दिनांक 17 जुलाई 1928 राजस्थान के कुंडलपुर गांव में उस सुबह एक अलग ही रौनक थी। गांव की गलियां सज चुकी थी। घर-घर में मिठाई बन रही थी। ढोल और सिनाई की आवाज पूरे गांव [संगीत] में गूंज रही थी। क्योंकि उस दिन गांव के सबसे सम्मानित परिवार के बेटे अर्जुन सिंह की शादी थी। अर्जुन सिंह उम्र 27 साल एक युवा किसान। उसका परिवार इलाके के सबसे प्रतिष्ठित परिवारों में यह गिना जाता था।
शांत स्वभाव मेहनती [संगीत] और लोगों की मदद करने वाला। इसी वजह से पूरे गांव में उनकी काफी इज्जत थी। शादी पास के गांव रामपुरा में ते हुई थी जो कुंडलपुर से लगभग 35 कि.मी. दूर था। आज के समय में यह दूरी ज्यादा नहीं लगती। लेकिन 1928 में जब नए पक्की सड़कें थी, न मोटर गाड़ियां थी तब यह सफर आसान नहीं था। बारात को जंगलों और पहाड़ों के रास्तों से होकर गुजरना था। इसी वजह से यह तय हुआ कि बारात दोपहर बाहर निकलेगी ताकि रात होने से पहले रामपुरा पहुंच सके। दोपहर होते-होते पूरा गांव चौपाल में इकट्ठा हो गया। घोड़ों को सजाया गया। रेलगाड़ियों को तैयार किया गया और धीरे-धीरे करीब 200 लोग बारात में शामिल हो गए। उस समय तक किसी को भी अंदाजा नहीं था कि यह यात्रा इतिहास की सबसे रहस्यमई घटनाओं में दर्ज होने वाली है।
बारात रवाना होने ही वाली थी कि गांव के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति बेरूदास वहां पर पहुंचे। उनकी उम्र लगभग 80 साल थी और पूरे इलाके के लोग उनकी बात का सम्मान करते थे। उन्होंने अर्जुन सिंह के पिता को अलग बुलाया। कुछ देर तक दोनों के बीच बातचीत हुई। लेकिन बातचीत के बाद अर्जुन के पिता के चेहरे का रंग बदल चुका था। जब लोगों ने पूछा कि क्या हुआ? तो उन्होंने उनकी बात टाल दी। लेकिन कुछ लोगों ने भेरूदास को यह कहते हुए सुना था सूरज ढलने से पहले पहाड़ी वाला रास्ता पार कर लेना है। यह सुनकर कुछ लोग मुस्कुरा दिए। उन्हें लगा कि यह किसी बूढ़े आदमी की बेवजह की चिंता हो गई। लेकिन भेरूदास के चेहरे पर मुस्कान नहीं थी। शाम करीब 4:00 बजे ढोल नगाड़ों के बीच बारात कुंडलपुर से निकल गई। आगे घोड़े थे। बीच में बैलगाड़ियां और उनके पीछे सैकड़ों बाराती। शुरुआत का सफर बिल्कुल सामान्य रहा। रास्ते में कई छोटे गांव आए। लोगों ने बारात का स्वागत किया। कुछ जगहों पर बारात रुकी भी थी। सब कुछ वैसा ही था जैसा किसी आम शादी में होता था। लेकिन शाम ढलते ढलते मौसम बदलने लगा। आसमान में बादल छा गए। हवा तेज होने लगी और जंगल वाला इरा शुरू हो गया। यह वही रास्ता था जिसे स्थानीय लोग कालीदरा नाम से जानते थे। यह रास्ता वर्षों से इस्तेमाल किया जाता था। लेकिन इसके बारे में एक अजीब बात भी कही जाती थी। कहा जाता था कि रात होने के बाद लोग इस रास्ते से गुजरना पसंद नहीं करते। हालांकि किसी के पास इसका कोई ठोस कारण नहीं था।
बस यह एक पुरानी मान्यता थी जो पीढ़ियों से चली आ रही थी। सूरज अब लगभग डूब चुका था और बारात अभी भी काली दर्रे मार्ग पर थी। कुछ बारातियों ने सुझाव दिया कि रात होने से पहले कहीं रुक जाना चाहिए। लेकिन अर्जुन सिंह के चाचा ने कहा रामपुर अब ज्यादा दूर नहीं है। अगर हम चलते रहे तो कुछ ही घंटों में पहुंच जाएंगे। बारात आगे बढ़ती रही। धीरे-धीरे अंधेरा बढ़ने लगा और जंगल पहले से ज़्यादा शांत महसूस होने लगा। रात के करीब 8:00 बजे एक चरवा ने आखिरी बार उस बारात को देखा था। उसके बाद वह पुलिस को बताया सब कुछ सामान्य लग रहा था। ढोल बज रहे थे। लोग हंस रहे थे। मुझे नहीं लगा कि कुछ गलत होने वाला है। लेकिन उसी रात कुछ ऐसा हुआ जिसे अर्जुन सिंह और उसकी बारात हो और पूरे कुंडलपुर को इतिहास का सबसे बड़ा रहस्य बना दिया। [संगीत] और अगली सुबह रामपुरा गांव में दुल्हन इंतजार करती रह गई। क्योंकि बारात कभी पहुंची ही नहीं। नमस्कार दोस्तों, आप देख रहे हैं काल दस्तावेज। जहां हम इतिहास के उन रहस्यों की परतें खोलते हैं जो समय के साथ और भी गहरे होते चले गए। तो चलिए अब शुरू करते हैं। 1928 में गायब हुई उस रहस्यमई बारात की आगे की कहानी। दिनांक 18 जुलाई 1928। रामपुरा गांव में सुबह हो चुकी थी। दुल्हन का परिवार पूरी रात जागता रहा। शुरुआत में सभी लोगों को लगा शायद रास्ते में किसी कारण देरी हो गई होगी। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, चिंता और बढ़ने लगी। सुबह 8:00 बजे तक भी बारात नहीं पहुंची। यह असामान्य था क्योंकि सामान्य परिस्थितियों में बारात आधी रात से पहले ही गांव पहुंच जानी चाहिए थी। दुल्हन के पिता ने तुरंत कुछ लोगों को रास्ते की तरफ भेजा। उन्हें उम्मीद भी नहीं थी कि बारात कहीं रुकी होगी। लेकिन कई घंटे बीत जाने के बाद भी कोई खबर नहीं आई। उधर कुंडलपुर में भी बेचैनी बढ़ने लगी। क्योंकि बारात के साथ गए लोगों में गांव के कई परिवारों के सदस्य शामिल थे। दोपहर होते-होते दोनों गांव के लोग बारात की तलाश में निकल पड़े। खोज शुरू हुई, कच्चे रास्ते देखे गए। जंगलों में खोजबीन हुई लेकिन कई घंटों तक कोई भी सुराग नहीं मिला। फिर दोपहर बाद कालीदरा मार्ग के पास एक चरवा ने एक अजीब सी चीज देखी। रास्ते से थोड़ी दूर दो घोड़े बंधे हुए थे। वही घोड़े जिन्हें बारात में साथ जाते हुए देखा था। लेकिन उनके पास कोई भी इंसान नहीं था। खबर मिलते ही सभी लोग वहां पर पहुंचे। जांच शुरू हुई। थोड़ी दूर पर कुछ और सामान मिला।
एक टूटा हुआ ढोल, कुछ कपड़े, एक बैलगाड़ी का पहिया। लेकिन सबसे अजीब बात यह थी कि वहां किसी संघर्ष के निशान नहीं थे। अगर डाकुओं ने हमला किया था तो इतने लोगों का हुआ क्या? और अगर बारात रास्ता भटक गई तो 200 लोग एक साथ कैसे गायब हो गए? अब मामला गंभीर हो चुका था। उस समय राजस्थान के उस इलाके के ब्रिटिश प्रशासन का प्रभाव था। घटना की खबर स्थानीय अधिकारियों तक पहुंच चुकी थी और एक औपचारिक जांच शुरू की गई। अगले कई दिनों तक जंगलों की तलाशी ली गई। खोजी दलों ने पहाड़ियों को खंगाला। सूखे कुएं तक की जांच हुई। पास के गांव में पूछताछ की गई। लेकिन अर्जुन सिंह या किसी भी बाराती का कोई भी पता नहीं चला। दिन हफ्तों में बदल गए। लेकिन जांच वहीं की वहीं खड़ी रही। फिर एक गवाह सामने आया। वह वही चरवा था जिसने आखिरी बारात को देखा था। उसने अधिकारियों को बताया जब मैंने बारात को देखा तब सब कुछ सामान्य था। लोग हंस रहे थे, ढोल बज [संगीत] रहे थे। किसी को कोई भी डर नहीं था। लेकिन उसके बाद उसने एक और बात बताई जिस पर शुरुआत में किसी ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया था। उसने कहा कि बारात के गुजरने के बाद उसने दूर पहाड़ियों की तरफ कुछ असामान्य रोशनी देखी थी। जब उससे पूछा गया कि कैसी रोशनी थी तो वह स्पष्ट जवाब नहीं दे सका। बस इतना कहा जैसे कोई दूर से संकेत दे रहा हो। अधिकारियों ने इस बयान को महत्व में नहीं दिया। उनके पास कोई ठोस सबूत नहीं था। लेकिन कुछ दिनों बाद जांच अधिकारियों को एक ऐसी जानकारी मिली जिसने पूरे मामले को एक नई दिशा दे दी। उन्हें पता चला कि काली दर्रा मार्ग का नाम पहली बार किसी नक्शे में 1928 में नहीं आया था। उस रास्ते का जिक्र 10 को पुराने सरकारी रिकॉर्ड में भी मौजूद था और उन रिकॉर्ड में एक ऐसी घटना दर्ज थी जिसने जांच की टीम को चौका दिया क्योंकि 1928 से बहुत पहले [संगीत] उसी इलाके में एक और रहस्यमय गायब होने की घटना दर्ज की जा चुकी थी और शायद अर्जुन सिंह की बारात का रहस्य उसी पुरानी घटना से जुड़ा हुआ था। अर्जुन सिंह की बारात को गायब हुए कई सप्ताह बीत चुके थे। जांच लगातार जारी रही। लेकिन
अधिकारियों के हाथ अब तक कुछ ठोस सबूत नहीं लगा था। ना कोई शव मिला, ना कोई जीवित व्यक्ति, ना कोई ऐसा सबूत जो बता सके कि आखिर 200 लोग एक ही रात में कहां चले गए। इसी बीच जांच अधिकारियों ने काली दर्रा मार्ग से जुड़े पुराने सरकारी रिकॉर्ड खंगालने शुरू कर दिए। उन्हें उम्मीद थी कि शायद इस रास्ते का कोई इतिहास होगा और वही उन्हें एक ऐसी फाइल मिली जिसने पूरे मामले को और रहस्यमई बना दिया। फाइल लगभग 30 साल पुरानी थी। तारीख 10 थी 1901। उस फाइल में एक छोटी व्यापारी टोले का जिक्र था। करीब 40 ऊंटों और बैलगाड़ियों के साथ उसी इलाके से गुजर रहे थे। उन्हें एक शेर से दूसरे शेर तक पहुंचना था। लेकिन वे कभी अपनी मंजिल तक पहुंचे ही नहीं। शुरुआत में लोगों ने सोचा कि शायद भी रास्ता भटक गए होंगे। लेकिन बाद में खोजबीन के दौरान कुछ ऊंट मिले, कुछ सामान मिला लेकिन लोग नहीं मिले। व्यापारियों के गायब होने का कारण अज्ञात है। यह पढ़कर जांच अधिकारी चौ गए क्योंकि 1928 की घटना में लगभग यही हुआ था। कुछ जानवर मिले, कुछ सामान मिला लेकिन लोग नहीं मिले। अब पहली बार अधिकारियों को लगा कि शायद दोनों घटनाओं के बीच कोई संबंध हो सकता है। उन्होंने 1901 वाली फाइल को और ध्यान से पढ़ना शुरू किया और तभी उन्हें आखिरी पन्ने पे एक नोट मिला। यह नोट किसी अधिकारी के हाथ से लिखा था। उसमें सिर्फ एक लाइन थी। रात के बाद काली दर्रा मारा का उपयोग करने से बचें। लेकिन क्यों? इसका जवाब उस फाइल में नहीं था। जांच फिर से तेज कर दी गई। अधिकारियों ने पुराने गांवों से बात की। आसपास के गांव में पूछताछ की। पुराने नक्शे देखे लेकिन कोई ठोस जवाब नहीं मिला। [संगीत] धीरे-धीरे मामला ठंडा पड़ने लगा। महीनों बीत गए। फिर साल गुजर गया। अर्जुन सिंह की बारात कुंडलपुर के इतिहास का सबसे बड़ा रहस्य बन चुकी थी। कुछ लोगों का मानना था कि बारात रास्ता भटक गई। [संगीत] कुछ लोगों का मानना था कि किसी संगठित गिरोह ने हमला किया होगा और कुछ लोगों का मानना था कि सच्चाई कभी सामने ही [संगीत] नहीं आई। लेकिन एक बात आज भी लोगों को सोचने पर मजबूर कर देती है। 1901 [संगीत] में व्यापारी गायब हुए।
1928 में बारात गायब हुई और दोनों घटनाएं उसी काली दर्रे मार्ग से जुड़ी थी। क्या यह सिर्फ एक संयोग था या फिर उस इलाके में कुछ ऐसा हुआ था जिसे उस समय की जांच एजेंसियां समझ ही नहीं पाई। आज करीब एक सदी बाद भी अर्जुन सिंह उसकी बारात और उन 200 लोगों का कोई भी रिकॉर्ड नहीं मिलता। न उनकी मंजिल का पता चला ना उनके अंतिम ठिकाने [संगीत] का। लेकिन अगर आप भी आज भी राजस्थान के कुछ पुराने गांव में जाएं तो वहां के बुजुर्ग इस घटना का जिक्र धीमी आवाज में करते हैं और अक्सर एक [संगीत] ही बात कहते हैं रात होने के बाद कालीदरा मार्ग से नहीं गुजरना चाहिए। क्यों शायद उन्हें भी नहीं पता है लेकिन अर्जुन सिंह की बारात का रहस्य आज भी अनसुलझा है। लेकिन अगर आप भी इस रहस्य के बारे में अपनी कोई थ्योरी रखते हैं तो उसे कमेंट में जरूर लिखिए। आपके हिसाब से अर्जुन सिंह की बारात के साथ उस रात क्या हुआ? और क्या 1901 और 19 की घटनाओं के बीच कोई संबंध था? अपनी राय हमें कमेंट में जरूर बताइए क्योंकि शायद इस रेस का जवाब किसी पुरानी फाइल में नहीं बल्कि अपनी किसी थ्योरी में छुपा