लाखों करोड़ रुपए की [संगीत] भारत अब डॉलर के लिए हर दरवाजा खटखटा रहा है और ऐसे में सवाल यह है कि क्या देश में डॉलर की इतनी कमी हो गई है कि सरकार को अब विदेशों में बसे भारतीयों तक से मदद मांगनी पड़ रही है क्योंकि बता दें कि इस बार जो मामला सामने आया है वह मामला सिर्फ गिरते रुपए का नहीं है। मामला है भारत की पूरी इकोनमी पर बढ़ते दबाव का। रुपया लगातार कमजोर हुआ। कच्चे तेल की कीमतें बढ़ी और भारत जितना डॉलर कमा रहा है उससे ज्यादा खर्च कर रहा है।
यानी देश में डॉलर आउटफ्लो ज्यादा हो गया है। 20 मई को रुपया करीब 96.95 प्रति डॉलर तक पहुंच गया था। इतिहास के सबसे कमजोर स्तरों में से एक। अब सोचिए भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% तेल बाहर से खरीदता है और तेल डॉलर में खरीदा जाता है। मतलब जैसे-जैसे डॉलर महंगा होगा वैसे-वैसे पेट्रोल, डीजल इसके साथ गैस और रोजमर्रा की चीजें महंगी होगी। यहीं से शुरू होता है सरकार और आरबीआई [संगीत] का डॉलर बचाओ मिशन। पहला तरीका आरबीआई खुद मार्केट में डॉलर बेच रहा है। दूसरा सरकारी बैंकों के जरिए इंटरवेंशन और तीसरा डॉलर रूपी स्वैप।
अब यह स्वैप आखिर है क्या? मान लीजिए किसी बैंक के पास डॉलर पड़े हैं। लेकिन उसे भारत में रुपए चाहिए। तो आरबीआई कहता है तुम मुझे डॉलर दो। मैं तुम्हें रुपया देता हूं। और कुछ साल बाद दोनों वापस बदल लेंगे। इससे फायदा यह होता है कि मार्केट में डॉलर की कमी नहीं दिखती और सिस्टम में भरोसा बना रहता है। लेकिन आपको यह बता दें कि असली गेम यहीं से ही अब शुरू होता है। सरकार की नजर अब एनआरआई यानी विदेशों में रहने वाले भारतीयों पर है।
सरकार यह चाहती है कि जो भारतीय बाहर डॉलर कमा रहे हैं, वह अपना पैसा भारतीय बैंकों में ही जमा करें। क्यों? इसका कारण है भारत को डॉलर चाहिए बहुत ज्यादा डॉलर और इसी के लिए सरकार पुराने फार्मूले फिर से निकाल रही है। 1997 में रिसर्जेंट इंडिया बोंड्स 200 में इंडिया मिलेनियम डिपॉजिट और फिर उसके बाद साल 2013 में एफसीएआर डिपॉजिट स्कीम। हर बार जब डॉलर का संकट आया। भारत ने [संगीत] क्या किया? भारत ने एनआरआई से पैसे बुलवाए और हर बार अरबों डॉलर भारत आए। लेकिन इस बार कहानी थोड़ी सी अलग है। थोड़ी सी ट्विस्ट है क्योंकि अमेरिका में ब्याज दरें पहले से बहुत ज्यादा है।
मतलब अगर भारत डॉलर बुलाना चाहता है तो एनआरआई को ज्यादा रिटर्न देना पड़ेगा। यानी डॉलर अब पहले से कई गुना ज्यादा महंगा हो चुका है और अब सरकार एक कदम और आगे बढ़ा चुकी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक जो दावे आए हैं उसके मुताबिक भारत अब इजराइल जैसे देशों के लिए स्किल्ड भारतीय वर्कर्स तैयार कर रहा है ताकि वह बाहर जाकर डॉलर कमाए और वो पैसा भारत भेजें। यानी भारत अब सिर्फ सॉफ्टवेयर या फिर दवाइयां एक्सपोर्ट नहीं करता। भारत अब स्किल्ड इंडियंस भी एक्सपोर्ट करता है और यह एक्सपोर्ट करना चाहता है क्योंकि दुनिया में पैसे वाले देश हैं लेकिन वहां काम करने वाले लोग बेहद कम है और यहीं पर भारत ने खेल खेला और भारत के पास दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी भी है।
अब आरबीआई ब्याज दरें बढ़ाने पर [संगीत] भी विचार कर रहा है क्योंकि जब बता दें आपको कि ब्याज दरें बढ़ती है तो विदेशी निवेशक भारत में पैसा लगाते हैं। लेकिन इसकी कीमत भी है। इसकी कीमत यह होगी कि ईएमआई महंगी हो जाएगी। लोन महंगे होंगे और बिजनेस के लिए कर्ज महंगा होगा। यानी रुपए को बचाने की लड़ाई अब सिर्फ आरबीआई नहीं लड़ रहा है। इस लड़ाई में सरकार, बैंक, एनआरआई और शायद आने वाले समय में हर भारतीय शामिल होने वाला है। अब देखना यह होगा कि आने वाले दिनों में यह जो मिडिल ईस्ट का संकट है, यह और क्या-क्या दिखाता है। फिलहाल इस रिपोर्ट में इतना ही। बाकी तमाम खबरों के लिए जुड़े रहे Zee न्यूज़ के साथ।