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खामेनेई को जहाँ दफ़नाया, कितनी ताक़तवर वो इमाम रज़ा दरगाह ?जानकार होश उड़ जाएंगे।

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ईरान के मशहूर शहर में स्थित इमाम रजा की दरगाह एक बार फिर पूरी दुनिया की नजरों में है। इसकी वजह है ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामने का अंतिम संस्कार। बताया जा रहा है कि उन्हें भी इसी ऐतिहासिक दरगाह परिसर में सुपुरदेखा किया जाएगा।

लेकिन सवाल यह है कि आखिर इस दरगाह की इतनी अहमियत क्यों है और यहां पहले कौन-कौन सी बड़ी हस्तियां दफन है? दरअसल इमाम रजा की दरगाह सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं है। यह ईरान के धार्मिक, राजनीतिक और शाही इतिहास का एक केंद्र है।

जहां करीब 1000 साल का इतिहास एक साथ दिखाई देता है। यहां शिया इस्लाम के आठवीं इमाम की मजार है। लेकिन उनके अलावा अब्बासी खलीफा काज़ार राजवंश के राजकुमार, मशहूर इस्लामी विद्वान ईरान के पूर्व राष्ट्रपति और कई शाही और धार्मिक हस्तियां भी दफन हैं। मगर क्यों खास है.

मशद की इमाम रजा दरगा? दरअसल ईरान के उत्तर पूर्व में स्थित मशद दुनिया भर के शिया मुसलमानों के लिए सबसे पवित्र शहरों में गिना जाता है। मशद शब्द का अर्थ है शहादत का स्थान। माना जाता है कि इमाम रजा की शहादत के बाद इस शहर को यही नाम मिला।

आज ये दरगाह परिसर दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक परिसरों में से एक है। हर साल करोड़ों श्रद्धालु यहां जियारत के लिए आते हैं। सदियों के दौरान तैमूरी, सफवी और काज़ार राजवंशों ने इस परिसर का लगातार विस्तार किया।

इसी वजह से यहां इस्लामी वास्तुकला के अलग-अलग दौर की झलक भी देखने को मिलती है। तो सबसे पहले जानिए कि आखिर कौन थे इमाम रजा। इस पूरे परिसर का केंद्र शिया इस्लाम के आठवें इमाम अली इब्न मूसा अल रजा यानी कि इमाम रजा की मजार है। शिया समुदाय उन्हें अपने सबसे सम्मानित धार्मिक नेताओं में गिनता है। वह अपने ज्ञान, धैर्य और धार्मिक नेतृत्व के लिए प्रसिद्ध थे। इतिहासकारों के अनुसार अब्बासी खलीफा अल मामून ने उन्हें खुरासान बुलाया था।

बाद में 818 ईसवी में उनकी मृत्यु हुई, जिसे शिया परंपरा में जहर देकर की गई शहादत माना जाता है। उनके निधन के बाद एक छोटा सा गांव धीरे-धीरे विशाल धार्मिक नगर मशद में बदल गया। आज उनकी मज़ार पर बना सुनहरा गुंबद पूरी दरगाह की पहचान बन चुका है।

इस दरगाह का सबसे दिलचस्प ऐतिहासिक पहलू यह है कि इमाम रजा की मजार के पास ही अब्बासी खलीफा हारून अल रशीद की कब्र भी मौजूद है। हारून अल रशीद वही शासक हैं जिनका नाम अलिफ लैला की कहानियों से पूरी दुनिया में मशहूर हुआ।

उनकी मौत 809 ईसवी में एक सैन्य अभियान के दौरान इसी इलाके में हुई थी और उन्हें भी यहीं दफनाया गया। इतिहासकार इसे एक बड़ा विरोधाभास मानते हैं। जिस अब्बासी शासन के दौर में इमामों और अहले-ए-बैत के समर्थकों पर अत्याचार हुए। उसी शासन के सबसे शक्तिशाली खलीफा की कब्र बाद में इमाम रजा की मजार के बिल्कुल पास रह गई।

दरगाह परिसर में काज़ार राजवंश के क्राउन प्रिंस अब्बास मिर्जा की कब्र भी मौजूद है। 19वीं सदी में वह ईरान की सेना के प्रमुख कमांडरों में शामिल थे। उन्होंने रूस और फारस के बीच हुए युद्धों में सेना का नेतृत्व किया और ईरान की सेना को आधुनिक बनाने की कोशिश की। उन्होंने प्रशासन और सैन्य व्यवस्था में कई सुधार शुरू किए। हालांकि वह कभी भी शहंशाह नहीं बन पाए लेकिन ईरान के इतिहास में उन्हें आधुनिक सुधारों की शुरुआत करने वाले नेताओं में गिना जाता है।

इमाम रजा दरगाह में प्रसिद्ध इस्लामी विद्वान बहा अलदीन अल आमिली जिन्हें शेख बहाई के नाम से भी जाना जाता है कि कब्र भी है। वो केवल एक धार्मिक विद्वान ही नहीं थे बल्कि गणितज्ञ, खगोल शास्त्री, इंजीनियर और वास्तुकार भी थे। माना जाता है कि सबवी काल में इस महान शहर के विकास और कई इंजीनियरिंग परियोजनाओं में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। दरगाह परिसर की कुछ पारंपरिक जल व्यवस्था और वास्तु संबंधी अवधारणाओं का श्रेय भी उन्हें ही दिया जाता है। आज भी बड़ी संख्या में छात्र, शोधकर्ता और धार्मिक विद्वान उनकी मजार पर श्रद्धांजलि देने पहुंचते हैं।

हाल के वर्षों में इस दरगाह से जुड़ा सबसे चर्चित नाम ईरान के पूर्व राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी का है। मई 2024 में हेलीकॉप्टर दुर्घटना में उनकी हो गई थी। रईसी का जन्म भी मशहद में हुआ था और वह इमाम रजा दरगाह के संरक्षक संगठन आस्ताने कुदूस रजवी के प्रमुख भी रह चुके थे। उनकी इसी पृष्ठभूमि और उनकी इच्छा को देखते हुए उन्हें इमाम रजा की मजार के निकट दफनाया गया। उनके अंतिम संस्कार में लाखों लोग शामिल हुए थे और आज उनकी कब्र भी बड़ी संख्या में लोगों के आकर्षण का केंद्र बन चुकी है और अब ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता आया अली खामनई का नाम भी इसी सूची में जुड़ने जा रहा है।

खामनई का जन्म भी मशहद में हुआ था और उनका इस शहर से गहरा भावनात्मक और धार्मिक रिश्ता रहा। बताया जाता है कि उन्होंने इच्छा जताई थी कि अंतिम संस्कार के बाद उन्हें भी इमाम रजा की दरगाह में ही सुपुरदेखाक किया जाए। अगर ऐसा होता है तो वह ईरान के उन शीर्ष नेताओं में शामिल हो जाएंगे जिनकी कब्र इस ऐतिहासिक धार्मिक परिसर में होगी। इसे ईरान की धार्मिक और राजनीतिक व्यवस्था में इस दरगाह की सर्वोच्च प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जा रहा है। दरगाह परिसर केवल धार्मिक नेताओं तक सीमित नहीं है।

यहां तैमूरी और सफी राजवंश के कई शहजादे ईरानियां, वज़र और शाही परिवारों के सदस्य भी दफन हैं। दरगाह परिसर में मौजूद प्रसिद्ध गोहरशाद मस्जिद इसी इतिहास का हिस्सा है। इस मस्जिद का निर्माण रानी गोहरशाद ने कराया था। उनके परिवार के कई सदस्यों की कब्रें भी इसी इलाके में मौजूद हैं। जब सफवी शासकों ने ईरान में शिया इस्लाम को राजधर्म बनाया तब इस दरगाह का महत्व और भी बढ़ गया। उसी दौर में यहां कई शासकों और प्रभावशाली धार्मिक नेताओं को दफनाया गया। इस दरगाह परिसर में सैकड़ों इस्लामी उलेमा, धार्मिक, शिक्षक और विद्वान भी दफन है।

जिन्होंने अपना जीवन धार्मिक, शिक्षा और समाज सेवा में बिताया। इसके अलावा 1980 के दशक में हुए ईरान इराक युद्ध के कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों और शहीदों को भी यहीं जगह दी गई। इस वजह से यह परिसर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं बल्कि ईरान के राष्ट्रीय इतिहास और सामूहिक स्मृति का एक महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है। लेकिन इस दरगाह में दफन होना इतना बड़ा सम्मान आखिर क्यों माना जाता है? तो शिया परंपरा में यह मान्यता है कि इमाम रजा के पड़ोस में दफन होने वाले लोगों पर उनकी विशेष कृपा रहती है और कयामत के दिन वो उनकी सिफारिश करेंगे।

इसी धार्मिक विश्वास के कारण इस दरगाह में दफन होना ईरान में सबसे बड़े सम्मानों में से एक माना जाता है। यही वजह है कि सदियों से शहंशाह, खलीफा, राजकुमार, धार्मिक विद्वान, राष्ट्रपति और अब देश के सर्वोच्च नेता तक सभी इस ऐतिहासिक परिस में दफन होने को सम्मान की बात मानते रहे हैं।

आज इमाम रजा की दरगाह केवल एक मजार नहीं बल्कि ईरान के धार्मिक विश्वास, शाही इतिहास, इस्लामी सभ्यता और आधुनिक राजनीति इन सभी का एक जीवंत दस्तावेज बन चुकी है। यहां की सुनहरी मिरारें, विशाल प्रांगण और सदियों पुरानी कब्रें ईरान के इतिहास की कई परतों को एक साथ समेटे हुए हैं। निष्पक्ष मतलब

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