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जब घमंड में चूर विनोद खन्ना ने मोहम्मद रफी का किया सारेआम अपमान फिर रफी ने…

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क्या आप सोच सकते हैं कि भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक ऐसा भी दिन आया था जब एक उभरते हुए सुपरस्टार ने अपनी फिल्म में सदी के सबसे महान गायक की आवाज पर होंठ हिलाने से सरेआम इनकार कर दिया था।

आखिर वह कौन सा सुपरस्टार था जो बॉक्स ऑफिस के नए गणित से इतना डरा हुआ था कि उसने खुदा की आवाज कहे जाने वाले मोहम्मद रफी साहब को रिजेक्ट करने की ठान ली थी। रिकॉर्डिंग स्टूडियो के बंद दरवाजों के पीछे उस दिन ऐसा क्या घटा जिसने उस जिद्दी सुपरस्टार के अहंकार को हमेशा के लिए चकनाचूर कर दिया और कैसे एक ठुकराया हुआ गीत रातों के इतिहास का सबसे अमर और युगल गीत बन गया। दोस्तों यह कोई मनगढ़ंत कहानी या छोटी-मोटी अफवाह नहीं है बल्कि यह तो 70 के दशक के उस सुनहरे दौर की एक सच्ची घटना है जब हमारा बॉलीवुड अपनी रोमांटिक छवि को त्याग कर मारधाड़ और एक्शन की एक नई पगडंडी पर कदम रख रहा था। 1970 यह वह दौर था जब 50 और 60 के दशक के वह मीठी मेलोडी और पेड़ों के इर्द-गिर्द गाते हुए नरम दिल वाले नायकों का युग अपनी आखिरी सांसे गिन रहा था।

दिग्गज लेखकों की कलम से जंजीर जैसी फिल्मों ने एंग्री यंग मैन और अंडरवर्ल्ड का ऐसा दौर शुरू कर दिया था जिसने दर्शकों की पसंद को रातों-रात बदल कर रख दिया था। लेकिन इस बदलाव की सबसे तगड़ी मार सिर्फ सिनेमा के पर्दे पर ही नहीं बल्कि संगीत की दुनिया पर भी पड़ी थी। साल 1969 में जब आरडी बर्मन के जादुई संगीत से सजी फिल्म आराधना रिलीज हुई तो मानिए जैसे संगीत की दुनिया में एक बहुत बड़ा ज्वालामुखी फट गया। किशोर कुमार की वह गहरी भारी और योडलिंग वाली आवाज ने पूरे देश को एक झटके में अपना दीवाना बना लिया था।

मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू जैसे गीतों ने किशोर दा को सफलता का एक ऐसा अंतिम पर्याय बना दिया था जिसने मोहम्मद रफी को सीधे तौर पर चुनौती दे डाली थी। इंडस्ट्री के निर्माताओं और निर्देशकों के भीतर यह अटल विश्वास पनप चुका था कि अब अगर बॉक्स ऑफिस पर ब्लॉकबस्टर सफलता चाहिए तो वह सिर्फ और सिर्फ किशोर कुमार की आवाज ही कर सकती है। किशोर दा की आवाज का यह जादू और खुमार इंडस्ट्री पर इतना हावी था कि बड़े-बड़े सुपरस्टार्स भी इसी बहती गंगा में हाथ धोना चाहते थे और इसी कमर्शियल दबाव ने एक दिन एक ऐसी चिंगारी को जन्म दिया जिसने मुंबई के एक मशहूर रिकॉर्डिंग स्टूडियो में भयंकर आग लगा दी। इस चिंगारी की असल शुरुआत साल 1974 में हुई जब मुंबई के महबूब स्टूडियो में एक फिल्म की शूटिंग जोरों-शोरों से चल रही थी। फिल्म का नाम था हाथ की सफाई। जंजीर की ब्लॉकबस्टर सफलता के बाद रातों-रात इंडस्ट्री के सबसे बड़े डायरेक्टर बन चुके प्रकाश मेहरा इस फिल्म का निर्देशन और इसकी भी कहानी सलीम-जावेद ने ही लिखी थी.

जो 1959 की क्लासिक दो उस्ताद से प्रेरित थी। इस फिल्म में दो नायक थे। एक चुलबुला पॉकेटमार राजू और दूसरा अंडरवर्ल्ड का एक बड़ा डॉन और स्मगलर शंकर। इस बड़े प्रोजेक्ट के संगीत का जिम्मा उस दौर की सबसे हिट म्यूजिकल जोड़ी कल्याणजी-आनंदजी के कंधों पर था जो संगीत में क्लेवोलिन जैसे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का शानदार प्रयोग करने के लिए मशहूर थे। दरअसल फिल्म की कहानी जब अपने पीक इमोशंस पर पहुंचती है तो डॉन शंकर और उसकी पत्नी रोमा के बीच एक बेहद जज्बाती, रूहानी और खूबसूरत रोमांटिक डुएट गाना फिल्माया जाना था। गुलशन बावरा की कलम से निकले इस गीत के बोल थे वादा कर ले सजना तेरे बिना मैं ना रहूं। जब कल्याणजी-आनंदजी ने कोंगा बीट्स और गिटार के जादू के साथ इस गाने की धुन तैयार की तो उन्हें पूरा यकीन हो गया कि इस गाने में जो दर्द, ठहराव और कशिश चाहिए वह केवल स्वर कोकिला लता मंगेशकर और गायकी के खुदा मोहम्मद रफी ही अपनी आवाज से पैदा कर सकते हैं।

लेकिन जैसे ही इस मास्टरपीस गाने की भनक उस लीड एक्टर को लगी जिसके ऊपर यह गाना फिल्माया जाना था, फिल्म के सेट पर एक ऐसा तूफान खड़ा हो गया जिसने सबको सन्न कर दिया। वह एक्टर और कोई नहीं के सबसे हैंडसम, माचो और स्टाइलिश सुपरस्टार विनोद खन्ना थे। विनोद खन्ना उस समय अपने करियर के एक बेहद नाजुक लेकिन महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़े थे। मेरा गांव मेरा देश जैसी फिल्मों में एक खूंखार विलेन के रूप में अपनी शुरुआत करने के बाद वे अब विलेन की छवि को तोड़कर एक हीरो के रूप में खुद को स्थापित कर रहे थे। जब विनोद खन्ना को पता चला कि वादा कर ले सजना गाना मोहम्मद रफी गा रहे हैं, तो वे बुरी तरह से घबरा गए। उनका यह खौफ किसी व्यक्तिगत लड़ाई का नतीजा नहीं था, बल्कि यह उस युग की इनसिक्योरिटी और बॉक्स ऑफिस के उस नए गणित का डर था जो कहता था कि बिना किशोर कुमार के कोई गाना हिट नहीं हो सकता।

विनोद खन्ना को यह डर सता रहा था कि उनका किरदार एक रफ और टफ इंसान का है, एक खूंखार क्रिमिनल का है और रफी साहब की नरम आवाज उनके इस रफ टफ अवतार पर बिल्कुल भी मेल नहीं खाएगी। अपनी ऐसी नई स्टार इमेज और उभरते करियर की फिक्र में डूबे विनोद खन्ना ने सीधे डायरेक्टर प्रकाश मेहरा और संगीतकार कल्याण जी आनंद जी से संपर्क किया और अपनी कड़ी नाराजगी जाहिर कर दी। उन्होंने साफ शब्दों में धमकी दे डाली कि अगर इस गाने को रफी साहब की जगह किशोर कुमार से नहीं गवाया गया, तो वे किसी भी कीमत पर कैमरे के सामने इस गाने पर लिप्सिंग नहीं करेंगे। एक उभरते हुए सुपरस्टार की यह जिद और यह बगावत इंडस्ट्री के उस स्याह सच को सामने ला रही थी जहां बाजार का दबाव भारी पड़ने लगा था।

विनोद खन्ना की इस खुली बगावत और कमर्शियल दबाव के आगे झुकना उस दौर में किसी भी संगीतकार के लिए आसान रास्ता हो सकता था। लेकिन कल्याण जी आनंद जी उस मिट्टी के बने फनकार थे जो अपनी कला और धुनों के साथ कभी समझौता नहीं करते थे। आज के दौर में जहां सितारे यह तय करते हैं कि उनके लिए कौन गाएगा, उस दौर में संगीतकारों का अपनी रचना पर पूरा एकाधिकार होता था। कल्याण जी आनंद जी का स्पष्ट मानना था कि संगीत किसी सितारे के अहंकार के लिए नहीं, बल्कि किरदार की रूह के लिए बुना जाता है। खन्ना को कड़े शब्दों में समझा दिया कि यह धुन सिर्फ और सिर्फ मोहम्मद रफी साहब के गले और उनके अनोखे ठहराव को ध्यान में रखकर गढ़ी गई है और अगर इसे कोई और गाएगा,

तो इस धुन की आत्मा हमेशा के लिए मर जाएगी। जब संगीतकारों के सामने उनकी एक न चली, तो विनोद खन्ना को उम्मीद थी कि डायरेक्टर प्रकाश मेहरा बॉक्स ऑफिस के नफे नुकसान का हवाला देकर उनका साथ देंगे। लेकिन प्रकाश मेहरा खुद एक बेहद संवेदनशील संगीत प्रेमी थे और कला का सम्मान करते थे। वे बाजार की मांग के आगे घुटने टेकने वालों में से नहीं थे। प्रकाश मेहरा चट्टान की तरह संगीतकारों के फैसले के साथ खड़े रहे और उन्होंने विनोद खन्ना के दबाव को पूरी तरह से दरकिनार करते हुए स्पष्ट कर दिया कि गाने के चयन और गायक की आवाज के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं होगी। यह उनकी जिद थी जो जानते थे कि गीत की आत्मा गायक की लोकप्रियता से कहीं अधिक महत्वपूर्ण होती है। लेकिन इस पूरे हंगामे के बीच सबसे बड़ा सवाल यह था कि जब यह बात खुद मोहम्मद रफी साहब तक पहुंचेगी तो उस महान फनकार के दिल पर क्या बीतेगी? यह पूरी घटना मोहम्मद रफी जैसे महान और कालजयी गायक के लिए किसी गहरे अपमान से कम नहीं थी। सोचिए जिस इंसान ने अकेले हैं चले आओ, मुझे तेरी मोहब्बत का सहारा और बहारों फूल बरसाओ जैसे सैकड़ों आइकॉनिक गाने देकर पीढ़ियों को प्रेम की भाषा सिखाई हो, जिसकी बादशाहत कभी किसी से छिपी ना रही हो, उसकी आवाज को एक नए और उभरते हुए सुपरस्टार द्वारा सरेआम ठुकराया जा रहा था।

किसी भी आम इंसान का अहंकार इस बात पर गहरी सकता था। एक नए सुपरस्टार के खौफ और बॉक्स ऑफिस के गणित की वजह से रफी साहब को बिना किसी गलती के सवालों के कटघरे में खड़ा कर दिया गया था। लेकिन रफी साहब इस मायावी दुनिया के होते हुए भी एक अलग ही दुनिया के इंसान थे। वे केवल एक गायक नहीं बल्कि एक सूफी संत के समान थे जिनके भीतर रत्ती भर भी गुरूर नहीं था। उनकी सबसे बड़ी खूबी उनका बिना किसी विवाद, बिना किसी अहंकार और बिना किसी ड्रामे के खामोश रहना था। जब उन्हें इस विवाद का पता चला तो उन्होंने कोई मीडिया की, कोई नाराजगी नहीं जताई बल्कि अपनी खामोशी की चादर ओढ़े हुए महबूब स्टूडियो के रिकॉर्डिंग रूम में पहुंच गए। उनके चेहरे पर वही पुरानी शांति, वही गहरा समर्पण और वही रूहानी मुस्कान तैर रही थी जो उनकी असली पहचान थी। उनकी इसी शांति ने उस रिकॉर्डिंग स्टूडियो के भारी तनावपूर्ण माहौल में एक अजीब सा जादू कर दिया था जहां मौजूद हर व्यक्ति बाहर चल रहे विवाद से वाकिफ था।

रिकॉर्डिंग रूम के भीतर जैसे ही गाने की धुन बजनी शुरू हुई, रफी साहब ने माइक थामा और उनके साथ सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर खड़ी हो गई। वाइड एंगल शॉट में अगर आप उस स्टूडियो को विजुलाइज करें, तो वहां सुई गिरने की भी आवाज नहीं थी। जैसे ही रफी साहब के गले से वादा कर ले सजना, तेरे बिना मैं ना रहूं सुर निकले, स्टूडियो में मौजूद हर एक इंसान के रोंगटे खड़े हो गए। ने अपनी आवाज में वह दर्द, वह कशिश, वह ठहराव और वह गहरा रोमांस भर दिया जो इस दुनिया में किसी और के बस की बात थी ही नहीं। उनके गाए हर एक सुर में इश्क जैसे इबादत बन गया था। वह रिकॉर्डिंग इतनी परफेक्ट, इतनी निर्दोष और इतनी जादुई थी कि किसी को भी अपनी जगह से हिलने की हिम्मत नहीं हुई। ऐसा लगा जैसे रफी साहब ने बिना एक शब्द कहे, बिना कोई हंगामा किए सुरों से सुपरस्टार के अहंकार और पूरी दुनिया के शक को एक करारा जवाब दे दिया हो। एक ऐतिहासिक गाना रिकॉर्ड हो चुका था। की बात यह थी कि इतनी बेहतरीन और रूह कंपा देने वाली रिकॉर्डिंग सुनने के बावजूद का वह खौफ उन पर इस कदर हावी था कि वह अब भी अपनी जिद पर अड़े रहे। उन्होंने यूनिट से फिर वही बात दोहराई कि गाना तो बहुत अच्छा है, लेकिन इसे अभी भी किशोर कुमार से गवा लो, वरना मैं इसे पर्दे पर नहीं गाऊंगा। पूरी यूनिट परेशान हो उठी कि आखिर इस जिद्दी सुपरस्टार को कैसे समझाया जाए कि वह अपने ही हाथों अपना कितना बड़ा नुकसान करने जा रहा है। सेट पर एक ऐसा चमत्कार हुआ जिसने पूरी कहानी का रुख मोड़ दिया। इसी उधेड़बुन और ड्रामे के बीच सेट पर फिल्म के दूसरे हीरो यानी कपूर खानदान के चिराग रणधीर कपूर की एंट्री हुई।

जब रणधीर कपूर ने यह रिकॉर्ड किया हुआ गाना सुना, तो रफी साहब की वह आवाज सुनकर वह पूरी तरह से मंत्रमुग्ध हो गए। उन्हें संगीत की गहरी समझ थी और वह तुरंत समझ गए कि यह गाना इतिहास रचने वाला है। वह सीधे उस जिद्दी एक्टर विनोद खन्ना के पास गए, उनके कंधे पर हाथ रखा और एक दोस्त की तरह उन्हें एक बहुत बड़ी बात समझाई।

रणधीर कपूर ने विनोद खन्ना को साफ शब्दों में कहा कि वह अपने जीवन की एक बहुत बड़ी भूल करने जा रहे हैं क्योंकि यह गाना रफी साहब की आवाज में ही बिल्कुल मुकम्मल और परफेक्ट है। उन्होंने विनोद खन्ना को समझाया कि इस गाने को एक बार खुद पर फिल्मा कर देखो। यह आवाज तुम्हारी स्क्रीन प्रेजेंस में ऐसा जादू भरेगी कि तुम्हारा करियर एक नई दिशा में मुड़ जाएगा। रणधीर कपूर की इस दखलअंदाजी और उनके पुरजोर समझाने पर आखिरकार विनोद खन्ना का हृदय परिवर्तन हुआ।

उन्होंने अपनी जिद छोड़ दी और इस गाने की शूटिंग के लिए हामी भर दी और फिर जब सेट पर कैमरा रोल हुआ और सिनेमैटोग्राफर ने विनोद खन्ना को अपने लेंस में कैद करना शुरू किया तो जो पर्दे पर उतरा वह किसी तिलिस्म से कम नहीं था। रफी साहब की वह दर्द भरी गूंजती हुई आवाज विनोद खन्ना के रफ-टफ लेकिन संवेदनशील किरदार पर इस कदर फिट बैठी कि लगा जैसे यह आवाज सीधे विनोद खन्ना की ही रूह से फूट रही हो।

क्लोजअप शॉट में विनोद खन्ना की आंखों में जो कशिश और जो गहराई नजर आई उसे रफी साहब की आवाज ने हजार गुना अधिक जीवंत कर दिया था। कैमरे के पीछे खड़े हर एक इंसान को यह समझ आ गया था कि उन्होंने अभी-अभी भारतीय सिनेमा के एक अमर इतिहास को कैमरे में कैद कर लिया है। जब 30 अगस्त 1974 को फिल्म हाथ की सफाई सिनेमाघरों में रिलीज हुई तो इसने पूरे देश में तहलका मचा दिया।

फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सेमी हिट साबित हुई लेकिन जिस चीज ने सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोरी और जिसने इस फिल्म को हमेशा के लिए अमर कर दिया वह था यही इकलौता गाना “वादा कर ले सजना”। यह गाना रिलीज होते ही चार्टबस्टर्स पर छा गया और देश के हर रेडियो स्टेशन, हर नुक्कड़, हर घर और हर गली में बस यही एक धुन बजने लगी। दिलचस्प बात में किशोर कुमार की आवाज में भी गाने मौजूद थे जैसे “पीने वाले को पीने का बहाना” जिसे किशोर दा और हेमा मालिनी ने गाया था। लेकिन जब सफलता का असली पैमाना मापा गया तो रफी साहब का गाया हुआ यह डुएट गाना बाकी सभी गानों पर भारी पड़ गया।

इस एक गाने ने विनोद खन्ना की पूरी रफ-टफ इमेज को रातों-रात बदल कर रख दिया। जो विनोद खन्ना कल तक सिर्फ एक विलेन या कठोर एक्शन हीरो माने जाते थे इस गाने ने उनके भीतर छिपे रोमांस को बाहर निकाल कर उन्हें एक रोमांटिक हार्टथ्रोब बना दिया। इस गाने का असर इतना गहरा था कि इसी फिल्म में अपने दमदार अभिनय के लिए विनोद खन्ना को उनके करियर का इकलौता फिल्मफेयर बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का अवार्ड प्राप्त हुआ।

इस घटना ने विनोद खन्ना की आंखें हमेशा के लिए खोल दीं और उन्हें यह गहरा एहसास करा दिया कि मोहम्मद रफी सिर्फ एक गायक या सिर्फ एक आवाज नहीं थे। बल्कि वे संगीत का एक ऐसा अथाह समंदर थे जिसकी गहराई का अंदाजा किनारे पर बैठकर कभी नहीं लगाया जा सकता। रफी साहब वह जादूगर थे जो अपनी मखमली आवाज के जरिए किसी भी पत्थर को मोम बना सकते थे और किसी भी क्रूर विलेन को दुनिया का सबसे बड़ा प्रेमी साबित कर सकते थे। दूसरी ओर रफी साहब ने अपनी उसी चिर परिचित खामोशी के साथ बिना किसी शिकायत के अपना काम किया। उन्होंने कभी किसी इंटरव्यू या महफिल में इस बात का ढिंढोरा नहीं पीटा कि उन्होंने एक सुपरस्टार के अहंकार को तोड़ दिया है या उसे गलत साबित कर दिया है।

जब दुनिया यह मान चुकी थी कि रफी साहब का युग खत्म हो गया है तब उन्होंने अपनी एक धुन अपने एक गीत से पूरे बॉक्स ऑफिस के गणित को झुठलाते हुए यह साबित कर दिया कि असली बादशाह की सल्तनत कभी खत्म नहीं होती। आज लगभग आधी सदी बीत जाने के बाद भी जब फिल्म हाथ की सफाई का जिक्र आता है तो फिल्म की कहानी भले ही वक्त की धुंध में खो गई हो लेकिन यह गीत आज भी भारतीय सिनेमा के सबसे रूहानी गानों की लिस्ट में सबसे ऊपर है। यह ऐतिहासिक वाकया हमें सिखाता है कि बाजार का ट्रेंड चाहे कितना भी बदल जाए सच्ची कला अपना जादू कभी नहीं खोती और महानता कभी चीख-चीख कर अपनी पहचान नहीं बताती।

बल्कि उसकी खामोशी ही इतिहास को सुनने पर मजबूर l

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