भारतीय सिनेमा के इतिहास में कपूर खानदान की जड़े पृथ्वीराज कपूर से लेकर राज कपूर और आज के रणबीर कपूर तक बहुत गहराई से फैली हुई है। लगभग 97 वर्षों से इस परिवार ने फिल्म इंडस्ट्री पर राज किया है। लेकिन दोस्तों क्या आप जानते हैं इस चमकते हुए फर्स्ट फैमिली ऑन ऑफ बॉलीवुड के ताज के नीचे एक बेहद रूढ़िवादी और पेट्रिया की सच्चाई को बड़ी ही चालाकी से छिपाया गया है।
यह कहानी सिर्फ एक मशहूर अभिनेत्री की कहानी नहीं है बल्कि यह एक ऐसी मासूम बच्ची की कहानी है जिसका बचपन बेरहमी से नोच लिया गया। एक ऐसी सुपरस्टार की कहानी है जिसे अपनी जवानी के चरम पर ही अपना पूरा करियर दफन करना पड़ा। और एक ऐसी मजबूर पत्नी की कहानी है जिसने दशकों तक एक शराबी और हिंसक पति का अत्याचार चुपचाप सहा। कपूर। खानदान की चमकती हुई बहू बनने से बहुत पहले नीतू कपूर का जन्म 8 जुलाई 1958 को नई दिल्ली में एक मध्यमवर्गीय पंजाबी सिख परिवार में हुआ था।
तब उनका नाम हरनीत कौर हुआ करता था। बचपन के वो दिन जब एक छोटी बच्ची को स्कूल जाना चाहिए। अपनी गुड़ियों से खेलना चाहिए। हरनीत के लिए वो दिन एक भयानक और कभी ना खत्म होने वाले बुरे सपने में बदल गए। उनके पिता दर्शन सिंह के अचानक निधन ने उनकी जिंदगी की पूरी कहानी को हमेशा के लिए पलट कर रख दिया। पिता की मौत के बाद परिवार की पूरी आर्थिक जिम्मेदारी उनकी मां राजी सिंह के कंधों पर आ गई। लेकिन राजी सिंह कोई आम मां नहीं थी बल्कि बॉलीवुड के गलियारों और पुरानी स्टार डस्ट जैसी पत्रिकाओं की मानें तो राजी सिंह की पर्सनालिटी बेहद सख्त और खौफनाक थी। और ऐसा भी कहा जाता है कि उनकी मां एक कोठे वाली थी।
दरअसल नीतू कपूर की नानी को उनके सगे रिश्तेदारों ने पर बेच दिया था। और 14 साल की उम्र से ही नीतू की मां को इस धंधे में धकेल दिया गया। हालांकि राजी आगे बढ़ना चाहती थी, हीरोइन बनना चाहती थी। इसीलिए अपने सपने को पूरा करने के लिए राजी 22 साल की उम्र में कोठे से भागकर दिल्ली पहुंच गई। यहां वो एक मिल में काम करने लगी। मिल में ही उसकी मुलाकात दर्शन सिंह नाम के एक लड़के से हुई। दोनों ने शादी कर ली और शादी के 1 साल बाद उनके घर एक बेटी का जन्म हुआ। बेटी का नाम रखा हरनीत सिंह। क्या आप इस बात की कल्पना भी कर सकते हैं कि महज 8 साल की उम्र में किसी बच्ची को अपने पूरे परिवार का पेट पालने के लिए दिन रात स्टूडियो की तेज चुभती और गर्म लाइटों के नीचे लगातार खड़ा कर दिया जाए। हरनीत कौर के साथ बिल्कुल यही हुआ था।
उनकी मां ने उन्हें बेबी सोनिया का नाम दिया और 1966 में सूरज और 10 लाख जैसी फिल्मों में काम करने के लिए पूरी तरह से मजबूर कर दिया। फिल्म दो कलियां में जुड़वा बहनों की दोहरी भूमिका ने उन्हें देश भर में मशहूर तो कर दिया। लेकिन इस शोहरत की बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी और वह कीमत थी उनका अपना मासूम बचपन। एक ऐसा बचपन जहां कोई नॉर्मल स्कूल लाइफ नहीं थी। कोई छुट्टियां नहीं थी।
सिर्फ और सिर्फ डायरेक्टर का एक्शन और कट ही उनकी जिंदगी बन गया था। इससे भी ज्यादा रूहंपा देने वाली बात वह है जो उस दौर के कुछ पत्रकारों और फिल्म इंडस्ट्री के अंदरूनी सूत्रों ने हमेशा दबे स्वर में कही और जिन पर आज भी यकीन करना मुश्किल होता है। अफवाहों और कई डार्क रिपोर्ट्स के अनुसार राजी सिंह का अपना अतीत भी काफी विवादित रहा था और जब नीतू महज 14 साल की एक कच्ची उम्र में थी, तब उनकी मां ने उनकी बेहद कामुक तस्वीरें फिल्म निर्माताओं को बांटी थी। एक और भयानक दावा यह भी किया जाता है कि नीतू के शरीर को समय से पहले बड़ा और मैच्योर दिखाने के लिए उन्हें बहुत कम उम्र में ही भारी मात्रा में हॉर्मोंस के दिए गए थे ताकि वह बाल कलाकार की छवि से जल्दी बाहर निकलकर लीड हीरोइन बन सकें और परिवार के लिए ज्यादा से ज्यादा पैसे कमा सकें। एक छोटी बच्ची के लिए इतनी कम उम्र में पूरे घर चलाने की जिम्मेदारी उठाना और अपनी ही सगी मां द्वारा किए गए इस भयानक का मनोवैज्ञानिक असर इतना गहरा था कि नीतू ताऊ उम्र एक ऐसी सहमी हुई लड़की बनकर रह गई जिसे जिंदगी भर हमेशा एक रक्षक या एक मजबूत सहारे की तलाश रही। 70 का दशक बॉलीवुड के लिए वह सुनहरा दौर था। जब पर्दे पर एंग्री यंग मैन का जादू लोगों के सिर चढ़कर बोल रहा था।
और नायिकाओं की छवि बहुत नाजुक और शर्मीली हुआ करती थी। इस दौर में बाल कलाकार से लीड एक्ट्रेस बनने का ट्रांजिशन बहुत कम लोगों के लिए सफल होता है। लेकिन नीतू ने यह नामुमकिन सा करिश्मा कर दिखाया। 1973 में आई फिल्म रिक्शावाला से उन्होंने लीड एक्ट्रेस के तौर पर अपना डेब्यू किया। हालांकि असली तहलका उसी साल नासिर हुसैन की ब्लॉकबस्टर फिल्म यादों की बारात ने मचाया। जिसने बॉक्स ऑफिस के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे। बर्मन के शानदार संगीत से सजे गाने लेकर हम दीवाना दिलों में उनके बिंदास, बेबाक और चुलबुले अंदाज ने रातों-रात उन्हें एक ओवरनाइट स्टार बना दिया और पूरे देश की धड़कन तेज कर दी। 70 के दशक में।
जहां हीरोइनें सिर्फ पेड़ के इर्द-गिर्द नाचती हुई नजर आती थी, नीतू ने एक मॉडर्न, खुशमिजाज और आजाद ख्यालों वाली लड़की की नई और ताजी इमेज घड़ी। अमिताभ बच्चन से लेकर शशि कपूर और शत्रुघ्न सिन्हा जैसे उस दौर के हर बड़े सुपरस्टार के साथ उन्होंने स्क्रीन शेयर की और अपनी एक्टिंग का लोहा मनवाया। दीवार कभी-कभी, अमर अकबर एंथनी और काला पत्थर जैसी बेहतरीन फिल्मों ने उन्हें बॉक्स ऑफिस की सबसे बड़ी गारंटी बना दिया था। लेकिन इस चमकते हुए और दूर से सुहावने लगने वाले स्टारडम के पीछे एक हाफती थक चुकी और रोती हुई लड़की छिपी थी।
जिसे कोई नहीं देख पा रहा था। क्या आप जानते हैं कि उस वक्त नीतू का वर्क शेड्यूल कितना ज्यादा खौफनाक और थका देने वाला था। उन्होंने महज 7 साल के अपने लीड करियर में लगभग 70 फिल्मों में काम किया था। जो आज के समय में सोचना भी नामुमकिन है। एक दिन में तीन-तीन शिफ्ट्स करना, एक स्टूडियो से दूसरे स्टूडियो पागलों की तरह भागना, बार-बार कपड़े बदलना और फिर से कैमरे के सामने आकर एक नकली मुस्कान बिखेरना उनकी रोजमर्रा की जिंदगी बन चुका था। उनके पास अपनी पर्सनल लाइफ के लिए, अपने खुद के लिए एक सेकंड का भी समय नहीं था।
यह भारी सफलता और स्टारडम उनके लिए एक सोने के पिंजरे जैसी बन गई थी। जिससे वह किसी भी कीमत पर कैसे भी करके बाहर निकलना चाहती थी। इसी खतरनाक भागदौड़ और गहरी मानसिक थकान के बीच उनकी जिंदगी में एक ऐसे शख्स की एंट्री होती है जिसने सब कुछ बदल दिया और वो थे कपूर खानदान के चॉकलेट बॉय रशी कपूर। रशी और नीतू की पहली मुलाकात 1974 में फिल्म जहरीला इंसान के सेट पर हुई थी। तब नीतू की उम्र महज 16 साल थी, और वह दुनियादारी से पूरी तरह अनजान थी। आपको जानकर शायद बहुत हैरानी होगी कि शुरुआत में नीतू को और ऋ कपूर बिल्कुल भी पसंद नहीं थे और दोनों के बीच कोई रोमांटिक एंगल नहीं था। रशी का बर्ताव सेट पर एक बुली जैसा था जो हमेशा दूसरों को परेशान करने में मजा लेता था। वह नीतू के मेकअप रूम में जबरदस्ती घुस जाते।
उनका सेट किया हुआ आई लाइनर खराब कर देते और उन्हें हर छोटी बड़ी बात पर बहुत चिढ़ाते थे। रशी कपूर उस समय बहुत बड़े स्टार थे। उनके पास दौलत और शोहरत की कोई कमी नहीं थी। और उनका मिजाज भी काफी तुनक मिजाज था। दिलचस्प बात यह है कि बॉलीवुड की इस सबसे आइकॉनिक लव स्टोरी की शुरुआत प्यार से नहीं बल्कि एक अजीब सी दोस्ती और विंग वुमन बनने से हुई थी। रशि कपूर उस समय यासमीन और डिंपल कपाडिया जैसी अपनी तत्कालीन गर्लफ्रेंड्स को लेकर काफी उलझे हुए रहते थे। नीतू उन्हें दूसरी लड़कियों को इंप्रेस करने के लिए नई-नई ट्रिक्स बताती थी और यहां तक कि उनके लव लेटर्स लिखने में भी उनकी पूरी मदद करती थी।
जब भी आर्शी का किसी से ब्रेकअप होता था तो वह एक बच्चे की तरह नीतू के कंधे पर सिर रखकर रोते थे और अपना दर्द बांटते थे। एक डरी हुई और अपनी मां के कड़े नियंत्रण में घुट रही नीतू को राशि में अचानक एक रक्षक नजर आने लगा और दूसरी तरफ रशि को नीतू में एक ऐसा सॉफ्ट कुशन मिल गया जो उनकी हर बदतमीज़ी, हर गुस्से, और हर नखरे को बिना शिकायत किए बर्दाश्त कर सकता था। इस अजीब सी दोस्ती के प्यार में बदलने का टर्निंग पॉइंट तब आया जब ऋषि कपूर अपनी फिल्म बारूद की शूटिंग के लिए पेरिस गए हुए थे। और नीतू कश्मीर की वादियों में कभी-कभी की शूटिंग कर रही थी। पेरिस की रोमांटिक हवाओं के बीच रशी को अचानक पहली बार नीतू की कमी बहुत गहराई से खलने लगी। उन्होंने वहां से सीधे कश्मीर एक टेलीग्राम भेजा। जिसके शब्द आज भी बॉलीवुड के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज हैं।
उसमें लिखा था यह सीखनी बड़ी याद आती है। नीतू ने जब वह टेलीग्राम पढ़ा तो उनकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा और उन्होंने उसे खुशी-खुशी यश चोपड़ा व पामेला चोपड़ा को दिखाया। लेकिन कहानी इतनी आसान नहीं थी। क्योंकि ऋषि कपूर कमिटमेंट फोबिया के गहरे शिकार थे। उन्होंने रिश्ते की शुरुआत में ही नीतू से साफ और कड़े शब्दों में कह दिया था, “मैं सिर्फ तुम्हें डेट करूंगा। तुमसे कभी शादी नहीं करूंगा। यह कपूर खानदान के बेटों का एक क्लासिक ईगो था, जहां उन्हें लगता था कि वे जो चाहे कर सकते हैं।
लेकिन नीतू की मासूमियत और उनके अटूट समर्पण ने धीरे-धीरे पत्थर दिल रशी को पूरी तरह से बदल कर रख दिया। दोनों ने एक साथ 12 ब्लॉकबस्टर फिल्मों में काम किया और खेल-खल में से लेकर रफू चक्कर तक उनकी शानदार ऑन स्क्रीन केमिस्ट्री का जादू पूरे देश के सिर चढ़कर बोलने लगा। लेकिन जब प्यार परवान चढ़ा, तो नीतू की जिंदगी का सबसे बड़ा और सबसे दर्दनाक इम्तिहान उनके सामने आ खड़ा हुआ।
कपूर खानदान की एक पुरानी, गहरी और अटूट परंपरा थी कि उनके घर की बहुएं शादी के बाद फिल्मों में काम बिल्कुल नहीं करेंगी। राज कपूर के दौर से ही यह नियम बेहद सख्त था। और हालांकि शम्मी कपूर और शशि कपूर की पत्नियों के मामले में कुछ छोटे अपवाद जरूर थे, लेकिन मुख्य खानदान में यह पूरी तरह से वर्जित माना जाता था। उस समय नीतू कपूर का अपना खुद का करियर एकदम चरम पर था और सफलता उनके कदम चूम रही थी। वह इंडस्ट्री की नंबर वन हीरोइन बनने की रेस में सबसे आगे थी और उनके पास ढेरों बड़े फिल्म ऑफर्स की लाइन लगी हुई थी। लेकिन जब प्यार और करियर में से किसी एक को चुनने की भारी-बारी आई तो नीतू ने बिना पलक झपकाए अपना चमकता हुआ करियर हमेशा के लिए कुर्बान कर दिया। 1980 में, महज 21 साल की कच्ची उम्र में, जब अन्य अभिनेत्रियां इंडस्ट्री में अपना करियर शुरू करने के लिए संघर्ष करती हैं। नीतू ने बॉलीवुड को हमेशा हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। उन्होंने अपनी साइन की हुई फिल्मों का साइनिंग अमाउंट तक निर्माताओं को वापस लौटा दिया और भारी मन से शादी के मंडप में बैठ गई।
पब्लिक प्लेटफॉर्म्स पर नीतू ने हमेशा दुनिया के सामने यही कहा कि यह पूरी तरह से उनका अपना फैसला था क्योंकि वह लगातार काम से थक चुकी थी और अब सिर्फ एक शांतिपूर्ण परिवार चाहती थी। लेकिन कई बड़े फिल्म समीक्षकों और गॉसिप कॉलम्स का गहराई से यह मानना है कि यह फैसला कपूर खानदान के भारी दबाव और रशि कपूर की गहरी असुरक्षा का ही नतीजा था। कहा जाता है कि रशी कपूर इतने ज्यादा पजेसिव थे कि वह अपनी पत्नी को स्क्रीन पर किसी और हीरो के साथ रोमांस करते हुए बिल्कुल नहीं देख सकते थे। इसे इंटरनलाइज्ड मिसोजनी का एक क्लासिक उदाहरण कहा जा सकता है। शादी के बाद नीतू कपूर ने पूरी तरह से खुद को पारिवारिक जिम्मेदारियों और रिश्तों को निभाने में झोंक दिया। उन्होंने अपनी सास कृष्णा राज कपूर को अपना एकमात्र आदर्श माना और कपूर परिवार के उस भव्य लेकिन बेहद डिमांडिंग लाइफ स्टाइल में खुद को पूरी तरह से ढाल लिया जहां बाहर से सब परफेक्ट दिखना जरूरी था। लेकिन उनकी असली और सबसे भयानक परीक्षा 80 और 90 के दशक में शुरू हुई।
जिसने उन्हें तोड़ कर रख दिया। यह वह दौर था जब बॉलीवुड में अचानक एक्शन फिल्मों का भारी दबदबा बढ़ रहा था। और रशी कपूर जैसे रोमांटिक चॉकलेट बॉय का चार्म पर्दे पर फीका पड़ने लगा था। रशी के करियर में बहुत भारी गिरावट आई। उनकी एक के बाद एक कई फिल्में बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह फ्लॉप होने लगी और वह खुद को संभाल नहीं पाए और गहरे डिप्रेशन में चले गए। इस भयानक असफलता का पूरा फ्रस्ट्रेशन और सारा गुस्सा उन्होंने अपनी पर्सनल लाइफ और अपनी पत्नी नीतू पर निकाला।
हालात इतने बिगड़ गए कि राशि कपूर शराब के भारी आदि हो गए। जो दरअसल उनके परिवार की एक पुरानी कमजोरी भी मानी जाती थी। शराब की इस जानलेवा लत ने उनके हंसते खेलते परिवार और आशियाने को एक जीते जागते नरक में तब्दील कर दिया। रशि कपूर का गुस्सा इतना भयानक और बेकाबू था कि सेठ पर वह नाना पाटेकर जैसे दिग्गज अभिनेताओं से सरेआम भिड़ जाते थे। अपने सगे भाई राजीव कपूर को सबके सामने बेइज्जत करते थे और एक बार तो उन्होंने संजय खान के मुंह पर गुस्से में शराब का पूरा गिलास तक फेंक दिया था। यही हैवानियत और यही बेलगाम गुस्सा घर की चार दीवारी के भीतर भी पूरी तरह से दाखिल हो गया था। 90 के दशक में कई बड़ी गॉसिप मैगजीन में यह खबर जंगल की आग की तरह फैली कि कपूर नशे में धुत होकर नीतू पर हाथ उठाते थे और उन्हें घरेलू हिंसा का शिकार बनाते थे।
स्थिति इतनी ज्यादा बदतर और असहनीय हो गई थी कि नीतू कपूर को एक रात मजबूर होकर पुलिस स्टेशन जाना पड़ा और अपने सुपरस्टार पति के खिलाफ घरेलू हिंसा की आधिकारिक शिकायत दर्ज करानी पड़ी थी। क्या आप कभी सपने में भी सोच सकते हैं कि देश के सबसे बड़े और मशहूर सुपरस्टार की पत्नी आधी रात को अपना घर छोड़कर चली गई थी? जी हां, यह कोई मनगढ़ंत अफवाह नहीं बल्कि कपूर खानदान की एक बहुत ही कड़वी सच्चाई थी। नीतू कपूर ने आखिरकार अपना घर छोड़ दिया था और चूंकि उनके पास अपनी कोई इनकम या आर्थिक सहारा नहीं था। इसलिए उन्होंने अपनी इज्जत बचाने और अपने पैरों पर खड़ी होने के लिए मुंबई के बांद्रा इलाके में एक ब्यूटी सेलून खोल लिया था। यह पूरे कपूर खानदान के लिए बहुत बड़ी और शर्मनाक बेइज्जती थी। लेकिन अपनी बच्चों की खातिर और समाज के डर से नीतू कुछ समय बाद वापस उसी घर में लौट आई और रिशि कपूर को फिर से उसी तरह संभालना शुरू कर दिया। इस पूरे डार्क और तकलीफ देह फेज में नीतू कपूर अपने बच्चों के लिए एक मजबूत चट्टान की तरह खड़ी रहीं।
उन्होंने अपने पति के चीखने चिल्लाने, उनकी बेवफा बेवफाई की कई उड़ती अफवाहों जिसमें डिंपल कपाड़ियां, दिव्या भारती और जूही चावला के साथ उनके लिंकअप्स शामिल थे और उनकी बढ़ती शराब की लत को चुपचाप आंसू पीकर बर्दाश्त किया। रशि कपूर इतने ज्यादा तुनक मिजाज और गुस्से वाले थे कि वह अपने ही बच्चों से सीधे तौर पर बात तक नहीं करते थे। रणबीर कपूर के बचपन का वो माहौल किसी भी आम बच्चे के लिए एक भयानक सदमे और ट्रॉमा जैसा था। निखिल कामत के साथ एक पॉडकास्ट और कई पुराने इंटरव्यूज में रणबीर ने खुद इस दिल दहला देने वाले काले सच को बिना झिझक के कबूल किया है।
रणबीर ने बड़ी उदासी से बताया कि उनके माता-पिता के झगड़े इतने ज्यादा खौफनाक और तेज होते थे कि वह रात के 5 या 6:00 बजे तक अपने घर की ठंडी सीढ़ियों पर अपने घुटनों के बीच सिर छिपाकर डर के मारे बैठे रहते थे। सिर्फ इस इंतजार में कि कब उनके माता-पिता का चिल्लाना बंद होगा और घर में शांति होगी। रशि की भारी आवाज का टेरर बच्चों के मन में इतना ज्यादा था कि रणबीर ने बचपन में कभी हिम्मत करके अपने पिता की आंखों में आंखें डालकर बात नहीं की। यहां तक कि उन्हें सालों तक अपने पिता की आंखों का असली रंग तक नहीं पता था। ऐसे खौफनाक और डरावने माहौल में नीतू ने एक पिता और बच्चों के बीच एक महत्वपूर्ण ब्रिज का काम किया और उन्हें जोड़े रखा। वह रणबीर और रिद्धिमा को दुनिया की वह सब कुछ खुशियां देना चाहती थी जो उन्हें अपने छिन्ने हुए और दर्दनाक बचपन में कभी भी नसीब नहीं हुआ था। नीतू ने धीरे-धीरे रणबीर को अपनी गहरी भावनाओं का डस्टबिन और अपना जिंदगी का सबसे बड़ा सहारा बना लिया। यही सबसे बड़ा कारण है कि रणबीर अपनी मां के अत्यधिक करीब हैं। और पिता से जिंदगी भर हमेशा एक अजीब सी दूरी महसूस करते रहे। कपूर खानदान की यह डार्क रियलिटी सिर्फ रशी और नीतू के बेडरूम तक ही सीमित नहीं थी।
बल्कि घर के बाहर भी बहुत कुछ चल रहा था। इस राजसी परिवार के भीतर एक बहुत बड़ा और खामोश शीत युद्ध भी चल रहा था। जो बाहरी दर्शकों की नजरों से बहुत चालाकी से छिपा हुआ था। यह भयानक जंग थी कपूर खानदान की दो बहुओं यानी नीतू कपूर और बबीता कपूर के बीच। बबीता ने कपूर खानदान के उन सारे दमनकारी नियमों के खिलाफ खुली बगावत कर दी थी, जिन्हें नीतू ने चुपचाप मान लिया था। बबीता हर हाल में अपनी बेटियों, करिश्मा और करीना को सुपरस्टार बनाना चाहती थी, और अपने इस मकसद के लिए, उन्होंने अपने पति रणधीर कपूर का घर हमेशा के लिए छोड़ दिया था। दूसरी तरफ, नीतू कपूर थी, जिन्होंने परिवार की खातिर सिर झुकाकर सारे कड़े नियम मान लिए थे, और अपनी पहचान मिटा दी थी। दोनों के सोचने और जीने का तरीका एक दूसरे से बिल्कुल अलग था और इसी वजह से दशकों तक दोनों परिवारों के बीच कोई बातचीत तक नहीं हुई।
यह दुश्मनी इतनी ज्यादा गहरी और कड़वी थी कि पारिवारिक शादियों तक का खुलकर बहिष्कार किया गया। जब करिश्मा कपूर की शादी हुई तो नीतू कपूर और उनके बच्चे इस शादी से पूरी तरह गायब रहे। वहीं रिद्धिमा की शादी में बबीता और उनकी बेटियों ने हिस्सा नहीं लिया। आज जो कपूर खानदान आपको क्रिसमस ब्रंच पर एक साथ हंसता मुस्कुराता और प्यार जताता नजर आता है वह बहुत बाद में पीआर एजेंसियों की मेहनत और करीना रणबीर की नई पीढ़ी की समझदारी से बना है। वरना असलियत में अंदर से यह पूरा परिवार कई गुटों में बंटा हुआ था और एक दूसरे से नफरत करता था। जब रणबीर कपूर ने बॉलीवुड में फिल्म सांवरिया से अपना पहला कदम रखा, तो नीतू की जिंदगी का एक नया सेकंड फेज शुरू हुआ। नीतू अपने बेटे के उभरते करियर और उसकी निजी जिंदगी में बहुत गहराई से इनवॉल्व रहती थी। रणबीर के लिए नीतू सिर्फ एक मां नहीं थी बल्कि एक सख्त गाइड और हर कदम पर उनका बचाव करने वाली रक्षक बन गई थी। ऐसा माना जाता है कि रणबीर की पर्सनल लाइफ और उनकी गर्लफ्रेंड को लेकर भी नीतू की राय बहुत ज्यादा मायने रखती थी और वह इसे कंट्रोल करती थी। चूंकि नीतू ने खुद एक टॉक्सिक और शोषक माहौल से लड़कर अपना मुकाम बनाया था इसलिए वह अपने इकलौते बेटे को लेकर एक्स्ट्रा प्रोटेक्टिव थीं।
जैसे-जैसे वक्त आगे बढ़ा, ऋषि कपूर की उम्र ढलने लगी और उनकी वह पुरानी आक्रामकता और गुस्सा कम होने लगा। अपनी सेकंड इनिंग्स में ऋषि कपूर ने ना केवल बेहतरीन कैरेक्टर रोल्स अपनाए बल्कि अपनी निजी जिंदगी में भी वह पूरी तरह से नीतू पर निर्भर हो गए। एक वक्त ऐसा आ गया जब ऋषि कपूर अपनी पत्नी के बिना 1 मिनट भी शांति से नहीं रह सकते थे। जब नीतू अपनी दोस्तों के साथ लंच या कोई फिल्म देखने बाहर जाती थी तो रशि घबराकर उन्हें लगातार फोन करते रहते थे। लेकिन जिंदगी जब वापस पटरी पर लौटती हुई लग रही थी तभी 2018 में एक ऐसा भयानक तूफान आया जिसने सब कुछ फिर से तहस-नहस कर दिया। रशि कपूर को ल्यूकेमिया जो कि एक प्रकार का ब्लड कैंसर है डिटेक्ट हुआ और रातोंरात कपूर परिवार की पूरी दुनिया उजड़ गई। बेहतरीन इलाज के लिए उन्हें तुरंत न्यूयॉर्क ले जाया गया।
इलाज के उन दर्दनाक 11 महीनों के दौरान नीतू कपूर का सबसे बड़ा और असली इम्तिहान शुरू हुआ। जिस पति ने उन्हें अपनी पूरी जिंदगी भर रुलाया था, आज उसी पति की टूटती सांसे बचाने के लिए वह न्यूयॉर्क के अस्पतालों के दिन रात चक्कर काट रही थी। आखिरकार 30 अप्रैल 2020 को कैंसर से एक लंबी जंग लड़ते हुए रशी कपूर ने मुंबई में अपनी आखिरी सांस ली। यह खबर इरफान खान की मौत के ठीक एक दिन बाद आई थी। जिसने पूरे देश को बुरी तरह झोर कर रख दिया था। रशी कपूर के अचानक चले जाने के बाद नीतू की जिंदगी एकदम से सूनी और खाली हो गई। वह आदमी जो पिछले कई दशकों से उनके लिए एक फुल टाइम जॉब बन चुका था, जिसकी देखभाल में उनका हर पल गुजरता था, अब वह नहीं था।
इस भारी लॉस को हैंडल करना नीतू के लिए बिल्कुल भी आसान नहीं था। 2022 में जब रणबीर कपूर और आलिया भट्टे की शादी हुई, तो उस शादी में मौजूद हर किसी की आंखें नम थी। रशि कपूर की कमी हर छोटी बड़ी रस्म में गहराई से महसूस की जा रही थी। नीतू कपूर की जिंदगी हमें आखिर क्या सिखाती है? यह कहानी सिर्फ ग्लैमर और स्टारडम की नहीं है। यह एक ऐसी मजबूत महिला की मिसाल है जिसने अपना पूरा बचपन अपनी मां कीत्वाकांक्षाओं पर कुर्बान कर दिया। अपनी सुनहरी जवानी अपने सच्चे प्यार और कपूर खानदान के गुरूर पर न्योछावर कर दी और अपनी आधी जिंदगी एक टॉक्सिक रिश्ते को संभालने में गुजार दी। लेकिन इस कहानी का अंत दुखद नहीं है।
बल्कि यह कहानी हमें बताती है कि जिंदगी किसी भी उम्र में किसी भी खतरनाक मोड़ पर रिस्टार्ट की जा सकती है। क्या आपको लगता है कि नीतू कपूर का अपने चमकते करियर को छोड़ना सही फैसला था? क्या कपूर खानदान की इस पितृसत्तात्मक सोच ने उनके बेजोड़ टैलेंट के साथ नाइंसाफी की?