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राजेश खन्ना की मौत से 72 घंटे पहले डिंपल ने क्या देखा जो उन्होंने कभी नहीं बताया

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उस बड़े कभी शोर से भरे कभी अजीब तरह की खामोशी से डूबे बंगले आशीर्वाद के एक बंद कमरे के बारे में बरसों तक फुसफुसाहट होती रही। कहते हैं वहीं राजेश खन्ना सबसे सच्चे होते थे। वहीं उनकी मुस्कान चेहरे से उतर जाती थी। वहीं दीवारों पर टंगे सुनहरे दिनों के फ्रेम धूल से भरते जाते थे और मेज पर रखी दवाइयों की शीशियां उनकी असली हालत बयान करती थी। बाहर फाटक पर अब भी पुराने प्रशंसक उनका नाम लेकर आें भरते थे। पर अंदर भारी पर्दों और बंद खिड़कियों के पीछे एक ऐसा आदमी बैठा था जो कभी लाखों दिलों की धड़कन था और अब अपनी ही परछाइयों से घिरा हुआ था। पड़ोसियों, नौकरों और पुराने परिचितों की कही बातों के अनुसार देर रात उस कमरे की बत्ती जलती रहती। कभी धीमे सुर में पुराने गीत बजते। कभी कांच से टकराती उंगलियों की सूखी आवाज सुनाई देती और कभी कोई नाम हवा में तैरता हुआ बाहर तक चला आता। डिंपल अगर उस वक्त यह सब खुलकर सामने आ जाता तो क्या लोगों का वह चमकता हुआ सपना उसी पल टूट नहीं जाता। आखिर उस कमरे में ऐसा क्या था जिसे सालों तक पर्दे में रखा गया?

एक बीमार सितारे की तनहाई, एक टूटे पति का पछतावा या एक ऐसे सम्राट का पतन जो कैमरों से दूर अपनी हार मान चुका था। आज हम उसी बंद दरवाजे से कहानी शुरू करेंगे क्योंकि राजेश खन्ना के आखिरी 72 घंटों को समझना हो तो पहले उस गुप्त जीवन को समझना होगा जिसे उन्होंने अपने ही घर के भीतर छिपा कर रखा था। राजेश खन्ना का नाम कभी सिर्फ एक अभिनेता का नाम नहीं था। वह अपने समय का बुखार था। उनकी कार के ऊपर गिरती गुलाब की पंखुड़ियां, सिनेमाघरों के बाहर बेहोश होती लड़कियां, खून से लिखे खत, उनकी मुस्कान पर मरमिटती भीड़। यह सब किसी फिल्मी प्रचार का हिस्सा नहीं बल्कि उस द्वार का पागलपन था। कहा जाता है कि जब उनकी फिल्में चलती थी तो टिकट खिड़कियों पर धक्कामुक्की किसी मेले जैसी नहीं। किसी उन्माद जैसी लगती थी। लेकिन यही सबसे बड़ा सामाजिक विरोधाभास था। पर्दे पर सब कुछ सोना था। घर के भीतर सब कुछ धुंधला। बाहर जनता उन्हें रोमांस का बादशाह कहती रही। पर अंदर उनकी दुनिया में थकान, अकेलापन, असुरक्षा और टूटते रिश्तों की सीलन उतर चुकी थी।

जिस आदमी के नाम पर लोग अपनी बेटियों के नाम रखते थे, वही आदमी रात में अपने ही बंगले के लंबे गलियारों में जैसे एक भटकती हुई आवाज बन गया था। यहीं इस कहानी में एक दूसरा चेहरा दाखिल होता है। बाहर से वफादार, अंदर से शायद कुछ और। राजेश के जीवन के उत्तरार्ध में उनके इर्द-गिर्द कुछ ऐसे लोग रहे जिन्हें लोग सेवा करने वाला, संभालने वाला, घर चलाने वाला मानते थे। मगर फिल्मी दुनिया में यह भी कहा जाता रहा कि किसी गिरते हुए सितारे के आसपास सबसे पहले संवेदना नहीं स्वार्थ मंडराता है। कौन कितना सच्चा था? कौन कितनी दूर तक उनके नाम, उनकी हैसियत और उनके घर की छाया से लाभ ले रहा था। इसका पूरा सच शायद कभी सामने नहीं आया। लेकिन संकेत बहुत थे और संकेत हमेशा वहीं से शुरू होते हैं जहां आदमी सबसे कमजोर हो जाता है। राजेश खन्ना का निजी जीवन शुरू से ही विरोधाभासों से भरा रहा। सफलता इतनी तेज आई कि वह किसी को भीतर से अस्थिर कर सकती थी। फिर आई डिंपल, बेहद युवा, असाधारण रूप से खूबसूरत और अपने समय की सबसे चर्चित दुल्हनों में से एक। उनकी शादी को उस दौर ने किसी राजसी मिलन की तरह देखा। लोग कहते थे सितारों का सितारा और सपनों की रानी एक घर में। मगर अक्सर सबसे चमकदार शादियां सबसे भारी सन्नाटे भी पालती हैं। डिंपल कांपड़ियां जब इस घर में आई तो वह सिर्फ पत्नी बनकर नहीं आई थी। वह एक मिथक का हिस्सा बन गई थी। लेकिन मिथक के भीतर इंसान भी रहते हैं। अपनी इच्छाओं, गुस्सों, अधिकारों, डर और कमजोरियों के साथ। उम्र का फासला, राजेश की बेहिसाब लोकप्रियता, उनका स्वभाव, उनका नियंत्रण पसंद करने वाला व्यक्तित्व और घर के भीतर की जटिलताएं, इन सब ने उस रिश्ते को बाहर से जितना भव्य दिखाया, भीतर से उतना ही कठिन बनाया। समय के साथ उनके अलग रहने की खबरें आने लगी और फिर यह दूरी बरसों लंबी खामोशी में बदल गई। यहीं से आशीर्वाद का वह कमरा और भी अहम हो जाता है। क्योंकि यही वह जगह थी जहां खबरों और करीबी सूत्रों के अनुसार राजेश अपने पुराने दिनों की रीलें देखते अपने संवाद दोहराते। कभी अपने ही सितारा होने पर गर्व करते तो कभी उसी सितारा होने के बोझ तले बैठ जाते। कहते हैं मेज पर उनकी तस्वीरें रखी रहती। युवा राजेश, सुपरस्टार राजेश, भीड़ से घिरे राजेश और फिर सामने आईने में दिखता एक अकेला चेहरा जिसकी आंखों में नींद कम और यादें ज्यादा थी। यह पतन अचानक नहीं आया था। सिनेमा बदल रहा था, दर्शक बदल रहे थे, नए चेहरे आ रहे थे और वह आदमी जिसने कभी सफलता की परिभाषा लिखी थी। धीरे-धीरे उस परिभाषा से बाहर धकेला जा रहा था। यह सिर्फ करियर की मार नहीं थी। यह अहंकार, पहचान और अस्तित्व पर प्रहार था। जब दुनिया आपको देवता बना देती है तो वह आपको इंसान की तरह बूढ़ा होने का अधिकार भी नहीं देती। राजेश खन्ना की यही विडंबना थी। मंच की रोशनी में उनकी चाल अब भी शाही लगती थी। पर निजी कमरों में वही चाल धीमी, सावधान और थकी हुई बताई जाती थी। बाहर उनका नाम अब भी सम्मान से लिया जाता था। पर भीतर उनके दिन कभी डॉक्टरों, कभी सलाह देने वालों, कभी पुराने दोस्तों और कभी चुपचाप बैठी स्मृतियों के साथ कटते थे। क्या यह वही आदमी था जिसके लिए कभी सड़कें रुक जाती थी? उनके बंगले का वैभव भी एक कहानी कहता था। विशाल दरवाजे, लंबे बरामदे, पुरानी लकड़ी की गंध, दीवारों पर बड़े फ्रेम, ट्रॉफियां, तस्वीरें, मुलायम रोशनी सब कुछ अब भी कहता था कि यहां कोई राजा रहता है। लेकिन सूत्रों के अनुसार उसी वैभव में एक अजीब जजरपन उतर आया था। जैसे घर भी अपने मालिक की तरह किसी अतीत से चिपका हुआ था।

जिसे छोड़ना वह चाहता भी नहीं था और छोड़ भी नहीं पा रहा था। बरसों तक राजेश और डिंपल के रिश्ते को लेकर तरह-तरह की बातें होती रही। किसी ने कहा दूरी सिर्फ औपचारिक थी। किसी ने कहा घाव बहुत गहरे थे। किसी ने कहा दोनों के बीच संवाद पूरी तरह टूटा कभी नहीं। यही अधूरापन जनता को सबसे ज्यादा खींचता रहा। क्योंकि लोग प्रेम कहानियों से कम टूटी हुई प्रेम कहानियों से ज्यादा बंधते हैं। और जब कहानी में एक सुपरस्टार, एक रहस्यमई पत्नी और एक महलनुमा घर शामिल हो तब हर बंद कमरा शक पैदा करता है। हमारी कहानी का उल्टा हिसाब अभी शुरू ही हुआ है। आखिरी 72 घंटों में डिंपल उसी घर में थी। उसी आदमी के पास थी जिससे वह बरसों पहले दूर चली गई थी। मगर सवाल यह है कि वह लौट कर किसके पास आई थी? पुराने प्रेम के पास, एक टूटे हुए पिता के पास, एक बिखरे हुए सम्राट के पास या उस सच्चाई के पास जिसे देखकर वह आज तक चुप हैं। चेहरे पर मुस्कान, होठों पर वही पुरानी नरमी। लेकिन कमरे के बाहर डॉक्टरों की फुसफुसाहट, दवाइयों की गंध और टेबल पर रखी रिपोर्टों की तहों में छिपा सच कुछ और कह रहा था। राजेश खन्ना की हालत वैसी नहीं थी जैसी दुनिया को दिखाई जा रही थी। जिन दिनों लोग अब भी उम्मीद की बातें कर रहे थे उन्हीं दिनों सूत्रों और सार्वजनिक रिपोर्टों के अनुसार उनका शरीर लंबे समय से लड़ाई लड़ रहा था। जो आदमी कभी कैमरे के सामने थकान को भी अंदाज में बदल देता था वह अब अपनी कमजोरी तक को शान से ढकने की कोशिश कर रहा था। अगर उस द्वार में पूरा सच बाहर आ जाता तो क्या उनके प्रशंसक उस छवि को सह पाते जिसमें सुपरस्टार नहीं एक बेहद नाजुक दर्द से झुका हुआ इंसान था। किन लोगों ने उनकी हालत पर पर्दा डाला। क्यों डाला और कब यह बीमारी सिर्फ बीमारी नहीं बल्कि एक छिपाया गया पारिवारिक रहस्य बन गई। इस परत को उठाए बिना आखिरी 72 घंटों की खामोशी समझना असंभव है। राजेश खन्ना के स्वास्थ्य को लेकर वर्षों से अटकलें लगती रही थी। उम्र, तनाव, अकेलापन, गिरती व्यावसायिक चमक और निजी टूटन यह सब किसी भी व्यक्ति के शरीर पर असर डालता है। बाद के वर्षों में उनके दुबले होते शरीर, चेहरे की थकान, आवाज की सुस्ती और सार्वजनिक मौकों पर दिखती कमजोरी ने सवाल उठाने शुरू कर दिए थे। लेकिन जैसा अक्सर बड़े सितारों के साथ होता है, सच्चाई कभी साफ शब्दों में सामने नहीं आती। वह संकेतों में चलती है। कई रिपोर्टों में यह सामने आया कि उनकी तबीयत लंबे समय से ठीक नहीं थी। अस्पताल के चक्कर, चिकित्सकीय निगरानी, सीमित मुलाकातें और घर के भीतर बढ़ती सावधानियां यह सब उस पर्दे के पीछे हो रहा था जहां आम जनता की नजर नहीं पहुंचती। बाहर सिर्फ इतना बताया जाता कि वह बेहतर हैं, आराम कर रहे हैं, संभल रहे हैं। लेकिन अंदर समय जैसे धीरे-धीरे किसी और दिशा में जा रहा था। यही वह जगह है जहां फल्मी दुनिया की चमक अपनी सबसे कठोर सच्चाई दिखाती है। एक सितारे का शरीर सिर्फ उसका शरीर नहीं रह जाता। वह निवेश बन जाता है, प्रतिष्ठा बन जाता है। अफवाहों का बाजार बन जाता है। कोई बीमारी सिर्फ बीमारी नहीं रहती। वह छवि का संकट बन जाती है। और जब राजेश जैसा नाम दांव पर हो तो चुप्पी भी एक रणनीति बन सकती है। कहा जाता है कि उनके करीबी लोगों में से कुछ ने अंतिम वर्षों में बाहरी दुनिया से पहुंच नियंत्रित कर दी थी। कौन भीतर आएगा, कौन नहीं, क्या बताया जाएगा, क्या छिपाया जाएगा? सब पर नजर रखी जाती थी। इसे देख कुछ लोग इसे सुरक्षा कहते थे। कुछ लोग नियंत्रण। यही वह धुंधली रेखा है जहां सेवा और स्वार्थ एक दूसरे का चेहरा पहन लेते हैं। डिंपल का इस दौर में फिर से अधिक दिखना लोगों के लिए भावुक करने वाला भी था और रहस्यमय भी। बरसों की दूरी के बाद वह क्यों लौटी? क्या यह सिर्फ एक परिवार का अपने बीमार सदस्य के पास लौटना था? या वह जान चुकी थी कि समय हाथ से निकल रहा है।

कुछ लोगों ने इसे कर्तव्य कहा। कुछ ने करुणा, कुछ ने अधूरी कहानी का अंतिम मोड़। लेकिन जो लोग उस घर के वातावरण को जानते थे, वे समझते थे कि यह वापसी साधारण नहीं थी। डिंपल और राजेश का रिश्ता कभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ था। ऐसा कई लोगों का मानना रहा। अलगाव था, चुप्पी थी, अपनी-अपनी दुनिया थी। मगर डोर कहीं ना कहीं बची हुई थी। खासकर बेटियों के कारण, सांझा इतिहास के कारण और शायद उस अनकहे भाव के कारण जिसे दोनों ने सार्वजनिक रूप से शब्द नहीं दिए। जब बीमारी ने राजेश को कमजोर किया तब यह डोर फिर दिखाई देने लगी। और शायद यही कारण है कि आखिरी दिनों में डिंपल का उनके पास होना सिर्फ पारिवारिक घटना नहीं। एक भावनात्मक विस्फोट था। बीमारी आदमी को निर्वस्त्र कर देती है। नाम से, पद से, मिथक से। राजेश खन्ना जिन्हें लोग काका कहकर पुकारते थे। जिन्हें पर्दे पर देखकर प्रेम सीखा गया। जिनके संवादों में लोग अपना दिल ढूंढते थे। वही आदमी अब कभी बिस्तर पर टिके, कभी धीमी आवाज में बोलते, कभी अतीत में लौटते दिखाई देते थे। सार्वजनिक छवि अब भी संभाली जा रही थी। पर निजी कमरे में बीमारी अपना काम कर रही थी। धीरे, निर्मम और बहुत व्यक्तिगत ढंग से। सूत्रों के अनुसार उन्हीं दिनों उनके कथनों में अतीत लौट लौट आता था। कभी करियर, कभी विश्वासघात, कभी अकेलापन, कभी परिवार। बीमारी के वक्त इंसान अक्सर वही बोलता है जिसे जीवन भर दबाकर रखा हो। क्या राजेश भी उसी मोड़ पर पहुंच चुके थे जहां आदमी दुनिया से नहीं अपने जीवन से हिसाब करता है? क्या डिंपल ने उन बिखरे वाक्यों में वह सुना जो कभी स्वस्थ दिनों में सुनने को नहीं मिला? यह भी याद रखना होगा कि राजेश खन्ना की कहानी सिर्फ शारीरिक कमजोरी की नहीं भावनात्मक भूख की भी कहानी थी। सुपरस्टार को तालियां मिलती हैं पर सहारा बहुत कम मिलता है। जब रोशनी बुझती है तो ताली बजाने वाली भीड़ घर तक साथ नहीं आती और घर के भीतर अगर रिश्ते भी पुराने घावों से भरे हो तो बीमारी सिर्फ रोग नहीं रहती। वह फैसला सुनाने वाली खामोश अदालत बन जाती है। उनकी हालत पर पर्दा डालने की कोशिश शायद इसलिए भी की गई क्योंकि उनके नाम से जुड़ी उम्मीदें बहुत बड़ी थी। जनता उन्हें कमजोर देखना नहीं चाहती थी और शायद वह खुद भी नहीं चाहते थे कि लोग उन्हें इस रूप में याद करें। मगर शरीर की भाषा किसी प्रचार से नहीं रुकती। आंखों के नीचे उतरती थकान, हाथों की सुस्ती, चाल का बदलना, आवाज की टूटन यह सब वह सच बोलता है जिसे प्रेस विज्ञप्तियां दबा नहीं पाती। और फिर एक और सवाल उठता है अगर बीमारी इतनी गंभीर थी तो उनके आसपास मौजूद लोगों में कौन ऐसा था जिसने समय रहते परिवार को पूरी गंभीरता से चेताया और कौन ऐसा था जिसने सिर्फ हालात को संभालने का अभिनय किया? किसने उनकी निजता बचाई और किसने उसी निजता को एक अदृश्य दीवार बनाकर सब कुछ अपने नियंत्रण में रखा। आखिरी दिनों की सबसे अंधेरी पहेली शायद यहीं छिपी है। बीमारी से ज्यादा डरावनी कभी-कभी वह चुप्पी होती है जो बीमारी के चारों ओर बुन दी जाती है। क्या डिंपल ने उसी चुप्पी के भीतर छिपा वह सच पहचान लिया था। फाटक पर हलचल कम थी। लेकिन भीतर के गलियारे अचानक चौकन्ने हो उठे थे। कहा जाता है उन अंतिम दिनों से कुछ पहले एक ऐसा आगंतुक आया जिसकी मौजूदगी ने राजेश खन्ना के भीतर दबे तूफान को फिर जगा दिया। वह कोई साधारण मुलाकाती नहीं था क्योंकि उसके आने के बाद घर का माहौल बदल गया। कमरे के बाहर खड़े लोगों की फुसफुसाहट तेज हो गई और राजेश जो कुछ घंटों पहले तक सुस्त और चुप थे असामान्य बेचैनी में डूब गए। किसने दरवाजा खोला? किसने उसे अंदर जाने दिया और वह कौन सी बात थी जिसने बरसों की दबाई हुई परतें एक ही मुलाकात में हिला दी। अगर उस वक्त बाहर खड़ी दुनिया को पता चल जाता कि उस बीमार कमरे में क्या चर्चा हुई तो शायद पुराने रिश्तों, पुराने हिसाबों और आखिरी इच्छाओं की पूरी कहानी बदल जाती। कुछ सूत्रों ने संकेत दिया कि उस मुलाकात के बाद राजेश बार-बार अतीत की ओर लौटने लगे। कुछ नाम लेने लगे, कुछ आग्रह करने लगे। कौन था वह शख्स, कोई पुराना विश्वास पात्र, कोई अधूरा रिश्तेदार, कोई ऐसा चेहरा जो उनकी टूटी हुई स्मृतियों में बहुत गहरे ढंसा हुआ था। यही वह मोड़ है जहां आखिरी 72 घंटों की कहानी अचानक और खतरनाक रूप से निजी हो जाती है। राजेश खन्ना के जीवन में लोगों का आना-जाना हमेशा से खबर बनता रहा। शुरुआती दौर में निर्माता, निर्देशक, नायिकाएं, दोस्त, प्रशंसक हर कोई उनके दरबार का हिस्सा बनना चाहता था। बाद के वर्षों में यह दायरा सिकुड़ गया। जो कभी भीड़ थी वह चुनिंदा चेहरों में बदल गई और जब जीवन अपने ढलान पर पहुंचता है तो यही चुनिंदा चेहरे सबसे महत्वपूर्ण हो जाते हैं क्योंकि वही आपकी आखिरी दुनिया बनते हैं। उस रहस्यमय आगंतुक को लेकर कभी कोई आधिकारिक स्पष्टता सामने नहीं आई। लेकिन फिल्मी गलियारों में यह बात लंबे समय तक तैरती रही कि राजेश के अंत के पहले कुछ मुलाकातें उन्हें भीतर तक हिला गई थी।

कोई कहता था पुराने संबंधों की गांठे खुल रही थी। कोई कहता था संपत्ति, विरासत, भावनात्मक हिसाब या अधूरी शिकायतें सामने लाई गई। कोई यह भी कहता था कि यह मुलाकातें राजेश को भावनात्मक रूप से थका देती थी। सच जो भी रहा हो, यह साफ था कि वह सिर्फ बीमारी से नहीं जूझ रहे थे। वह स्मृतियों से भी जूझ रहे थे। यही जहरीली नजदीकियों का खेल फिर सामने आता है। गिरते हुए सितारे के पास सबसे पहले वही पहुंचता है जिसे कुछ हासिल करना हो। सहानुभूति, पहुंच, महत्व या इतिहास में अपनी जगह। राजेश जैसे व्यक्ति जो भावुक भी थे और अपनी छवि से गहरे बंधे भी ऐसे समय में बहुत असुरक्षित हो सकते थे। उनके आसपास उपस्थित हर व्यक्ति का चेहरा एक जैसा नहीं पढ़ा जा सकता। कोई सचमुच अपना था। कोई शायद सिर्फ अवसर का इंतजार कर रहा था। डिंपल की उपस्थिति इस पूरे दृश्य को और भी तीखा बना देती है। बरसों बाद वह इस घर में फिर थी। लेकिन अब किसी नवविवाहिता की तरह नहीं। किसी चुप देखती समझती सब कुछ भीतर रखती स्त्री की तरह। कहा जाता है कि वह राजेश के पास बैठती। उनकी बातें सुनती। कभी बहुत कम बोलती। ऐसी खामोशी खाली नहीं होती। वह बहुत कुछ दर्ज करती है और कई बार जो शब्द नहीं कहे जाते वही सबसे अधिक सच्चे होते हैं। क्या उस रहस्यमय मुलाकात के बाद राजेश ने डिंपल से कुछ ऐसा कहा जो उन्होंने कभी किसी और से नहीं कहा था। कुछ स्रोतों के संकेत हैं कि उनकी बातों में पछतावा था, शिकायत थी और शायद विनती भी। बीमारी इंसान के भीतर झूठ की ताकत कम कर देती है। जो आदमी वर्षों तक अपने व्यक्तित्व के कवच में ढका रहा हो वह अंत के निकट आकर अचानक बहुत सीधा हो सकता है। अगर ऐसा हुआ तो डिंपल ने क्या सुना और यहीं उनकी बेटियों की परछाई भी दिखाई देती हैं। परिवार जो बरसों से दूरी और निकटता के बीच झूलता रहा। अब उसी कमरे में भावनात्मक रूप से फिर से इकट्ठा हो रहा था। एक पिता जो महानायक था मगर निजी जीवन में जटिल एक पत्नी जो दूर चली गई थी मगर पूरी तरह गई नहीं। बच्चे जो अपने पिता को दुनिया से अलग एक और रूप में जानते थे। यह सिर्फ एक परिवार नहीं यह कई अधूरी कहानियों का एक साथ आमनासामना था। राजेश खन्ना को लेकर यह भी मशहूर था कि वह अपने अतीत से कट नहीं पाते थे। सफलता का शिखर जितना ऊंचा होता है, उसकी याद उतनी ही निर्मम होती है। शायद इसलिए किसी पुराने व्यक्ति का अचानक सामने आना उन्हें भीतर तक तोड़ देता था। पुराने दिन, पुराने संवाद, पुराने प्रेम, पुरानी चोटें सब फिर उठ खड़े होते थे। और जब शरीर पहले से थका हो तो स्मृतियों का हमला और भी भारी पड़ता है। उस मुलाकात के बाद जैसा कुछ लोगों ने इशारों में कहा कमरे की हवा बदल गई थी। डॉक्टरों की आवाजें और दब गई। घर के लोगों के चेहरों पर तनाव गहरा हुआ और राजेश की निगाहें जैसे बार-बार किसी एक ही बिंदु पर लौटती थी। जैसे वह किसी निर्णय के कगार पर हो। किसी बात को कहना चाहते हो। किसी बात को सुधारना चाहते हो या किसी से एक अंतिम आश्वासन मांग रहे हो। क्या यही वह क्षण था जब डिंपल ने उनकी आंखों में वह देखा जिसे बाद में कभी शब्द नहीं दिए गए। कहानी यहीं सबसे नुकीली हो जाती है। क्योंकि अब हम सिर्फ एक बीमार सितारे की नहीं उस आदमी की बात कर रहे हैं जो अपने जीवन के सबसे निजी अदालत घर में खड़ा था। बाहर लोग अब भी उन्हें राजेश खन्ना, सुपरस्टार, काका, रोमांस का सम्राट कह रहे थे। लेकिन भीतर वह सिर्फ एक मनुष्य थे। थके हुए, यादों से भरे, अपने ही अतीत के सामने असहाय और जब कोई रहस्यमय आगंतुक ऐसे समय पर आता है तो वह सिर्फ दस्तक नहीं देता। वह दबी हुई सच्चाइयों का ताला भी हिला देता है।

तो आखिर उस मुलाकात के बाद ऐसा क्या बदला कि डिंपल ने उनके पास से उठना बंद कर दिया और राजेश बार-बार जैसे किसी अनसुने हिसाब की ओर लौटते रहे। क्या उन्होंने कोई नाम लिया था? कोई विनती की थी या कोई ऐसा राज सौंपा था जिसे सुनकर डिंपल आज तक चुप हैं और शायद उसी अनसुने राज के तुरंत बाद घर के भीतर एक ऐसा घेरा बना जिसमें सिर्फ पांच चेहरों को आने जाने की छूट थी और बाकी सबको विनम्र मुस्कान के साथ दरवाजे पर रोक दिया जाता था। देर रात की दवाइयों का समय, सुबह की जांच, दोपहर की थकान और शाम की मुलाकातें सब कुछ एक कागज पर लिखा जाता। फिर वही कागज अगले ही घंटे गायब हो जाता। रसोई तक में यह फुसफुसाहट थी कि डॉक्टर, पारिवारिक प्रतिनिधि, एक पुराने भरोसेमंद सहायक और दो बेहद नजदीकी लोग मिलकर तय कर रहे हैं कि बाहर दुनिया क्या सुनेगी और क्या नहीं सुनेगी। जो आदमी कभी अपने फैसले खुद करता था, उसके कमरे के बाहर अब फाइलें पहले तय करती थी, कि कौन बोलेगा। सूत्रों के अनुसार उसी दौर में कुछ फोन कॉल ऐसे हुए जिनमें बीमारी से ज्यादा चर्चा छवि की हुई और यही सबसे भारी सवाल बनकर उठता है क्या यह सुरक्षा थी या एक ऐसा मौन समझौता जिसमें सच को टुकड़ों में बांट दिया गया था। 72 घंटों की उल्टी गिनती में पहला दिन अजीब अनुशासन से भरा था। सफेद चादरें बदली गई। कमरे की रोशनी हल्की की गई और बाहर बरामदे में रखी कुर्सियों पर बैठे लोग बार-बार उठकर फिर बैठते रहे। जैसे हर आवाज पर निर्णय बदल सकता हो। डिंपल अंदर थी लेकिन हर बार कोई नया चिकित्सकीय कागज आता तो दरवाजे पर खड़े दो लोग पहले उसे पढ़ते फिर आगे भेजते। यह वही घर था जहां कभी मेहमान बिना सूचना आ जाया करते थे। पर अब प्रवेश का नियम किसी वीआईपी सुरक्षा से भी कठोर था। इस गुप्त घेरे की दूसरी परत पैसे और प्रतिष्ठा की थी और यही कहानी चुभने लगती है। एक वरिष्ठ परिचित ने बाद में संकेत दिया कि कुछ निर्णयों में यह भी जोड़ा जा रहा था कि कौन सी खबर बाहर जाने पर पुराने ब्रांड करारों, सार्वजनिक छवि और विरासत की कीमत पर असर पड़ेगा। एक दिन की विशेष देखभाल पर जितनी रकम खर्च हो रही थी उतने में उस समय एक मध्यमवर्गीय परिवार कई महीनों का घर चला लेता। फिर भी चर्चा बीमारी की गंभीरता पर कम कथन की भाषा पर अधिक थी। इसी बीच एक ऐसा चेहरा भी बार-बार दिखा जिसे घर का सदस्य नहीं पर घर की चाबी जैसा प्रभाव मिला हुआ था। फिल्मी गलियारों में उसे राजेश के पुराने द्वार का साथी कहा जाता रहा। वह जिसके बारे में फिल्मी गलियारों में कहा जाता था कि कठिन समय में साथ बैठता भी था और जोखिम भरे फैसलों की ओर धकेलता भी था। वह व्यक्ति देर शाम आया। लगभग चुपचाप भीतर गया और बाहर निकलते समय उसने स्टाफ से सिर्फ इतना कहा कि अब किसी बाहरी को अंदर ना आने देना। उसकी आंखों में घबराहट कम हिसाब ज्यादा दिखाई देता था। रात गहराते ही एक ठोस घटना हुई जिसे बाद में अलग-अलग लोगों ने अलग तरह से याद किया। बताया जाता है कि राजेश ने अचानक जोर देकर किसी पुराने दस्तावेज की मांग की। अलमारी का नाम लिया और कहा कि वह कागज डिंपल को अब भी दिखाया जाए। कमरे में मौजूद दो लोगों ने बात टाल दी। कहा गया कि अब भी आराम जरूरी है। कागज सुबह देख लेंगे। सुबह तक वह फाइल अपनी जगह पर नहीं मिली और इस बात को तुरंत घरेलू अव्यवस्था कहकर दबा दिया गया। यही वह क्षण था जब डिंपल की चुप्पी बदल गई। पहले वह सुन रही थी। अब वह देखने लगी कि किसके आने पर कौन सा ड्रर बंद होता है। किसके जाने के बाद कौन सा फोन तुरंत कट जाता है और किस नाम का जिक्र होते ही कमरे का माहौल भारी हो जाता है। उन्होंने किसी पर सार्वजनिक आरोप नहीं लगाया। पर उन्होंने उस रात के बाद एक भी कागज बिना पढ़े आगे नहीं बढ़ने दिया। घर के भीतर पहली बार लगा कि मौन समझौते में एक दरार पड़ गई है। दूसरे दिन की सुबह तक राजेश का मन अतीत में भटकता रहा और वह कभी बेटियों का नाम लेते कभी पुराने संघर्षों का तो कभी ऐसे संकेत देते जैसे कोई अधूरी व्यवस्था पूरी करनी हो। इस पर भी गुप्त घेरे ने आधिकारिक संदेश वही रखा। स्थिति नियंत्रित है। चिंता की बात नहीं। यह वाक्य बाहर सुनने में सुकून देता था। पर भीतर बैठी आंखों को बेचैन करता था। क्या किसी सम्राट की अंतिम निजी इच्छा भी प्रबंधन की भाषा में अनुवादित कर दी जानी चाहिए? जब एक परिवार भावनाओं में डूबा हो और उसके बीच कुछ लोग छवि, पहुंच और फैसले की डोर पकड़ लें। तो सच सबसे पहले किसके हाथ से फिसलता है? डॉक्टर के, परिजन के या उसी व्यक्ति के जो बिस्तर पर लेटा सब सुन रहा होता है। दोपहर ढलने लगी तो घर में तनाव का रंग और गहरा हुआ क्योंकि इस बार चोट बाहर से नहीं भीतर के घेरे से आई बताई जाती है। जिन पर सबसे अधिक भरोसा था। उन्हीं में से एक पर निजी बातचीत को बाहर तक पहुंचाने का शक जताया गया। ऐसा कई पत्रकारों और पुराने उद्योग सूत्रों ने वर्षों बाद कहा। वह व्यक्ति राजेश के निजी कक्ष तक बिना रोक-टोक जाता था। दवाइयों का समय जानता था और परिवार की भावनात्मक स्थिति भी पड़ चुका था। ऊपर से वह सेवक जैसा शांत दिखता। लेकिन कुछ आरोपों में उसे भीतर ही भीतर सूचना का सौदागर बताया गया। कम से कम आरोप यही रहे। अगर सबसे नजदीकी आदमी ही आवाज, कागज और संकेत को लाभ में बदल दे तो विश्वास किस दरवाजे पर जाकर दम तोड़ता है? इस विश्वासघात की शुरुआत एक बहुत मामूली लगने वाली आदत से हुई थी। वह करीबी व्यक्ति हर मुलाकात के बाद कहता कि वह नोट बना रहा है ताकि दवा और दिनचर्या में गलती ना हो। पर बाद में कहा गया कि उन्हीं नोट्स के टुकड़े बाहर चर्चा का सामान बनते गए। किसी को पता नहीं चला कि कौन सी पर्ची चिकित्सा के लिए थी और कौन सी पर्ची रसूखदार

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