जिस इमारत को आज पूरी दुनिया मुंबई की पहचान ही नहीं बल्कि आन बान शान मानती है, वह इमारत गेटवे ऑफ इंडिया से भी पहले खड़ी कर दी गई थी। जिस समय तक गेटवे ऑफ इंडिया की नींव का पहला पत्थर भी नहीं रखा गया था। द ताजमहल पैलेस पहले से [संगीत] उस समुद्री किनारे पर गर्व से सिर उठाए खड़ा था। शीर्ष पर अपना लाल गुंभद आसमान में उठाए अरब सागर निहारते हुए [संगीत] जो बात सबसे ज्यादा चौंकाने वाली है वह यह कि ब्रिटिश काल में निर्मित होने के बावजूद इसे किसी अंग्रेज ने नहीं बल्कि एक भारतीय ने बनवाया था और वह भी उस दौर में जब भारतीयों को उनके अपने ही देश, अपने ही शहरों के होटलों, सिनेमाघरों और क्लबों जैसी जगहों पर जाने की इजाजत नहीं थी। गेट पर ही बोर्ड पर साफ शब्दों में लिखा हुआ मिल जाता था। डॉग्स एंड इंडियंस आर नॉट अलाउड। भारतीय अपमान और नस्लीय भेदभाव के प्रतीक इस वाक्य का सीधा सा मतलब था कि कुत्तों और भारतीयों को उस जगह [संगीत] भीतर आने की इजाजत नहीं है। यह कहानी है उस भारतीय की जिसने अपने निजी अपमान को न सिर्फ अपने शहर बल्कि अपने देश के गौरव के रूप में पत्थर की इमारत के रूप में ताबीरर कर दिया। ऐसा स्वाभिमान और आन रखने वाला कौन था? वह भारतीय आप देख रहे हैं इंफो टीवी वर्ल्ड जहां हम बताते हैं मेगा कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट्स की वे कहानियां [संगीत] जहां विज़न, मेहनत और इंजीनियरिंग मिलकर भारत का भविष्य बनाते हैं। ऐसे ही शानदार इंफ्रास्ट्रक्चर और इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट्स की डिटेल्ड [संगीत] वीडियोस देखने के लिए इस चैनल को तुरंत सब्सक्राइब कीजिए और इस विषय पर बेहतरीन जानकारी के लिए लगातार हमारे साथ जुड़े रहिए। 19वीं सदी का आखिरी दशक बॉम्बे जिसे अब हम मुंबई कहते हैं। उस वक्त ब्रिटिश भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक बंदरगाह था। दुनिया भर के मालवाहक जहाज यहां आते थे। माल उतरता था। सौदे होते थे। लेकिन इस पूरे शहर में एक भी होटल नहीं था जो अंतरराष्ट्रीय स्तर का हो। जो इक्कादुक्का मौजूदा होटल थे। जैसे वाटसंस होटल वो सिर्फ यूरोपीय लोगों के लिए उपलब्ध थे। कोई भी भारतीय चाहे वह कितना भी धनी या प्रभावशाली क्यों ना हो उनके दरवाजे पर रुक जाता था। उन होटल्स की दहलीज लांघने की इजाजत उसे नहीं थी। जमशेद जी नसेरवान जी टाटा पारसी समुदाय के एक दूरदर्शी उद्योगपति थे। जिन्होंने कपड़ा व्यापार से शुरुआत कर इस्पात, जल विद्युत और कई सारे बड़े उद्योगों की नींव रखी थी। एक शाम अपने एक विदेशी मित्र के साथ वाटसंस होटल चले गए। वहां उन्हें [संगीत] भी भीतर दाखिल होने से रोक दिया गया और दरवाजे से ही बाहर निकल जाने का रास्ता दिखा दिया गया। वजह सिर्फ इतनी थी कि वे एक भारतीय थे और इस बात [संगीत] से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था कि वे बेहद प्रभावशाली, रसूखदार और एक विदेशी के गहरे दोस्त तक हैं। उस दोस्त के सामने झेला गया यह आत्मसम्मान पर पड़ा गहरा आघात था। यह प्रसंग इतना प्रसिद्ध है कि टाटा समूह के ऐतिहासिक दस्तावेजों के साथ-साथ दूसरी कई जगहों पर भी इस घटना का उल्लेख मिलता है।
हालांकि इतिहासकार चार्ल्स एलन जैसे कुछ विद्वान इस बात पर सवाल उठाते हैं कि क्या इस इमारत के निर्माण के पीछे सच में यही एकमात्र कारण था। उनके अनुसार डी टाइम्स ऑफ इंडिया के तत्कालीन संपादक ने जमशेद जी से आग्रह किया था कि बॉम्बे को एक ऐसे होटल की जरूरत है जो इस शहर की शान के लायक हो। शायद दोनों बातें सच हैं। एक अपमान और एक शहर की जरूरत। कौन सा सच पूरा है और कौन सा सच आधा है यह बात तो इतिहास की परतों में दबी रह गई। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ऐसे ही कभी किसी जगह किसी चलती ट्रेन से एक भारतीय को वैध टिकट होने के बावजूद सामान सहित इसीलिए प्लेटफार्म पर धक्का मारकर फेंक दिया गया था। क्योंकि वह एक भारतीय यानी काला व्यक्ति था और वही धक्का किसी मोहनदास करमचंद गांधी को महात्मा गांधी बनने की राह पर मारा गया धक्का साबित हो गया था। उस धक्के का जवाब क्या था? यह तो दुनिया जानती है। [संगीत] लेकिन यहां आज हम बात करेंगे जमशेद जी टाटा और उनकी खूबसूरत ताबीरर ताजमहल होटल के बारे में। [संगीत] एक सपना जो पत्थरों में ढला और 123 साल बाद भी खड़ा है। जमशेद जी ने फैसला किया था कि वो एक ऐसा होटल बनाएंगे जो दुनिया के किसी भी शानदार होटल के मुकाबले किसी मामले में कम नहीं होगा। सबसे जरूरी [संगीत] बात यह होटल हर भारतीय का स्वागत करेगा। उस होटल की दहलीज पर आने वाला हर इंसान समान सम्मान और आदर का हकदार होगा। भला उस समय पर शायद ही यह अंदाजा किसी को भी रहा होगा कि एक दिन यही जगह ना सिर्फ सभी इंसानों को समान आदर और सम्मान की नजर से देखेगी बल्कि जिन्हें सड़क के आवारा कुत्ते कहकर हर कोई दुत्कार देता [संगीत] है। एक वक्त आएगा कि इस दहलीज से वे आवारा कुत्ते भी दुत्कारे नहीं जाएंगे [संगीत] बल्कि ताज पेट के रूप में भरपूर प्यार, खानापानी और देखभाल पाएंगे। जी हां, यह कोई कोरी कल्पना नहीं है। बल्कि सचमुच द ताजमहल होटल में तमाम स्ट्रीट डॉग्स के लिए पूरी केयर का इंतजाम है और वे पूरे अधिकार [संगीत] से भीतर तक चले जाते हैं। अपनी तयशुदा जगह पर रखा खाना पानी खाते पीते हैं। [संगीत] आराम करते हैं और लाड प्यार तक पाते हैं। सिर्फ इस सोच के चलते कि हर जीवित प्राणी ईश्वर का ही रूप है और समान आदर और प्यार का हकदार है। खैर लौटते हैं अपनी पिछली बात पर। द ताजमहल होटल का वह प्रोजेक्ट टाटा एंड सनंस का नहीं था। जमशेद जी ने इसके लिए अपनी व्यक्तिगत संपत्ति [संगीत] निवेशित की थी। टाटा समूह के आधिकारिक स्रोत बताते हैं कि इस होटल पर 3 लाख पाउंड स्टर्लिंग से अधिक खर्च हुआ जो ब्रिटिश मुद्रा या चांदी के लिए उपयोग किया जाने वाला शब्द है और वह उस जमाने में एक [संगीत] असाधारण रकम थी। उनके करीबी दोस्त, कारोबारी साझेदार यहां तक कि उनके बेटों ने भी कहा कि यह घाटे का सौदा साबित होगा। [संगीत] जमशेद जी का जवाब था शायद होगा लेकिन मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। अब सवाल था इस प्रोजेक्ट की जमीन कहां होगी? जमशेद जी चाहते थे कि होटल समुद्र के ठीक सामने हो। तत्कालीन बॉम्बे का अपोलो बंदरगाह जहां आज गेटवे ऑफ इंडिया खड़ा है। उस वक्त एक खुला समुद्री किनारा था। यहां जमीन को समुद्र से पुनः प्राप्त किया गया था।
यानी यह रिक्लेम्ड लैंड थी। 1 नवंबर 1889 को जमशेद जी टाटा ने अपोलो बंदरगाह के पास लगभग ढाई एकड़ रिक्लेम्ड जमीन की लीज हासिल कर ली। इस जगह को चुनने के पीछे जमशेद जी के मन में तीन स्पष्ट [संगीत] कारण थे। पहला अगर होटल का मुख्य प्रवेश द्वार कोलाबा कोजवे की तरफ हो तो एलट क्लास गेस्ट्स की गाड़ियां आसानी से होटल तक पहुंच सकती हैं। पार्किंग की सुविधा होगी। दूसरा होटल की यू आकार की विंग्स इस तरह बनाई जाएंगी कि पिछले समुद्री किनारे यानी [संगीत] बैक बे से आने वाली दोपहर की समुद्री हवा सीधे आंगन में आए और हर कमरे तक पहुंचे। [संगीत] तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण जमशेद जी चाहते थे कि ज्यादातर कमरों से अरब सागर सीधे दिखे। यह सिर्फ एक होटल भर नहीं था। [संगीत] यह बॉम्बे बंदरगाह पर आने वाले हर जहाज के लिए भारत के गौरव और शान की पहली झलक बनने वाला था। [संगीत] नींव के लिए जमीन की मार्किंग की जा चुकी थी। सपने की ताबीरर का आधार तय हो चुका था। अब बारी थी उन इंजीनियर्स और आर्किटेक्ट्स के हुनर और कौशल की जो इस सपने को हकीकत में बदलने जा रहे थे। [संगीत] जमशेद जी टाटा को एक ऐसा इंसान चाहिए था जो बॉम्बे की जमीन, उसकी जलवायु और उसके समुद्री किनारे को समझे। साथ ही एक ऐसी इमारत बनाएं जो हर समुद्री थपेड़े के सामने खड़ी बेखौफ मजबूत इमारत ही ना हो। बल्कि खूबसूरती [संगीत] भी ऐसी कि बाहर से देखने पर ही भीतर जाने को मन मचल उठे और हॉस्पिटिटी इंडस्ट्री के [संगीत] ऊंचे स्टैंडर्ड्स पर भी दुनिया में अपनी मिसाल आप हो। जमशेद जी ने फैसला किया कि इस होटल के मूल डिजाइन की जिम्मेदारी भारतीय आर्किटेक्ट्स को ही दी जाएगी। दो नाम सामने आए सीताराम खंडेराव वैद्य और डी एन मिर्जा। वैद्य उस द्वार के प्रतिष्ठित आर्किटेक्ट थे जो बॉम्बे की इमारतों और उनकी जरूरतों को गहराई से जानते थे। विक्टोरिया टर्मिनस [संगीत] यानी आज का छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस जिसे एफ डब्ल्यू स्टीवेंस ने 1888 में डिजाइन किया था। [संगीत] उस भव्य गौथिक इमारत का असर इन दोनों आर्किटेक्ट्स के काम पर साफ दिखता था। दोनों ने मिलकर ताज का मूल नक्शा तैयार करना शुरू किया। एक ऐसी इमारत जिसमें भारतीय और यूरोपीय आर्किटेक्टर का अनूठा मेल हो लेकिन नियति को कुछ और मंजूर था। सन 1900 में जब निर्माण कार्य अभी शुरुआती दौर में ही था। सीताराम खंडेराव वैद्य का असामायिक निधन हो गया। यह झटका बड़ा था। [संगीत] परियोजना अधूरी थी। डिजाइन का सबसे बड़ा दिमाग चला गया था। ऐसे में जमशेद जी ने एक अनुभवी अंग्रेज इंजीनियर और आर्किटेक्ट को यह काम सौंपा। डब्ल्यू ए चेंबर्स। एक दिलचस्प बात यह है कि चेंबर्स वही शख्स थे जिन्होंने वाटसंस होटल को भी डिजाइन किया था। यानी वही होटल जिसके दरवाजे पर जमशेद जी को रोका गया था और जहां से इस पूरे मामले की शुरुआत मानी जाती है। अब वही चेंबर्स जमशेद जी टाटा के इतने बड़े सपने को अंजाम देने वाले थे। वेरीिफाइड सोर्सेस बताते हैं कि चेंबर्स ने वैद्य के मूल नक्शे को बड़े पैमाने पर वैसा ही बनाए रखा जो होटल की योजना के बड़े हिस्से को दर्शाता है। [संगीत] लेकिन हां चेंबर्स ने एक बड़ा बदलाव यह जरूर किया कि उन्होंने केंद्रीय गुंबद का आकार और ऊंचाई बढ़ा दी।
यही गुंबद आगे चलकर ताज की सबसे बड़ी और [संगीत] पहली पहचान बना। जिसे देखकर दूर से ही ताज होटल को पहचाना जा सकता है। [संगीत] इस पूरे निर्माण का ठेका दिया गया एक और पारसी व्यक्ति को खान साहेब सोराब जी रुस्तम जी कॉन्ट्रैक्टर। [संगीत] यह नाम कम लोगों को पता है। लेकिन ताज की दीवारों में उनकी मेहनत का रंग हर एक पत्थर [संगीत] पर दर्ज है। कहा जाता है कि होटल की वह अद्भुत फ्लोटिंग स्टेयरकेस जो बिना किसी दीवार के सहारे हवा में तैरती सीढ़ियों जैसी दिखती है। [संगीत] वह इन्हीं कॉन्ट्रैक्टर का खुद का डिजाइन था। अब सवाल था यह पूरी इमारत दिखेगी कैसी? [संगीत] आर्किटेक्टर्स के सामने एक असाधारण चुनौती थी। यह होटल अपनी शैली का एक अकेली भवन भर नहीं होना बल्कि इसे भारत की विविधता को खुद में समेटना था। जो डिजाइन तैयार हुआ वो [संगीत] स्थापत्य की कई महान परंपराओं का एक अनूठा संगम था। इमारत की छत और गुंबदों में मूरिश प्रभाव था। अर्ध गोलाकार प्याजनुमा आकृतियां जो उत्तरी अफ्रीका और स्पेन की इस्लामी वास्तुकला की पहचान है। मेहराबें और [संगीत] खिड़कियां विक्टोरियन गौथिक शैली की थी। बालकनी और खिड़कियों के जालीदार काम में राजपूत और ओरिएंटल टच था। छत के किनारों पर एडवर्डियन डिटेल्स थी। छह मंजिला यह इमारत दो विशाल विंग्स में बटी [संगीत] थी जो एक बड़े आंगन को घेरती थी। यूं आकार की संरचना। ठीक वैसे जैसे जमशेद जी ने सोचा था ताकि समुद्री हवा सीधे आंगन तक आए। इस इमारत का एक पहलू आज भी लोगों को हैरान करता है। होटल का मुख्य प्रवेश द्वार समुद्र की तरफ नहीं बल्कि शहर की तरफ है। बंदरगाह से जो हिस्सा दिखता है, वह दरअसल होटल का पिछला हिस्सा है। लेकिन यह कोई गलती नहीं थी। यह एक सुविचारित निर्णय था। जमशेद जी चाहते थे कि ज्यादातर कमरों की खिड़कियां समुद्र की तरफ खुले ना कि शहर की तरफ। बाद में एक मिथक फैला कि आर्किटेक्ट [संगीत] ने नक्शा उलटा बना दिया और जब उन्हें एहसास हुआ तो उन्होंने इमारत से [संगीत] कूदकर जान दे दी। लेकिन यह कहानी निराधार साबित हुई। बॉम्बे यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी में मिले ताज के मूल नक्शों ने इस अफवाह को कोरा झूठ साबित कर दिया। एक और असाधारण तथ्य ताज के केंद्रीय गुंबद में जो स्टील इस्तेमाल की गई वो उसी ग्रेड की थी जो पेरिस के आईफेल टावर में लगी है। जमशेद जी ने उस दौर में वही स्टील आयात करवाई। एक ऐसे समय में जब भारत खुद आईफेल टावर जैसी इमारतों की कल्पना भी नहीं कर सकता था। बॉम्बे के समुद्री किनारे पर उसी स्तर की धातु से एक गुंबद खड़ा हो रहा था। ब्लूप्रिंट तैयार था। आर्किटेक्ट तय थे। बिल्डर तैनात [संगीत] था। अब शुरू होने वाला था। वह काम जो इतिहास बन जाएगा भी और बनाएगा भी। सन 1898 बॉम्बे के अपोलो बंदरगाह पर रिक्लेम्ड [संगीत] समुद्री जमीन पर पहली बार खुदाई के औजार उतरे। ऐसी जमीन पर नींव डालना आसान नहीं था। मिट्टी की परतें नरम थी, जलस्तर ऊंचा था और यहां एक ऐसी इमारत खड़ी करनी थी, जिसकी मजबूती से कोई समझौता ना हो, और जो [संगीत] सैकड़ों साल तक टिके। इसलिए नीव को जमीन से 40 फुट नीचे तक ले जाया गया। 40 [संगीत] फुट यानी लगभग चार मंजिला इमारत की गहराई। यह सिर्फ नींव नहीं थी। यह एक वचन था कि यह इमारत अपनी जगह से टस से मस नहीं होगी। और आज भी जब बरसाती समंदर अपनी हदें तोड़ता हुआ किनारे तक उफन आता है। [संगीत] जब पूरा शहर समुद्री पानी के सैलाब को देखकर थर्राने लगता है। [संगीत] दत्तज महल होटल उतनी ही मजबूती से शांति से अपनी जगह अटल खड़ा रहता है। [संगीत] काम शुरू होने पर खुदाई की जाने लगी। मजदूर नीचे तक उतरे। पत्थर और मिट्टी [संगीत] निकली। एक हेक्टेयर की इस जमीन पर धीरे-धीरे दो विशाल विंग्स का ढांचा आकार लेने लगा। [संगीत] बिल्डर सोराबजी कॉन्ट्रैक्टर के निर्देशन में पत्थर पर पत्थर चढ़ता गया। यह वो दौर था जब कन नहीं थी। भारी मशीनें नहीं थी। [संगीत] सब कुछ मानव श्रम और कुशल कारीगरों के हाथों से बने कमाल से हो रहा था। [संगीत] धनुषकार मेहराबें तराशी जा रही थी। जालीदार खिड़कियां बन रही थी और आंगन के चारों तरफ गलियारे उठ रहे थे।
लेकिन जो बात इस निर्माण को बाकी सबसे अलग बनाती थी वो थी जमशेद [संगीत] जी टाटा की वे यात्राएं जो उन्होंने इस होटल के लिए पूरी दुनिया में की। वो सिर्फ नक्शे पर भव्य इमारत नहीं बनाना चाहते थे बल्कि सुविधाओं के मामले में भी उसके [संगीत] भीतर दुनिया की सबसे उन्नत तकनीक और सुविधाएं उपलब्ध करवाना चाहते थे। दसेलडोरफ से विद्युत मशीनरी मंगवाई गई। बर्लिन से झाड़ फानूस मंगवाए गए। अमेरिका से पंखे आए और पेरिस की उस प्रदर्शनी से जहां आईफेल टावर बना था। उसी स्तर के स्टील रोड और प्लांट्स मंगवाए गए। जर्मन एलिवेटर लगे। टर्किश बांध बने और अंग्रेज बटलर नियुक्त किए गए। होटल के बगीचे में एक अलग विद्युत संयंत्र स्थापित किया गया जो कि सिर्फ इसी होटल के लिए था। [संगीत] पूरी इमारत बिजली से जगमगाएगी और अगर किसी कारण बिजली जाए तो तुरंत [संगीत] बैकअप की व्यवस्था भी रहेगी। यह बॉम्बे की पहली इमारत थी जो पूरी तरह बिजली से रोशन होने वाली थी। चार विद्युत लिफ्टें, बैकप पावर सिस्टम और एशिया की पहली एयर कंडीशनिंग व्यवस्था सब एक ही छत के नीचे। यह काम एक कार्बन डाइऑक्साइड आइस मेकिंग प्लांट से होता था जो हर दिन 15 टन बर्फ बनाता था। 1903 में जब भारत के ज्यादातर लोगों ने बिजली का बल्ब भी नहीं देखा था। इस होटल में कमरे ठंडे रखे जाने की व्यवस्था हो रही थी। इमारत के भीतर सोराबाजी कॉन्ट्रैक्टर ने एक ऐसी सीढ़ी बनाई जो आज भी लोगों को चकित करती है। फ्लोटिंग स्टेयरकेस। यह सीढ़ी किसी दीवार से नहीं टिकी है बल्कि कैंटीवर तकनीक से हवा में स्टेबल है। उस जमाने में यह इंजीनियरिंग का करिश्मा था। 5 साल की मेहनत, हजारों कारीगरों के हाथ, दुनिया भर से मंगवाई गई सामग्री और फिर आया वह दिन जिसका इंतजार था। 16 दिसंबर 1903 जमशेद जी टाटा उस दिन बीमार थे। उनका शरीर साथ नहीं दे रहा था। लेकिन वह वहां उस उद्घाटन के लिए मौजूद थे। [संगीत] अपने उस सपने के पूरा होने का गवाह बनने के लिए जो देखे जाने के समय लगभग नामुमकिन जैसा लग रहा था। होटल का निर्माण तब भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ था। लेकिन पहली विंग के दो फ्लोर तैयार थे। उस दिन 17 मेहमानों ने ताजमहल होटल के भीतर पहली बार कदम रखा। 30 निजी स्वीट, [संगीत] 350 कमरे, बिजली की चकाचौंध, घड़ियां, घंटियां और चार लिफ्टें। यह सब उस दौर में किसी जादू से कम नहीं था। सारा भारतीय गौरव उस वास्तुकला की अनूठी मिसाल बनी इमारत में सिमट आया था। सबसे खास बात यह रही कि एक सपना देखा गया और हकीकत के धरातल पर उतर तक आया। लेकिन अभी तक गेटवे ऑफ इंडिया की नींव का पत्थर तक नहीं रखा गया था। वो मार्च 1911 में बनना शुरू हुआ और 1924 में खोला गया था। उससे पहले के दो दशकों तक बॉम्बे बंदरगाह पर आने वाले हर जहाज के लिए इस ताज होटल का लाल गुंबद ही भारत की पहली झलक था। यह गुंबद सिर्फ [संगीत] दिखावे के लिए नहीं था। भारतीय नौसेना के जहाज इस 240 फुट ऊंचे केंद्रीय गुंबद का उपयोग दिन के वक्त त्रिकोणमितीय दिशा निर्धारण के बिंदु [संगीत] के रूप में करते थे। जमशेद जी टाटा ने अपना सपना पूरा होते देखा। लेकिन वह इसकी पूरी भव्यता देखने के लिए ज्यादा समय तक नहीं रह पाए। साल 1904 में उनका निधन हो गया। सपनों की ताबीरर अपनी जगह [संगीत] खड़ी थी।
लेकिन सपना देखने वाला चला गया था। फिर भी ताज होटल की प्रसिद्ध और बोलबाला रुका नहीं। यह होटल इतिहास का गवाह बनता रहा। पहले विश्व युद्ध में इसे 600 बिस्तरों वाले सैनिक अस्पताल में बदल दिया गया। [संगीत] स्वतंत्रता आंदोलन के द्वार में सरोजनी नायडू मोहम्मद अली जिन्ना जैसी हस्तियां यहां बैठकर करती थी। और सन 1947 में जब देश आजाद हुआ, तो स्वतंत्र भारत में उद्योग जगत को दिया गया पहला भाषण इसी होटल की दीवारों के भीतर दिया गया था। फिर सन 1973 में पड़ोस के ग्रीस होटल को गिराकर उसकी जगह ताज का 22 मंजिला टावर विंग बनाया गया [संगीत] जिसे भारतीय आर्किटेक्ट्स द राइस बाटलीवाला और रुस्तम पटेल ने डिजाइन किया और स्विस डिजाइनर डेल केलर ने इसका इंटीरियर तैयार किया। इस इमारत [संगीत] ने बहुत सा वक़ भी देखा और उसके साथ आती चुनौतियों के थपड़े भी झेले। 105 साल तक यह इमारत अडिग खड़ी रही। दो विश्व युद्ध, आजादी का संघर्ष, देश का बंटवारा सब कुछ इन दीवारों ने देखा सहा। लेकिन 26 नवंबर 2008 की रात वो हुआ जो इतिहास [संगीत] में पहले कभी नहीं हुआ था। ना सिर्फ देश के स्वाभिमान और गौरव के प्रतीक इस शानदार होटल के परखच्चे उड़ाने की कोशिश की गई बल्कि पूरे देश की सुरक्षा व्यवस्था में भी सेंध लगाकर दबाव बनाने की सोची समझी। योजनाबद्ध कोशिश। उस शाम मुंबई के बंदरगाह पर 10 हथियारबंद आतंकवादी समुद्री रास्ते से आकर उतरे। लश्कर तैयबा के यह 10 लड़ाके पाकिस्तान में महीनों की कठोर और बर्बरतापूर्ण ट्रेनिंग लेकर आए हुए थे। जो सिर्फ दिखने में इंसान जैसे जरूर थे। लेकिन जिनके पास ना इंसानी दिल था ना इंसानी [संगीत] भावनाएं, तैराकी, हथियार चलाना और सबसे जरूरी अपने [संगीत] निशाने पर ली गई सभी जगहों के चप्पे-चप्पे का पहले से तैयार नक्शा। उन्हें द ताजमहल होटल का विस्तृत ब्लूप्रिंट दिया गया था। यह होटल उनके लिए सिर्फ एक इमारत नहीं था। यह भारतीय समृद्धि और प्रगति का प्रतीक था और वह भी उसकी प्रमुख औद्योगिक नगरी में की प्रतिष्ठा प्राप्त। [संगीत] इसी कारण यह उनका प्राथमिक निशाना था। रात के लगभग 9:30 बजे [संगीत] मुंबई को कभी ना सोने वाला कर्मठ शहर कहा जाता है। लिहाजा उस दिन उस समय भी शहर में अभी तक चहल-पहल [संगीत] जारी थी। चार आतंकवादियों ने ताज पर एक साथ दो दिशाओं से हमला किया। दो आतंकी मुख्य प्रवेश द्वार [संगीत] से घुसे। दो पूल की तरफ वाले दरवाजे से A के 47 राइफलें, हथगोले और विस्फोटक सामग्र। लोभी में अचानक से गोलियां चलने लगी। मेहमान [संगीत] ऑन ड्यूटी कर्मचारी लोग सब के सब अचानक से घिर आए इस संकट के बीच लगभग मौत के मुंह में फंसे हुए थे। होटल के भीतर कुल मिलाकर छह विस्फोट [संगीत] हुए।
एक लोभी में, दो लिफ्ट्स में, तीन रेस्टोरेंट्स में। आधी रात तक ताज के कुछ हिस्सों में आग फैल गई और वो लाल गुंबद जो एक 105 सालों से बॉम्बे बंदरगाह की पहचान था उसे काफी नुकसान [संगीत] पहुंचा। उस वक्त होटल में लगभग 450 मेहमान ठहरे हुए थे। इसके बाद जो हुआ वो इस होटल के इतिहास का सबसे गौरवशाली अध्याय बन गया। ताज के कर्मचारी चाहते तो अपनी-अपनी जान बचाकर भाग सकते थे। उन्हें सुरक्षित रास्ते मालूम थे। सभी दरवाजे पता थे। लेकिन उनमें से एक कर्मचारी भी अपनी ड्यूटी छोड़कर नहीं गया। [संगीत] वे सब के सब अपने कर्तव्य में तत्परता से जुटे रहे। वह कर्तव्य जो उस समय चुनौती ही नहीं बल्कि जान का संकट बनकर भी आया था। [संगीत] किचन के शेफ और अन्य कर्मचारी उन्हीं रास्तों से बचाकर मेहमानों को सुरक्षित कमरों में ले जाते रहे। [संगीत] कुछ ने अपनी जान पर खेलकर मेहमानों को गोलियों से बचाया। जो अचानक से घबराकर भाग भी चुके थे। वह भी वापस लौट आए क्योंकि उन्हें पता था कि भीतर काफी लोग फंसे हैं। होटल के कार्यकारी शेफ हेमंत ओबेरॉय ने उस [संगीत] पूरी रात और अगले दो दिनों तक अपने मेहमानों और कर्मचारियों को संभाला, शांत रखा और जितना हो सका सुरक्षित बनाए रखने का प्रयास किया। यह बहादुरी किसी फिल्म की कल्पना नहीं थी। यह सच था और पूरी दुनिया ने इसे देखा। यह होटल केवल वर्ल्ड क्लास हॉस्पिटिटी इंडस्ट्री में भारतीय आन-बान और शान का प्रतीक भर नहीं रह गया था। इन गुजरते पलों में बल्कि यह उस भारतीय आति्य परंपरा का भी साक्षी बना था। जहां अपने मेहमानों की सुरक्षा और सुविधा अपने से ऊपर मानी जाती है।
यही वजह थी कि मौत सामने दिखते हुए भी दे ताजमहल होटल के कर्मचारी शांत भाव से अपने फर्ज को निभा रहे थे और बहुत ही कम लोगों को यह बात पता है कि जिस समय यह सारा घटनाक्रम चल रहा था। खुद रतन टाटा पीछे वाली गली में अपने कुछ कर्मचारियों के साथ न सिर्फ मौजूद थे बल्कि वे तब तक वहां बने रहे थे जब [संगीत] तक पूरा घटनाक्रम काबू में नहीं कर लिया गया था और वे होटल में मौजूद अतिथियों और लोगों की तरफ से निश्चिंत नहीं हो गए थे। इस घटनाक्रम के घटते ही मुंबई पुलिस ने तुरंत मोर्चा संभाल लिया और पूरे होटल को चारों तरफ से घेर लिया। लेकिन एनएसजी कमांडो को दिल्ली से मुंबई पहुंचने में लगभग 10 घंटे लग गए। 27 नवंबर की सुबह 6:00 बजे एनएसजी पहुंची और ऑपरेशन शुरू हुआ। मंजिल दर मंजिल गलियारा दर गलियारा कमांडो आगे बढ़ते रहे। भारी गोलीबारी हुई। विस्फोट होते रहे। होटल की दीवारें जो कभी राजाओं, महाराजाओं, [संगीत] देसी विदेशी सेलिब्रिटीज की मौजूदगी की गवाह और मेजबान बनी थी, उन पर अब गोलियों के निशान थे। तीन दिन चलती कार्यवाही और लगभग 60 घंटे से अधिक [संगीत] का समय। 29 नवंबर 2008 की सुबह 8:00 बजे एनआईएसजी कमांडो ने ताज होटल को सुरक्षित घोषित कर दिया। होटल के भीतर [संगीत] घुसे चार में से तीन आतंकवादी मारे गए। करीब 300 लोगों को जीवित बाहर निकाल लिया गया।
लेकिन इस जीत की कीमत बहुत बड़ी थी। ताज की दीवारों के भीतर 31 लोग शहीद हुए थे। जिनमें [संगीत] 12 ताज के अपने कर्मचारी थे। कुछ पलों तक जो लोग इस होटल में मेजबानी में जुटे थे। खतरे से भरे पलों में [संगीत] उन्होंने मेजबानी में अपनी जान तक बिछा दी थी। उनकी शहादत सिर्फ ताजमहल होटल अपने इतिहास में याद नहीं रखेगा बल्कि वो लोग भी इन्हें कभी भूल नहीं पाएंगे जिनकी [संगीत] जान की कीमत इन कर्मचारियों ने अपनी जान देकर चुकाई थी। होटल की हेरिटेज विंग बुरी तरह क्षतिग्रस्त थी। छत के कुछ हिस्से ढह चुके थे। गुंबद को नुकसान पहुंचा था। 100 साल पुरानी कलाकृतियां, नक्काशी और वह गलियारे जिनसे कभी गांधी, नेहरू [संगीत] और सरोजनी नायडू जैसे लोग गुजरे थे। सब राख और मलबे के नीचे दबे हुए थे। 30 नवंबर को रतन टाटा ने एक टेलीविजन इंटरव्यू में कहा, जो टूटा है, हम इसे फिर से बनाएंगे और यह [संगीत] पहले से बेहतर होगा। इसके बाद जिन हिस्सों को अपेक्षाकृत कम नुकसान पहुंचा था, वे हिस्से 21 दिसंबर 2008 को खोल दिए गए। हमले के महज 25 दिन [संगीत] बाद यह ताज की जिद नहीं स्वाभिमान था कि परिस्थितियां और हालात चाहे जो हो रुकना और झुकना नहीं है। हेरिटेज विंग का पुनर्निर्माण होना अभी बाकी था और वह एक अलग ही कहानी थी। लेकिन रतन टाटा का वही वचन अभी भी अपनी जगह कायम था कि हम इसे बनाएंगे और पहले से भी बेहतर बनाएंगे। फिर शुरू हुआ