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पान की दुकान से मिला इंडस्ट्री का सबसे बड़ा विलेन।

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पाकिस्तान का शहर लाहौर। लाहौर का एक इलाका हीरा मंडी। हवा में संगीत के सुर, इत्र की खुशबू और अलग-अलग घरों से निकलती लाल पीली रोशनी घुली हुई थी। बारबीक्यू पर पकते कबाब इस माहौल में लज्जत जोड़ रहे थे। रवायत एक और चीज की थी। अलग-अलग तरह से लगाए गए पान की। एक सर्द रात इसी माहौल में पहुंचे चार दोस्त। खाना खाया। फिर गए राम लुभाया की पान की दुकान पर। पान लगवाया।

लेकर चारों पान चबाने लगे। इन चारों में एक लड़का फोटोग्राफर था। वो कुछ अलग अंदाज में पान चबा रहा था। इतना अलहदा अंदाज कि बगलगीर हुए एक साहिबान उसे बहुत चाव से देख रहे थे। लड़के ने नोटिस किया लेकिन इग्नोर करके पान घुलाने में मशगूल हो गया। इतने में ही वह आदमी पूछ पड़ा, “भाई तुम्हारा नाम क्या है?” सामने से खड़ू उस ढंग से जवाब मिला, “आपको मेरे नाम से क्या मतलब?” सामने वाले ने कहा, गलत मत समझिए। मेरा नाम वली मोहम्मद वली है। लड़के ने फिर घुड़का। बोला तो मैं क्या करूं? शख्स ने रिप्लाई में अपना पेशा बताया। बोला मैं राइटर हूं।

दलसुख एम पंचोली नाम के फिल्म प्रोड्यूसर ने मेरी लिखी एक कहानी पर फिल्म बनाई है। अब मैं एक और फिल्म उनके लिए लिख रहा हूं। लड़के को यह जवाब भी इंप्रेस नहीं कर सका। उसे यह सब पान बुलाने की प्रक्रिया में डिस्टरबेंस लग रहा था। लड़के ने दोहराया, अब आपकी इस बात का मैं क्या करूं कि आप राइटर हैं। शख्स ने अब मुद्दे की बात की। कहा मेरी फिल्म पंजाबी में बन रही है। मैं कहना यह चाहता हूं कि जिस तरह तुम पान चबा रहे हो वो मेरे कैरेक्टर से मैच करता है। तुम एक्टिंग करना चाहोगे फिल्म में। लड़के ने सीधे मना कर दिया। उसे लगा कि यह कोई झलास सा आदमी है। लेकिन शख्स ने जोर लगाया।

कहा कि कल ऑफिस आकर प्रोड्यूसर से मिलो। फिर जवाब देना। लड़के को जैसे तैसे पीछा छुड़ाना था। उसने कह दिया ठीक है मैं आ जाऊंगा। लड़के को पंचोली आर्ट स्टूडियोज आने के लिए कहा गया लेकिन लड़का तय दिन पर पहुंचा नहीं। कुछ ही दिनों बाद वो गया लाहौर के प्लाज़ा सिनेमा। एक फिल्म देखनेलेकिन फिल्म शुरू होने से पहले ही डायलॉग बाजी शुरू हो गई। क्योंकि इत्तेफाकन उसी सिनेमा हॉल में वली मोहम्मद वली ने लड़के को देख लिया, पहचान गए। बली ने उसे रोका और सबके सामने पंजाबी में जितनी गंदी गालियां सीखी थी सब दे डाली। गाली सुनने के बाद लड़के को यकीन हो गया कि यह आदमी फर्जी ऑफर नहीं दे रहा था। मन बनाया कि पक्का उस स्टूडियो जाकर प्रोड्यूसर से मिलेंगे। लेकिन वली साहब इस बार खुद ही लड़के को लेकर पंचोली आर्ट स्टूडियोज गए। स्क्रीन टेस्ट की तैयारी हुई।

मोती भी गिदवानी ने ही लड़के का मेकअप किया। गिदवानी ही इस फिल्म को डायरेक्ट करने वाले थे। दलसुख पंचोली और मोती गिदवानी ने स्क्रीन टेस्ट देखा। लड़के की कुछ तस्वीरें देखी औरउसे फिल्म ऑफर कर दिया। लगभग आदेश के स्वर में और तब यह लड़का हाथ जोड़कर कहने लगा कि प्लीज सर प्लीज मुझे एक बार अपने घर वालों से पूछ लेने दीजिए क्योंकि मैं फोटोग्राफी छोड़कर फिल्म लाइन में घुसने वाला हूं। तो घर वालों की सहमति जरूरी है। घर वालों की हां सुनने के लिए जो लड़का फिल्म के डायरेक्टर और प्रोड्यूसर के आगे हाथ जोड़ रहा था वही लड़का आने वाले वक्त में ऐसा एक्टर बना कि मां-बाप ने अपने बच्चों का नाम उस लड़के और उसके किए कैरेक्टर्स के नाम पर रखना ही बंद कर दिया। इस लड़के का नाम था प्राण और यह कहानी थी प्राण की पहली पिक्चर यमला जट की। वो एक्टर जिसने पहली बार विलेन कैरेक्टर्स को स्टाइल दिया। खास किस्म की मैनरिज्म दी और जो अपने कैरेक्टर्स की तैयारी के लिए और अब्राहम लिंकन से प्रेरित हुआ करता था। कहानी शुरू करते हैं दिल्ली से। पुरानी दिल्ली का बल्ली महारान यहीं रहता था प्राण कृष्ण सिकंद का पूरा परिवार। प्राण की मां रामेश्वरी घर संभालती थी। पिता लाला केवल कृष्ण सिकंद सरकारी सिविल इंजीनियर थे।

विभाग में उनकी बहुत पूछ थी। दुरुस्त काम था। इसीलिए जहां जिस शहर में सड़क या ब्रिज बनाने वाला कोई बड़ा प्रोजेक्ट सरकार शुरू करती, वहां लाला केवल का ट्रांसफर हो जाता। तो मां-बाप अपने साथ कुल सात बच्चों को लिए नए शहर चले जाते थे। कभी उन्नाव तो कभी मेरठ। रामपुर में तंबू लगा था। तभी रजा हाई स्कूल से प्राण ने अपनी दसवीं की पढ़ाई पूरी की। रिजल्ट कुछ खास नहीं थे। जैसे तैसे पास कर गए थे। उर्दू सीख ली थी जो आगे चलकर प्राण के करियर में खूब काम आई। लेकिन 10वीं पास करने के बाद एक सवाल जिससे आज भी बच्चों का सामना होता है वो प्राण से भी टकराया। पिता ने रिजल्ट आने के बाद प्राण को बुलाया। पूछा कि आगे क्या करना है? जवाब की तैयारी उन्होंने पहले ही कर ली थी। पूरा खांका खींच लिए आए थे। पापा से बोले अब पढ़ाई नहीं कर पाऊंगा। मुझे फोटोग्राफी का शौक है तो इसे ही अपना पेशा बनाऊंगा। प्राण जानते थे कि उनके पिता के दोस्त दिल्ली के कनोट प्लेस में स्टूडियो चलाते हैं।

तो प्रस्ताव रखा कि अपने मित्र से कह दीजिए कि वह अपने साथ रख लें ताकि प्रोफेशनली फोटोग्राफी सीख सकें। पिता ने जवाब सुना। कुछ देर बाद अपने दोस्त और एस एंड कंपनी के मालिक को फोन करके माजरा बताया। कुछ दिनों बाद प्राण ने दिल्ली जाकर ए दादास एंड कंपनी ज्वाइन कर ली। फोटो प्रिंट करना सीखने लगे। उस जमाने में डिजिटल फोटोग्राफी तो थी नहीं। तस्वीर क्लिक की जाती थी और नेगेटिव प्रिंट होता था और उससे फोटो बनते थे। किंग ऑफ रोमांस शाहरुख खान का एक डायलॉग है। अगर किसी चीज को शिद्दत से चाहो तो पूरी कायनात तुम्हें उससे मिलाने की कोशिश में लग जाती है। दिलचस्प यह है कि फिल्मी दुनिया में दाखिल होने की तो साधारण चाह भी प्राण के मन में नहीं थी। लेकिन कायनात पूरी कोशिश में लगी हुई थी। इस एपिसोड की शुरुआत में ही हमने कहानी सुनाई कि प्राण को उनकी पहली फिल्म कैसे लाहौर में मिली थी।

सोचिए कि अगर प्राण लाहौर पहुंचते ही नहीं तो क्या होता? लेकिन कायनात की कोशिश देखिए ए दास एंड कंपनी ने अपनी एक शाखा खोली लाहौर में। उसे संभालने का जिम्मा प्राण को ही मिला और इस तरह दिल्ली की खाक छानने के बाद प्राण चले लाहौर के रंग देखने। लेकिन दिल्ली से लाहौर वाया शिमला पहुंचे थे प्राण। फोटोग्राफी के ही सिलसिले में शिमला भेजे गए थे। जहां उन्होंने पहली बार अपने कदम मंच पर रखे। सालाना होने वाली रामलीला में प्राण ने सीता का किरदार निभाया था। गेस कीजिए कि राम कौन बना था? आप जवाब सुनिए और इत्तेफाक शब्द को ज़हन में ले आइए। राम बने थे मदन पुरी।

अमरीश पुरी के बड़े भाई। मदन पुरी भी आगे चलकर फिल्मों की दुनिया में आए और वह भी विलेन कैरेक्टर्स ही प्ले करने के लिए मशहूर हुए थे। प्राण खुद कहा करते थे कि किस्मत उन्हें फिल्म जगत में ले आई। यह इत्तेफाक ही तो था कि एक लड़का लाहौर के हीरा मंडी में पान चबा रहा है। वहीं एक फिल्म राइटर उसे देखकर इंप्रेस हो जाता है और फिल्म का विलेन रोल ऑफर कर देता है। प्राण को यमला जट ऑफर हुई। उन्होंने स्वीकार कर लिया। शूटिंग शुरू हुई और आ गई एक मुसीबत। प्राण की हिंदी ठीक थी। उर्दू ठीक जानते थे। लेकिन फिल्म बन रही थी पंजाबी में।

लाहौर में रहते हुए थोड़ी बहुत पंजाबी सीख ली थी उन्होंने। लेकिन ज्यादातर वक्त दिल्ली और उत्तर प्रदेश के अलग-अलग इलाकों में बिताने की वजह से पंजाबी डिक्शन परफेक्ट नहीं था। डायलॉग बोलते थे तो पता चलता था कि पंजाबी उनकी मातृभाषा नहीं है। फिल्म क्रू में गसिप होने लगी कि वली साहब किसे उठाकर ले आए हैं। यह तो पंजाबी बोल ही नहीं पा रहा। वली को भी अपनी नाक बचानी थी। उन्होंने प्रोड्यूसर दलसुख एम पंचोली को समझाया कि सर आप मुझे थोड़ा वक्त दीजिए।

इस लड़के की पंजाबी दुरुस्त मैं करवाऊंगा। समय मिला। बली ने अपने भाई नजीम को जिम्मा सौंपा। प्राण ने नजीम के साथ डिक्शन पर काम शुरू किया। कुछ ही दिनों में प्राण पंजाबी ऐसी धारदार बोलने लगे कि वह उसी फर्राटे के साथ गालियां देना भी शुरू कर चुके थे जिस फर्राटे के साथ उन्होंने प्लाज़ा सिनेमा में गालियां सुनी थी वली के मुंह से। प्राण को हमेशा लगता रहा कि यमला जट में उनका किरदार हल्का था। लेकिन इस किरदार ने उनकी दुनिया बदली। फोटोग्राफ से उठाकर पर्दे पर पेश कर दिया। प्राण पंजाबी फिल्में करके लाहौर में और भी शोहरत बटोरने लगे थे। कुछ मशहूरियत पहले से थी। उनके कपड़ों और तांगे की ऐसी चर्चा थी कि सहादत हसन मंटो ने कहा था वो एक हैंडसम आदमी थे। लाहौर में अपने कपड़ों और सबसे शानदार तांगे के लिए मशहूर थे। जिससे वह शाम को मौज मस्ती में घुमा करते थे। कपड़े के शौक प्राण पूरा कर सकते थे क्योंकि फोटोग्राफी में उनकी कमाई खूब हुआ करती थी।

₹200 महीने की सैलरी थी जो कि 30 और 40 के दशक में बहुत ज्यादा थी। इतनी सैलरी छोड़कर प्राण ने यमला जट में काम किया था जिसमें उन्हें महीने के हिसाब से सिर्फ ₹50 मिला करते थे। 1946 आते-आते अविभाजित भारत का दरवाजा आजादी खटखटाने लगी थी और उसके बगल में खड़ा था एक विभाजन। दोनों चर्चाएं एक साथ हो रही थी। प्राण लाहौर में थे। शुक्ला अहलवा आलिया नाम की दिल्ली की एक लड़की से शादी हो चुकी थी।

एक बेटा जन्म ले चुका था। नाम रखा गया था अरविंद। प्राण को डर सताने लगा था बंटवारे का। माहौल ऐसा बन चला था जिसमें लोग एक दूसरे के खून के प्यासे थे। प्राण ने इसी डर से दो काम किए। पहले तो अपनी सुरक्षा के लिए एक रामपुरी छुरी बनवाई। हर जगह रामपुरी लेकर घूमने लगे। दूसरा काम अपनी पत्नी और बेटे को इंदौर एक रिश्तेदार के पास भेज दिया ताकि दंगा भड़के और लाहौर छोड़ना पड़े तो ज्यादा मुसीबत ना हो। प्राण को जिस बात का डर था वो होने वाला था। साल 1947 का 14 और 15 अगस्त आने वाला था। लेकिन उससे पहले आता है 11 अगस्त जो कि प्राण के बेटे का पहला जन्मदिन था। इंदौर से पत्नी का संदेश आया कि बेटे के पहले जन्मदिन पर मौजूद रहना है। चाहे जो हो जाए। पहले प्राण नेमना किया। लेकिन पत्नी ने जिद की तो 10 अगस्त को इंदौर पहुंचकर साथ में इतने ही कपड़े ले गए कि एक हफ्ते बाद लाहौर वापस आ जाएंगे। क्योंकि लाहौर में रहते हुए फिल्में वह करने लगे थे। लगभग करियर बन चुका था। हीरो और विलेन दोनों किरदार निभा चुके थे।

20 फिल्में उनकी फिल्मोग्राफी में जुड़ चुकी थी। लेकिन इंदौर आ गए तो दोबारा कभी लाहौर जा नहीं पाए क्योंकि देश का बंटवारा हो गया। 14 अगस्त को पाकिस्तान बना, 15 अगस्त को भारत भी आजाद हुआ। एक एक्टर जो 20 फिल्में कर चुका है वह इंदौर में क्यों ही रुकता? उसका ठिकाना तब या तो लाहौर हो सकता था जहां पंजाबी फिल्में खूब बनती थी या फिर मुंबई जो हिंदी फिल्मों का गढ़ था। प्राण मुंबई पहुंचे ताज होटल में ₹55 हर दिन के किराया वाला स्वीट बुक किया। शुरू किया खोजना काम। लेकिन हर जगह नो नॉट फिट का जवाब मिलने लगा। उन दिनों बॉम्बे टॉकीज के लिए काम कर रहे थे शहादत हसन मंटू। वह भी कई जगह अपने साथ प्राण को लेकर गए लेकिन कहीं बात बनी नहीं। काम मिल नहीं रहा था।

धीरे-धीरे पैसा भी खत्म होने लगा। ताज होटल छोड़कर सस्ते होटल में रहने लगे। फिर सबसे सस्ते होटल तक शिफ्ट हुए। प्राण की बायोग्राफी एंड प्राण में पत्रकार और लेखक बनी रूबेन लिखते हैं, भारत की आजादी से एक दिन पहले भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अपने भाषण से नए देश को संबोधित किया। ट्रीस्ट विद डेस्टिनी। और जैसे भारत ने किस्मत से अपना वादा निभाया वैसे ही प्राण ने भी अपना वादा निभाया। लगभग 8 महीने तक लगातार संघर्ष करने के बाद किस्मत ने उन पर मेहरबानी की। मुंबई के मलाड स्थित बॉम्बे टॉकीज स्टूडियो से प्राण को एक टेलीफोन आया।

आवाज आई हमारे स्टूडियो में आओ। हमारे पास तुम्हारे लिए कुछ काम है। प्राण भागेदौड़े यह मन बनाकर स्टूडियो पहुंचे कि जो भी ऑफर होगा तुरंत हां कहेंगे। प्रोडक्शन मैनेजर सामने आए। प्राण से बोली कि एक रोल है तुम्हारे लिए लेकिन ₹500 ही मिलेंगे। उससे ज्यादा ₹1 नहीं। प्राण ने तुरंत हां कह दिया लेकिन एक शर्त के साथ बोले मुझे ₹100 एडवांस चाहिए। ₹100 मिल गए। इस एडवांस के साथ प्राण ने मुंबई में अपनी पहली फिल्म साइन की। फिल्म का नाम जिद्दी। फिल्म साइन करके प्राण घर गए। परिवार के साथ एक रेस्टोरेंट गए। पत्नी को खाना खिलाया, खुद शराब पी। पूरे ₹100 उसी वक्त उड़ा दिए।

मौज मस्ती करके होटल लौटे तो गार्ड ने बताया कि साहब आपसे मिलने एक आदमी आया था। बोल कर गया है कि उसका नाम नवलकर है। कल वह सुबह 10:00 बजे फिराने के लिए कह गया है। प्राण को कतई अंदाजा नहीं था कि यह नवलकर साहब हैं कौन। आए तो पता चला कि नवलकर प्रभात स्टूडियो में बतौर कैमरामैन काम करते थे। नवलकर अगले दिन आए और प्राण को अपने साथ ले गए प्रोड्यूसर बाबूराव पाई के दफ्तर फेमस स्टूडियोज। उनकी मुलाकात एक और डायरेक्टर प्रोड्यूसर फतेह लाल से करवाई गई। जिन्हें प्यार से लोग साहिब मामा कहा करते थे। ऑफिस में प्राण को बैठाकर कुछ देर साहिब मामा और नवलकर ने आपस में बातें की। फिर प्राण के सामने एक ऑफर रखा गया। एक फिल्म का ऑफर। पूछा गया कि एक फिल्म करने के लिए कितने पैसे लोगे?

प्राण ने पलट कर पूछ लिया आप देंगे कितना? सामने से जवाब आया ₹500। प्राण अभी-अभी ₹500 में एक पिक्चर साइन करके आए थे। तो उन्होंने अगली पिक्चर के लिए फीस बढ़ाने की सोची। साफ कहा कि 500 में नहीं हो पाएगा। पैसे बढ़ाइए। जवाब मिला कि हम अपने हीरो को भी ₹500 महीने ही दे रहे हैं। लेकिन प्राण नहीं मांगे। साहिब मामा को प्राण की आंखें इतनी प्रभावित कर चुकी थी कि वह किसी भी हाल में इस एक्टर को विलेन रोल देना चाहते थे। उन्होंने ही कहा कि ठीक है तुम्हें ₹600 देंगे। लेकिन एक शर्त है कि किसी को भी और खासकर हीरो को पता नहीं चलना चाहिए कि तुम्हें हम ₹600 फीस दे रहे हैं। प्राण मान गए और इस तरह उन्होंने मुंबई में अपनी दूसरी फिल्म अपराधी साइन की। दो फिल्में साइन कर लेने के बाद प्राण के जीवन में फिर वही आदमी लौटा जो उन्हें इस दुनिया में खींच लाया था। वली मोहम्मद वली जो कि उन दिनों पुतली नाम की फिल्म बना रहे थे।

वली ने प्राण को फिल्म में विलेन किरदार निभाने के लिए कहा। ऑफर दिया ₹1000 हर महीने फीस। कुछ ही दिनों पहले जो एक्टर मुंबई की सड़कों पर धूल फांक रहा था। अब उसके पास तीन फिल्में आ चुकी थी। और एक के बाद एक उसकी फिल्मों की फीस बढ़े जा रही थी। वह अपनी फिल्म के हीरो की फीस को भी लांघ चुका था। धार फूटते ही प्राण के हिस्से वो फिल्म आई जिसने उन्हें फिल्म इंडस्ट्री में स्थापित कर दिया। उस फिल्म के बाद फिल्मफेयर मैगजीन ने लिखा कि प्राण बॉलीवुड के नंबर वन बैड बॉय हैं। इसी फिल्म में एक खास कलाकारी प्राण ने की जो उनकी स्टाइल ही बन गई। फिल्म का नाम बड़ी बहन। दुल्हन एक रात की और माया बनाने वाले डीडी कश्यप ने बड़ी बहन बनाई थी। प्राण ने अजीत नाम का विलेन प्ले किया था। इसी फिल्म में प्राण ने सिगरेट पीकर धुएं का छल्ला बनाया जो बाद के दिनों में उनकी पहचान सी बन गई। स्क्रीन पर लोग सिगरेट के धुएं का छल्ला देखते ही समझ जाते थे कि अगले ही पल एक आदमी स्क्रीन पर आने वाला है जो हीरो की जिंदगी तहस-नहस करने पर उतारू हो जाएगा। राज कपूर एक फिल्म बना रहे थे। फिल्म का नाम जिस देश में गंगा बहती है।

फिल्म में एक डकैत होता है जिसका नाम है राका। राज कपूर ने यह रोल ऑफर किया प्राण को। प्राण ने फिल्म की कहानी सुनी। कैरेक्टर दिलचस्प लगा तो हां कह दिया। लेकिन राज कपूर ने चुनौती बढ़ा दी। बोले कि प्राण तुम्हें लोग पसंद करते हैं क्योंकि तुम एक तरह की अपनी मैनरिज्म के साथ एक्टिंग करते हो। तो मेरी फिल्म के लिए भी कोई मैनर डेवलप करो जो राका की पहचान बन जाए। उसे और खतरनाक बना दे। राका कैसा दिखेगा से लेकर? क्या हरकतें करेगा तक? यह सब प्राण सोचने लगे। लेकिन समझ नहीं पा रहे थे कि क्या ड्रेसअप दिया जाए, क्या मैनर पकड़ा जाए। फिर दो घटनाएं घटी। एक दिन एक अंग्रेजी अखबार में डाकुओं के एक गैंग के पकड़े जाने की खबर थी। गैंग लीडर पुलिस की से मारा गया था। उसे 21 लगी थी। प्राण ने उसकी तस्वीर देखी। अखबार की कटिंग ली और राज कपूर को दिखाया। राज कपूर को आईडिया पसंद आया। तय हो गया कि राका ऐसा ही दिखेगा। कपड़े से लेकर बाल और मूछ की स्टाइल तक उसी डकैत जैसी रख ली गई। अब मैनर पकड़ना था तो एक रात नींद में सोते हुए प्राण ने कुछ ऐसा सपना देख लिया कि नींद खुल गई। बेड पर बैठ गए और दोनों हाथों से अपनी गर्दन सहलाने लगे। मानो गला चोक हो रहा हो और उसी वक्त प्राण को ख्याल आया कि यही राका का स्टाइल होगा। इसमें एक साइकी भी थी कि डकैतों को हमेशा पुलिस का डर होता था। तो डर से पैदा होने वाली घुटन को दिखाने के लिए यह मैनर जम रहा था। राज कपूर को यह आईडिया भी जम गया और इसी तरह से पूरी फिल्म शूट हुई। राका प्राण के करियर के सबसे यादगार किरदारों में से एक है। गुंडई की इंतहा दिखाने वाला रोल। लेकिन प्राण खुद कहते थे राका ने गांवों में आग लगाई और लोगों को गोली मारी। लेकिन आखिर में उसने उस लड़की के लिए अपने हथियार डाल दिए जिससे वह प्यार करता था और जिसे उसने खो दिया। मैं उसे दुनिया के सबसे यादगार प्रेमियों में से एक कहूंगा। विलेन नहीं पर्दे पर गुंडई करने में प्राण पीएचडी कर चुके थे। डायरेक्टर प्रोड्यूसर की पहली पसंद बन चुके थे। जिस देश में गंगा बहती है रिलीज होने के बाद यह रोला और बढ़ा ही। लेकिन पेशेवर जिंदगी का चांद प्राण की पर्सनल जिंदगी पर बुरा असर डालने लगी थी। बनी रुबेन को दिए इंटरव्यू में प्राण ने कहा था कि मुझे याद है कि जब भी मैं पब्लिक में या सड़कों पर दिखता था तो लोग मुझे अरे बदमाश अरे लफंगा कहने लगते थे। लेकिन मैं इन तानों को बिना किसी परवाह के नजरअंदाज कर देता था। मेरी पत्नी शुक्ला भी इनसे परेशान नहीं होती थी क्योंकि उन्हें हमेशा पता होता था कि मैं सिर्फ एक काम कर रहा हूं और उसे अच्छे से कर रहा हूं। लेकिन प्राण के बच्चों से इस समझ की उम्मीद कैसे ही की जा सकती थी। उनके जीवन में एक बेटी भी आ चुकी थी जिसका नाम रखा गया था पिंकी।

पिंकी के स्कूल में उसकी सहेलियां यही फपियां कसा करती थी। उनके पिता के रोल को लेकर चिढ़ाया करती थी। इस माहौल के बीच प्राण ने की उपकार नाम की पिक्चर। मनोज कुमार ने फिल्म डायरेक्ट की थी। इस फिल्म का ख्याल कैसे आया? इसकी कहानी सुनिए। मनोज कुमार की 1965 में एक फिल्म आई थी शहीद। भगत सिंह की कहानी दिखाई गई थी। मनोज कुमार भगत सिंह बने थे। प्राण भी इस पिक्चर में थे। डाकू कहर सिंह का रोल था उनका। शहीद बनकर तैयार हुई। फिल्म की स्क्रीनिंग रखी गई। मनोज कुमार ने तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को आमंत्रित किया। शास्त्री फिल्म देखने आए। फिल्म खत्म हुई तो मनोज कुमार से शास्त्री ने पूछा कि क्या एक फिल्म नहीं बन सकती जिसमें हम जय जवान जय किसान की बात कर रहे हो? हमने जीके का सवाल रटा हुआ है कि जय जवान जय किसान का नारा किसने दिया था? लाल बहादुर शास्त्री ने। ग्रीन रिवोल्यूशन और जवानों को समर्पित था यह नारा। अपने नारे को फिल्म में ढालना चाहते थे लाल बहादुर शास्त्री।

मनोज कुमार ने प्रधानमंत्री की बात सुनी। तय किया कि इस थीम पर एक फिल्म बनाएंगे और इसी थीम पर पिक्चर लिखी गई उपकार। मनोज कुमार ने फिल्म में भारत का रोल किया। प्राण इस फिल्म में मलंग चाचा बने थे। एक और एक्टर इस पिक्चर में थे जो आगे चलकर प्राण के ही लीक के विलेन बने। प्रेम चोपड़ा। उनके किरदार का नाम था पून कुमार। मदर इंडिया वाले कन्हैया लाल उपकार में लाला धनीराम बने थे। इसी फिल्म के बाद मनोज कुमार भारत कुमार के नाम से फेमस हो गए थे। प्राण ने 1967 में रिलीज हुई उपकार के जरिए उस फरमे को तोड़ा जिसमें से हर डायरेक्टर प्रोड्यूसर उन्हें गुंडा बनाकर निकाल रहा था। इसी उपकार की वजह से प्राण को पहली बार बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर के लिए फिल्मफेयर अवार्ड भी मिला।

रूबेन अपनी किताब में लिखते हैं, 1960 के दशक के आखिर तक प्राण एक स्टार बन गए थे। प्रोड्यूसर और पब्लिक दोनों के मन में प्राण बैड की पहचान बन गए थे। जब प्रोड्यूसर अपने आने वाले प्रोजेक्ट्स के बारे में अपने रेगुलर डिस्ट्रीब्यूटर फाइनेंसर से बात करते थे तो हमेशा यही डिमांड होती थी कि अगर आपकी फिल्म में विलेन का रोल दमदार है तो प्राण को लो। ऐसा इसलिए था क्योंकि डिस्ट्रीब्यूटर जिनकी उंगलियां लगातार बॉक्स ऑफिस की नब्ज़ पर रहती थी। जानते थे कि ऑडियंस प्राण के अगले खास और रंगीन किरदार को देखने आएगी। आदर्शवाद के शीश महल पर बेरोजगारी और महंगाई के पत्थर चलने लगे। तंत्र जिस लोक के लिए स्थापित किया गया था, उसी लोक के खिलाफ हो चला था। सिल्वर स्क्रीन पर इन सब से मुक्ति दिलाने उतरा एक नया हीरो। गुस्से से भरा और विद्रोह के सुर साधता हीरो। लेकिन हीरो की हीरोबाजी गुंडे की गुंडई से तय होती है। गुंडे की मंशा से तय होता है कि हीरो कितना हीरोबाज होगा। यानी चुनौती हीरो बनने वाले एक्टर्स के लिए भी थी और विलेन बनने वालों के लिए भी। प्राण दूसरे ब्रैकेट में थे। सबसे मजबूत और स्थापित दो दशक से ज्यादा पुराने खिलाड़ी। राइटर्स की एक जोड़ी ने कहानी गढ़ी नए ढंग का विलेन पैदा किया और उससे लड़ने आया नया हीरो। एंग्री यंग मैन यानी अमिताभ बच्चन। साल 1973 में जंजीर रिलीज़ हुई। इसमें दो विलिअन थे। एक अजीत जिन्होंने तेजा का किरदार निभाया। तेजा सूट बूट पहनता था, सिगार पीता था, स्विमिंग पूल में तैरते हुए विस्की पीता था। लेकिन एक विलेन और था शेर खान। डायलॉग याद कीजिए। इस शहर में नए आए हो साहब। वरना शेर खान को यहां कौन नहीं जानता। जंजीर बनाई थी डायरेक्टर प्रकाश मेहरा ने जो मानते थे कि अगर प्राण ने यह फिल्म करने से मना कर दिया होता तो यह फिल्म बनती ही नहीं। प्राण ने शेर खान बनने के लिए जो तैयारियां की उस पर आएंगे। लेकिन पहले इस फिल्म की तैयारी की कहानी सुनते चलिए। सलीम खान और जावेद अख्तर ने कहानी लिखी। प्रकाश मेहरा को सुनाई। मेहरा ने कहानी सुनते ही तय कर लिया कि शेर खान का रोल प्राण करेंगे। चलिए यह बात तय हो गई। तय करना था कि हीरो कौन होगा? विजय का रोल कौन करेगा। प्राण ने प्रकाश मेहरा को सुझाव दिया कि देव आनंद से मिलिए। मुलाकात हुई। देव आनंद ठहरे देवा आनंद। बोले कि इस फिल्म में दो-तीन गाने डालो फिर बनाओ। मेहरा ने साफ मना कर दिया कि नहीं विजय का कैरेक्टर गाना नहीं गाएगा। यह उस टाइप की पिक्चर नहीं है। तो देववानंद ने कहा कि ऐसा करो यह कहानी मुझे दे दो। मैं बनाता हूं।

मेहरा ने यह ऑफर भी ठुकरा दिया और देव आनंद से किनारा कर लिया। फिर एंट्री हुई धर्मेंद्र की। धर्मेंद्र ने यह कहानी खरीद ली थी। प्रकाश मेहरा ने धर्मेंद्र से एक वादा भी किया था साथ में पिक्चर करने के लिए। दोनों बातें सिर टिका कर बैठ गई। लेकिन धर्मेंद्र व्यस्त चल रहे थे तो उन्होंने भी कहानी छोड़ दी। प्रकाश मेहरा से कह दिया कि आपको जो उचित लगे उसके साथ फिल्म बना लीजिए। तब जंजीर की कहानी सुनाई गई राजकुमार को। कहानी सुनकर राजकुमार बोले जानी यह मेरे टाइप का सब्जेक्ट है। मैं एक बार महीम में इंस्पेक्टर बन चुका हूं। तुम इस फिल्म की शूटिंग मद्रास में करो। मद्रास को अब चेन्नई कहते हैं। मेहरा को यह ख्याल जमा नहीं क्योंकि कहानी की सेटिंग मुंबई में थी तो लोकेशन की वजह से राजकुमार ने भी ना कह दिया। ऐसा लगने लगा था कि ना कोई हीरो मिलेगा और ना ही जंजीर बनेगी। प्राण ने यही बात अपने छोटे बेटे सुनील को बताई जो चेन्नई में एक दोस्त के साथ रहकर काम करते थे। दोस्त का नाम अमिताभ। अमिताभ के भाई अमिताभ बच्चन। दो-ती साल पहले ही फिल्म इंडस्ट्री में पधारे थे तो सुनील ने अपने पिता प्राण से कहा कि पापा मेरे दोस्त का भाई भी हीरो है। नया है लेकिन काम बहुत बढ़िया है उसका। आप एक बार उसको आजमाइए।

प्राण ने यही मैसेज प्रकाश मेहरा को दे दिया। उसी वक्त एक फिल्म रिलीज हुई थी बॉम्बे टू गोवा जिसमें अमिताभ और शत्रुघ्न सिन्हा थे। तो जावेद अख्तर और प्रकाश मेहरा गए सिनेमा हॉल में बॉम्बे टू गोवा देखने। फिल्म में एक फाइट सीक्वेंस था। जब वो सीक्वेंस शुरू हुआ तभी प्रकाश मेहरा चिल्ला पड़े। मिल गया। लोग देखने लगे कि यह कौन आदमी है जो चीख रहा है। उन्हें क्या मालूम था कि प्रकाश मेहरा को अपनी पिक्चर का हीरो मिल गया था। फिल्म की शूटिंग शुरू हुई। प्राण शेर खान थे जो कि पठान था। प्राण ने इस कैरेक्टर को पठान जैसा लुक देने के लिए लाल रंग का विग और दाढ़ी लगाई। गेटअप तो खुद बनाया ही अपनी आवाज भी बदल डाली। एक अलग भारीपन और गूंज वाली आवाज के साथ पूरी फिल्म में डायलॉग बोले ताकि लगे कि हां वो पठान हैं। आवाज बदलना इतना मुश्किल था कि एक-एक वर्ड सही बोलने के लिए कई बार 18 से 20 रिटेक करने पड़ते थे। जो भी करना पड़ा हो फिल्म बनकर जब रिलीज हुई तो एक नया फिनोमिना हमारे सामने आया। अमिताभ और प्राण की जोड़ी ऐसी चमकी कि एक के बाद एक कई फिल्में दोनों ने साथ में की। मसलन कसौटी, मजबूर, अमर अकबर, एंथनी, डॉन और गंगा की सौगंध कालिया में भी दोनों साथ दिखे थे। प्राण ने वो लकीर खींची जिसके सहारे कई एक्टर्स आगे बढ़े और उन्हीं की श्रेणी के विलिलेन बने। या कहें कि उतनी ही शोहरत कमाई।

मसलन अमरीश पुरी जो कहा करते थे कि प्राण साहब का स्क्रीन पर आना बहुत बड़ी मुसीबत बन जाता था। क्योंकि वह डर पैदा करती थी। जब मैंने 1940 के दशक में फिल्में देखना शुरू किया तो मुझे वे बहुत हैंडसम लगती थी। लेकिन उनकी आंखें बहुत साफ थी। उनका जो स्टाइल था वह था एक के बाद एक बहुत छोटे वाक्य बोलने का। वो चबा चबा के बोलते थे तो स्टाइल ऑडियंस को अच्छा लगता था क्योंकि वे सुनाई देते थे और समझ में आते थे। और जैसे-जैसे 1950 के दशक में वे बड़े हुए, सुरैया के साथ बड़ी बहन में सिगरेट के धुएं के छल्ले छोड़ने का उनका स्टाइल बहुत पॉपुलर हो गया। इसी तरह उनकी आंखों का खास लुक भी ऑडियंस को यह इशारा देता था कि वे कुछ करने वाले हैं। उनसे इतनी नफरत की जाती थी कि कोई भी नए जन्मे बच्चे का नाम प्राण नहीं रखता था। प्राण के प्राण होने का अंदाजा इस बात से भी लगा सकते हैं कि वह एक साथ 10-15 फिल्मों की शूटिंग करने लगे थे। हर फिल्म में बोलने का टोन अलग होता था। फिर भी कभी किसी सेट पर वह भूलते नहीं थे कि कहां किस टोन में डायलॉग बोलना है। प्राण की कारीगरी या कहें कि शगल यह था कि जो रोल उन्हें मिले उसे खास लुक दिया जाए और कोई भी लुक रिपीट ना हो। जंजीर में जब वह पठान शेर खान बने उसी वक्त प्राण के बहुत अच्छे दोस्त मनोज कुमार ने उन्हें एक फिल्म शोर ऑफर की जिसमें प्राण का रोल एक पठान का ही था। यह जानते हुए कि मनोज कुमार की ही उपकार ने उन्हें बतौर स्टार एक नया आयाम दिया है। प्राण ने शोर में काम करने से मना कर दिया क्योंकि उन्हें लगा कि जंजीर में पठान बन रहा हूं तो शोर में भी पठान नहीं बनूंगा। दुनिया भर के मशहूर और कुख्यात लोग प्राण को बहुत पसंद आते थे। इसकी छाप भी उनके काम पर दिखती है। 1965 में रिलीज खानदान में उन्होंने अपना पूरा मेकअप और गेटअप, जर्मनी के तानाशाह हिटलर जैसा रखा। हेयर स्टाइल और मूछें भी हिटलर जैसी। अमर अकबर एंथनी में उन्होंने अमेरिका के राष्ट्रपति रहे अब्राहम लिंकन जैसी वेशभूषा और मेकअप धारण कर लिया। जुग्नू फिल्म में एक प्रोफेसर का रोल कर रहे थे तो बांग्लादेश के संस्थापक राष्ट्रपति मुजीब उर रहमान की तरह कुर्ता, विग, चश्मा और मूछे लगा ली। निगाहें पिक्चर बन रही थी। उसमें बिल्कुल वैसी ही दाढ़ी रखी जैसी राजीव गांधी के करीबी और कांग्रेस नेता सैम पितोदा रखते हैं। जोशीला पिक्चर में तो वह शशि कपूर के ससुर जेफरी कैंडल की दाढ़ी ही कॉपी कर गए। लगभग छ दशक का करियर और करीब 200 से ज्यादा फिल्में प्राण के हिस्से आई।

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