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भारत के 12 ऐसे संत जो बने नेता! आखिर क्यों?

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12 ऐसे संत जो नेता बने। आखिर क्यों? आइए जानते हैं इस वीडियो में। तो नंबर 12 पर आते हैं सतपाल महाराज जी। मानव उत्थान सेवा समिति के संस्थापक सतपाल महाराज जी के देश विदेश में लाखों करोड़ों भक्त हैं जो उनके एक इशारे पर कुछ भी करने को तैयार रहते हैं। लेकिन महाराज जी को बहुत पहले ही समझ आ गया था कि केवल आध्यात्मिक प्रवचनों से जनता का पेट नहीं भरता। उसके लिए नीति निर्माण यानी पॉलिसी मेकिंग की टेबल पर बैठना सबसे जरूरी है। उत्तराखंड को अलग राज्य बनाने के आंदोलन में इन्होंने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और अपनी ताकत दिखाई। इन्हें अच्छी तरह पता था कि बिना मलाईदार मंत्रालय और सरकारी पावर के पहाड़ों का विकास करना हवा में तीर चलाने जैसा है। इसलिए इन्होंने पहले कांग्रेस और फिर भाजपा में अपनी ढाक जमाई। आज 2026 में भी वे उत्तराखंड सरकार में सीनियर कैबिनेट मंत्री बनकर ठाट से राज का काज संभाल रहे हैं। महाराज जी ने दुनिया को सिखा दिया कि भजन और वोट बैंक दोनों को एक साथ कैसे साधा जाता है। पहाड़ों की महाराज के बाद अब बात करते हैं उस युवा सन्यासी की जिसे आज की तारीख में राजस्थान का बुलडोजर बाबा कहा जाने लगा है और जिनके तेवर देखकर अपराधी थरथर कांपने लगते हैं। गेस कीजिए कौन है वो। तो नंबर 11 पर आते हैं बाबा बालकनाथ जी।

आज के समय में सबसे हॉट और चचित चेहरों में से एक बाबा बालकनाथ जी। नाथ संप्रदाय के इस युवा सन्यासी को अक्सर राजस्थान का योगी भी कहा जाता है। रोहतक के बाबा मस्तनाथ मठ के आठवें महंत बालकनाथ जी का राजनीति में आना खुद उनकी [गला साफ़ करने की आवाज़] मर्जी से नहीं बल्कि उनके गुरु महंत चांदनाथ जी के कड़े आदेश पर हुआ था। जब गुरु का स्वास्थ्य बिगाड़ने लगा तो उन्होंने बालकनाथ जी को अपनी राजनीतिक विरासत संभालने का जिम्मा सौंप दिया। बाबा बालकनाथ जी ने भी गुरु की आज्ञा को सिर आंखों पर रखा और पहले अलवर से सांसद बने और फिर तजारा से विधानसभा चुनाव जीतकर राजस्थान की राजनीति में तहलका मचा दिया। इनका राजनीति में आने का सीधा मकसद नाथ संप्रदाय की लोक कल्याण और संस्कृत राष्ट्रवाद की परंपरा को आगे बढ़ाना है। इनका आक्रामक अंदाज देखकर चुनाव के समय विरोधियों की गिग्गी बन जाती है। युवा बाबा की बात तो हो गई लेकिन अब बात करते हैं उस तेजतर्रार साध्वी की जिनका नाम सामने आते ही टीवी चैनलों की टीआरपी और राजनीति का पारा दोनों एक साथ सातवें आसमान पर पहुंच जाते हैं। टू नंबर 10 पर आती हैं साध्वी प्रज्ञा सेन ठाकुर जी। सन्यास की कठिन दीक्षा लेने वाली साध्वी प्रज्ञा जी का राजनीति में आना किसी फिल्मी सस्पेंस थ्रिलर स्क्रिप्ट से कम नहीं है। एक लंबे कानूनी अदालती और वैचारिक विवाद खासकर मालेगांव विस्फोट मामले में सालों तक आरोपी रहने व जेल की हवा खाने के बाद इन्होंने अपनी लड़ाई को सीधे राजनीतिक अखाड़े में उतरकर लड़ने का फैसला किया। उनका राजनीति में आने का सबसे बड़ा कारण राष्ट्रवाद के मुद्दे को मुखरता से उठाना और खुद पर लगे आरोपों का जवाब राजनीतिक मंच से देना था। भाजपा ने उनकी इसी फायर ब्रांड छवि को भुनाने के लिए उन्हें भोपाल से लोकसभा का टिकट थमा दिया और उन्होंने भारी मतों से चुनाव जीतकर संसद का रास्ता तय किया। अपने बयानों से हमेशा मीडिया में आग लगाने वाली। साध्वी प्रज्ञा जी ने सबको दिखा दिया कि राजनीति में बयानों के तीर कैसे छोड़े जाते हैं। साध्वी प्रज्ञा जी के तीखे तीरों के बाद अब इतिहास के कुछ पुराने पन्नों को पलटते हैं और चलते हैं उस दौर में जब हमारा देश नया-नया आजाद हुआ था। तब भी एक बड़ी महंत ने दिल्ली की सल्तनत की नींव हिला दी थी। तो, नंबर नौ पर आते हैं, महंत दिग्विजय नाथ जी। गोराक्षपीठ के इस पूर्व महंत का इतिहास भारत के स्वतंत्रता संग्राम से बहुत गहराई से जुड़ा हुआ है। देश के विभाजन के समय हिंदू हितों की रक्षा करना और भारतीय राजनीति को एक मजबूत सांस्कृतिक और राष्ट्रवादी दिशा देना ही इनका सबसे बड़ा और इकलौता लक्ष्य था।

इन्हें बहुत पहले ही समझ आ गया था कि आजादी के बाद देश की राजनीति जैसे तुष्टीरण के धर्रे पर चल रही है, उसे बदलने के लिए संतों और सन्यासियों को अपने आश्रमों से बाहर निकलकर संसद में बैठना ही होगा। वे हिंदू महासभा में शामिल हुए और गोरखपुर की जनता के आशीर्वाद से सांसद बनकर संसद पहुंचे। महंत दिग्विजयनाथ जी ने ही गोरखपीठ के लिए राजनीति के उस पावरफुल दरवाजे को खोला था जिस पर आज की पीढ़ी राज कर रही है। इतिहास के कलियारों से निकलकर अब वापस वर्तमान के दौर में आते हैं और बात करते हैं एक ऐसे आधुनिक आचार्य की जो अपनी बेबाक्य शायरी और तीखे राजनीतिक कटाक्षों के लिए जाने जाते हैं। तो नंबर आठ पर आते हैं आचार्य प्रमोद कृष्णम जी। उत्तर प्रदेश के संभल में स्थित प्रसिद्ध श्री कल्कि धाम के पीठाधीश्वर आचार्य प्रमोद कृष्णम जी का राजनीति में आने का फंडा दुनिया से बिल्कुल जुदा है। उनका साफ मानना है कि राजनीति में जब तक सुचिता और आध्यात्मिक मूल्यों का तड़का नहीं लगेगा तब तक देश का कल्याण नहीं हो सकता। लंबे समय तक कांग्रेस पार्टी के वफादार सिपाही रहे। आचार्य जी अपनी ही पार्टी के बड़े नेताओं को आईना दिखाने से कभी पीछे नहीं हटते। उनका मुख्य उद्देश्य धार्मिक और राजनीतिक मंचों के बीच एक मजबूत मध्यस्थ का काम करना था। आज 2026 में भले ही उनकी राजनीतिक पोजीशन पूरी तरह बदल चुकी हो और वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के साथ मिलकर कल्कि धाम के भव्य निर्माण में दिन रात व्यस्त हो। लेकिन राजनीति के गलियारों में उनकी शायरी और चुटीले कटाक्ष आज भी विरोधियों के छुड़ाने के लिए काफी हैं। आचार्य जी की शायरी और चुटकुलों का सिलसिला तो चलता रहेगा। लेकिन अब बात करते हैं उत्तर प्रदेश के ही एक ऐसे स्वामी जी की जिन्होंने शिक्षा, सत्ता और राजनीति का एक बहुत ही अनोखा कोकटेल तैयार किया था। तो नंबर सात पर आते हैं स्वामी चिन्मयानंद जी। परमार्थ निकेतन और स्वामी सुखदेवंद के परम शिष्य चिन्मयानंद जी मुख्य रूप से शाहजहांपुर के इलाकों में शिक्षा और आध्यात्म के बड़े-बड़े काम देख रहे हैं। लेकिन 1980 और 90 के दशक में जब देश में राम मंदिर आंदोलन ने रफ्तार पकड़ी तो संतों की राजनीतिक भागीदारी को बढ़ाने के संकल्प के साथ यह भी सीधे चुनावी मैदान में कूद पड़े। इनका राजनीति में आने का मुख्य कारण मंदिर आंदोलन को एक पढ़ा लिखा और बौद्धिक नेतृत्व देना था ताकि कानूनी मूछ पर भी बात रखी जा सके। ये उत्तर प्रदेश से शानदार तरीके से सांसद चुने गए और अटल बिहारी वाजपेयी जी की सरकार में गृह मंत्री की मलाईदार कुर्सी तक पहुंचे। राजनीति के इस खेल में इन्होंने बहुत लंबी पारी खेली। हालांकि बाद के दिनों में कई बड़े विवादों ने इनका पीछा भी खूब किया और इन्हें बैकफुट पर धकेल दिया। राम मंदिर आंदोलन के उस स्वर्णिम दौर में देश की राजनीति को कई बड़े और कड़क चेहरे दिए। इसी कड़ी में एक ऐसी साध्वी भी उभरी जो अपनी सादगी और सीधे प्रहार के लिए जानी जाती है। चलिए देखते हैं कौन है वो। तो नंबर छह पर आती हैं साध्वी निरंजन ज्योति जी। आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अबे सानंद गिरी की शिष्या और एक बेहद लोकप्रिय ओजस्वी कथावाचक साध्वी निरंजन ज्योति जी का राजनीति में आने का कारण बहुत ही व्यावहारिक और जमीनी था। वे ग्रामीण इलाकों के करीब गरीब दलित और शोषित समाज की सेवा करना चाहती थी और उन्हें बहुत जल्दी यह समझ आ गया था

कि बिना सरकारी पावर और फंड के यह सारे काम कछुए की चाल से ही चलेंगे। भाजपा से जुड़कर इन्होंने उत्तर प्रदेश की जिला स्तर की राजनीति से अपनी शुरुआत की और धीरे-धीरे अपनी मेहनत के दम पर केंद्रीय मंत्रिमंडल तक का सफर तय किया। अपनी देसी बुंदेलखंडी भाषा और ढेठ अंदाज के लिए जानी जाने वाली साध्वी जी ने यह साबित कर दिया कि सन्यासी अगर एक बार मन में ठान ले तो दिल्ली के बड़े-बड़े सुरमाओं के बीच भी अपनी धाक जमा सकता है। साध्वी जी की इस देसी साध्वी सादगी के बाद अब बात करते हैं उत्तर प्रदेश के एक ऐसे महाराज की जिनके बयान आते ही टीवी चैनलों की स्क्रीन लाल हो जाती है और विरोधी दल पानी मांगने लगते हैं। तो नंबर पांच पर आते हैं साक्षी महाराज जी स्वामी सच्चिदानंद हरि साक्षी जिन्हें पूरी दुनिया साक्षी महाराज जी के नाम से जानती है। देश में कई बड़े आश्रमों के संचालक और आध्यात्मिक गुरु साक्षी महाराज जी का राजनीति में आने का एकमात्र और सबसे बड़ा मकसद था हिंदुत्व की कट्टर विचारधारा का देशव्यापी प्रचार प्रसार करना। राम मंदिर आंदोलन के दौरान यह एक बेहद आक्रामक और बड़े चेहरे के रूप में उभरे थे। पिछड़े और शोषित वर्गों के अधिकारों की आवाज को संसद तक पहुंचाने के बहाने इन्होंने राजनीति में ऐसी धमाकेदार एंट्री मारी कि आज तक खंडा गाड़कर जमे हुए हैं। इनके तीखे बयान और बिना लाग लपेट के बोलने का अंदाज विरोधियों के कलेजे पर सांप लूटने जैसा काम करता है। राजनीति के गंदे खेल में रहकर भी इनका साधु वाला कड़क रोग आज तक 1% भी कम नहीं हुआ है। साक्षी महाराज जी के इन तीखे और कड़क बयानों से थोड़ा आगे बढ़ते हैं और बात करते हैं उस महान और तपस्वी संत की जिन्होंने पूरी पूर्वी उत्तर प्रदेश की राजनीति का पूरा भूगोल और इतिहास ही बदल कर रख दिया था। तो नंबर चार पर आते हैं महंत अभैद्यनाथ जी। गोरखपुर के विश्व प्रसिद्ध गोराक्षपीठ के पूर्व पीठाधीश्वर और मौजूदा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी के गुरु महंत अभैद्यनाथ जी का राजनीति में आना भारतीय समाज के लिए एक बहुत बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। हिंदू समाज में अंदर तक फैली छुआछूत और जातिवाद जैसी घातक कुरीतियों को दूर करने और राम मंदिर आंदोलन को एक मजबूत निर्णायक और निडर राजनीतिक नेतृत्व देने के लिए इन्होंने सन्यास के साथ-साथ राजनीति का कांटों भरा रास्ता चुना। उनका साफ मानना था कि जब तक संत और महात्मा खुद सत्ता के केंद्र में जाकर नहीं बैठेंगे तब तक समाज का वास्तविक भला होना नामुमकिन है। इन्होंने हिंदू महासभा और बाद में भाजपा के बेनदले कई बार विधानसभा और लोकसभा का चुनाव भारी बहुमत से जीता। गोरखपुर को अपराध मुक्त करने और सामाजिक समरसता की अलख जगाने में इनका योगदान हमेशा अमर रहेगा। महंत अवैद्यनाथ जी ने तो पूरे समाज को जोड़ने और सवारने का काम किया। लेकिन अब बात करते हैं एक ऐसे अनोखे सन्यासी की जिन्होंने भगवा वस्त्र पहनकर भी वामपंथी विचारधारा और उग्र सामाजिक आंदोलनों में अपनी पूरी जिंदगी झोंक दी थी। तो नंबर तीन पर आते हैं स्वामी अग्निवेश जी। आर्य समाज के इस सन्यासी का अंदाज

और उनकी कार्यशैली। बाकी के तमाम संतों से बिल्कुल अलग और जुदा थी। सिर पर पारंपरिक भगवा पगड़ी और वस्त्र धारण करने वाले स्वामी अग्निवेश जी का राजनीति में आने का मुख्य उद्देश्य सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ कड़े और सख्त कानून बनवाना था। इन्होंने बंधुआ मजदूरी बाल श्रम बंधक बनाए गए मजदूरों की रिहाई और कन्या भ्रूण हत्या जैसी भयानक सामाजिक की बुराइयों के खिलाफ दिल्ली की सड़कों से लेकर गांवों तक एक बहुत लंबी लड़ाई लड़ी। उन्हें यह बात अच्छे से समझ आ गई थी कि केवल मंच से लंबे चौड़े उपदेश देने से बड़े-बड़े जमींदार और भ्रष्ट ठेकेदार सुधरने वाले नहीं है। इसके लिए सत्ता का झंडा जरूरी है। इसलिए इन्होंने हरियाणा विधानसभा का चुनाव लड़ा और वहां शिक्षा मंत्री की कुर्सी भी संभाली। राजनीति में रहकर भी इन्होंने हमेशा एक एक्टिविस्ट की तरह काम किया और सत्ता के गलियारों में अपनी एक अलग और बागी पहचान बनाई। सामाजिक आंदोलनों के इस अनोखे मसीहा के बाद। अब बात करते हैं उस फायर ब्रांड महिला नेता की जिसके एक इशारे पर 1990 के दशक में पूरा देश व दिल्ली की सरकार थनने लगती थी। नंबर दो पर आती हैं उमा भारती जी। बचपन से ही गजब के आध्यात्मिक झुकाव के कारण वे देश विदेश में धार्मिक प्रवचन और एक प्रखर कथावाचक के रूप में बहुत कम उम्र में ही मशहूर हो चुकी थी। लेकिन 1980 और 90 के दशक में जब देश में राम जन्मभूमि आंदोलन शुरू हुआ तो उमा भारती जी की सिंह गर्जना जैसी प्रखर वाणी ने पूरे देश के युवाओं को झकझोर कर रख दिया। राजमाता विजय राजे सिंधिया ने उनकी इस अद्भुत राजनीतिक समझ और बेजोड़ वक्ता वाली प्रतिभा को पहली नजर में ही पहचान लिया था और उन्हें मुख्यधारा की सक्रिय राजनीति में आने के लिए राज किया। राजनीति के अखाड़े में कदम रखते ही इन्होंने अपने बयानों से अंगारे उगलना शुरू कर दिए। मध्य प्रदेश में कांग्रेस के मजबूत किले को ढाकर वे मुख्यमंत्री बनी और केंद्र सरकार में भी कई बेहद महत्वपूर्ण मंत्रालय संभाले। उमा भारती जी ने पूरी दुनिया को दिखा दिया। एक साध्वी अगर अपनी जिद पर आ जाए तो बड़े-बड़े सियासी सिंहासनों को तास के पत्तों की तरह बिखेर सकती है। और अब आखिरकार वक्त आ गया है

जिसका आप सभी को बड़ी बेसब्री से इंतजार था। बात करते हैं उस महानायक की जिसके नाम मात्र से बड़े-बड़े अपराधियों और माफियाओं के पैर कांपने लगते हैं और जिनकी [नाक से की जाने वाली आवाज़] राजनीति का लोहा आज पूरी दुनिया मार रही है। [गला साफ़ करने की आवाज़] तो नंबर एक पर आते हैं योगी आदित्यनाथ जी। गोरखपुर के प्रसिद्ध गोरक्षपेठ के मौजूदा महंत और नाथ संप्रदाय के प्रमुख सन्यासी योगी आदित्यनाथ जी का भारतीय राजनीति में आना आधुनिक इतिहास की सबसे बड़ी और युगांतकारी राजनीतिक घटनाओं में से एक माना जाता है। अपनी परम पूज्य गुरु महंत अभद्यनाथ जी के कड़ी आदेश और गोरक्षपीठ के राजनीतिक उत्तराधिकारी को संभालने के लिए उन्होंने बहुत ही छोटी उम्र में संसद का रुख किया था। इनका राजनीति में आने का मुख्य और इकलौता उद्देश्य गोरक्षपीठ के सामाजिक व जन कल्याणकारी कार्यों को आगे बढ़ाना था। पूर्वी उत्तर प्रदेश से खूंखार माफिया राज को हमेशा के लिए उखाड़ फेंकना और चमरायाई हुई कानून व्यवस्था को पूरी तरह से चाक चौबंद करना था। आज 2026 में भी उनका यह बेजोड़ बुलडोजर मॉडल और जीरो टॉलरेंस वाला कड़क प्रशासन पूरे देश के राज्यों के लिए एक नजीर बना हुआ है। योगी जी ने पूरी दुनिया के सामने एआई डंगे की चोट पर साबित कर दिया है कि एक सच्चा सन्यासी जब अपने निजी स्वार्थ को छोड़कर राज धर्म निभाता है तो जनता चैन की नींद सोती है और बड़े-बड़े अपराधियों और भ्रष्टाचारियों की लंका लग जाती है।

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