Air India के AI 2379 फ्लाइट में 300 फीट की अचानक गिरावट और 24 यात्रियों के घायल होने से कई गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। इन सवालों को समझने के लिए हमारे साथ हैं ग्रुप फाइटर पायलट यूके देवनाथ जी जो बताएंगे कि आखिर विमान के अचानक एल्टीट्यूड ड्रॉप के पीछे का असली वजह क्या है और पायलट ऐसी स्थिति में क्या करते हैं? सर बहुत-बहुत स्वागत है आपका india.com में। सर सबसे पहले तो मुझे आप यह बताइए कि एयर इंडिया की जो फ्लाइट्स हैं इसमें कंटिन्यू ऐसी प्रॉब्लम्स देखने को क्यों कैसे मिल रही हैं? जैसे पिछले साल भी अहमदाबाद में जो बहुत बड़ा क्रैश था उसमें ऑलमोस्ट 300 लोगों की जान चली गई थी। तो ऐसी प्रॉब्लम्स बार-बार क्यों हमें एयर इंडिया में देखने को मिल रही हैं? हां, बहुत ही बेहतरीन सवाल है। सवाल एडमिनिस्ट्रेटिव और सेफ्टी पॉइंट ऑफ व्यू से बहुत इंपॉर्टेंट है। देखो एयर इंडिया दुनिया की बेहतरीन एयरलाइंस में से एक है। जी सर। मैं एयरफोर्स में था। फाइनली ग्रुप कैप्टन रैंक से रिटायर हुआ। 34 साल की नौकरी के बाद फाइटर पायलट था। मिग-23 उड़ाया। उस अनुभव से बोलूंगा। देखो एिएशन चाहे वो मिलिट्री एिएशन हो या सिविल एिएशन हो। उसमें कमोबेश एक नियम है जी। कि हजारों घंटे की फ्लाइट में जी या लाखों घंटों की फ्लाइट में एक एक्सीडेंट हो सकता है। जी मशीन है राइट मशीन के पीछे ह्यूमन एफर्ट है। राइट कभी मशीन फेल होती है। कभी ह्यूमन एफर्ट फेल होता है। कोई भी पायलट जानबूझ के तो गलती नहीं करता। कई बार मशीन है। सर्विसिंग इंजीनियर्स कर रहे हैं। वो भी जानबूझ के कोई बिल्कुल। फौल्ट नहीं करेंगे। लैप्सेस होते हैं अ क्योंकि कई बार वर्क अंडर प्रेशर होता है। तो एयर इंडिया की पिछले साल की जो दुखद दुर्घटना की आप बात कर रहे हैं उसकी इन्वेस्टिगेशन अभी तक चल रही है। राइट? अ उसमें जो फ्यूल कंट्रोल स्विच था उसके ऑपरेशंस के बारे में सवाल उठ रहे हैं।
अब सवाल यह है कि अभी तक डीजीसीए या अमेरिका की जो कंपनी है जिसने उस फ्यूल कंट्रोल स्विच को बनाया था। उन्होंने फाइनल रिपोर्ट नहीं दी है कि क्या पायलट ने उस फ्यूल कंट्रोल स्विच को गलत इस ऑपरेट किया या फ्यूल कंट्रोल स्विच में ही कोई डिफेक्ट। अभी वाली बात जो हो रही है कि जिसमें हवाई जहाज उड़ते-उड़ते 300 फीट नीचे आ गया। देखो दो-तीन चीजें होती हैं। जब कोई हवाई जहाज उड़ रहा होता है तो एक फिनोमना होती है हम कहते हैं कैट सीएटी क्लियर एयर टर्बुलेंस। जहाज के सामने सब कुछ सही नजर आता है। लेकिन क्योंकि उसमें अलग-अलग दिशाओं से वायुमंडल में एयर स्ट्रीम्स आ रही हैं। देखो हवा कभी एटमॉस्फेयर में दाएं से आती है, कभी बाएं से आती है। तो जब वो टकराती हैं ना तो सडनली ऊपर या नीचे डिफ्लेक्ट हो जाती हैं। कोई बादल नहीं है, कोई बारिश नहीं है। हवा एकदम साफ दिख रही है। लेकिन क्योंकि दो हवाएं टकराई हैं तो एक टर्बुलेंस पैदा होता है। ओके। उसकी वजह से जहाज होता है कभी-कभी 300 फीट ऊपर चला जाए, 300 फीट नीचे चला आए। अच्छा एक और फिनोमिना है। अभी देखो बारिश का सीजन है, मसून है। आपने देखा होगा बड़े-बड़े टावरिंग क्लाउड्स होते हैं। तो एक तो भयंकर क्लाउड आपने देखा होगा काले रंग का होता है। बहुत ऊंचा होता है और अचानक उससे बारिश। कई बार तो ओले भी गिरते हैं। तो हम इन क्लाउड्स को बोलते हैं सीबी क्लाउड। क्यूमुलो निंबस क्लाउड। इन क्लाउड में एक उनकी प्रॉपर्टी होती है कि बहुत तेज अप ड्राफ्ट होती है। अपड्राफ्ट बोला तो हवा नीचे से ऊपर बहती है या बहुत तेज डाउन ड्राफ्ट होती है। बोला तो हवा ऊपर से ले नीचे की तरफ बहुत तेजी से आती है। अब अगर समझिए किसी वजह से एक हवाई जहाज इस अपड्राफ्ट या डाउन ड्राफ्ट में आ जाए तो वह अपने आप अपने आप ये नहीं कि पायलट ने किया वो 300 फुट ऊपर जा सकता है। 300 फुट नीचे आ सकता है। ऐसा होता रहता है। ओके। अ पायलट्स जो हैं उनके सामने एक रेडार होता है सभी हवाई जहाजों में। चाहे बोइंग हो या एयर बस हो। हम उसे कहते हैं उसके जहाज के नोज में होता है। सामने वाले पोर्शन में। हम उसको बोलते हैं एयरक्राफ्ट वेदर रेडार। तो उसमें दिख जाता है काफी हद तक कि सामने कोई भयंकर क्लाउड है। क्यूमुलर निबस क्लाउड है। पायलट के सामने एक स्कोप है। उसमें अलग-अलग रंगों में ना लाल, पीला, हरा वार्निंग लेवल आती रहती है। तो पायलट क्या करते हैं? अगर उसको दिख जाता है अभी भी जो बादल है वो समझिए 50 कि.मी. दूर है,
40 कि.मी. दूर है, 30 कि.मी. दूर है। पायलट क्या करता है? हमको सिखाया जाता है कि डॉग लेग कर दो। सामने ये बादल है। सीधा मत जाओ। बाएं तरफ 45 डिग्री मुड़ जाओ। दो-ती मिनट फ्लाई करो। और जब ये क्लाउड पीछे छूट जाए तो फिर दोबारा से ओरिजिनल फ्लाइट पाथ पे आ जाओ। दो-ती मिनट में आप अपने ओरिजिनल रूट में आ गए। तो आपने डॉग लेग किया और आप अपने ओरिजिनल फ्लाइट पाथ पर आ गए। यह एक बहुत स्टैंडर्ड प्रक्रिया होती है। सर मैं इसी जवाब से सवाल पूछना चाहूंगी कि जो पायलट था जो फोकट से दिल्ली की एआई 2379 जो फ्लाइट थी जिसमें टर्बुलेंस आया तो आपने बताया कि पायलट को पता चल जाता है। तो क्या इस जो पायलट था उसको पता नहीं चला उसने क्यों नहीं कोई ऐसा प्रिकॉशन लिया कि टर्बुलेंस से बचा जा सके। हां देखो अगर वो क्लियर एयर टर्बुलेंस है यानी वाता सा सामने एकदम हवा साफ है तो फिर वो वेदर रेडार में दिखाई नहीं देता है। ओके वेदर रेडार में तभी दिखाई देगा अगर सामने बादल है वो बारिश वाले बादल है वो वेदर रेडार में दिखता है। देखो रेडार कैसे काम करता है इलेक्ट्रॉनिक वेव्स को ट्रांसमिट किया जाता है। वो सामने जो बादल है उसके पानी के कणों से टकराता है। बूंदों से टकराता है और वापस आ जाता है। ओके। तो स्कोप पे दिख जाता है। कई बार क्या होता है कि जब तक आपको वेदर रेडर में दिखा तब तक आप इतने पास आ गए इतने पास आ गए कि आपको दाएं बाएं जाने का मौका ही नहीं मिला। कई बार क्या होता है कि आपने सोचा कि हां सामने अभी ये 50 कि.मी. दूर है। 40 कि.मी. है। मैं बाएं तरफ मोड़ लेता हूं। अब आपने जहाज को बाएं तरफ मोड़ा। हो सकता है कि मानसून सीजन में जैसे उड़ीसा के पास अभी हुआ आपने बाएं तरफ मोड़ा वहां पर भी एक्यूमुलर नंब है। ओके तो फिर पायलट को डिसीजन लेना पड़ता है कि वो अपने जहाज को ऊपर ले जाए नीचे ले जाए क्योंकि दाएं बाएं उसको क्यूमुले बस इस तरफ नजर आ रहा है। सामने नजर आ रहा है। सीबी क्लाउड लेफ्ट में भी नजर आ रहा है। तो अपने जहाज को ऊपर ले जा सकता है या नीचे ले जा सकता है।
अगर उसका समय नहीं है तो वह क्या करता है कि जो रेड येलो ग्रीन वार्निंग अलग-अलग दिख रही हैं वो लीस्ट डिस्टरबेंस ओके लीस्ट यानी सबसे कम जहां टर्बुलेंस है उसमें से ले जाता है ये स्टैंडर्ड ट्रेनिंग का एक हिस्सा होता है। ओके सर जैसा कि हमने फिल्मों में देखा है। अभी एनिमल मूवी थी उसमें रणवीर कपूर जो है अपने प्राइवेट जेट को ऑटो पायलट मोड में डाल के रोमांस करते हैं। तो क्या ये रियल लाइफ में पॉसिबल है? हां देखो अब जो सिविलियन एयरक्राफ्ट होते हैं उनमें ऑटो पायलट भी होता है और उनकी फ्लाइट ड्यूरेशन कई बार लंबी होती है। अगर आप दिल्ली से मनीला जा रहे हो तो फ्लाइट ड्यूरेशन 5 घंटा 7 घंटा होती है। जाहिर बात है कोई भी पायलट लगातार 5 घंटे 7 घंटे तक उड़ा नहीं सकता। तो ऑटो पायलट को हैंडओवर कर देते हैं। ओके कि ऑटो पायलट ऑटो पायलट अब मुझे 7 कि.मी. की हाइट पर अगले 21 मिनट के लिए 700 कि.मी. सीधा जाना है। आप प्लीज मेरी हाइट, स्पीड, डायरेक्शन मेंटेन करते हुए ले जाओ। ओके। उसके बाद नियम के अनुसार यह है कि एक पायलट थोड़ा रेस्ट ले सकता है। वाशरूम जा सकता है। लेकिन दूसरा जो पायलट है कोपायलट। जी। फर्स्ट पायलट जो है वो कंट्रोल में होना चाहिए।
वहां पर फिजिकली प्रेजेंट होना चाहिए। ओके। बाकी फिल्मों की तो बात ही अलग है। हमारे हिंदी फिल्म्स जो हैं वो क्या कहते हैं ना कुछ लिबर्टीज लेने के लिए जाने जाते हैं। सर ऑटो पायलट की बात कर रहे हैं तो क्या जो अभी ये इंसिडेंट हुआ है फुकेट और दिल्ली वाली जो फ्लाइट है तो ऐसा क्या कोई ऑप्शन था कि ऑटो पायलट में डाल देते और फ्लाइट को पता चल जाता ऑटो पायलट के कि हां आगे टर्बुलेंस है तो उससे बचा जा सकता था। हां देखो नॉर्मली क्या होता है जैसे आप ऑटो पायलट एंगेज करते हैं आप जा रहे हैं और आपको दिख रहा है जी 150 किलोमीटर दूर से 100 किलोमीटर की दूर से ही आपको क्लाउड दिख गया है तो नियम क्या है कि आप जब ऐसा टर्बुलेंस एक्सपीरियंस कर सकते हैं तो जैसे मैं mi-23 उड़ाता था हमारा एक डैंपर मोड होता था ओके कि अगर टर्बुलेंस होंगे तो ऑटो पायलट का जो डैंपर मोड है वो टर्बुलेंस को थोड़ा कम कर देता था ओके लेकिन लेकिन अगर झटके वाकई सेवेयर होंगे आप देखेंगे पायलट जो है वो अनाउंस कर देता है कि लेडीज एंड जेंटलमैन आप कृपया अपनी सीटों पर बैठ जाइए अपनी कुर्सी की पेटियों को बांध लीजिए फ्लाइट क्रू प्लीज एनश्योर तो आपने देखा होगा जो क्रू के मेंबर्स होते हैं वो आते हैं आपका सीट बेल्ट टाइट है कि नहीं चेक करते हैं देखो पायलट जो है टर्बुलेंस में घुस गया है तो नियम है कि ऑटो पायलट को ऑफ कर देना है ओके और उसके बाद पायलट मैनुअली उसको उड़ाता है यानी अपने कंट्रोल से उसको उड़ाता है। ऑटो पायलट को लेकर आप टर्बुलेंस में या क्यूमुले निंबस क्लाउड के अंदर नहीं घुस सकते। वो ट्रेनिंग का हिस्सा नहीं है। रेगुलेशन में अलाउ नहीं है।
तो टर्बुलेंस में चले गए तो पायलट को मैनुअली उस जहाज को उड़ाना है। लेकिन उसके बावजूद भी ऐसा हो सकता है कि इतने जोर से अपड्राफ्ट का झटका आए। इतने जोर से डाउन ड्राफ्ट का झटका आए कि पायलट जो उड़ा रहा है वह स्मूथ नहीं उड़ा पाएगा। जहाज फिर भी 100 200 फीट ऊपर नीचे हो सकता है। लेकिन ऐसा नहीं है कि वो ईंट की तरह से नीचे आता है। देखिए सामने की तरफ उड़ रहा है ना सामने उड़तेउते वो 100 फीट नीचे आ गया। डरने की कोई बात नहीं है। ऐसा होता रहता है। सर जैसे कि 24 लोगों के घायल होने की खबर सामने आई है। तो जब ये टर्बुलेंस हुआ जब फ्लाइट 300 फीट नीचे आई तो उनको चोट कैसे लगी? बिकॉज़ वो तो चेयर पे बैठे थे स्टक होंगे तो उनको चोट कैसे आई? देखो ये बहुत ही इंटरेस्टिंग सवाल है और पैसेंजर सेफ्टी के लिए सभी दर्शकों को ध्यान से सुनना चाहिए। अगर आपके जहाज के कैप्टन ने अनाउंस कर दिया है कि कृपया अपनी सीट पर बैठ जाइए और कुर्सी की सीट बेल्ट को बांध लीजिए तो जो पैसेंजर्स हैं उनके दो-तीन कर्तव्य हैं। राइट? कर्तव्य नंबर एक कहना मानकर आप वहां पर अपनी कुर्सी पर आकर बैठ जाइए। वाशरूम या कहीं पर भी मत जाइए। दूसरी बात है सीट बेल्ट को ना सिर्फ बांधे वरन उसको टाइट कर लीजिए। लूज मत छोड़िए। कई बार क्या होता है कि पायलट अनाउंस कर करते हैं कि लेडीज एंड जेंटलमैन सामने टर्बुलेंस हो रहा है तो कृपया सीट बेल्ट को बांध कर रखिए। तो ठीक है आप पायलट का कहना मानते हुए सीट बेल्ट लगाएं टाइट करें। थोड़ा सा लूज रख सकते हैं। लेकिन जैसे ही आपको लगता है कि टर्बुरेंस बढ़ रहा है, कृपया आप उसको तुरंत खींच कर टाइट टाइट कर लीजिए। फुल्ली टाइट कर लीजिए। अभी जितने दर्शकों का सिर ओवरहेड लगेज से टकराया या जितने दर्शकों का सिर एयरक्राफ्ट की छत से टकराया इन मेरा यह मानना है और शायद शत प्रतिशत सही भी है। इन्होंने सीट बेल्ट टाइट या लूज नहीं लगा रखी थी। टाइट होती तो कुछ नहीं होता। लूज भी होता है तो वह अपनी सीट में कितना 6 इंच ऊपर जा सकते हैं। छत तक नहीं जा सकते।