साल 1857 के मैप को अगर आप देखो तो एक बड़ा डिफरेंस नजर आएगा। इस मैप में ज्यादातर पोर्शन पीले रंग से रंगा हुआ था। यह रंग उन हिस्सों का था जो ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के कंट्रोल में था। बंगाल अवध से लेकर साउथ तक सब कुछ उनके डायरेक्ट कंट्रोल में था। लेकिन इसी मैप के वेस्टर्न हिस्से में एक बहुत बड़ा लैंड ऐसा था जहां यह पीला रंग आपको नहीं दिखेगा। यह एरिया था राजपूताना का। इसे ही आज हम राजस्थान भी कहते हैं। इस मैप को देखने से लगेगा कि अंग्रेजों ने राजस्थान पर कब्जा नहीं किया। लेकिन क्या यह सच है? कई लोग मानते हैं कि अंग्रेज राजस्थान के वीर योद्धाओं और किलों की वजह से इस पूरे एरिया को जीत ही नहीं पाए। लेकिन अगर आप हिस्ट्री के चैप्टर्स को गहराई से पलटेंगे तो सच्चाई बहुत अलग और कहीं ज्यादा कॉम्प्लेक्स नजर आती है। रियलिटी ये है कि इन अंग्रेजों ने किसी योद्धा को हराकर या किन्हीं किलों को जीतकर राजस्थान को नहीं जीता। उन्होंने एक दूसरा बेहद खतरनाक और चालाक तरीका अपनाया। आज मैं आपको बताऊंगा कि आखिर जिस ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने सिख एंपायर को हराया, बंगाल, झांसी और सतारा जैसी रियासतों को जंग लड़कर जीत लिया, उसी कंपनी ने राजस्थान को क्यों नहीं जीता। आज आपको मैं यह पूरी कहानी बताऊंगा और वीडियो के एंड तक आते-आते आप शॉक्ड रह जाओगे कि कैसे अंग्रेजों ने बिना कोई तलवार उठाए राजस्थान को अपना हिस्सा बना लिया और इसके बारे में बहुत कम लोग जानते भी हैं। तो वीडियो को पूरा देखिएगा क्योंकि अपना इतिहास नहीं जानोगे तो खुद को कैसे पहचानोगे। इंडियन हिस्ट्री का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट तब आया जब 1707 में औरंगजेब की मृत्यु हुई।
इस एक इंसिडेंट के बाद दिल्ली का तख्त कमजोर पड़ गया। मुगलों की ताकत लगातार कम होने लगी और एक बहुत बड़ा पावर वैक्यूम पैदा हो गया। इस खालीपन को भरने के लिए राजपूताना की रियासतें आगे आई। वेस्टर्न इंडिया में जोधपुर, जयपुर, उदयपुर, बूंदी और कोटा इन सभी राज्यों ने अपनी खोई हुई आजादी वापस लेना शुरू कर दिया। ऐसा लग रहा था कि राजपूताना का पुराना गौरव वापस लौट रहा है। लेकिन यह आजादी बहुत छोटी साबित होने वाली थी। मुगलों के कमजोर होने का फायदा सिर्फ राजपूत राज्यों ने ही नहीं उठाया था। साउथ से एक नई ताकत बहुत तेजी से नॉर्थ इंडिया की तरफ बढ़ रही थी। यह ताकत थी मराठा साम्राज्य और इसी मराठा विस्तार ने राजपूताना के इतिहास की दिशा को पूरी तरह से मोड़ कर रख दिया। मराठा सरदार खासतौर पर सिंधिया और होलकर घरा ने उत्तर भारत में अपना प्रभाव बढ़ा रहे थे। उन्होंने राजपूताना के मेवाड़, मारवाड़, हाड़ौती और ढूंढाड़ जैसे इलाकों में घुसपैठ शुरू की। लेकिन यह मराथे यह नहीं चाहते थे कि वो राजपूतों पर डायरेक्टली रूल करें। उनका मकसद था चौथ और सर देशमुखी जैसे भारी टैक्स कलेक्ट करना। अब मराठों की ये बढ़ती ताकत राजपूत स्टेट्स के लिए क्राइसिस सी बन गई थी। मराठा सेनाएं आती थी। भारीभरकम टैक्स मांगती थी। अगर राजा पैसा नहीं दे पाते थे तो पूरे के पूरे स्टेट को लूट लिया जाता था। कई बार मराठों ने राजपूत राजाओं के आपसी उत्तराधिकारों की विवादों में भी दखल दिया। इसका बहुत बड़ा एग्जांपल है जयपुर में। 1743 में सवाई जय सिंह द्वितीय की मृत्यु हुई। उनके बाद उनके पुत्र ईश्वर सिंह और माधव सिंह के बीच उत्तराधिकार यानी सक्सेशन की लड़ाई छिड़ गई। इस क्राइसिस का इन्होंने फायदा उठाया और अलग-अलग सरदार अलग-अलग राजपूत राजा को सपोर्ट करते रहे। जो गुट मराठों को ज्यादा पैसा देता, मराठा आर्मीज़ उसी का साथ देती थी। राजपूताना का खजाना धीरे-धीरे खाली होने लगा था। लेकिन इस सिचुएशन से राजपूत उभर पाते उससे पहले एक और खतरा उनके सामने था। इस खतरे का नाम था पिंडारी।
पिंडारी घुड़सवार लुटेरों के ग्रुप थे। यह शुरुआत में मराठा आर्मी के साथ चलते थे। लेकिन जब मराठा एंपायर खुद इकोनॉमिक क्राइसिस से गुजरने लगा तो वह अपने ही सैनिकों को सैलरी नहीं दे पा रहे थे। इसी बीच ये पिंडारी बेलगाम हो गए। उन्होंने राजपूताना में अच्छी खासी अराजकता फैलानी शुरू कर दी। पिंडारियों के ग्रुप गांव के गांव को जला देते थे। फसलें लूट लेते थे। आम जनता की लाइफ नरक जैसी बन गई थी इन सभी सिचुएशंस में। इस तरह से राजपूतों की कंडीशन बुरी तरह खराब हो गई। अब हालत यह थी कि राजपूत राजाओं के खजाने पूरी तरह से खाली हो रहे थे। उनके पास अपनी खुद की आर्मी को पैसे नहीं थे देने के लिए। जब आर्मी को पैसा नहीं मिला, तो राज्य के अंदर ही विद्रोह होने लगे। राजा अपने ही किलों में खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रहे थे। इकॉनमी जजर हो चुकी थी और पूरा राजपूताना एक तरह से एक भयंकर विनाश के कगार पर खड़ा था। मेवाड़ जैसे राज्यों की हालत इतनी खराब हो गई थी कि एडमिनिस्ट्रेशन को चलाना भी मुश्किल हो रहा था। कई इलाकों में खेती उजड़ चुकी थी। ट्रेडिंग रूट्स अनसेफ हो गए थे और रेवेन्यू की वसूली लगातार घट रही थी। ठीक इसी टाइम पर एक और ताकत इमर्ज हो रही थी इंडियन पॉलिटिकल सीन में जो चुपचाप अपना काम कर रही थी। यह पावर थी ईस्ट इंडिया कंपनी। अंग्रेज जब बंगाल और साउथ इंडिया के कई इलाकों पर अपना कब्जा जमा चुके थे तो अब उनकी नजर नॉर्थ इंडिया पर थी। 1798 से 1805 के बीच गवर्नर जनरल लॉर्ड विलेजली ने एक नई स्ट्रेटजी बनाई। विलेजली का मकसद था मराठा पावर को पूरी तरह से क्रश कर देना, खत्म कर देना। इन्होंने मराठों को हराने के लिए राजपूतों [संगीत] को अपने साथ मिलाया। लेकिन अंग्रेजों का काम करने का तरीका मुगलों या मराठों से बहुत अलग था। वो इमोशन और धर्म के बेसिस पर अपने डिसीजन नहीं लेते थे। उनका हर एक डिसीजन एक कैलकुलेटेड बिजनेस डील की तरह होता था। राजपूताना को लेकर अंग्रेजों ने एक बहुत ही गहराई से कॉस्ट बेनिफिट एनालिसिस किया और इसी एनालिसिस में छिपा है उस सवाल का जवाब कि उन्होंने राजस्थान पर सीधा कब्जा क्यों नहीं किया और आपको इस बात का भी जवाब मिलेगा कि क्या उन्होंने कभी कब्जा करने की कोशिश भी नहीं की। अंग्रेजों ने देखा कि बंगाल, अवध, पंजाब जैसे इलाके बहुत उपजाऊ थे। वहां भारी लगान वसूला जा सकता था। इसीलिए उन जगहों पर सीधे कब्जा करना फायदे का सौदा था। दूसरी तरफ अगर आप राजपूताना देखो तो यहां की ज्योग्राफी बहुत अलग थी। यह थार के रेगिस्तान और अरावली की मुश्किल पहाड़ियों का इलाका था। एक बहुत बड़े रेगिस्तान में अपनी आर्मी को तैनात रखना और प्रशासन को चलाना अंग्रेजों के लिए बहुत महंगा पड़ने वाला था। लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि राजपूताना आर्थिक रूप से बेकार था। यह इतिहास की एक बहुत बड़ी गलतफहमी है जिसे कई लोग राजस्थान के रेगिस्तान को देखकर समझते हैं। अंग्रेजों की नजर यहां की खेती पर नहीं थी बल्कि राजस्थान के सफेद सोने यानी कि नमक पर थी। अंग्रेजों ने बहुत ही चालाकी से बिना डायरेक्ट रूल चलाए संधियों के जरिए यानी ट्रीटीज के थ्रू सांभर झील, पचपदरा और डीडवाना के नमक प्रोडक्शन पर अपना पूरा मोनोपोली जमा लिया। उन्होंने सदियों से चले आ रहे लोकल बंजारों का ट्रेड खत्म कर दिया और नमक पर भारी टैक्स लगा दिया। इसके अलावा मालवा की जो कीमती अफीम [संगीत] थी वो भी इसी राजपूताना के ट्रेडिंग रूट से होकर जाती थी। अंग्रेजों ने इन रास्तों पर बहुत ही स्ट्रिक्ट कंट्रोल किया ताकि बंगाल में उनके अफीम के ट्रेड को कोई टक्कर ना दे सके। ईस्ट इंडिया कंपनी का फंडा बहुत साफ था। मिनिमम खर्चा और मैक्सिमम प्रॉफिट। इन संधियों ने उन्हें बिना डायरेक्ट [संगीत] रूल किए राजपूताना के सबसे ज्यादा कीमती रिसोर्सेज का मालिक बना दिया। इसके साथ ही राजपूताना की अपनी एक स्ट्रेटेजिक अहमियत भी थी जिसे अंग्रेज किसी कीमत पर छोड़ना नहीं चाहते थे। ईस्ट इंडिया कंपनी को हमेशा से खतरा रहता था सिख एंपायर और अफगानिस्तान की ओर से होने वाले हमलों से। उन्हें राजपूताना एक बफर ज़ोन की तरह चाहिए था। यानी कि बाहरी हमलों को पहले ही रोक लेने वाला ज़ोन। अगर राजपूताना पर मराठों या किसी दूसरी ताकत का कब्जा हो जाता तो अंग्रेजों के लिए दिल्ली और बाकी के नॉर्थ इंडिया को बचा पाना मुश्किल हो जाता। एक तरह से अंग्रेजों को राजपूताना पर कंट्रोल तो [संगीत] चाहिए था लेकिन वो इसके लिए एक भी खर्च नहीं करना चाहते थे। फिर इस प्रॉब्लम को सुलझाने के लिए अंग्रेजों [संगीत] ने एक हथियार निकाला जिसे सहायक संधि या फिर सब्सिडरी अलायंस के नाम से हम जानते हैं। इस एक संधि ने राजपूताना सहित पूरे भारत के नक्शे को बदल कर रख दिया। साल 1813 में लॉर्ड हेस्टिंग्स भारत के गवर्नर जनरल बनकर भारत आए। इन्होंने मराठों से फाइनल लड़ाई की तैयारी शुरू की। इसी टाइम पर उन्होंने राजपूत रियासतों के सामने ट्रीटीज का प्रपोजल दिया। अंग्रेजों ने पिंडारियों से पीछा छुड़ाने का भी भरोसा दिलाया और बाहरी दुश्मनों से सुरक्षा करने का वादा भी किया। इसके बदले में राजपूत राजाओं को ब्रिटिश सत्ता की सर्वोच्चता या सुप्रीमेसी को एक्सेप्ट करना था। लगातार कई डिकेड से जंग चल रही थी। लूट से परेशान राजपूत थे।
तो इनके लिए यह जो प्रपोजल था ये डूबते हुए नाव को तिनके का सहारा जैसा था। 1817-18 में तीसरा एंग्लो मराठा युद्ध हुआ। इसमें फाइनली मराठा हार गए और अंग्रेजों ने मराठों को पूरी तरह से निस्तनाबूत कर दिया। 6 जनवरी 1818 को होलकर को मंदसौर की संधि पर साइन करने पड़े और उसे राजपूत राज्यों पर अपना हर एक क्लेम छोड़ना पड़ा। यानी कि अब राजपूताना पूरी तरह से अंग्रेजों के प्रभाव क्षेत्र में आ चुका था। राजपूत रियासतों के साथ इन संधियों का ड्राफ्ट तैयार करने की जिम्मेदारी चार्ल्स मेटकाफ को दी गई। मेटकाफ उस टाइम पर दिल्ली में ब्रिटिश रेजिडेंट थे। वो बहुत ही चालाक एंबेसडर थे। उन्होंने संधि की शर्तें ऐसी बनाई कि राजाओं को अपनी आजादी का भ्रम भी रहे और असली ताकत अंग्रेजों के हाथों में भी आ जाए। जैसे कि स्ट्रीटी की पहली शर्त थी शाश्वत मित्रता यानी राजा और अंग्रेज हमेशा दोस्त रहेंगे। दूसरी और सबसे खतरनाक शर्त ये थी कि राजा किसी भी दूसरे राज्य से कोई स्वतंत्र विदेशी संबंध नहीं रख सकता। यानी कि जो फॉरेन मैटर्स होंगे वो सिर्फ और सिर्फ अंग्रेजों के पास होंगे। राजा के पास नहीं होंगे। इन फैक्ट एक राजा दूसरे राजा से बिना अंग्रेजों की इजाजत के बात भी नहीं कर सकता था। तीसरी शर्त यह थी कि राजा को अपनी खुद की सेना भंग करनी होगी। राज्य की सुरक्षा के लिए ब्रिटिश सेना की एक टुकड़ी वहां तैनात की जाएगी और सबसे बड़ी बात इस ब्रिटिश सेना का पूरा खर्चा राजा को ही उठाना होगा। इसके अलावा कई राज्यों को सालाना एक तय रकम भी अंग्रेजों को देनी थी। एग्जांपल के लिए जोधपुर को हर साल ₹18,000 और 1500 घुड़सवार अंग्रेजों को देने पड़े। दिसंबर 1817 से लेकर मार्च 1818 के बीच एक-एक करके सभी बड़ी रियासतों ने इन संधियों पर साइन कर दी। कोटा, मेवाड़, जयपुर, जोधपुर, बीकानेर सब ब्रिटिश अंब्रेला के नीचे [संगीत] आ गए। देखने में ऐसा लग रहा था कि राजपूताना में शांति लौट आई है। मराठों और पिंडारियों का खतरा टल चुका था। राजा अपने किलों में सेफ फील कर रहे थे। लेकिन रियलिटी में इन संधियों ने राजपूताना की संप्रभुता का यानी उनकी सोवनिटी का आजादी का गला घोट दिया था। राजाओं ने बाहरी सुरक्षा के बदले अपनी असली ताकत का सौदा कर लिया था। संधियों में एक क्लॉज़ यह भी था कि अंग्रेज राजाओं के इंटरनल मैटर्स पर कोई दखल नहीं देंगे। लेकिन इतिहास गवाह है कि यह सिर्फ एक कागजी वादा था। असली खेल अब पर्दे के पीछे से खेला जाने लगा था। अंग्रेजों ने 1818 में राजपूताना रेजिडेंसी नाम का एक पॉलिटिकल डिपार्टमेंट बनाया। डेविड ऑक्टलोनी को राजस्थान का पहला रेजिडेंट बनाकर भेजा गया। यह रेजिडेंट सिस्टम एक इनडायरेक्ट रूल की रीड की हड्डी था। रेजिडेंट कहने को तो सिर्फ एक राजदूत था। लेकिन असलियत कुछ और ही थी। रेजिडेंट धीरे-धीरे स्टेट के हर छोटे-बड़े फैसलों में दखल देने लगा। अगर राजा अंग्रेजों की बात नहीं मानता तो रेजिडेंट राजा के विरोधों को भड़काने लगता था। लॉर्ड हेस्टिंग्स ने खुद अपनी पर्सनल डायरी में इस बात को कबूल किया था। उस डायरी के पन्ने ब्रिटिश लाइब्रेरी में आज भी मौजूद है। आप जाके वहां देख सकते हैं। मतलब फोटो मिल जाएंगे। वहां देख सकते हैं। हेस्टिंग्स ने लिखा था कि हमारे रेजिडेंट एक दूत की तरह काम नहीं करते बल्कि वो एक तानाशाह की तरह बर्ताव करते हैं। वो राजाओं के पर्सनल मैटर्स में दखल देते हैं और अपनी ताकत का प्रदर्शन करते हैं। इस सिस्टम का सबसे बुरा असर राजपूताना की आम जनता और किसानों पर पड़ा। ये एक ऐसा एस्पेक्ट है जिसे हिस्ट्री बुक्स में अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है क्योंकि हमारी आदत है हम पॉलिटिकल हिस्ट्री को बहुत ज्यादा पढ़ते हैं। राजाओं को अब ब्रिटिश आर्मी का भारी खर्चा उठाना पड़ता था। जैसा कि सहायक संधि में जिक्र था। अंग्रेजों को सालाना टैक्स भी देना पड़ता था। इसके अलावा राजा अपने महलों के शानो शौकत पर भी अच्छा खासा पैसा बहा रहे थे। क्योंकि अब उन्हें जंग तो लड़नी नहीं थी। इसलिए उनका पूरा ध्यान अय्याशी या विलासिता या लग्जरी पर चला गया। इन सब चीजों का पैसा कहां से आ रहा था? इस सवाल का जवाब देखेंगे तो आपको पता चलेगा कि आम किसान और व्यापारी इन सब के लिए अपने पैसे दे रहे थे। टैक्स के रूप में। राज्यों ने जनता पर भारी टैक्स लगाए। नए लैंड रेवेन्यू सिस्टम लागू किए गए जिससे किसानों पर प्रेशर बढ़ा। राजा तो ब्रिटिश प्रोटेक्शन में सेफ थे। उन्हें अब जनता के विद्रोह का भी डर नहीं था। क्योंकि अगर जनता विद्रोह करती तो राजा की रक्षा के लिए उनकी ब्रिटिश आर्मी मौजूद थी। इसीलिए राजाओं की जवाबदेही यानी अकाउंटेबिलिटी अपनी जनता के प्रति खत्म हो गई। साल 1832 आते-आते अंग्रेजों ने राजपूताना पर अपनी पकड़ और मजबूत कर ली। उन्होंने अजमेर में एजेंट टू गवर्नर जनरल यानी एजीजी का हेड क्वार्टर बना दिया। क्योंकि अजमेर राजपूताना के बिल्कुल बीच में था तो अंग्रेजों ने इसे सीधे अपने कंट्रोल में रखा। यहां से बैठकर वो पूरे राजपूताना की रियासतों पर नजर रखते थे। इसी दौरान भारत के बाकी हिस्सों में लॉर्ड डलहौजी का शासन आया। डलहौजी के बारे में आप जानते हैं कि उन्होंने एक बहुत ही बेकार पॉलिसी लाई थी जिसे डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स यानी व्यपगत का सिद्धांत कहा गया। इसके तहत अगर किसी भारतीय राजा का अपना कोई सगा बेटा नहीं होता था तो उसके मरने के बाद अंग्रेजों द्वारा उस राज्य को हड़प लिया जाता था। इसी नीति के तहत झांसी, सतारा और नागपुर जैसी कई रियासतों को ब्रिटिश एंपायर में मिलाया गया। लेकिन आप इस बात को सुनकर हैरान रह जाएंगे कि राजपूताना को इस पॉलिसी से काफी हद तक बचा कर रखा गया। अब सवाल ये उठता है कि डलहौजी ने राजपूताना को क्यों नहीं हड़पा?
वो चाहते तो इसको हड़प सकते थे। सच तो यह है कि डलहौजी ने ऐसा करने की पूरी कोशिश की थी। 1852 में डलहौजी ने राजपूताना की करौली रियासत पर डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स लगाकर उसे ब्रिटिश एंपायर में मिलाने का ऐलान किया। लेकिन लंदन में बैठे कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स ने डलहौजी के इस डिसीजन को पलट दिया। उनका लॉजिक सीधा था कि राजपूताना की कई रियासतें अंग्रेजों द्वारा बनाई गई डिपेंडेंट रियासतें नहीं हैं बल्कि वो अंग्रेजों की पुरानी एलाइज हैं। अंग्रेजों ने राजपूताना को सिर्फ इसलिए नहीं छोड़ा क्योंकि उन्हें कोई आर्थिक नुकसान दिख रहा था बल्कि वो लीगल ट्रीटीज के जाल में खुद ही बुरी तरह से बंधे हुए थे। जब 1857 का विद्रोह भड़का तो राजपूताना के राजाओं ने अपनी संधियों का पालन किया। अंग्रेजों का साथ जरूर दिया। लेकिन यहां पर हिस्ट्री का एक बहुत बड़ा सच है जो अक्सर छिपा लिया जाता है। या फिर मैं यूं कहूं कि इस घटना को जानने के बाद आपको समझ में आएगा कि हिस्ट्री में सब कुछ ब्लैक एंड वाइट नहीं होता। राजा भले ही अंग्रेजों के साथ थे लेकिन राजपूताना की जनता और कई जागीरदारों ने अंग्रेजों के खिलाफ भयंकर विद्रोह किया था। मारवाड़ में आवा के ठाकुर कुशाल सिंह ने अंग्रेजों और जोधपुर के राजा की संयुक्त सेना को बुरी तरह हराया। उन्होंने ब्रिटिश पॉलिटिकल एजेंट मोक मेसन का सिर काटकर आवा के किले पर टांग दिया था। कोटा में तो विद्रोहियों ने मेजर बर्टन की हत्या कर दी और खुद कोटा के महाराव को 6 महीने तक उनके ही महल में बंधक बनाकर रखा। इसलिए यह कहना कि राजपूताना में अंग्रेजों को किसी बड़े विद्रोह का सामना नहीं करना पड़ा। ये एक भूल हो सकती है। 1857 के बाद अंग्रेजों ने राजपूताना के राजाओं को उनकी इसी वफादारी का इनाम भी दिया क्योंकि इन्हीं राजाओं ने अपनी ही बगावत करने वाली जनता को कुचलने में अंग्रेजों की मदद भी की थी। अंग्रेजों ने राजपूत राजाओं के साथ अपने रिश्ते को एक और तरीके से मजबूत किया। उन्होंने एक मार्शल रेस की थ्योरी कढ़ी। अंग्रेजों ने कुछ खास जातियों को जन्म से ही लड़ाकू और बहादुर घोषित कर दिया। ऑफ कोर्स इसमें राजपूत भी शामिल थे। इस पर मैंने डिटेल में वीडियो बनाया है। वैसे अगर आप चाहो तो आई बटन पे क्लिक करके या डिस्क्रिप्शन में मैं इसका लिंक दे दूंगा। वहां पर जाकर आप देखो कि ये कितनी खतरनाक थ्योरी थी जिसने अपने आप में डिवाइड एंड रूल का एक सिस्टम जो है उसको फॉलो किया। खैर, इस मार्शल रेस की थ्योरी का फायदा यह हुआ कि राजपूताना के राजाओं को लगा कि अंग्रेज उनके गौरवशाली इतिहास की इज्जत करते हैं। इस साइकोलॉजिकल डिप्लोमेसी ने अंग्रेजों और राजपूत शासकों के बीच एक ऐसा रिश्ता बना दिया जो 1947 तक चलता रहा। अंग्रेज राजाओं को मेडल देते थे। उन्हें तोपों की सलामी दी जाती थी। उनके सम्मान में दरबार लगाए जाते थे। राजा इन सिंबॉलिक सम्मानों में खुश थे। जबकि असली पॉलिटिकल और इकोनॉमिक ताकत अंग्रेजों के हाथों में थी लंबे टाइम तक। हालांकि अगर आप देखें तो इस ब्रिटिश इंपैक्ट के कुछ अलग तरीके के सोशल परिणाम भी हुए। सच यह है कि अंग्रेजों के दबाव में आकर राजपूताना में कई पुरानी कुप्रथाओं पर रोक लगी। एग्जांपल के लिए 1822 में बूंदी रियासत ने सती प्रथा को इललीगल घोषित किया। 1833 में कोटा के महाराजा ने कन्यावध पर प्रतिबंध लगाया। यह सुधार सीधे तौर पर ब्रिटिश रेजिडेंट्स के दबाव और उनके द्वारा बनाए गए नैतिक माहौल का नतीजा थे। लेकिन यह सुधार भी उस सिस्टम का एक हिस्सा थे जहां अंग्रेज खुद को एक सभ्य समाज के रूप में पेश करना चाहते थे। वो दिखाना चाहते थे कि वो भारत में सिर्फ राज करने नहीं बल्कि यहां के लोगों को सभ्य बनाने आए हैं। इस पूरे सिस्टम को या इस पूरी बातों को जो हमने अभी अभी-अभी की है इसको इतिहासकार अलग-अलग नजरियों से देखते हैं। 19वीं सदी के ब्रिटिश इतिहासकारों ने इसे एक बहुत महान काम बताया। उनके हिसाब से राजपूत राजा अकुशल थे।
आपस में लड़ रहे थे। अंग्रेज मसीहा बनकर आए। जिन्होंने राजपूताना को विनाश से बचा लिया। लेकिन जब भारत आजाद हुआ तो नेशनलिस्ट हिस्टोरियंस ने उनकी इस कॉलोनियल थ्योरी को पूरी तरह से खारिज कर दिया। उन्होंने डॉक्यूमेंट्स के बेसिस पर यह साबित किया कि ये कोई मसीहाई काम नहीं था। यह एक साफ सुथरा पॉलिटिकल एक्सप्लइटेशन था। संधियों के नाम पर राजाओं को निहत्ता कर दिया गया और आम जनता का खून चूसा गया पैसे के रूप में। आज के दौर के मॉडर्न हिस्टोरियंस इस सब्जेक्ट को और भी गहराई से देखते हैं। माइकल एच फिशर और इयान कोप्लैंड जैसे इतिहासकार अपनी रिसर्च में बताते हैं कि ये इनडायरेक्ट रूल यानी परोक्ष शासन कोई एक दिन में बना हुआ सिस्टम नहीं था। इसे रोज-रोज़ की डिप्लोमेसी, प्रेशर और साजिशों के जरिए जिंदा रखा जाता था। उन्होंने यह भी साबित किया कि राजपूताना की रियासतें दुनिया से कटी हुई नहीं थी। वहां जो कुछ भी हो रहा था उसका सीधा संबंध लंदन में बैठे ऑफिसर्स की पॉलिसीज से होता था। अंग्रेज अधिकारी अपनी जानकारी और डाटा के जरिए भी राज कर रहे थे। वो लगातार जनगणना यानी सेंसस कर रहे थे। गजेटियर लिख रहे थे। जानकारी इकट्ठा करना भी उनके शासन का एक बहुत बड़ा अवसार था। आज जब हम सीयू एचसीएन की किताब अ कलेक्शन ऑफ ट्रीटीज के पन्ने पलटते हैं जिसमें उन सभी संधियों का एकदम मूल पाठ मौजूद है तो तस्वीर बिल्कुल साफ हो जाती है। संधियों की भाषा इतनी सटीक और कानूनी रूप से कसी हुई थी कि उसमें से बाहर निकलने का कोई रास्ता छोड़ा ही नहीं गया था। राजपूताना का इतिहास सिर्फ तलवारों और युद्ध के मैदानों का इतिहास नहीं है। यह दस्तावेजों, संधियों और खामोश कूटनीति का भी इतिहास है। अंग्रेजों ने तलवार की जगह पेन का इस्तेमाल किया और वह तलवार से ज्यादा कामयाब रहे। तो दोस्तों, इस पूरी बहस का रिजल्ट क्या है? अंग्रेजों ने राजस्थान पर कब्जा क्यों नहीं किया? जवाब बहुत सीधा है। क्योंकि उन्हें उसकी जरूरत ही नहीं थी।
डायरेक्ट कंट्रोल से उन्हें जो कुछ मिल सकता था वो सब कुछ उन संधियों से मिल गया था जो अंग्रेजों और राजपूत राजाओं के बीच में हुई। राजाओं की सेना खत्म हो गई थी। यानी कि ये राजा अब अंग्रेजों के खिलाफ हथियार नहीं उठा सकते थे। विदेश नीति अंग्रेजों की मुट्ठी में थी। यानी कि दो राजा आपस में मिलकर कोई विद्रोह भी नहीं कर सकते थे। राजपूताना का जो राजस्व था, वह अप्रत्यक्ष रूप से ब्रिटिश खजाने को मजबूत कर रहा था। और यह सब कुछ बिना एक भी ब्रिटिश सोल्जर की जान को खतरे में डाले हो रहा था। साथ ही उन्हें अफगान और सिख एंपायर के खिलाफ एक बहुत ही वफादार बफर जोन भी मिल गया था। जब भारत आजाद हुआ तो उसके बाद हालात तेजी से बदले। ब्रिटिश एंपायर के जाते ही वो सारी ट्रीटीज खत्म हो गई। सरदार वल्लभ भाई पटेल यानी हमारे लौह पुरुष की लीडरशिप में भारत सरकार ने इन रियासतों को एक करने का बहुत ही बड़ा और कॉम्प्लेक्स काम शुरू किया। 47 से 49 के बीच एक-एक करके लगभग सभी राजपूताना की रियासतें भारतीय संघ में शामिल हो गई। और आखिरकार 1956 में मॉडर्न राजस्थान स्टेट का निर्माण पूरा हुआ। अंग्रेजों का यह इनडायरेक्ट रूल इंडियन हिस्ट्री का एक ऐसा चैप्टर है जो बताता है कि डिप्लोमेटिक अधीनता या डिप्लोमेटिक गुलामी कई बार सीधे मिलिट्री रूल से भी ज्यादा गहरी और परमानेंट होती है। ताकत का मतलब हमेशा मैदान में खून बहाना नहीं होता बल्कि असली ताकत वो होती है जो सामने वाले को यह एहसास ही ना होने दे कि वो हार चुका है। अब जाते-जाते मैं एक बात यह क्लियर करना चाहता हूं कि ऐसा नहीं है कि राजपूत राजा जितने भी थे वो सब के सब एकदम बेकार राजा थे या उनके पास अपनी ताकत नहीं थी। ये समय का ऐसा चक्र था जिसमें हर राजा धीरे-धीरे फंसता चला गया। चाहे वो पिंडारियों का अटैक हो चाहे वो मराठाओं का अटैक हो।
18वीं सदी में जब ये पावर्स इमर्ज [संगीत] हो रही थी तो 19वीं सदी आते-आते इन पावर्स का डिक्लाइन होना भी शुरू हुआ। और इसी का रिजल्ट था कि अंग्रेजों ने इस स्थिति का पूरा लाभ उठाया और उन्होंने राजस्थान को अपने इनडायरेक्ट रूल में कन्वर्ट किया। जैसे कि एग्जांपल के लिए देखा जाए तो हमारे जो राजपूताना के रूलर्स थे कई [संगीत] लोग ऐसे थे जिन्होंने फर्स्ट वर्ल्ड वॉर में अंग्रेजों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ाई लड़ी। तो इस तरह से राजपूताना का इतिहास मैंने आपके सामने रखा। आपको यह कहानी कैसी लगी? कमेंट करके जरूर बताइए। मेरा कहीं से कोई इंटेंशन नहीं है किसी भी राजपूत राजा के असम्मान का। मैं उस सिचुएशन को बस बयां कर रहा हूं जो उस समय चल रही थी। तो कमेंट पे यह मत लिखना कि अरे तुमको तो यह नहीं पता था। तुमको वो नहीं पता था। यह पूरा एक सिचुएशन था उस टाइम का जो आपके सामने मैंने रखा। अब आपको ये वीडियो कैसा लगा कमेंट करके जरूर बताइए। वीडियो को लाइक और शेयर करना ना भूलें। और ऐसे इंटरेस्टिंग कहानियों के लिए इतिहास से जुड़े रहने के लिए हिस्ट्री करंट को सब्सक्राइब जरूर करें। और हां अगर वीरता का इतिहास जानना है तो राजपूताना का इतिहास पढ़िए। क्योंकि राजपूतों में जो वीरता दिखाई गई है वो वीरता बहुत ही बड़े लेवल पर आपको काफी चीजें लाइफ में सीखने को आगे बढ़ने को देंगी। बहुत-बहुत धन्यवाद।