कारनामों पर वहां कभी शर्म नहीं बल्कि एक अजीब सा गर्व महसूस किया जाता था। नटवर लाल सिर्फ ठगी का ही नहीं बल्कि जेल से भागने का भी मास्टर था। पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक वो आठ बार अलग-अलग जेलों से फरार हुआ। मार्च 1956 में मेरठ में उसे गिरफ्तार किया गया। उस समय उस पर 35 से ज्यादा केस चल रहे थे।

कुछ महीनों बाद उसे लखनऊ जेल शिफ्ट किया गया। यहां उसने अपनी मीठी बातों से जेलर को ही अपने जाल में फंसा लिया। उसने लालच दिया कि अगर मेरी मदद करोगे तो ₹5 लाख दूंगा। जेलर मान गया। एक बड़ा बॉक्स उसके सामने लाया गया। ऊपर नोटों की गड्डियां सजी थी। जेलर को यकीन हो गया। बदले में उसने नटवर लाल को पुलिस सुपरिटेंडेंट की वर्दी दिला दी। बस फिर क्या था? वर्दी पहनकर मूछों पर दाब देते हुए वो आराम से जेल के गेट से बाहर निकल गया। कार पहले से ही बाहर इंतजार कर रही थी और वह गायब। बाद में जब बॉक्स खोला गया तो नीचे सिर्फ कागज की कतरण थी। असली नोट तो बस ऊपर दिखावे के लिए रखे गए थे। लेकिन उसका सबसे चर्चित भागना तो और भी फिल्मी था। साल 1996 में उम्र 84 साल। वह कानपुर जेल में था। चलने फिरने की हालत भी नहीं। व्हीलचेयर पर निर्भर। उसने जेल प्रशासन को लिखा कि उसका इलाज सिर्फ दिल्ली में ही संभव है। इजाजत मिल गई। दो पुलिसकर्मी उसे लेकर दिल्ली स्टेशन पहुंचे। एक सिपाही व्हीलचेयर वापस करने गया। दूसरा उसके पास खड़ा रहा। तभी नटवर लाल ने मासूमियत से कहा, सिपाही जी, एक कप चाय पिला दीजिए। पहले मना हुआ। फिर सोचा बूढ़ा है। हिल भी नहीं सकता। जैसे ही सिपाही चाय लेने गया। नटवर लाल हवा हो चुका था। चारों तरफ तलाश हुई लेकिन वो ऐसे गायब हुआ जैसे कभी था ही नहीं। एक समय ऐसा था जब लोग यह मानने लगे थे कि नटवर लाल को पकड़ना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। इससे जुड़ा एक किस्सा उसके गांव वाले बताते हैं। दरअसल नटवर लाल की एक बेटी थी और नटवर लाल ने ठान ली कि अपनी बेटी की शादी तो वही कराएंगे जब यह बात पुलिस तक पहुंची तो उन्होंने नटवर लाल के घर के चारों तरफ और पूरे गांव में अपना नेटवर्क बिछा दिया। हर तरफ पुलिस पहरा दे रही थी

ताकि नटवर लाल को पकड़ा जा सके। लेकिन अपनी चतुराई से नटवर लाल ने घर की महिलाओं से कहा कि तुम जब मटकोर रस्म के लिए निकलो तो मेरे लिए साड़ी वगैरह ले आना। इस तरह वो दूसरे गांव से साड़ी पहनकर इन महिलाओं के साथ घर पहुंच गया जो वहां ना सिर्फ इस रस्म में बैठा बल्कि बेटी से भी मिला और ब्राह्मण को पूरे विधिविधान से शादी करवाने की पूरी ट्रेनिंग दे गया और तुम लिखते जाओ कि मेरी बेटी की शादी में यह चीजें होनी चाहिए। फिर वह साड़ी पहने वहां से चला गया और पुलिस देखती रह गई। उसके खिलाफ 100 से ज्यादा केस दर्ज थे। आठ राज्यों की पुलिस उसे ढूंढ रही थी। नौ बार गिरफ्तार हुआ। आठ बार भाग निकला। अलग-अलग अदालतों ने उसे कुल मिलाकर 100 साल से ज्यादा की सजा सुनाई। सिंहभूम में 19 साल, दरभंगा में 17 साल और जुर्माना पटना में 5 साल लेकिन अपनी चालाकियों के दम पर उसने सिर्फ 20 साल ही जेल में बिताए। उसकी मौत भी उसकी ज़िंदगी की तरह ही रहस्यमय रही। कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक 25 जुलाई 2009 को उसकी मौत हो चुकी थी। लेकिन आज तक कोई पुख्ता सबूत नहीं मिला और शायद यही वजह है कि मिस्टर नटवर लाल आज भी एक कहानी नहीं बल्कि एक रहस्य बनकर जिंदा है। तो दोस्तों आपको नटवर लाल की कहानी कैसी लगी? क्या एक इंसान इतना चालाक हो सकता है कि अकेले पूरे सिस्टम की आंख में धूल झोंक दे और आखिर क्यों आज भी उसके गांव के लोग नटवर लाल को महान मानते हैं? अपनी राय हमें कमेंट्स में बताइए। यह पेशकश पसंद आई हो तो वीडियो को लाइक और शेयर करके 1111 लाइक्स जरूर करवा दीजिए और ऐसी ही अनसुनी अनकई कहानियों के लिए हमारे चैनल को सब्सक्राइब करके पास वाली घंटी बजाना मत भूलिएगा। जय हिंद, जय

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