हिमाचल में एक कुत्ते ने बचा ली पूरे गांव की जान। पहाड़ टूटने से पहले ही कर दिया था अलर्ट। फिर कुत्ते के मालिक और गांव के एक बुजुर्ग भगवान बनकर आए। नहीं तो हो जाता बहुत ही बड़ा अनल। हमारे समाज में कुत्ता शब्द को लोग अक्सर गाली की तरह इस्तेमाल करते हैं। कुत्ते जैसे मत बनो।
कुत्ते की मरेगा। मगर हमारे हिमाचल की यह सच्ची घटना उन सबके मुंह पर तमाचा है जो कुत्ते को जानवर समझते हैं और इंसानियत का ठेका खुद उठाए करते हैं। मंडी जिले के सियाठी गांव में जो हुआ उसे कुदरत का कहर कहो या सिस्टम की लापरवाही पर जो बचा उसका श्रेय एक कुत्ते को जाता है।
एक ऐसा पालतू कुत्ता जो रात के करीब 4:00 बजे अचानक जोर-जोर से भौकने लगा। बिना रुके लगातार जैसे किसी अनहोनी का इशारा कर रहा हो। उसकी यह आवाज सुनकर मालिक ललित कुमार जागे। पहले सोचा बारिश की वजह से डरा होगा। पर जब वो अपने घर से बाहर निकले तो उनकी आंखें फटी रह गई। घर के पास जमीन फट चुकी थी। एक बड़ी दरार सीधे नींव तक पहुंच रही थी। बारिश थमने का नाम नहीं ले रही थी और मिट्टी सरक रही थी। ललित को समझ आ गया वक्त नहीं है। उसने झटपट पूरे परिवार को बाहर निकाला और फिर दौड़ पड़े गांव के दूसरे घरों की तरफ।बाहर निकलो। खतरा है जल्दी करो। वो चिल्ला रहे थे। बारिश में भीगते जा रहे थे। पर उनकी आवाज में जो डर था वह असली था। उधर गांव के बुजुर्ग धनदेव जी पहाड़ के दरकने और बिजली के खंभे गिरने की जैसी आवाज से चौंक गए।
70 साल की उम्र में भी उन्होंने आवाज से ही पहचान लिया कि कुछ बड़ा टूटने वाला है। उन्होंने भी लाठी पकड़ी और निकल पड़े उस गांव की तरफ जिसे वह बचपन से देखते आए थे। अब एक ओर वो कुत्ता था जो लगातार भौंक रहा था। दूसरी ओर ललित जो चिल्ला चिल्लाकर सबको सचेत कर रहे थे और तीसरी ओर धनदेव जी जो एक-एक घर में जाकर दरवाजा खटखटा रहे थे। लोगों को जगा रहे थे।
उनकी हर पुकार में उनका अनुभव था। भरोसा था और साथ में थी अपने गांव के लोगों को सुरक्षित बचाने की ललक। गांव के लोग नींद में थे। बच्चे सो रहे थे। महिलाएं कंबल लपेटे थी। पर खतरे की भनक लगते ही तब एक-एक करके बाहर निकलने लगे। बुजुर्गों को सहारा देकर उठाया गया। बच्चों को गोद में लेकर भागा गया। कोई चप्पल पहनना भूल गया, कोई कंबल लेना। क्योंकि अब सवाल सिर्फ एक था जान बचानी है।
और फिर लोगों के घरों से बाहर आते ही कुछ ही देर में पूरा गांव ही उजड़ गया। 10 मकान मलबे में समा गए। 20 खच्चरे, 30 बकरियां, आठ भेड़े, पांच भैंस सब खत्म। बर्तन, कपड़े, बाइक, फर्नीचर सब बह गया। जिस घर में सुबह चूल्हा जलना था वो अब पहचान में नहीं आता। लेकिन इस तबाही के बीच जो नहीं बहा वो था जीवन। एक भी इंसानी जान नहीं गई। क्योंकि उस रात एक कुत्ता जाग रहा था। एक बेटा चेत गया और एक बुजुर्ग दौड़ पड़े थे। अब से आठे गांव के लोग किसी स्कूल में किसी मंदिर में रातें काट रहे हैं।
जो तन पर था बस वही बचा। जिस तकिए पर सिर रखकर सोते थे अब वही तकिया भी मलवे में दबा है। बच्चे सहमे हैं। माएं चुप हैं और बुजुर्ग फिर भी हिम्मत दिखा रहे हैं। बाकी प्रशासन भी अब पहुंच गया है राहत लेकर। एसडीएम, तहसीलदार, एसएओ सब मौके पर हैं। 10-100 की फरी मदद दी गई है। सिर पालें और राशन बांटे गए हैं। गांव वालों के लिए खाना मंदिर में बन रहा है। लेकिन यह सब उस के सामने बौना लगता है जिसे टाला जा सकता था। अगर 2014 में ही सरकार ने इस बस्ती को दूसरी जगह शिफ्ट कर दिया होता। क्योंकि यह पहली बार नहीं था।
2014 में भी यहां भूसखलन हुआ था। तब कहा गया था इन परिवारों को सुरक्षित जमीन देंगे। इसके बाद फाइलें चली, फोटो खींचे लेकिन नतीजा शून्य। अब वही बस्ती जो कभी आबाद थी मिट्टी में मिल चुकी है। पूर्व जिला पार्षद भूपेंद्र सिंह भी कह रहे हैं अब और नहीं। अब इन परिवारों को जमीन दो, मकान दो, स्थाई समाधान दो। लेकिन इस वीडियो का सबसे दिल तोड़ने वाला हिस्सा अब आता है।
जिस कुत्ते ने सबको बचाया, जिसकी एक आवाज ने पूरी बस्ती को नींद से उठाया, जिसने वक्त से पहले अनहोनी को पहचान लिया, अब वो खुद लापता है। तबाही के बाद से कोई नहीं जानता वो कहां है। कुछ लोग कहते हैं मलबे में दब गया होगा। कुछ कहते हैं डरकर जंगल भाग गया और कुछ बुजुर्ग कह रहे हैं वो कोई साधारण कुत्ता नहीं था। भैरव भगवान द्वारा भेजे गए थे और काम पूरा करके लौट गए। इस वजह से यह कहानी अधूरी लगती है क्योंकि जो सबसे पहले अलार्म था जो सबसे पहले बोला आज वो भी चुप है और गायब है।
इसलिए अगली बार अगर कभी किसी गांव में कोई कुत्ता रात को जोर-जोर से भौके तो उसे पत्थर मत मारना क्योंकि हो सकता है वो सिर्फ भौक नहीं रहा हो। वो तुम्हें जिंदा रखने की कोशिश कर रहा हो।