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शाह का क्रांतिकारी फैसला, 370 हटाने से भी बड़ा !

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कांग्रेस को एक फैसला लेने में 3 साल लग गए। अगले 3 दिनों तक सबसे बड़ा सस्पेंस यह होगा कि सिद्धरामैया दिल्ली की बात मानेंगे या अपने मन की बात करेंगे। कांग्रेस के तीन बड़े लीडर राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे और केसी वेणुगोपाल आज दिनभर सिदरा मैया को इस बात के लिए मनाते रहे कि कुर्सी छोड़ो। बदले में जो मांगोगे वह मिल जाएगा। बेटे को मंत्री बना देंगे। राज्यसभा की सीट दिला देंगे। यहां तक कि राज्यसभा में पार्टी का नेता भी बना देंगे। लेकिन सिद्धरा मैया कह रहे हैं कि उनका दिल दिल्ली में नहीं लगता। बेंगलुरु में ही लगता है। कर्नाटक कांग्रेस के लिए बहुत बड़ा राज्य है। 28 के चुनाव में कांग्रेस वहां रिपीट करना चाहती है। इसीलिए मुख्यमंत्री का चेहरा बदलना चाहती है। आज जब कांग्रेस अपने एक सीएम को इस्तीफा देने के लिए मना रही थी, उसी समय बीजेपी ने अपने सबसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट को ल्च कर दिया। देश में अगले 3 साल जिस एक फैसले के इर्द-गिर्द सारे चुनाव होंगे, सारे चुनाव का नैरेटिव जिस एक फैसले से बनेगा, वो फैसला क्या है? आपको इस रिपोर्ट में दिखाते हैं। [संगीत] भाग घुसपैठिया भाग जल्दी भाग। बंगाल छोड़कर भाग, हिंदुस्तान छोड़कर भाग। जल्दी-जल्दी भागो। जल्दी-जल्दी भागो नहीं तो जो करना है सरकार करेगा। बांग्लादेश के हाकिमपुर बॉर्डर पर बांग्लादेशी घुसपैठियों की कतार लगी है।

इन सभी घुसपैठियों को बॉर्डर पार करना है। इन सभी घुसपैठियों को बांग्लादेश जाना है। ममता राज में बांग्लादेशी घुसपैठियों की बहुत मौज थी। लेकिन जब से बंगाल में शुभेंदु अधिकारी की सरकार बनी है, यह सभी बांग्लादेशी घुसपैठिए वापस भाग रहे हैं। चीफ मिनिस्टर शुभेंदु अधिकारी ने बंगाल पुलिस से कह दिया है, किसी भी घुसपैठियों को रोकने की जरूरत नहीं है। जो भाग रहे हैं उन्हें भागने दो। ये एकिस्टिंग फॉरेनर्स एक्ट है। कोई नया कानून नहीं है। और ये लोग चला जाना चाहिए। और उनका बांग्लादेशी जो नागरिक है उनका लेने का जिम्मेदार तो है उनका तो जब हम लोग यहां से बोल रहा था तब वहां से उनका जो स्पोक्सपर्सन है मैं देखा था तो उन्होंने बताया जो बांग्लादेशी है वो तो हम लोग ले लेगा तो ये सब बांग्लादेशी है उसको ले लेना चाहिए लेकिन ये लोग को पुलिस को हम लोग बता दिया जेल में भेजने का जरूरत नहीं है देश के रुपया में खाना खाएगा कपड़ा देगा मेडिसिन देगा एक दामाद है ये लोग दिल्ली में होम मिनिस्टर अमित शाह ने एक क्रांतिकारी फैसला लिया। अमित शाह ने डेमोग्राफी चेंज पर हाई लेवल कमेटी बना दी। यह कमेटी घुसपैठ से होने वाले डेमोग्राफी चेंज के [संगीत] पैटर्न को समझेगी और जहां भी अननेचुरल डेमोग्राफी चेंज का पैटर्न दिखेगा, वहां इससे निपटने के लिए सरकार को सुनियोजित और समयबद्ध समाधान बताएगी। जस्टिस रिटायर प्रकाश प्रभाकर नावलेकर हाई लेवल कमेटी के अध्यक्ष होंगे। जनगणना आयुक्त इसके मेंबर होंगे। रिटायर्ड आईएएस दुर्गाशंकर मिश्रा, रिटायर्ड आईपीएस बालाजी श्रीवास्तव और डॉ. शमिका रवि समिति के सदस्य होंगे।

होम मिनिस्ट्री के जॉइंट सेक्रेटरी इस हाई पावर कमेटी के मेंबर सेक्रेटरी होंगे। क्या अमित शाह का नया प्रोजेक्ट आर्टिकल 370 हटाने से भी बड़ा प्रोजेक्ट है? इसकी संभावना बहुत ज्यादा है। डेमोग्राफी चेंज पर हाई लेवल कमेटी की क्रोनोलॉजी समझिए। पहले एसआईआर हुआ। गांव-गांव में तीन-तीन पीढ़ियों के कागज देख लिए गए। एसआईआर के बाद जनगणना शुरू हो गई। इसमें जातियों की भी गिनती होगी। जनगणना के बाद डेमोग्राफी चेंज की चेकिंग होगी। यानी पहले आइडेंटिफिकेशन हुआ फिर कंफर्मेशन हो रहा है। अंत में एक्शन होगा। फर्ज कीजिए कि किसी शहर में 20 साल पहले 10% मुसलमान थे। 20 साल बाद वहां 11 या 12% मुसलमान हुए तो इसे नेचुरल डेमोग्राफी चेंज माना जाएगा। लेकिन अगर 10% मुसलमान 20 साल में 30% या 40% हो गए तो जांच भी होगी, एक्शन भी होगा और एक-एक घुसपैठियों को बाहर निकाला जाएगा। डेमोग्राफी चेंज रोकने का जो मिशन अमित शाह ने शुरू किया 2027 में इसका असर दिखना स्टार्ट हो जाएगा और 29 तक इसकी गूंज रहेगी। सरहद के उस पार से पैदा होने वाले सारे खतरों पर हमारी नजर तो होनी ही चाहिए। मगर सरहद के उस पार से सरहद के अंदर जिन लोगों का उपयोग कर कर आंतरिक खतरा होता है उस पर भी हमारी नजर होनी चाहिए और उसको भी निर्दय निर्दयता के साथ कानून के तहत कार्यवाही करनी चाहिए। डेमोग्राफी चेंज में समय लगता है। सिस्टमैटिक तरीके से चलें तो इसे रिवर्स करने में भी टाइम लगता है। मगर बंगाल का घुसपैठिया भगाओ मॉडल तुरंत रिजल्ट दे रहा है। जैसी भागमभाग बॉर्डर पर मची है, वैसी ही भागमभाग ममता बनर्जी की पार्टी में मची है। क्या ममता बनर्जी की पार्टी टूट रही है? पहले केजरीवाल की पार्टी टूटी। फिर नवीन पटनायक की पार्टी टूटी। बिहार में लालू तेजस्वी यादव की पार्टी टूटी। क्या कांग्रेस में भी सबसे बड़ी फूट होगी? कर्नाटक में कांग्रेस के नाटक का क्लाइमेक्स क्या होगा? इस पर आगे बात करेंगे। कांग्रेस ने अभी का संकट टाल लिया है। लेकिन लॉन्ग टर्म क्राइसिस बची है। क्या राहुल गांधी कर्नाटक में राजस्थान वाली गलती दोहराएंगे या केरल वाली समझदारी दिखाएंगे? इस पर विस्तार से एक-एक पॉइंट बताएंगे। लेकिन सबसे पहले बात बंगाल की। दिल्ली में नरेंद्र मोदी की सरकार का 13वां साल शुरू हुआ। फोकस राज्यों पर है और राज्यों से भी ज्यादा बंगाल पर। बंगाल के नदिया में कल्याणी में टीएमसी की सीनियर लीडर काकोली घोष दास्तीदार मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की बैठक में शामिल हुए। काकोली ने कहा शुभेंदु का निमंत्रण मिला इसीलिए वह आई। दो टीएमसी विधायक भी शुभेंदु की बैठक में आए। बंगाल में टीएमसी के 29 में से 8 से 10 लोकसभा सांसदों के बीजेपी से संपर्क में होने की खबरें चल रही हैं। कहा जा रहा है कि आम आदमी पार्टी की तरह टीएमसी के कुछ राज्यसभा सांसद भी जंप मारने के चक्कर में हैं। काकोली घोष दस्तीदार तो खैर कैमरे पर आकर खुल्लम खुल्ला सब कुछ कह रही हैं।

बंगाल चुनाव होने तक टीएमसी में लोकसभा की चीफ विप रहीम काकोली घोष दस्तीदार ने सांसदी बचा कर रखी है। लेकिन टीएमसी के बाकी सभी पदों से इस्तीफा दे दिया है। केंद्र सरकार ने काकोली घोष दस्तीदार को वाई कैटेगरी की सीआईएसएफ सिक्योरिटी दी है। यानी स्टेज सेट है। काकोली के फैसले का वेट है। चार दशक तक ममता बनर्जी की करीबी नेता रही काकोली घोष ने इस्तीफा देते वक्त ममता के राजनीतिक मॉडल और अभिषेक बनर्जी के आईपैक मॉडल पर अटैक किया। हां मुझे लगता है कि ये जो संस्था काम किया और आगे जैसा हमें गाली दिया जैसे छोटे-छोटे बच्चे हमारे ऊपर दबाव डाला ये काम करने का तरीका नहीं है। वो जहां जाएगा मुझे लगता है चुनाव में वो खतरनाक रिजल्ट पैदा करेगा। टीएमसी के भीतर सब कुछ ठीक नजर नहीं आ रहा है। ममता बनर्जी अपनी पार्टी को एक रखने की जद्दोजहद में लगी हुई हैं। लेकिन एक अदृश्य महाशक्ति टीएमसी को तोड़ने की कोशिश में लगी हुई है। नॉर्थ कोलकाता की टीएमसी की मीटिंग हुई तो ना विधायक आए ना टीएमसी के काउंसलर्स आए। तो उत्तर कोलकाता का जो मीटिंग था उसमें उत्तर कोलकाता के हर काउंसिलर कोर कमेट जिला के जो लोग इंपॉर्टेंट पोजीशन में हैं सबको उपस्थित होने का बात था और एमएलए का एमएलए तो हम लोग गए थे लेकिन अधिकतर काउंसिलर नहीं थे अधिकतर नेताग नहीं थे जो उत्तर कोलकाता का मीटिंग में अंदर बैठने की जगह नहीं होती थी बाहर लोगों को खड़ा होना पड़ता था वहां पे चेयर खाली खाली था। लोग नहीं थे। तो इससे तो साफ जाहिर हो रहा है कि कहीं ना कहीं हम सबका मनोबल टूट रहा है। यह मनोबल जो टूट रहा है इसको रोकने की आवश्यकता है और यह संभव तभी होगा जब उच्चतर नेतृत्व इसको एड्रेस करेंगे। ऐसे छोड़ देने से नहीं होगा। एक इंस्ट्रक्शन आप दे दे रहे हैं कि सब अपने-अपने एरिया में जाओ। अभी तो सबसे बड़ा बात है कर्मी लोग का मनोबल को पकड़ के रखना। चारों तरफ जैसे हो रहा है जो भी न्यूज़ आ रही है इस पे तो कर्मी जो है उनका मनोबल ठीक नहीं रह सकता है। टीएमसी के काउंसिल यानी पार्षद अपने ऑफिस भी नहीं जा रहे हैं। कई काउंसलर्स ने इस्तीफा दे दिया है। कई काउंसलर्स घर बैठ गए हैं। कोलकाता नगर निगम पर अभी भी टीएमसी का कब्जा है। लेकिन जब काउंसलर्स ही नहीं जाएंगे तब कब्जा कितने दिन तक रहेगा कोई नहीं जानता। क्या नहीं नहीं वो पूरा हमारा पार्टी का अंदर का बात है वो एनालिसिस चल रहा है हम लोग कॉन्फिडेंट है अंडर द लीडरशिप ऑफ ममता बनर्जी उत्तर कोलकाता नॉर्थ कोलकाता हम फिर पूरा कोलकाता जो तृणमूल कांग्रेस है नॉर्थ साउथ सब मिलकर हम ये कॉरपोरेशन फिर हम लोग जीतने का क्या-क्या करना है पोल असेंबली का एनालिसिस और अब क्या-क्या करना है ये सब एनालिसिस हुआ और वी आर कॉन्फिडेंट। मोदी का 13वां साल विरोधियों के लिए भूकंप लेकर आया है। इसी भूकंप की आहट ओसा के नवीन पटनायक ने महसूस की।

बीजेडी के राज्यसभा सांसद देवाशीष सामंतरे ने 25 मई को बीजेडी से इस्तीफा दिया। 26 मई को देवाशीष सामंतरे ने बीजेपी जाइन कर ली। देवाशीष सामंतरे ने आम आदमी पार्टी के राघव चड्ढा की तरह पार्टी नहीं तोड़ी। उनको पार्टी में लाने के लिए दूसरा तरीका निकाला गया। देवाशीष सामंतरे के इस्तीफे से राज्यसभा की सीट खाली हुई है। राज्यसभा की सीट पर दोबारा चुनाव होगा। ओसा में बीजेपी की सरकार है। विधायक ज्यादा बीजेपी के हैं। राज्यसभा के चुनाव में देवाशीष सामंतरे के दोबारा सांसद बनने की पूरी संभावना रहेगी। इस तरह पार्टी तोड़े बिना और कोई रिस्क लिए बिना राज्यसभा में बीजेपी का एक सदस्य बढ़ जाएगा। बंगाल चुनाव के बीच में जब संसद में महिला आरक्षण संविधान संशोधन बिल गिरा तब बीजेपी को एहसास हुआ कि 303 सीट से 240 सीट पर रह जाने का क्या मतलब होता है? नरेंद्र मोदी की पार्टी तभी से मिशन मोड में काम कर रही है। बंगाल और असम जीतकर पार्टी का बेस बढ़ाया गया। संसद में बीजेपी की स्ट्रेंथ बढ़ाई जा रही है। इसीलिए राहुल गांधी जब यह कहते हैं कि मोदी सरकार एक साल में गिर जाएगी तो उसमें कोई तथ्य नहीं। बस नैरेटिव होता है। यूपी में अब वही बात अखिलेश यादव दोहरा रहे हैं। उन्होंने इसलिए ठीक कहा यूपी में समाजवादी सरकार बनते ही दिल्ली गिर जाएगी। मोदी सरकार का 13वां साल निर्णायक है। बीजेपी जनसंघ के दो पुराने और बड़े एजेंडे को जमीन पर उतारने की तैयारी में जुट चुकी है। कोशिश यह है कि फरवरी 2027 में जब यूपी, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर और गोवा

के चुनाव शुरू हो तब तक वैचारिक धरातल पर पार्टी इतनी मजबूत हो जाए कि घाटी समर्थकों को कोई गिला शिकवा ना रह जाए। इस मिशन का सबसे बड़ा टेस्ट यूपी में होने वाला है। जहां हिंदुत्व का झंडा योगी आदित्यनाथ ने थाम रखा है। अखिलेश यादव यूपी में पिछले 9 साल में हुए एनकाउंटर का जातिगत विश्लेषण कर रहे हैं। अखिलेश ने एनकाउंटर में भी पीडीए ढूंढ लिया है। जिस एनकाउंटर के पीछे चले मर्जी समझो वो है फर्जी। सच्चाई तो यह है कि मर्जी के हिसाब से फर्जी एनकाउंटर हो रहा है। उत्तर प्रदेश में एनकाउंटर वर्चस्व की धाक जमाने के लिए कहे जाते हैं। अपनी धाक बनी रहे। धाक से लोग डरे इसलिए उत्तर प्रदेश में एनकाउंटर किए जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार जाति धर्म देखकर के एनकाउंट करवाती है। इससे प्रदेश का सामाजिक सौहार्द बिगड़ता है। यूपी में इन दिनों बिजली संकट की खबर चल रही है।

अखिलेश वहां भी हेडलाइन बनाने में लगे हैं। डबल इंजन का धुआं निकल गया है। सबसे ज्यादा बिजली का कारखाना किसने लगाया और कम से कम मुख्यमंत्री जी एक कारखाने का नाम ले दें तो उससे भी थोड़ी बहुत बिजली से राहत मिल जाएगी। यूपी में बिजली कटौती हो रही है। यह सच बात है। मगर यह भी सच है कि यूपी में बिजली की मांग रिकॉर्ड लेवल पर है। अखिलेश के राज में जितनी बिजली की पीक डिमांड थी, उससे दोगुनी बिजली योगी आदित्यनाथ की सरकार सप्लाई कर रही है। अखिलेश राज में यूपी के अंदर बिजली की पीक डिमांड 16,000 मेगावाट थी। 25 मई 2026 को यूपी ने 31,824 मेगावाट बिजली की मांग पूरी करके रिकॉर्ड बना दिया। याद करना ऊर्जा संकट पर उंगली कौन उठा रहे हैं? जिनके समय में बिजली के तार पर लोग कपड़ा सुखाते थे। ये सच्चाई है। समाजवादी पार्टी के समय में बिजली नहीं आती थी। 26 मई का दिन कांग्रेस के लिए एक बार फिर चैलेंज लेकर आया। 12 साल पहले 26 मई को ही कांग्रेस के हाथ से दिल्ली की सत्ता निकली थी और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने थे। [प्रशंसा] मैं नरेंद्र दामोदर दास मोदी ईश्वर की शपथ लेता हूं

कि मैं विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा क्या कर रही हो मैडम 12 साल बाद कर्नाटक की सत्ता पर कांग्रेस की पकड़ कमजोर पड़ रही है। गेंद चुनकर देश के चार राज्यों में कांग्रेस का मुख्यमंत्री हैं। कर्नाटक, केरल, तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश। कांग्रेस के राज्यों में सबसे बड़ा राज्य है कर्नाटक। यहां विधानसभा की 224 सीटें हैं। लोकसभा की 28, राज्यसभा की 12। कर्नाटक ही वो राज्य है जो राहुल की पार्टी चला रहा है। चुनावों में कांग्रेस को सबसे ज्यादा आर्थिक मदद कर्नाटक से मिलती है। 26 मई को राहुल गांधी उसी कर्नाटक में प्रयोग करने लगे। टुडे एंटायर डिस्कशन इज ओनली कंसंट्रेटेड ऑन कमिंग राज्यसभा इलेक्शंस एंड काउंसिल इलेक्शंस ऑफ कर्नाटका। कांग्रेस ने दो दिन तक कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद पर सस्पेंस बनाकर रखा और अंत में यह कह दिया कि डिस्कशन केवल राज्यसभा चुनाव पर था। अगले महीने 18 जून को कर्नाटक में राज्यसभा की पांच सीटों पर चुनाव होंगे। राज्यसभा चुनाव महत्वपूर्ण है। लेकिन दांव पर कर्नाटक के मुख्यमंत्री की कुर्सी है। डीके शिवकुमार मुख्यमंत्री बनने के लिए अधीर हो रहे हैं। सिद्ध रमैया मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटने को तैयार नहीं है और राहुल गांधी में इतना साहस नहीं कि वह सीधे-सीधे [संगीत] सिद्ध रमैया को अपना फैसला सुना दें।

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