जिस बुलेट बाइक को आज युवा अपनी शान और स्टाइल का सिंबल मानते हैं। एक वक्त ऐसा भी था जब बुलेट को बनाने वाली कंपनी रॉयल एनfield बंद होने की कगार पर पहुंच गई थी। कंपनी भारी नुकसान में थी। हालात इतने ज्यादा खराब हो चुके थे कि कंपनी के ज्यादातर लोगों का मानना था कि इसे अब बेच देना चाहिए या फिर पूरी तरह से बंद कर देना चाहिए।
लेकिन उसी वक्त एक युवा ने अपनी सोच, मेहनत और सूझबूझ से डूबती हुई कंपनी को देश की सबसे सफल कंपनियों में शामिल कर दिया। आज रॉयल एनफील्ड भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के कई देशों में अपनी मजबूत पहचान बना चुकी है।
जब भी सड़क पर थर-थर की आवाज सुनाई देती है तो लोग बिना देखे ही समझ जाते हैं कि कोई बुलेट बाइक गुजर रही है। आज रॉयल एनफील्ड सिर्फ एक बाइक नहीं बल्कि लाखों लोगों का सपना और जुनून बन चुकी है। लेकिन साल 2000 के आसपास हालात बिल्कुल अलग थे। उस समय रॉयल एनfield की पेरेंट कंपनी आयशर ग्रुप भारी नुकसान झेल रही थी। कंपनी का यह डिवीजन करीब ₹20 करोड़ के घाटे में था। हालात इतने खराब हो चुके थे कि कंपनी के कई बड़े अधिकारियों का मानना था कि रॉयल एनफील्ड को बेच देना चाहिए या फिर इसे पूरी तरह से बंद कर देना चाहिए। इसी मुश्किल समय में एक युवा आगे आया।
उसका नाम था सिद्धार्थ लाल। सिद्धार्थ लाल आयशर ग्रुप के चेयरमैन विक्रम लाल के बेटे थे। उस समय उनकी उम्र सिर्फ 26 साल की थी। जब सभी लोग कंपनी को बंद करने की बात कर रहे थे तब सिद्धार्थ ने कंपनी से सिर्फ 24 महीने का समय मांगा। उन्होंने भरोसा दिलाया कि वह इस डूबती हुई कंपनी को फिर से खड़ा कर सकते हैं। सिद्धार्थ लाल को रॉयल एनफील्ड डिवीजन की जिम्मेदारी दी गई। जिम्मेदारी मिलते ही उन्होंने कई बड़े और साहसिक फैसले लिए। सबसे पहले उन्होंने जयपुर स्थित कंपनी का नया प्लांट बंद कर दिया। इसके अलावा डीलरों को दिए जाने वाले भारी डिस्काउंट भी खत्म कर दिए।
इस फैसले से कंपनी का हर महीने लगभग ₹80 लाख का खर्च बचने लगा। इसके बाद सिद्धार्थ ने एक और महत्वपूर्ण फैसला लिया। उन्होंने तय किया कि कंपनी नए-नए सेगमेंट में जाने के बजाय अपने सबसे मजबूत ब्रांड यानी बुलेट को और बेहतर बनाएगी। उनका मानना था कि अगर ब्रांड मजबूत होगा तो ग्राहक खुद कंपनी के पास आएंगे। साल 2001 में सिद्धार्थ लाल ने शहरों के युवाओं को ध्यान में रखते हुए 350 सीc की बुलेट इलेक्ट्रा ल्च की। यह बाइक युवाओं को बेहद पसंद आई और बाजार में सफल साबित हुई। इसके बाद साल 2002 में कंपनी ने थंडरवर्ड बाइक ल्च की।
इस बाइक ने भी लोगों का दिल जीत लिया। धीरे-धीरे रॉयल एनfield की बिक्री बढ़ने लगी और कंपनी घाटे से निकलकर मुनाफे में पहुंच गई। सिद्धार्थ लाल सिर्फ बाइक बनाने पर ही नहीं रुके। उन्होंने ग्राहकों के अनुभव को बेहतर बनाने पर भी जोर दिया। कंपनी ने ऐसे आधुनिक शोरूम और रिटेल आउटलेट शुरू किए जहां ग्राहक सिर्फ बाइक खरीदने नहीं बल्कि एक शानदार अनुभव लेने आते थे। रॉयल एनfield का मशहूर टैगलाइन है। मेड लाइक अ गन। यह ब्रांड अपनी मजबूती, दमदार, इंजन और अनोखी पहचान के लिए जाना जाता है। समय के साथ कंपनी ने अपने डिज़ और तकनीक में लगातार बदलाव किए और ग्राहकों की जरूरतों के अनुसार नई-नई बाइक बाजार में उतारी। सिद्धार्थ लाल की सबसे बड़ी सफलता यह रही कि उन्होंने लोगों की बुलेट को लेकर सोच बदल दी।
पहले बुलेट को सिर्फ एक साधारण या पुराने जमाने की बाइक माना जाता था लेकिन आज ये स्टाइल रॉयल्टी और एडवेंचर की पहचान बन चुकी है। आज रॉयल एनफील्ड भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के कई देशों में अपनी मजबूत पहचान बना चुकी है। लाखों युवा इस बाइक को खरीदने का सपना देखते हैं।