एक बच्चे की जिद और सैकड़ों यात्रियों की उड़ान 24 घंटे के लिए रुक गई। मामला इतना छोटा था कि शायद किसी घर में इसे कुछ मिनटों में सुलझा लिया जाता। लेकिन जगह थी विमान और विमान भी उड़ान भरने के लिए तैयार था। सीट पर एक बच्चा बैठा था लेकिन वह सीट बेल्ट लगाने को तैयार नहीं था। माता-पिता ने उसे समझाया। उसे विमान के क्रू ने भी समझाया।
काफी कोशिश हुई लेकिन बच्चा अपनी जिद पर अड़ा रहा और फिर जो हुआ उसने एक पूरी फ्लाइट के यात्रियों का सफर लगभग एक दिन आगे खिसका दिया। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि बच्चा सीट बेल्ट क्यों नहीं लगा रहा था? सवाल यह भी है कि एक बच्चे की ज़िद के सामने माता-पिता और एयरलाइन क्रू की स्थिति आखिर इतनी मुश्किल क्यों हो गई कि सैकड़ों यात्रियों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा।
6 अगस्त को कनाडा के विक्टोरिया इंटरनेशनल एयरपोर्ट से टोरेंटो जाने वाली पोर्टर एयरलाइंस की फ्लाइट पीडी4 उड़ान भरने के लिए तैयार थी। यात्री विमान में बैठ चुके थे। विमान रणवे की तरफ बढ़ने वाला था। लेकिन तभी क्रू की नजर एक बच्चे पर गई। बच्चे ने सीट बेल्ट नहीं लगाया था। अब यहां मामला सिर्फ एक बच्चे की जिद करने का नहीं था। विमान में सीट बेल्ट कोई वैकल्पिक चीज नहीं है। टेक ऑफ से पहले हर यात्री को सुरक्षा नियमों का पालन करना होता है। क्रू ने बच्चे को सीट बेल्ट लगाने के लिए मनाने की कोशिश की। उसके माता-पिता ने भी कोशिश की। लेकिन बच्चा तैयार नहीं हुआ। यानी विमान के सामने एक ऐसी स्थिति थी जिसमें उड़ान भरना सुरक्षा नियमों के खिलाफ होता है।
एयरलाइन के मुताबिक माता-पिता और क्रू की तमाम कोशिशें नाकाम रही। आखिरकार विमान को वापस टर्मिनल पर लाना पड़ा। यात्रियों को विमान से उतार दिया गया। अब यहां एक और विकल्प था। एयरलाइन बच्चे और उसके माता-पिता को फ्लाइट से उतार कर बाकी यात्रियों को लेकर आगे बढ़ सकती थी। लेकिन समस्या सिर्फ उन्हें विमान से उतारने तक सीमित नहीं थी। उन्हें और उनका सामान भी उतारना था। कागजी कारवाई करनी थी और इसी पूरी प्रक्रिया में इतना वक्त निकल गया कि एक और बड़ी परेशानी सामने आ गई। विक्टोरिया एयरपोर्ट रात 12:30 पर बंद हो जाता है। यानी अब विमान के पास उड़ान भरने का वक्त ही नहीं बचा था और इसका नतीजा यह हुआ कि पूरी फ्लाइट को अगले दिन के लिए रिशेड्यूल करना पड़ा। फ्लाइट 7 अगस्त की रात 10:49 के लिए दोबारा तय हुई।
यानी जिस सफर को कुछ घंटों में पूरा होना था उसके लिए यात्रियों को करीब 24 घंटे का इंतजार करना पड़ा। आखिरकार विमान अगले दिन टोरंटो पहुंचा। लेकिन तब तक यात्रियों को यात्रियों की परेशानी सोशल मीडिया तक पहुंच चुकी थी। और यहां से शुरू हुई एक दूसरी बहस। सॉफ्ट पैरेंटिंग बनाम पैरेंटल कंट्रोल। सोशल मीडिया यूज़र्स का एक बड़ा सवाल था कि अगर बच्चा सीट बेल्ट नहीं लगा रहा था तो माता-पिता उसे मना क्यों नहीं पाए? Redit पर एक यूजर ने दावा किया कि माता-पिता ने कहा कि सीट बेल्ट ना पहनना बच्चे का अधिकार है। हालांकि सोशल मीडिया पर किए गए ऐसे दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। वहीं एक्स पर कुछ लोगों ने माता-पिता पर जुर्माना लगाने की भी बात कही।
एक यूज़र्स ने तो यहां तक कहा कि विमान को बच्चे और उसके माता-पिता को उतारकर बाकी यात्रियों के साथ आगे बढ़ जाना चाहिए था। लेकिन यहां एक जरूरी बात समझना भी बेहद जरूरी है। विमान में सुरक्षा नियम किसी बहस का हिस्सा नहीं होते। अगर सीट बेल्ट लगाने का निर्देश दिया गया है और यात्री उसका पालन नहीं करता तो क्रू के पास उड़ान रोकने के अलावा विकल्प सीमित हो सकते हैं। और यही वजह है कि एक बच्चे की ज़िद सिर्फ परिवार की परेशानी नहीं रही। उसका असर पूरी फ्लाइट के यात्रियों पर पड़ा। सैकड़ों लोगों लोग एयरपोर्ट पर रुके रहे और उन्हें अपना पूरा प्लान मजबूरन बदलना पड़ा और करीब एक दिन बाद वो अपनी मंजिल तक पहुंच पाए।
अब इस घटना का सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या एक बच्चे की ज़िद के आगे पूरी फ्लाइट को रोक देना सही था या फिर एयरलाइन को बच्चे और उसके माता-पिता को उतार कर बाकी यात्रियों को समय पर रवाना कर देना चाहिए था। फिलहाल यह भी साफ नहीं है कि इस देरी से परेशान यात्रियों को किसी तरह का मुआवजा मिला या नहीं।
लेकिन इस घटना ने एक बात जरूर साफ कर दी है कि विमान में कुछ नियम ऐसे होते हैं जहां बहस की गुंजाइश बहुत कम होती है। क्योंकि जमीन पर बच्चे की जिद कुछ मिनट की परेशानी हो सकती है। लेकिन आसमान में वही जिद सैकड़ों यात्रियों के पूरे सफर को बदल देती है। और आपका क्या मानना है