क्या आप जानते हैं कि आज अगर भारत के हर मिडिल क्लास परिवार के घर के सामने एक कार खड़ी है तो उसके पीछे किसी हिंदुस्तानी का नहीं बल्कि सात समंदर पार बैठे एक जापानी इंसान का हाथ है। जब दुनिया की बड़ी-बड़ी कंपनियों ने हमारी औकात पर सवाल उठाते हुए कह दिया था कि इंडिया के लोग बहुत गरीब हैं। वो कार कभी अफोर्ड नहीं कर सकते। तब इस एक अकेले शख्स ने भारत की मिट्टी और हमारे सामर्थ्य पर भरोसा किया। इन्होंने हमें सिर्फ एक लोहे की गाड़ी नहीं दी। इन्होंने हर भारतीय कोबंद आंखों से खुले आसमान के सपने देखना सिखाया।
यह कहानी है उस महान शख्स की जिन्होंने भारत को अपना दूसरा घर माना और बदले में भारत ने उन्हें दिया अपना सबसे बड़ा नागरिक सम्मान पद्मविभूषण। लेकिन इस कहानी की असली शुरुआत दुनिया के उस करारे धोखे से होती है जिसने हर हिंदुस्तानी के आत्मसम्मान को झकझोर कर रख दिया था। चलिए सीधे इतिहास की फाइलोंको फाड़ कर सच बाहर निकालते हैं। बात 1980 के दशक की है।
भारत सरकार देश के आम और मिडिल क्लास लोगों के लिए एक बेहद सस्ता और सुरक्षित पीपल्स कार प्रोजेक्ट शुरू करना चाहती थी। सरकार चाहती थी कि हमारे देश का आम नागरिक भी सम्मान के साथ चार महीनों पर चले। इसके लिए भारत सरकार ने अपनी झोली फहलाकर जर्मनी की Folkswagen से लेकर यूरोप और अमेरिका के बड़े-बड़े ऑटोमोबाइल दिग्गजों के दरवाजे खटखटाए। लेकिन जानते हैं ।
हम बोरे साहब ने हमारे दिस प्रपोजल इज क्वाइट अनएक्सेप्टेबल। वी कैन नॉट एक्सेप्ट दिसटर्म्स। आई एम सॉरी बट दैट इज सिंपली। उन्होंने भारत के इस प्रस्ताव को लात मार दी।हमारी औकात का सरेआम मजाक उड़ाया। उन विदेशी कंपनियों का सीधा और कड़वा बयान था कि इंडिया एक बेहद गरीब भुखमरी से जूझ रहा देश है। वहां का मिडिल क्लास कभी कार खरीदने की हैसियत ही नहीं रख सकता।
वहां फैक्ट्री लगाना अपने अरबों डॉलर नाले में फेंकने जैसा है। पूरी दुनिया ने भारत को रिजेक्ट करके अकेला छोड़ दिया था। लेकिन तभी इस गहरे अंधकार के बीच एंट्री होती है जापान की एक कंपनी के उस जांबाज चीफ की जिसका नाम अभी पूरी दुनियाके लिए अनजान था।
जहां पूरी दुनिया को भारत में सिर्फ कंगाली दिख रही थी, वहां इस जापानी शेर को भारत के मिडिल क्लास की वो छिपी हुई ताकत दिख रही थी, जो इतिहास बदलने का दम रखती थी। उसने बिना एक सेकंड गवाए दुनिया के उन बड़े घमंडी देशों को चुनौती दी और भारत सरकार का हाथ थाम लिया। उसने अपनी पूरी कंपनी की साख, अपनी प्रतिष्ठा और अपने पूरे 1 साल की गाढ़ी कमाई
भारत के इस प्रोजेक्ट पर दांव पर लगा दी। यह एक ऐसा जुआ था कि अगर यह प्रोजेक्ट फेल होता, तो वह जापानी कंपनी हमेशा हमेशा के लिए दिवालिया हो जाती। लेकिन उस शख्स ने पूरी दुनिया के मुंह पर तमाचा मारते हुए कहा था इंडिया सोया नहीं है। इंडिया बस जागने का इंतजार कर रहा है और मैं इसे जगा कर रहूंगा। और दोस्तों अब वक्त आ चुका है उस रहस्यमई नाम को रिवील करने का। वो जापानी शेर कोई और नहीं बल्कि Suzuki मोटर्स के चीफ ओसा Suzuki थे। और उनके इसी विज़न से जन्म हुआ भारत की सबसे बड़ी लेजेंड कार Maruti 800 का। लेकिन ओसामू Suzuki भारत के लिए कैसी गाड़ी बनाना चाहते थे? भारत आने के बाद वह किसी फाइव स्टार होटल के एसी कमरे में नहीं बैठे। हमारे देश के आम लोगों के असली दर्द को समझने के लिए वो दिल्ली की तपती सड़कों पर एक साधारण साइकिल रिक्शा में सवार हो गए। अचानक दिल्ली में मूसलाधार बारिश होने लगी।
तभी उनकी नजर सामने सड़क पर जा रहे एक स्कूटर पर पड़ी। उस पुराने स्कूटर पर एक मिडिल क्लास आदमी, उसकी पत्नी और दो छोटे मासूम बच्चे बैठे थे। वो पूरा परिवार उस तूफानी बारिश में भीग रहा था। बच्चे ठंड से कांप रहे थे और भारी ट्रैफिक के बीच वो स्कूटर कभी भी फिसल सकता था।
उस एक दृश्य ने इस जापानी अरबपति के दिल को अंदर तक झकझोड़ दिया। उन्होंने रिक्शा पर बैठे-बैठे ही कसम खाई। मुझे इस देश के लिए एक ऐसी गाड़ी बनानी है जो एक स्कूटर की कीमत में आ सके लेकिन बंद दरवाजे के भीतर इस पूरे परिवार को महफूज़ रख सके। यही वो ग्राउंड लेवल सोच थी जिसने भारत की तकदीर बदली। अब सोचिए एक विदेशी इंसान के दिल में भारत के मिडिल क्लास के लिए इतनी हमदर्दी क्यों थी? क्योंकि ओसामो सुजुकी कोई पैदाइशी करोड़पति नहीं थे। उनका बचपन दूसरे विश्व के बाद के उस तबाह हो चुके जापान में बीता था, जहां चारों तरफ सिर्फ भुखमरी और कंगाली थी।
उन्होंने बेहद गरीबी को बहुत करीब से देखा था। शायद यही वजह थी कि जब वो Suzuki कंपनी के सबसे बड़े [संगीत] बॉस बने, तब भी उनके पैर हमेशा जमीन पर टिके रहे। अरबों डॉलर की कंपनी का मालिक होने के बावजूद वो हमेशा फ्लाइट की इकॉनमी क्लास में आम पैसेंजर्स के साथ बैठते थे।
वह अपनी फैक्ट्री का चक्कर लगाते समय खुद अपने हाथों से फालतू चल रहे लाइट और पंखे बंद करते थे ताकि एक-एक पैसा बचाया जा सके। वह कहते थे कि बचाया हुआ एक-एक पैसा गाड़ी की लागत कम करेगा और उसे भारत के गरीबों के बजट में लाएगा। इसी साधारण सोच की वजह से वो भारत को दुनिया की सबसे किफायती कार दे पाए। और आखिरकार 14 दिसंबर 1983 को जब देश की पहली Maruti 800 एक साधारण कर्मचारी मिस्टर हरपाल सिंह को सौंपी गई तो पूरी दुनिया का घमंड नेस्तनाबूद हो गया। जैसे ही यह गाड़ी भारत की सड़कों पर उतरी, विदेशी कार मेकर्स के पैरों तले जमीन खिसक गई।
जो विदेशी कंपनियां कहती थी कि भारत कार नहीं खरीद सकता, Maruti की बंपर सेल देखकर उनके होश उड़ गए। बुकिंग की लाइनें महीनों लंबी होने लगी। जिन गोरे साहबों ने भारत का मजाक उड़ाया था, वे अपना सिर पकड़ कर बैठ गए। और असली बदला तो आज पूरा हो रहा है। जो विदेशी कंपनियां कभी भारत को हेट करती थी आज वही कंपनियां भारत के इस विशाल मार्केट में अपनी कारें लॉन्च करने के लिए दिन रात गिड़गिड़ा रही हैं। बेताब बैठी हैं।
आज अमेरिकी टेस्ला से लेकर यूरोप के बड़े-बड़े [संगीत] ब्रांड्स भारत सरकार के सामने हाथ जोड़कर खड़े हैं कि हमें भारत में बिजनेस करने की इजाजत दे दो। ओसामू Suzuki और Maruti ने मिलकर पूरी दुनिया के मुंह पर तमाचा मारते हुए साबित कर दिया कि भारत को हल्के में लेने की भूल कभी मत करना। 94 साल की लंबी और गौरवशाली उम्र जीने के बाद ओसामो Suzuki ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।
लेकिन वह जाते-जाते भी कह गए थे कि जापान मेरी जन्मभूमि भले हो लेकिन भारत मेरा दूसरा घर है। भारत के ट्रांसपोर्ट सिस्टम को पूरी तरह बदलने के उनके इसी योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत देश के [संगीत] सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया। आज Oसा Suzuki हमारे बीच नहीं है। लेकिन आज भी जब भारत की किसी भी सड़क से कोई कार गुजरती है तो उसमें उनकी वो रिक्शा वाली सोच साफ दिखाई देती है। सलाम है इस महान जापानी आत्मा को जिसने भारत का मान बढ़ाया।