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आडवाणी ने अटलजी की बात मानी होती तो पीएम नहीं बन पाते मोदी!

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नमस्कार आज के 21 साल पहले अगर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई की राय लालकृष्ण आडवानी ने मान ली होती तो आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिस पद पर हैं ना जाने उनका क्या होता आपको लग रहा होगा यह बात मैंने क्यों कही तो मैं आपको थोड़ा फ्लैशबैक में किस्से कहानियों के माध्यम से बताने की कोशिश करता हूं दरअसल आज पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई की जन्मतिथि है और इस जन्म तिथि के मौके पर उनसे जुड़े कुछ रोचक किस्स कहानियां लेकर के मैं हाजिर हूं आमतौर पर जब भी बड़े हस्ती का जन्मदिन या पुण्यतिथि होती है तो मेरी कोशिश होती है कि मैं आपको ऐसे किस्स कहानियां सुनाऊं जो आपके लिए थोड़ा रोचक भी हो और थोड़ा आपको आनंद भी दे तो बात यह है कि आज के 21 साल पहले 2002 दो के अप्रैल महीने के दूसरे हफ्ते में गोवा में भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारणी की बैठक होनी थी उस बैठक से पहले जो गोधरा में हुआ जो अहमदाबाद में हुआ और जो गुजरात दंगे जिनको कहा जाता है उसकी वजह से बीजेपी की जो किरकिरी हुई थी गुजरात सरकार की जो किरकिरी हुई थी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का जो जो एक धब्बा लगा था उन दंगों की वजह से उसकी वजह से अटल बिहारी वाजपेई बहुत चिंतित रहा करते थे बहुत उदास बहुत परेशान रहा करते थे और उन्होंने बयान भी दिया था मैं किस मुंह से जब वह शरणार्थियों से मिलने गए थे एक कैंप में गुजरात में तो उन्होंने कहा था कि इससे ज्यादा दिल को चीर देने वाली बात कोई नहीं हो सकती कि आप अपने देश में ही शरणार्थी हैं

उस समय 8000 मुस्लिम परिवार जो 8000 मुस्लिम शरणार्थी कैंपों में रह रहे थे तब उन्होंने कहा था कि मैं किस देश से विदेश किस मुंह से विदेश जाऊंगा या दुनिया को मुह दिखाऊंगा तोव बहुत चिंतित रहा करते थे तो राष्ट्रीय कार्यकारणी की बैठक में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई जब जाने के लिए तैयार थे तब उन्होंने लालकृष्ण आडवाणी को संदेशा भिजवाया कि उनके विशेष विमान में आडवानी जी भी उनके साथ गोवा की का सफर तय करें आडवाणी जी ने हामी भर दी एयरपोर्ट पर जसवंत सिंह और अरुण शौरी जो आईटी मिनिस्टर थे उस वक्त विदेश मंत्री थे जसवंत सिंह चार के चार लोग एक विशेष विमान में सवार हुए चर्चा चल पड़ी गुजरात की चर्चा होनी थी और उस पूरे राष्ट्रीय कार्यकारणी की बैठक में गुजरात का मुद्दा आने वाला था छाने वाला था चर्चा होने लगी चर्चा के बीच में जसवंत सिंह ने कहा कि अटल जी आप आप इस पर क्या सोचते हैं आपका क्या सोचना है अटल जी ने बिना देरी किए उन्होंने कहा कि कम से कम उन्हें इस्तीफा ऑफर तो करना चाहिए था उनका इशारा नरेंद्र मोदी की तरफ था नरेंद्र मोदी को एक साल से कुछ ही समय ज्यादा हुआ था जब उत्तर प्रदेश के जब वह गुजरात के मुख्यमंत्री बने थे आडवानी जी भी वहां पर थे अटल जी की इस बात से असहमत होते हुए आडवाणी जी ने कहा कि मैं ऐसा नहीं मानता नरेंद्र मोदी ने अपने दायित्व का निर्वाह किया है और ऐसे समय में उनको हटाया जाना ठीक नहीं रहेगा उन्होंने कहा कि मैंने अहमदाबाद और गुजरात के बहुत सारे लोगों से बात की है उनकी सरकार और नरेंद्र मोदी की भूमिका अभी उनको एक साल मुख्यमंत्री हुआ उनकी भूमिका ठीक रही है इससे गलत संदेश जाएगा आमतौर पर अटल जी और आडवाणी जी के बारे में आप जानते हैं कि उनका ऐसा पिछले 50 वर्षों में भारत की राजनीति में बरले ही दो व्यक्तियों के बीच में ऐसा संबंध रहा हो पूरी दुनिया की राजनीति में जैसा अटल जी और आडवाणी जी का था आमतौर पर एक दूसरे के मुंह के सामने वो कभी भी विरोध नहीं करते थे लेकिन उस जहाज में चर्चा इसी बात की होनी थी और गोवा में जहाज लैंड करने वाला था और फैसला होने वाला था

कि नरेंद्र मोदी के भविष्य के साथ क्या होगा और अटल आडवाणी और उसी बैठक में फैसला होना था आडवाणी जी उस समय पार्टी में प्रभावी तौर पर अटल जी से ज्यादा प्रभाव उनका देखा जाता था और एड आडवानी कैंप के में ज्यादा ताकतवर लोग थे आडवाणी जी गुजरात से सांसद भी थे उनका नरेंद्र मोदी से अपना एक लगाव भी था उन्होंने नरेंद्र मोदी का उस यात्रा में पूरा बचाव किया लेकिन अटल जी की मंशा को भांपते हुए वह जब गोवा की राष्ट्रीय कार्यकारणी में गए तो उन्होंने नरेंद्र मोदी से कहा कि आप इस्तीफा ऑफर कर दीजिए राष्ट्रीय कारखाने की बैठक हुई नरेंद्र मोदी ने बतौर मुख्यमंत्री गुजरात उस पूरी बैठक में राष्ट्रीय कार्यकारणी की बैठक में गोधरा के किस से गोधरा में किस तरह से ट्रेन पर हमला हुआ वहां पर किस तरह से लोगों की जाने गई और उसके रिएक्शन में गुजरात के अलग-अलग जगह कैसे दंगे हुए और क्या-क्या राज्य सरकार की व्यवस्था हुई कैसे राज्य सरकार ने कामकाज किया क्या अब वहां पर स्थिति है क्या उसका परिणाम दुष्परिणाम सामने आया ये सारे बातें नरेंद्र मोदी ने बताई और भाषण देने के अंत में उन्होंने कहा कि राज्य का प्रमुख होने के नाते मैं जो है अपने पद त्याग की की प त्या का पेशकश करता हूं इतना उनके कहते ही चूंकि आडवाणी जी के लोग वहां पर ज्यादा थे और आडवाणी जी बिल्कुल नहीं चाहते थे कि नरेंद्र मोदी पद से हटे इस बात का संकेत उन्होंने बहुत लोगों को दिया था तो इसलिए वहां राष्ट्रीय कार्यकारणी की बैठक में नरेंद्र मोदी ने जैसे ही अपने इस्तीफे की पेशकश की पार्टी के भीतर तुरंत विरोध हो गया इस्तीफा मत दो इस्तीफा मत दो इस्तीफा मत दो नरेंद्र मोदी बने रहो इस्तीफा मत दो बाद में प्रमोद महाजन जैसे नेताओं ने कहा सरेआम अटल जी के सामने कहा उन लोगों ने कि इसका तो सवाल ही नहीं उठता और इस तरीके से नरेंद्र मोदी अपने पद से इस्तीफा ना दे सके और आडवानी जी ने उन्हों पद से इस्तीफा देने के बजाय अटल जी की मंशा के विपरीत जाकर पार्टी में अपने ताकत का इस्तेमाल कह लीजिए या नरेंद्र मोदी का साथ देकर उन्हें उस वक्त बचा लिया और उसके बाद की कहानी तो इतिहास है नरेंद्र मोदी ने उसके बाद 27 का चुनाव दो का चुनाव कैसे जीता 13 12 का चुनाव कैसे जीता और 12 का चुनाव जीतने के बाद वो 13 में भारत के प्रधानमंत्री पद के बीजेपी के उम्मीदवार कैसे बने और फिर लालक स् आडवानी ने उसी नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनने में कितने राह रोड़े हटकाए और फिर दोनों में किस तरह का संबंध हो गया कि आज मार्गदर्शक मंडल में आडवाणी जी ना जाने कब से हैं और उस मार्गदर्शक मंडल की आज तक एक बैठक नहीं हुई मैंने यह जो आपको किस्सा सुनाया यह आडवाणी जी ने अपनी ऑटोबायोग्राफी अपनी आत्मकथा में लिखा है जिस किताब का नाम है माय कंट्री माय लाइफ मेरा देश मेरा जीवन तो यह किस्सा मैंने

आपसे हू बहू वहां से उठाया है और आपको सुनाया अब कुछ और किस्से अटल जी के बारे में मजेदार मैं आपको सुनाता हूं असल में अटल जी इतनी उदार व्यक्तित्व के आदमी थे आज पुण्य तिथि पर बार उन्हें मैं सादर नमन करता हूं इस देश में जिन नेताओं ने अपने अपनी पर्सनालिटी से अपनी सोच से अपनी वाणी से अपने विचारों से पूरे देशवासियों को झंकृत किया है और जिनका आदर और सम्मान पाया है उसमें अटल जी सिरमोर है अटल जी जैसा आज तक ऐसा बहुत लोगों का मानना है लेकिन जितने वीडियो मैंने देखें और जितने नेताओं को मैंने सुना है पिछले 35 सालों 30 35 सालों में संसद में रूबरू होकर उसमें अटल जी से अच्छा वक्ता संसद में आज तक कोई नहीं हुआ और जब वो 1957 में जीत कर आए थे उन्होंने जब भाषण दिया था पिछली पंक्ति से तब के प्रधानमंत्री ने भी उनके भाषण की कला से प्रभावित होकर कहा था कि एक ना एक दिन यह यह व्यक्ति यह नौजवान भारत का प्रधानमंत्री बनेगा लालू यादव का आप वीडियो देखते होंगे उन्होंने मजाक में अटल जी को कहा कि नेहरू जी ने तो आपको एक बार कहा था अब आप दोदो बन चुके अब तो पिंड छोड़िए तो यह किस्सा है तो मैं कह रहा था अटल जी का व्यक्तित्व और उनसे कुछ जुड़े रोचक कि से आपको और भी सुना देता हूं अटल जी का आरएसएस के साथ बड़ा ऊपर नीचे का रिश्ता होता था कभी आरएसएस की बातों को मानते थे कभी वह उन्होंने आरएसएस को एक बार ये ताकीद भीती थी कि कई बार हमको सत्ता में बने रहने के लिए राजनीतिक दलों को जमीन की परिस्थितियों के हिसाब से अपनी विचारधारा में भी परिवर्तन करना चाहिए बहुत बार वो ऐसी सीख देते थे राम मंदिर मुद्दे पर भी उनका स्टैंड पहले कुछ और था फिर बाद में कुछ और हुआ तो आरएसएस से उनका इस तरह का रिश्ता था आरएसएस की पसंद आडवानी थे दुनिया जानती और इसके बाद हुआ यह कि 2002 में जब अटल जी अपने प्रधानमंत्री काल का कार्यकाल पूरा करने में दो साल बाकी थे 2004 में चुनाव हुआ था 2002 में मसला आया कि राष्ट्रपति पद का चुनाव होगा तो किसको सर्वसम्मति का राष्ट्रपति पद बनाया जा पीसी अलेक्जेंडर को लाल की आडवानी चाहते थे उनका नाम आगे किया उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी में उनके बहुत अच्छे रिश्ते रहे हैं कांग्रेस पार्टी सपोर्ट कर देगी पीसी अलेक्जेंडर को राष्ट्रपति आडवाणी जी का नाम था वोह एनडीए की बैठक हुई उनके नाम देने की वजह से सर्वसम्मति से तय भी भी हो गया लेकिन कांग्रेस पार्टी की तरफ से ही विरोध के स्वर उठ गए इसलिए पीसी अलेक्जेंडर का नाम सत्ता पक्ष यानी एनडीए को वापस लेना पड़ा विचार होने लगा कि किसका किससे फिर एनडीए ने प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई को अधिकृत कर दिया कि वो जिसको चाहे मुख्य राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित कर सकते हैं

ऐसे में मुलायम सिंह यादव ने एपीजे अब्दुल कलाम का नाम आगे किया था जिस पर कि सारे लोगों की सहमति बन गई लेकिन इस बीच एक मजेदार घटना घटी आरएसएस प्रमुख रजू भैया वो दिल्ली के दौरे पर थे उन्होंने रात आडवानी जी को फोन किया आडवानी जी ने उनसे कहा कि आप सुबह नाश्ते पर हमारे घर आइए रजू भैया उनके घर गए तो रजू भैया ने लालकृष्ण आडवानी से सुबह के नाश्ते पर कहा कि आपसे मिलने से पहले मैं अटल जी से मिलकर के आया हूं और मेरी बातचीत का मसला जो है राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार का नाम था आडवानी जी ने रज्जू भैया से पूछा कि किसके नाम पर आप किसका नाम देना चाहते हैं उन्होंने कहा मैंने अटल जी से कहा कि अब आप खुद ही राष्ट्रपति बन जाइए और अटल जी को उनको स्वास्थ्य में भी दिक्कत है घुटनों में परेशानी है और उनसे ज्यादा उप राष्ट्रपति पद को सुशोभित करने वाला कोई व्यक्ति नहीं हो आडवानी जी बहुत हैरत में पड़ गए उन्होंने कहा अटल जी ने क्या जवाब दिया उन्होंने कहा अटल जी ने तो कोई जवाब नहीं दिया ह हां करते रहे उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया आडवाणी जी ने कहा कि ऐसा नहीं हो सकता है अभी कल ही सारे राजनीतिक दलों की बैठक हुई है और एनडीए ने और सारे दलों ने एक तरह से अटल जी को अधिकृत किया है कि वह राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार किसी को भी तय कर सकते हैं तो ऐसा नहीं हो सकता यानी संघ ने प्रधानमंत्री रहते हुए अटल बिहारी वाजपेई को एक बार राष्ट्रपति बनाने की पेशकश की थी वो तो आडवानी जी ने अपनी अपना ना कौशल इस्तेमाल किया और यह टकराव होते होते बचा और ऐसी बात नहीं यह भी किस्सा आडवाणी जी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है अब दूसरी बात यह है कि मैं आपको कुछ किस्से और बताता हूं अटल जी की पर्सनालिटी से जुड़ा एक किस्सा यह है कि आज के दौर में आप देखते हैं किस तरीके से विपक्ष के नेताओं को खास कर के गांधी और नेहरू को लेकर के आज का भारतीय जनता पार्टी का जो कार्यकर्ता है नेता किस तरह के शब्दों की बात करता है अटल जी इस मामले में बहुत उदार थे विपक्षी दलों के बारे में विपक्षी नेताओं के बारे में जो उनका आदर था जो जो हालांकि विपक्ष में रहते उनको सत्ता पक्ष की तरफ से भी बहुत आदर मिला था टकराव होते रहते थे लेकिन आप समझिए 1993 की बात है शिवराज पाटिल लोकसभा के अध्यक्ष थे नजमा हेपतुल्ला राज्यसभा की उपसभापति थी और महात्मा गांधी की मूर्ति को लगाने का फैसला हुआ संसद जो पुरानी संसद है अब उसके गेट नंबर एक के सामने वो जो जगह निर्धारित की गई राम सुतार जो कि मूर्ति बनाते हैं वो मूर्ति उन्होंने बनाई थी

तो उसकी जगह कहां हो इसके लिए पीवी नरसिंहा राव ने और शिवराज पाटिल ने अटल जी से कहा कि नजमा हेपतुल्ला और अटल जी ही आपस में तय कर ले विपक्ष के नेता थे अटल जी ही तय कर ले कि महात्मा गांधी की मूर्ति कहां लगी महात्मा गांधी की मूर्ति जहां लगने वाली थी अटल जी का यह कहना था कि इसको और ऊंचाई पर रखा जाना चाहिए लेकिन उनकी उस बात को इसलिए नहीं माना गया कि जो अंदर से गेट से जो सामने की तरफ जो दृश्य आ रहा था उसको ऊपर रखने पर गांधी जी की मूर्ति कट जा रही थी तो उसे नीचे ही रखा गया उसे जब नीचे रखा गया तो अटल जी ने कहा कि यह जैसी मूर्ति और गांधी जी की मूर्ति के पीछे जो व्यवस्था होनी चाहिए उसके के लिए बाउंड्री वाल को डी शेप में किया जाए अटल जी के इस प्रस्ताव पर आज भी आप भारतीय पुरानी संसद में जाएंगे जहां आज आप देखते हैं संसद गांधी मूर्ति के सामने सांसद धरना प्रदर्शन करते हैं विरोधी पक्ष के हमेशा से वो मूर्ति जहां लगी और वो जो डी शेप बना है वो अटल जी के प्रस्ताव पर बना था और नरसिंहा राव की सरकार थी शिवराज पाटिल लोकसभा अध्यक्ष थे अटल जी ने कहा कि मूर्ति अगर ऐसी लग गई है तो इसको और भव्यता तभी मिलेगी जब इसके पीछे की बाउंड्री वाल जो है उसको कर्व कर दिया जाए थोड़ा बैकग्राउंड दिखाई दे इस तरह की उनकी सोच थी एक 16 फीट की प्रतिमा नेहरू जी की जो आप देखते हैं संसद में फोटो आपने देखा होगा गेट नंबर वन का जो अंदर का लॉन है उसके चौराहे पर लगी हुई है उस मूर्ति को लगाने में भी अटल जी ने अपनी राय दी थी और नेहरू जी की वह मूर्ति नीचे देखते हुए है

अटल जी ने मूर्ति लगाने वालों से कहा कि उसको ऊंचाई पर लगाओगे तो जो नीचे से गुजरेगा उसे लगेगा कि नेहरू जी उसे देख रहे हैं थोड़ा इस तरह का लगाया जाना चाहिए उनके प्रस्ताव पर बांस और तमाम तमाम चीजें ले आई गई और फिर मूर्ति को ऐसे लगाया गया हालांकि उतनी ऊंचाई पर नहीं लगाया गया जितनी अटल जी का कहना था लेकिन उस पर लगाया गया तो ऐसा भाव उनका था आज जाटों को लेकर के राजनीति हो रही है आज जाट समाज का अपमान आप समझ नहीं सकते आप इस बात का अंदाजा नहीं लगा सकते कि भारतीय जनसंघ का कितना विरोध पश्चिमी उत्तर प्रदेश और जाटों में था जब चौधरी चरण सिंह थे कोई भी भारतीय जनसंघ का नेता वहां पर जनसभा करने के लिए जल्दी तैयार नहीं होता था अटल जी ने तय किया कि वह बागपत में जनसभा कर और बागपत में जनसभा करने के लिए पहले तो फील्ड ही नहीं मिल रहा था मैदान ही नहीं मिल रहा था जब अटल जी वहां पर गए और जनसभा करना शुरू किया तो वहां पर लोग काले झंडे दिखा कर के जाट समाज के लोग काले झंडे लेकर के हर तरफ से घेर लिया अटल जी ने माइक पकड़ी और माइक पकड़ते उन्होंने कहा कि जब हमारे यहां सुंदर बच्चा होता है तो उसको नजर ना लग जाए तो काला टीका लगाते हैं यह काले झंडे भी मेरे लिए काले टीके के बराबर है जो लोग झंडा लेकर आए थे वो झंडा लेकर बैठ गए और अटल जी की की बातों को सुनने लग गए 1957 में बलरामपुर से यूपी के बलरामपुर से लोकसभा चुनाव जीतने के बाद अटल जी जब लोकसभा सांसद के रूप में उनको पहली तनख्वा मिली थी तो संसद मार्ग पर अपने दोस्त जेपी माथुर के साथ टहलते हुए वो सीपी तक आए वो इतने ज्यादा खुश थे और इतने खाने खिलाने के शौकीन थे कि माथुर साहब के साथ वो जाकर के दोष खाए डोसा खाने के बाद कॉफी पी कॉफी पीने के बाद जो खादी आश्रम वहां का है वहां जाकर के उन्होंने दो जोड़ी उनके लिए कपड़े खरीदे वह हमेशा अपने सहयोगियों के लिए

और आज के दौर के नेताओं की तरह शो ऑफ करने का उनका कभी नेचर नहीं था एक बार चंदे के तौर पर एक मोटी रकम अटल जी को किसी ने दे दी उस थैले पर उन्होंने सीधे लखनऊ लिख कर के छोड़ दिया कि ये लखनऊ चला जा उसको हाथ भी नहीं लगाया और अपने जो लोग उनका काम धाम देखते थे उनको दे दिया जहां तक अपने पारिवारिक सदस्यों का साथ देने की बात है बाद के दिनों में रंजन भट्टाचार्य उनके दत्तक पुत्री के जो पति हैं उनको लेकर के अटल जी पर सवाल बहुत उठाए गए बाद के दिनों में उनके प्रधानमंत्री रहते रंजन भट्टाचार्य पर और उनकी काफी पीएमओ में तूती भी बोलती थी लेकिन अटल जी ने अपने शुरुआती दिनों से लेकर और बहुत बाद तक अपने किसी पारिवारिक सदस्य को नजदीक फटकने नहीं दिया उनके तमाम कि से कहानियां है मैं उनके परिवार के कई सदस्य उनकी बहन कमला जी से मिलने एक बार आगरा गया था और उन्होंने मुझे बहुत सारी कहानियां बताई थी मैंने कई बार इसके पहले के वीडियो में कुछ-कुछ बातें बताई है वो बताती थी कि अटल जी को मिठाई से इतना प्यार था और बचपन में ही कि ग्वालियर में जब वो लोग उनकी मां गुझिया देती थी अक्सर से अब गांव में भी प्रचलन य खत्म ही हो रहा है लेकिन पहले ऐसा होता था कि त्यौहारों के मौके पर एक दूसरे को मिठाइयां भेजते थे तो अटल जी के के परिवार में जब मिठाइयां आती थी तो होता यह है कि अगर दो गुझिया किसी ने भिजवाई तो जब आप उसका बर्तन भेजते तो चार गुझिया उसको दूना करके भेजते अटिल जी छोटे थे कमला जी उनसे छोटी थी वह बताती थी उन्होंने मुझे बताया है मैं उनसे गया था एक बार मिलने बहुत साल पहले अटल जी पर डॉक्यूमेंट्री बना रहा था तो उन्होंने बताया कि जब मैं जब हम लोग निकलते थे

तो अम्मा गुझिया देती थी तीन घरों में जाते थे तो अटल जी घर से निकलते ही बोलते थे खाएगी मैं कह नहीं भैया नहीं नहीं नहीं मैं नहीं खाऊंगी उनको देना बोले वो थोड़ी आके मां से पूछेंगे कि कितनी गुजिया द दी आधा खाएगी तो वह एक मिठाई निकालते थे उसमें से आधा कमला को देते थे और फिर आधा अपने खाते थे कमला को इसलिए देते थे बाद में उन्होंने बताया कमला को मैं तुम्हें इसलिए खिलाता था तुम मां से आके तुम ही ना कह दो तो इस तरह के बचपन से ही थे शुरुआती दौर में व कम्युनिस्ट भी थे आपको मता है और उनके बहुत सारे किस्से हैं कितना सुनाऊ कमला जी बताती थी वो छ बहुत छोटी थी तो उनकी शादी हो गई थी उनको विदा कराने के लिए अटल जी आए तो वो जो ट्रेन थी उसमें लेडीज कंपार्टमेंट लेडीज का डिब्बा ही अलग था जेंट्स का डिब्बा अलग था तो जब ससुराल से विदा करा कर के माइकेल ले आने का काम अटल जी को था अटल जी सारा मिठाई और डिब्बा जो जो चीज विदाई में मिली थी वह सब लेकर खाने वाला सामान अपने साथ बैठ गए और जो लगेज था वो अपनी बहन के साथ लेकर बैठ गए और पूरे रास्ते खाते आए वो बेचारी सामान के लिए तो किसी पहले स्टॉपेज प या दूसरे स्टॉपेज पर उतर के पूछने भी नहीं ग जब सफर लंबा कटा तब उतर के एक बार पूछने गए तो कमला जी इनको देख के ही रोने लगी क भैया सब खा गए और मुझे कुछ भी नहीं दिया तो इस तरीके के अटल जी थे उनकी बहुत सारी कहानियां मैं आपको सुना सकता हूं आज के दिन मैंने सोचा कुछ जो जो याद आ रहा है उनकी जन्म तिथि है तो पूर्व प्रधानमंत्री के बारे में कुछ रोचक किस्से आपको सुनाऊं आज बस इतना ही

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