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बॉम्बे का वो पहला डोन जिससे डरता था दाऊद इब्राहिम!

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एक ऐसा डॉन जिसके बारे में कहा जाता है कि उसने दाऊद इब्राहिम तक को पीट दिया था और जिसने एक वेश्या को अपनी बहन बना दिया। आखिर बंदरगाह पर बोरेड होने वाला एक मामूली कुली बंबई का सबसे खौफनाक नाम सबसे बड़ा अंडरवर डॉन कैसे बना? [नाक से की जाने वाली आवाज़] [संगीत] [संगीत] उस वक्त मुंबई को मुंबई कहते थे। वो शहर जो किसी को फर्श से अर्श तक पहुंचा देता [गला साफ़ करने की आवाज़] था और किसी को अंधेरे में हमेशा के लिए गुम कर देता था। वो शहर जहां लोगों की किस्मत रातोंरात बदल जाती थी। कुछ लोग उसी शहर की भीड़ में हमेशा के लिए खो जाते थे। उस वक्त जैसे-जैसे मुंबई अपना विस्तार कर रही थी। मुंबई के विस्तार होने के साथ वहां एक काली अंधेरी क्राइम की दुनिया भी बढ़ रही थी। 1940 का दशक था। समंदर के पानी को छूती नमकीन हवाएं, बंदरगाह पर उठता धुआं, जहाजों का शोर और उन्हीं हजारों चेहरों के बीच एक चेहरा ऐसा भी था जिसे कोई नहीं जानता था। गुमनाम एक लंबा चौड़ा खामोश तेज निगाहों वाला पठान। 7 फीट लंबाई थी उसकी और वह अफगानिस्तान से मुंबई सिर्फ 2 जून की रोटी कमाने आया था। कहते हैं वह अपने भाई की तलाश में आया था। उसका काम बंदरगाह पर कुली का था। बूढ़े ढोना, पसीना बहाना और दिन खत्म होने पर कुछ सिक्के जेब में लेकर घर लौटाना।

और कहते हैं इंसान अपनी किस्मत साथ लेकर पैदा होता है। और उस पठान की किस्मत उसे ऐसी राह पर ले जाने वाली थी जो आगे चलकर अपराध के इतिहास में दर्ज होने वाला था। [संगीत] कौन जानता था कि बंदरगाह पर बोरे उठाने वाला यही मामूली कुली एक दिन मुंबई के अंडरवर का बेताज बादशाह बनेगा जिसके नाम से बड़े-बड़े लोग रास्ता बदल देंगे और जिसकी छड़ी एक छड़ी की बात हो रही है जिसकी छड़ी उसका सहारा नहीं बनेगी बल्कि क्राइम की दुनिया में हुकूमत का प्रतीक बन जाएगी और जिसकी एक आवाज पर मुंबई की गलियां सन्नाटे में डूब जाएगी यह कहानी शुरू होती है बहुत साल पहले। हमारे जन्म से बहुत साल पहले जब आजाद भारत भी नहीं था। 1940 के आखिरी सालों में जब बंदरगाह पर काम करने वाले अफगान कुलियों से मालाबारी गैंग का एक नेता जबरन वसूली करने पहुंचा और उस दौर में बंदरगाह पर तो कोई नियम थे ही नहीं। ताकत का राज चलता था। जो ज्यादा ताकतवर उसकी ज्यादा रशूक और वही वहां डर फैलाता था। दादागिरी चलती थी और हर इलाके को अपनी हुकूमत बना रखा था लोगों ने। उस दिन भी माहौल सामान्य था। हर दिन की तरह करीम लाला अपने अफगान साथियों के साथ मुंबई की गोदी में बैठा था। तभी वहां मालाबारी कूलियों का एक नेता आया।

उसकी चाल में अकड़ थी। आंखों में धमकी भरा अंदाज और आवाज में आदेश। उसने कहा अगर यहां काम करना है तो हफ्ता देना पड़ेगा। लेकिन उसे पता नहीं था कि सामने वाला आदमी करीम लाला कोई मामूली इंसान नहीं। करीम लाला जरा भी नहीं डरा। वो खड़ा हुआ और उसकी आंखों में आंखें डालकर ठंडी मगर खतरनाक आवाज में कहा, “हम भी उतनी ही मेहनत करता है जितना तुम। हम में और तुम में कोई फर्क नहीं। हम एक पैसा तुम्हें नहीं देंगे। बस यही वो पल था जिसके बाद एक आम सीधे साधे कुली को अपराध की दुनिया में धकेल दिया गया। कुछ पल के लिए खामोशी वहां छा गई थी और फिर अचानक तनाव बारूद की तरफ हट पड़ा। मालाबारी नेता गुस्से में करीम लाला की तरफ झपटा। लेकिन अगले ही पल जो हुआ उसने वहां मौजूद लोगों की सांसे रोक दी। करीम लाला बिजली की फुर्ती से उठा और उसने ऐसा पलटवार किया कि सामने वाला संभल नहीं पाया। घोंसे बजने लगे। चीखें हवा में घुलने लगी और देखते-देखते ही मालाबारी ग्रुप वहां से भागने लगा। हालात खूनी टकराव में बदल गए। शोर सुनकर करीम लाला के पठान साथी वहां पहुंचे और जैसे ही मालाबारी गैंग ने उनकी तरफ देखा उनके चेहरों का रंग उड़ गया। जो कुछ देर पहले धमकियां दे रहे थे वही लोग अब जान बचाकर पोर्ट पर भाग रहे थे। उस दिन यह सिर्फ एक छोटी लड़ाई नहीं थी। उस दिन मुंबई की अंधेरी दुनिया में एक नया नाम पैदा हुआ और वो नाम था करीम लाला पठान। अफगानिस्तान में 1911 में जन्मे करीम लाला का असली नाम था अब्दुल करीम शेर खान पठान। उसे अफगानिस्तान में पश्तून समुदाय का आखिरी राजा भी कहा जाता था। लाला ने 21 साल की उम्र में हिंदुस्तान आने का फैसला किया। मूल रूप से पश्तून था।

बड़े होने पर जब उसको काम धंधे की दरकार हुई तो उसने भारत की राह पकड़ी। 1931 में पेशावर से होते हुए करीम लाला मुंबई पहुंचा और जल्द ही जल्द पैसा कमाने की चाहत उसको अपराध की दुनिया तक ले आई। बंदरगाह पर दबदबा बनाने के बाद जिस आदमी ने वसूली मांगने वाले गुंडों के सामने सिर झुकाने से इंकार किया था, अब उन्हीं का नाम बंदरगाह के तटों पर गूंजने लगा। लोग अब उसे अब्दुल करीम खान नहीं बल्कि करीम लाला कहने लगे। लेकिन यह तो बस शुरुआत थी क्योंकि मुंबई के अंडरवर का पहला बड़ा बादशाह अभी पैदा हो रहा था। कहानी लिखी जा रही थी। बंदरगाह पर दबदबा बनने के कुछ ही सालों के भीतर करीम लाला ने यह पूरा खेल समझ लिया। उसने डॉग पर उतरने वाले माल पर नजर रखनी शुरू की। धीरे-धीरे बंदरगाह से सामान गायब होने लगे और फिर वही माल मुंबई के बाजारों में बिकने लगा। पैसा बेतहाशा आने लगे और पैसे की खास बात यह है कि जब पैसा आता है तो अपने साथ ताकत भी लाता है और उसी ताकत और पैसे के जोर पर कुछ ही समय में करीम लाला ने नया धंधा शुरू किया सूद पर पैसे देना और उस दौर में जुए के अड्डे में हारने वाले लोग ज्यादातर बेरोजगार जरूरतमंद थे। धंधा पैसे और ताकत की जोर पर दिन दुगनी रात चौगुनी कमाई होने लगी। जिसके बाद करीम ने धंधे का नया नियम बनाया। उसने तय किया कि हर महीने की 10 तारीख को ब्याज देना होगा। देखते ही देखते हर महीने की 10 तारीख उसकी तिजोरी भर जाती थी। करीम उस वक्त से पैसे नहीं बांट रहा था। उसके साथ-साथ वो लोगों की जिंदगी में दखल देना भी सीख रहा था। बाद में जाकर वो लोगों के झगड़े सुलझाने लगा। मकान खाली करवाने लगा और लोगों की जिंदगी में निजी जिंदगी में फैसले लेने लगा। मामला कोर्ट पहुंचने से पहले करीम लाला के दरबार में पहुंचता था। करीम का रसूख इतना बढ़ गया था कि 1950 का दशक आते-आते हर रविवार उसके घर की छत पर एक दरबार लगने लगा। क्या गरीब क्या अमीर व्यापारी मजदूर हर कोई वहां अपनी पर समस्या लेकर पहुंचता था। कहा जाता है कि मुंबई में करीम लाला की शुरुआत ग्रांड रोड स्टेशन के पास लिए गए किराए के मकान से हुई और यहीं से उसने अपराध की सीढ़ियां चढ़नी शुरू की। करीम को इस बात की जानकारी थी कि इस शहर में मुंबई में जुड़ियों की कमी नहीं है। यह लोग अपना शौक पूरा करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। यही वजह थी करीम लाला ने घर में जुए के अड्डे खोल दिए।

कुछ ही समय में उसका खोला यह जुआ घर आसपास लोगों को भी अपनी ओर बुलाने लगा। कम समय में ही उसकी यह जुआ घर पूरी मुंबई की पहचान बनने लगा। समय गुजरने के साथ यह घर क्लब में बदला जहां नामी गिरामी लोग आने लगे। कहते हैं पढ़ा लिखा ना होने के बावजूद करीम लाला में लोगों के पढ़ने की गजब क्षमता थी। अमीर व्यापारी, कपड़ा व्यापारी उससे वसूली और सुरक्षा का काम लेने लगे और यहीं से पैदा हुआ पठान गया। इसके बाद करीम ने अपराध की दुनिया का दायरा बढ़ाना शुरू किया। अवैध शराब, जुए के अड्डे, वेश्यावृत्त, नशीली दबाव की तस्करी धीरे-धीरे उसने हर धंधे में पैर जमा लिया। उसके साम्राज्य की सबसे बड़ी ताकत उसका डर था। कहते हैं मुंबई में अगर कोई मकान मालिक किराएदार से परेशान हो जाए तो बस एक लाइन बोलता था। अब लाला को बुलाना पड़ेगा। और यह सुनते ही लोग घर खाली कर देते। धंधे को लाला तेजी से आगे बढ़ाने लगा। करीम लाला धंधे का अंदाज तो बदल नहीं रहा था। साथ ही करीम लाला के पहनावे का भी अंदाज उस वक्त के साथ बदलने लगा। पठान सूट की जगह वो सफेद सफारी सूट पहनने लगा। आंखों पर काला चश्मा, हाथ में महंगी सिगार और चेहरे पर ऐसा रोप कि सामने वाला नजरें झुका ले। फिर एक दिन उसकी जिंदगी में आई एक छड़ी। जी हां, यही वो छड़ी है। उसकी 50वीं सालगिरह पर किसी ने उसे महंगी वॉकिंग स्टिक भेंट की। पहले तो करीम लाला ने उसे लेने से मना कर दिया। बोला, “मैं अभी बूढ़ा नहीं हुआ हूं। मुझे सहारे की जरूरत नहीं। लेकिन दोस्तों ने कहा कि इससे उसकी शख्सियत और रोबदार लगी। उसने छड़ी अपने पास रख ली और फिर वो छड़ी सिर्फ छड़ी नहीं रही। खौफ की पहचान बन गई। कहते हैं अगर करीम मस्जिद में अपनी छड़ी छोड़कर वजू करने चला जाता तो मस्जिद भरी होने के बावजूद कोई उसकी जगह बैठने की हिम्मत नहीं करता। धीरे-धीरे उसके लोगों ने छड़ी का एक और इस्तेमाल खोज निकाला। जब पुलिस की निगाहें करीम पर पड़ने लगी तो उनके लोगों ने सलाह दी कि मकान खाली करवाने वो खुद ना जाए। उसके बाद जब भी किसी जगह से कब्जा हटवाना होता था तो करीम के लोग वहां सिर्फ उसकी छड़ी छोड़ देते थे। और जैसे ही किराएदार उस छड़ी को

देखता मकान खाली। मुंबई में इससे पहले किसी ने ऐसा रसूख नहीं देखा था। इसी दौरान करीम सिर्फ अपराधी नहीं बल्कि गरीबों और बेरोजगारों के लिए मसीहा बनने लगा। पठानों की कोई भी समस्या हो, नौकरी, पैसा या पारिवारिक विवाद लोग सीधे उसके पास आते। धीरे-धीरे उसकी चर्चा अंडरवर के दूसरे बड़े नामों तक पहुंची। वो नाम था हाजी मस्तान। उस दौर में तस्करी का बेताज बादशाह मस्तान एक ऐसा आदमी की तलाश में था जो उसके माल की सुरक्षा कर सके। 1970 के दशक में दोनों की मुलाकात ग्रंट रोड में मस्जिद में हुई। मस्तान ने कहा खान साहब बॉम्बे पोर्ट ट्रस्ट पर मेरा बहुत माल उतरता है। मुझे उसे सुरक्षित बाहर पहुंचाना है। करीम लाला ने पूछा क्या कुछ हिंसा हो सकती है? मस्तान मुस्कुराया और कहा कि अगर आपके लोग आसपास होंगे तो किसी की हिम्मत नहीं होगी और बस यहीं से मुंबई अंडरवर की सबसे बड़ी साझेदारियों में से एक शुरू हुई। उस वक्त करीम सिर्फ एक गैंगस्टर नहीं रहा। वो मुंबई का अब डॉन बन चुका था। उसके गेम में माजिद दीवाना, नवाब खान, नासिर खान उर्फ सफेद हाथी, हीरो लाला और कई ऐसे लोग शामिल थे जो उसके लिए एक बार में जान देने को तैयार रहते थे। लेकिन हर बादशाहत की तरह उसकी कहानी में भी एक नया खिलाड़ी आने वाला था और वो था दाऊद इब्राहिम कास्कर। दिलचस्प बात यह थी कि करीम लाला के मन में दाऊद के पिता हवलदार इब्राहिम कास्कर के लिए बहुत सम्मान था क्योंकि वह एक ईमानदार पुलिस वाला था। करीम ने कभी उसे खरीदने की कोशिश नहीं की। जब दाऊद पैदा हुआ और इब्राहिम के पास दावत देने के पैसे नहीं थे तब करीम ने खुद दावत रखवाई थी। लेकिन आगे चलकर वक्त बदला। 1980 के दशक तक दाऊद तेजी से ऊपर उठने लगा। जल्दी ही दोनों के बीच दुश्मनी खुलकर सामने आई और फिर शुरू हुआ मुंबई का सबसे खूनी गैंग वार। दाऊद ने अपना भाई शब्बीर खोया तो करीम ने अपना भाई रहीम लाला। अंडरवर के गलियारों में यह किस्सा खूब सुनाया जाता है कि एक बार करीम लाला को खबर मिली कि उसके इलाके में दाऊद इब्राहिम अपने गुरे लेकर एक क्लब में हंगामा कर रहा है। तो करीम लाला ने मौके पर पहुंचकर दाऊद की जमकर पिटाई की। बताते हैं कि करीम लाला ने दाऊद को तब तक मारा जब तक वो अधमरा नहीं हो गया। इस पिटाई से दाऊद को गंभीर चोटें आई।

यह वो समय था जब मुंबई में अंडरवर की जड़े फैल रही थी। यह वो दशक था जब मुंबई एक नहीं तीन डाउन की हुकूमत चला करती थी। एक तरफ हाजी मस्तान, दूसरी तरफ वध राजन मुदलियार और करीम लाला आपस में कोई टकराव नहीं था। इन तीनों ने अपना क्षेत्र बांट रखा था। उस समय के सभी डॉन करीम लाला का बहुत आदर सम्मान करते थे। करीम लाला पठान उसकी छवि किसी रॉबिन हुड की तरह थी। कहते हैं कि करीम लाला जुबान का बहुत पक्का था। जो वो कह देता था उसे वह पूरा किया करता था। करीम लाला ही वह शख्स था जिसने गंगूबाई काठियावाड़ी को अपनी बहन बनाया क्योंकि उसने करीम लाला के हाथ में राखी बांधी थी। यह किस्सा भी बड़ा रोचक है। गंगूबाई को प्यार में धोखा मिला और धोखा किसी और ने नहीं बल्कि उसके पति ने ही दिया। पति ने उसे गुजरात में लाकर मुंबई के कमाटीपुरा इलाके में एक कोठी में महज ₹500 में बेच दिया। यहीं पर गंगूबाई के साथ एक शख्स ने रेप किया। यह शख्स करीम लाला के गैंग का सदस्य था। गंगूबाई ने करीम लाला के दरबार में इंसाफ की गुहार लगाई। करीम लाला ने इंसाफ कर भी दिया। करीम लाला को इंसाफ से प्रभावित होकर गंगूबाई ने करीम लाला के हाथ में राखी बांधी और करीम लाला ने गंगूबाई को अपनी बहन बना लिया और कमाटीपुरा इलाके के सभी कोठे वहां होने वाले सभी गैरकानूनी धंधों की कमान गंगूबाई को सौंप दी। कहा जाता है कि 60 से 80 के दशक में माया नगरी चमक रही थी। उसी दौर में सिर्फ फिल्में नहीं बनती थी। किस्मतें बनती थी। रिश्ते बनते थे और कई बार फैसले अदालतों में नहीं डॉन करीम लाला के दरबार में तय होते थे। करीम लाला का नाम सुनकर बड़े-बड़े लोग सोच में पड़ जाते हैं। कहा जाता है कि उस दौर में मुंबई की कई बड़ी हस्तियां उन्हें जानती थी। उनके साथ तस्वीरें खिंचवाने के लिए पागल रहती थी। बॉलीवुड से जुड़ी कई कहानियां आज भी लोगों को हैरान कर देंगी। सबसे चर्चित किस्सों में से एक था हेलेन का। दुनिया हेलेन के फिल्म की दीवानी हो रही थी। लेकिन हेलेन परेशान थी। क्योंकि उसका एक दोस्त पीएन अरोड़ा उसकी मोटी रकम दबा कर बैठा था। हेलन दिलीप कुमार के पास गई। दिलीप कुमार ने हेलंस को करीम लाला से मिलने की बात कही।

करीम लाला ने एक चिट्ठी लिख डाली और चिट्ठी लिखने के कुछ ही घंटों बाद पूरी रकम जो है हेलेन के पास आ गई। समझिए करीम लाला का यह रुतबा था। उसने मुंबई में उनके प्रभाव और चर्चा बढ़ा दी। लोग कहते हैं कि उस दौर में कई विवाद कानून की किताबों से नहीं डॉन के कहे शब्दों से सुलझ जाते थे। एक और चर्चित किस्सा है अमिताभ बच्चन और करीम लाला से जुड़ा। अमिताभ बच्चन के बयान ने हलचल मचा दी थी। एक बार अमिताभ बच्चन ने कहा था कि बचपन में वह अपने पिता के साथ करीम लाला की बैठकों में गए थे। बयान सामने आया और बहस छिड़ गई। क्या बॉलीवुड और अंडरवर्ड के रिश्ते वाकई इतने गहरे थे? कहा यह भी जाता है कि अमिताभ बच्चन की ब्लॉकबस्टर फिल्म जंजीर में अमिताभ प्रांत द्वारा निभाए गए प्रसिद्ध किरदार शेर खान असली जिंदगी के डॉन करीम लाला से काफी प्रेरित था। उस वक्त करीम लाला जैसे नाम मुंबई की कहानियों का हिस्सा बन चुके थे। उस दौर में फिल्मी दुनिया और अंडरवर के बीच की रेखा कभी-कभी इतनी धुंधली थी कि असली कहानी और अफवाह में फर्क करना मुश्किल था। यही वजह है कि पुरानी मुंबई के ये किस्से आज भी रहस्य, रोमांच और बहस का हिस्सा बने। पर कहते हैं ना हर कहानी का अंत भी आता है। वही हुआ उम्र करीम पर असर दिखाने लगी। 1980 के दशक के मध्य तक उसने खुद को पीछे करना शुरू किया। वो कहने लगा अब मैं रिटायर हो चुका हूं। लेकिन उसकी गैंग सक्रिय थी। लोग दबी जुबान में यह भी कहते हैं कि डोंगरी में एक जेब भी लाला की मर्जी के बिना नहीं कटती थी। आखिरकार उसने हिंसा खत्म करने की कोशिश की। सितंबर 1987 में वो मक्का पहुंचा और दाऊद से मिला। करीम ने उसे गले लगाकर कहा, बहुत खून बह चुका।

अब मुझे शांति से मरने दो। समय बीतता गया। एक समय महंगी शराब और ऑबदार जिंदगी जीने वाला करीम सादा जीवन पसंद करने लगा। उसने अपने पुराने घर को कभी नहीं छोड़ा। और फिर आया 18 फरवरी 2002। जिस आदमी ने मुंबई की गलियों पर दशकों तक राज किया जिसे गोलियां नहीं रोक सकी, पुलिस नहीं रोक सकी, दुश्मन नहीं रोक सके, उसका अंत किसी गैंग हुआ और बदले या षड्यंत्र में नहीं हुआ। सीने में अचानक दर्द उठा। मुंबई के पहले डॉन की कहानी हमेशा के लिए खत्म हो गई। आज भी मुंबई की पुरानी गलियों में एक किस्सा खुसफुसाया जाता है। एक दौर था जब सिर्फ आदमी नहीं उसकी छड़ी राज करती थी। वैसे करीम लाला की मौत के कई सालों बाद एक तस्वीर बहुत वायरल हुई जिसमें वो इंदिरा गांधी से बात करते हुए दिखाया गया। इस तस्वीर में उसके साथ हरिंद्र चट्टोपाध्याय भी खड़े थे। चट्टोपाध्याय स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी सरोजनी नायडू के भाई थे। बाद में पत्रकार बलजीत परमार ने लिखा कि करीम लाला ने ही उन्हें बताया था कि वह कभी भी राष्ट्रपति भवन गए ही नहीं थे। इसलिए जब सन 1973 में हरिनाथ को पद्म पुरस्कार मिला तो उसने उनके साथ राष्ट्रपति भवन जाने की इच्छा प्रकट की। वहां हरिनाथ ने यह कहकर इंदिरा गांधी से उसकी मुलाकात करवाई कि वह मुंबई में पठानों के नेता हैं। यह करीम और इंदिरा गांधी की मुलाकात की पहली और आखिरी तस्वीर थी। करीम लाला सिर्फ डॉन नहीं था। वो एक दौर था। मुंबई की गलियों में उसका नाम कानून से पहले लिया जाता था। कहते हैं लोग उससे नहीं उसकी छड़ी से डरते थे। वक्त गुजर गया। लोग बदल गए लेकिन मुंबई की पुरानी हवाओं में आज भी एक नाम अभी भी गूंजता है। करीम लाला मुंबई का पहला अंडरवर टॉम [संगीत]

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