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सतलूज के गुल्लुधरा की वो कहानी जिसे सुनकर रोना आ जाएगा!

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लाहौर शहर में एक हुकुम जारी हुआ कि गुड़ को गुड़ मत कहो। पंजाब का हर आदमी हर बच्चा सदियों से जिस चीज को गुड़ कहता आया था अब उसे रूढ़ी कहना [संगीत] था। वजह क्या है? गुड शब्द का उच्चारण गुरु से मिलता-जुलता था और लाहौर के हाकिम को गुरु शब्द से नफरत थी। हुक्म था कि जो आदमी अपनी जबान पर ये लफ्ज़ लाएगा, उसका सिर धड़ से अलग कर दिया जाएगा। यह अकेला फरमान नहीं था। उसी दौर में एक और नियम चल रहा था कि जिस-जिस सर पर लंबे बाल और पगड़ी हो वो सिर काटकर लाहौर के हाकिम के सामने पेश करो और इनाम पाओ। जिन सिरों की कीमत लगाई जा रही थी वो जंगलों में छिपे हुए थे। खाने को सिर्फ भुने हुए चने मिलते तो वह चों को बादाम कहते। [संगीत] एक आंख वाले साथी को वह मजाक में लखन नेत्रा सिंह कहते यानी लाख आंखों वाला। और मौत मौत को वो सिर्फ कूच का हुक्म कहते। जैसे किसी फौज को आगे बढ़ने का आदेश मिला हो। जानेमाने लेखक और इतिहासकार खुशवंत सिंह अपनी किताब अ हिस्ट्री ऑफ द सीक्स में लिखते हैं कि मिटा दिए जाने के खौफ के बीच भी यह लोग हंसीज़ाक किया करते थे। मिटा दिया जाना। पूरी कौम को साफ कर देना। इसके लिए आज जो शब्द इस्तेमाल होता है वो है एथेनिक [संगीत] कंजिंग। यहूदियों के नरसंहार को एक अलग नाम मिला होलोकस्ट।

इसी तरह सिख कौम को मिटा दिए जाने की कोशिश को भी एक नाम मिला कलुहारा। पंजाबी का यह शब्द आज फिर से चर्चा में है। दिलजीत दोसांज की जिस फिल्म सतलज का नाम पहले पंजाब 95 था उससे भी पहले इसका नाम होना था क्या था कल्लूहारा? सिख इतिहास की किन दो घटनाओं को छोटा कल्लूहारा और बड़ा कल्लूहारा कहते हैं क्यों नरसंहार हुए थे ये? और सिख कौम ने फिर इसका क्या जवाब दिया? जानेंगे कहानी आज के एपिसोड में। नमस्ते। मैं हूं निखिल और आप देख रहे हैं अलिफ लैला। [संगीत] [संगीत] [संगीत] सिख धर्म की शुरुआत 15वीं सदी में गुरु नानक ने की थी। उनके बाद एक के बाद एक 10 गुरु होते हैं। 10वें और आखिरी गुरु थे गुरु गोविंद सिंह। 1699 में उन्होंने खालसा की नीव रखी। यानी एक ऐसा समुदाय जिससे लोग दीक्षा लेकर बाल और दाढ़ी बिना कटवाए हथियार उठाकर जुल्म के खिलाफ खड़े होंगे। पहचान बिल्कुल क्लियर थी। लंबे बाल होंगे, पगड़ी होगी और कमर में तलवार होगी। खालसा पंथ की ये नींव सिखों और मुगलों की अदावत के चलते ही पड़ी थी। पांचवें गुरु गुरु अर्जुन देव को 1606 में मुगल बादशाह जहांगीर के हुक्म पर गिरफ्तार किया गया था। बाद में उन्हें मार डाला गया। नौवें गुरु गुरु तेग बहादुर को मुगल बादशाह औरंगजेब के हुकुम पर दिल्ली में सर कलम किया गया। शीशगंज गुरुद्वारा है। गुरु तेग बहादुर के बेटे थे गुरु गोविंद सिंह। उनके भी दो सबसे छोटे बेटे जिनकी उम्र 9 और 6 साल थी। 1705 में सरहंद में मुगल सूबेदार वजीर खान के हुकुम पर मार डाले गए। गुरु गोविंद सिंह के बाद बंदा सिंह बहादुर ने सिखों की अपनी पहली हुकूमत खड़ी की। लेकिन 1716 में मुगल बादशाह फर्रुख सीियर ने उन्हें और उनके सैकड़ों साथियों को दिल्ली में मरवा डाला।

इसी फर्रुख सीियर ने एक फरमान भी जारी किया जिसमें हुकुम था कि जो भी सिख मिले उसे मार डाला जाए जब तक वह इस्लाम कबूल ना कर ले। इसी फरमान को लाहौर के सूबेदार अब्दुल समद खान और बाद में उनके बेटे जकरिया खान ने बकायदा निजाम में बदला। किसी सिख की खबर देने पर, पकड़वाने पर और उसका सिर कलम करके लाने पर अलग-अलग इनाम तय थे। जिस जगह इन सिखों को कत्ल किया जाता था नखास यानी घोड़ों का जो बाज़ार था उसी का नाम आगे चलकर फिर शहीदगंज पड़ा लाहौर में। ये सब 1746 से करीब 20 साल पहले की बात है। तो ये साफ है कि सिखों पर मौत का फरमान कोई नई बात नहीं थी। जहांगीर से लेकर फ़र्रुख सियर तक ये मुगल सल्तनत की अपनी नीति रही थी। लेकिन घारा की जो घटना है वो मुगल सल्तनत के हुकुम से नहीं शुरू हुई थी। वह हुआ उस दिन के बाद जब यह सल्तनत खुद टूट चुकी थी। 1739 में ईरान के बादशाह नादिर शाह ने दिल्ली को लूट कर तबाह किया। जब दिल्ली की पकड़ पूरे देश पर ढीली होने लगी तो पंजाब के जो सूबेदार थे यानी मुगलों के जो गवर्नर थे आपस में लड़ने लगे और इसी बीच सिख जो अब तक छोटी-छोटी टोलियों में बटे थे वो संगठित होने लगे। उन्होंने अपनी फौजी टुकड़ियां बना ली और अपने सरदार भी चुने और इनमें से एक नाम था जस्सा सिंह अहलवालिया का। इस नाम को आप याद रखिए। यह आगे बार-बार आएगा। मुगल हुकूमत के लिए यह सिख एक सिरदर थे। एक मार्शल रेस थी। लड़ने को तैयार रहते थे। लगान देने से इंकार करते थे। गांव के किसानों को भड़काते थे और मौका मिलते ही सरकारी खजाना लूट लेते थे। यह हम मुगल पर्सपेक्टिव बता रहे हैं आपको। लाहौर के गवर्नर उन्हें बागी मानते थे और उन्हें खत्म कर देना चाहते उनको नोसेंस लगती थी कि हटाओ। अब यहीं इस कहानी में वो कैरेक्टर आता है जिसे कल्लूगारा का गुनहगार माना जाता है। खुशवंत सिंह अपनी किताब में लिखते हैं कि लखपत एक हिंदू खत्री था। कलनौर का रहने वाला था और लाहौर के हुकूमत में दीवान था। दीवान को आप ट्रेचर भी समझ सकते हैं। मिनिस्टर फॉर फाइनेंस भी समझ सकते हैं। उसके पास पूरा हिसाब किताब रहता है लगान का। है [नाक से की जाने वाली आवाज़] ना? वित्त मंत्री समझ लीजिए आप। उस वक्त लाहौर का गवर्नर था याहिया खान और लखपत राय उसका सबसे ताकतवर अफसर था। इस लखपत राय का एक भाई था जसपत राय जो कि ऐनाबाद नाम की जगह पर फौजदार था। वहां का फौजी कमांडर ऐमीनाबाद लाहौर से कुछ 55 कि.मी. नॉर्थ में उस जमाने में होता था। कनिंग हम अपनी किताब में इसी इलाके की फिर एक घटना का जिक्र करते हैं। उनके मुताबिक सिखों की एक टोली एमीनाबाद के आसपास वसूली कर रही थी। मुगल [नाक से की जाने वाली आवाज़] पर्सपेक्टिव से देखेंगे यह एक्सटॉशन है। सीख पर्सपेक्टिव से देखेंगे यह टैक्सेशन है। है ना? तो शब्द आप लोग अपने चुन लीजिए। [नाक से की जाने वाली आवाज़] वसूली तो कर रहे थे पैसे की। इन पर हुकूमत की एक टुकड़ी ने फिर हमला किया लेकिन वो टुकड़ी हार गई और उसका सरदार मारा गया और सरदार था जसपत राय। लखपत राय का भाई दीवान का भाई मारा गया। इतिहासकार सरप्रीत सिंह अपनी किताब कॉल्डन स्वॉर्डन विक्ट्री में इस घटना का एक दूसरा ब्यौरा देते हैं। वह लिखते हैं कि सिखों की जो टोली पैसा वसूल कर रही थी कई दिनों से घोड़ों पर थी। थकी और भूखी थी। तो ऐनाबाद के पास एक जंगल में रुकी हुई थी। शाम का खाना बना रही थी। तभी जसपत राय का संदेश आया कि मेरे इलाके से निकल जाओ। सिखों ने कहलवाया कि तीन दिन से सफर में है। थोड़ा सुस्ता लेंगे, खाना खाएंगे और उसके बाद जाएंगे यहां से। आपसे लड़ने का हमारा कोई इरादा नहीं। लेकिन जसपत राय ने माना नहीं। उसने धमकी दी कि अगर नहीं जाते हो तो सबके सिर बुणवा दूंगा। और जैसे ही सिख खाना खाने बैठे हमला हो गया। लड़ाई हुई और इस लड़ाई में जसपत राय मारा गया। यहां से बदले की वो कहानी शुरू होती है जो आगे चलकर हजारों जाने लगी। अपने भाई की मौत की खबर सुनकर लखपत राय का गुस्सा सारी हदें पार कर गया। 19वीं सदी के सिख इतिहासकार रतन सिंह भंगु की किताब प्राचीन पंथ प्रकाश के मुताबिक लखपत राय गवर्नर याहिया खान के दरबार में पहुंचा। अपनी पगड़ी उतार कर उसने जमीन पर फेंक दी और कसम खाई। कहा कि मैं खत्री हूं लेकिन जब तक मैं इन सिखों का नाम इस दुनिया के पन्नों से मिटाता नहीं तब तक ना मैं पगड़ी पहनूंगा ना खुद को खत्री कहूंगा। लखपत राय ने गवर्नर से इजाजत ली और अपनी पूरी ताकत झोंक दी। सबसे पहले निशाना बने लाहौर शहर में रहने वाले सिख घर-घर से पकड़ा गया और शहर के बाहर जो घोड़ों का बाजार था वहां उन्हें कत्ल किया गया। फिर बारी आई उनके आस्था प्रतीकों की। खुशवंत सिंह के मुताबिक सिखों की पवित्र किताब गुरु ग्रंथ साहिब की जितनी प्रतियां उनको मिली सब जला दी गई। अमृतसर में सिखों का सबसे पवित्र स्थान हरमंदिर साहब जो गोल्डन टेंपल आज आप जहां कहते हैं चारों तरफ से पवित्र सरोवर है उसमें उसे रेत से पाट दिया गया। और फिर वह हुकुम आया जिससे हमने इस कहानी की शुरुआत की थी। हुकुम आया कि गुरुणी यानी सिखों के धार्मिक शब्दों को पढ़ना बोलना ग्रंथ साहब का उच्चारण करना यह बंद होगा। यहां तक कि गुरु शब्द बोलने पर भी मौत की सजा लाई गई और चकि गुड़ का उच्चारण गुरु से मिलता था। गुरु तो हुकुम हुआ कि अब गुड़ को गुड़ नहीं रूढ़ी कहा जाएगा। यह तमाम हुकुम जैसे पहले बताया लाहौर से जारी होते थे। पंजाब की जो कैपिटल थी। लेकिन असल में सिखों की बड़ी तादाद लाहौर में नहीं थी। वह अमृतसर और आसपास के इलाकों में रहती थी। तो जब यह कत्लेआम शुरू हुआ तो सिख नेताओं ने अपने लोगों को एक जगह इकट्ठा होने का आदेश दिया और यह जगह थी कानवान। गुरदासपुर से यह कोई 15 कि.मी. साउथ में पड़ता है। ब्यास नदी के आसपास जो एक मार्च था दलदली जंगल कह लीजिए आप। घने पेड़ भी हैं, दलदल भी हैं, छिपने की बहुत सारी जगह। यहां पे हजारों सिख अपने परिवारों को लेकर के आ गए जान बचाने के लिए। अब इनकी तादाद का अंदाजा 15,000 से लेकर उससे ज्यादा भी लगाया जाता है। खुशवंत सिंह लिखते हैं कि लखपत राय को इसकी खबर लगी कि सिख इकट्ठा हो रहे हैं ब्यास के किनारे। तो वह अपनी फौज लेकर कानून के उस जंगल की तरफ बढ़ा और पूरे जंगल को चारों तरफ से उसने घेर लिया। एक शीश डाल दी। है ना? घेरा डाला। अंदर फंसे सिखों के पास खाना खत्म होने लगा। तो एक तरफ आग और दूसरी तरफ घेरा डाले फौज। आखिरकार इन्होंने घेरा तोड़ा और रावी नदी की तरफ यह लोग भागे। ऊपर पहाड़ी इलाके यानी आज जो जम्मू कश्मीर है वहां के राजाओं से मदद मांगी। लेकिन सिखों की मदद अगर आप कर रहे हैं तो लाहौर के गवर्नर से पंगा ले रहे हैं। तो पहाड़ी राजाओं ने मदद करने से इंकार किया कि पंजाब एक ताकतवर सूबा है। उसकी फौज से हम पंगा नहीं लेना चाहते। इसी तरह भागते-भागते बचते-बचाते लोगों का यह गुट भागा। बीच में कई बार कत्लेआम हुआ। बचे कुचे सिख जो थे किसी तरह रावी ब्यास और फिर सतलज को पार करते हैं भटिंडा आते हैं। खुशवंत सिंह लिखते हैं कि लखपत राय का जो कैंपेन था उसमें करीब 7000 सिख मारे गए थे फॉर ह पीरियड बहुत बड़ा नंबर है। 3000 को जिंदा भी पकड़ा गया। इतिहासकार हरिराम गुप्ता अपनी किताब हिस्ट्री ऑफ़ द सी्स में लिखते हैं कि इन 3000 कैदियों को जंजीरों में बांधकर लाहौर लाया गया। बाजार में इनकी परेड हुई और फिर उसी शहीदगंज में ले जाकर एक-एक कर सबके सिर्फ कलम किए गए। यह 1746 की बात है। इतिहास में इस घटना को सिखों ने कल्लूहारा कहा। कल्लूहारा मतलब नरसंहार। लगभग 10,000 लोगों को मारा गया। और जैसा हमने पहले कहा फॉर इट्स पीरियड इट्स अ ह्यूज ह्यूज नंबर। लेकिन अगर आप सिखों की आबादी में से 10,000 निकालेंगे उस पीरियड में तो यह नुकसान और ज्यादा बड़ा था। कुछ अनुमानों के मुताबिक सिखों की कुल आबादी का 1/4 से 1/3 हिस्सा इस मुहिम में खत्म हो गया। मतलब हर तीसरा सिख मारा गया। अब आप सोच सकते हैं कि जिस तबाही में किसी कौम की एक तिहाई आबादी मारी गई हो इतिहास उसे छोटा कलारा क्यों कहता है? इसका जवाब उस दूसरी घटना में छिपा है जो इसके 16 साल बाद हुई। अहमद शाह अब्दाली अफगानिस्तान के दुरानी साम्राज्य का बादशाह कभी ईरान के नादिर शाह का एक सिपा सलार हुआ करता था। 1747 में जब नादिर शाह का कत्ल हो गया तो अब्दाली ने कंधार में अपनी हुकूमत खड़ी कर ली और खुद को बादशाह घोषित किया। इसके बाद उसने अगले 22 सालों में हिंदुस्तान पर एक के बाद एक नौ हमले किए और यह ज्यादातर रेड्स थी। रेड का मतलब फौज आएगी, सामने वाले को हराएगी। उसके बाद जितने गांव या शहर मिलेंगे उनको लूट लिया जाएगा। पैसा वापस ले जाएंगे। इसीलिए ये मिलिट्री कैंपेन नहीं थे। ये रेड्स थी। कनिंघम अपनी किताब में अब्दाली का जो खाका खींचते हैं वो पढ़ने लायक है। उनके मुताबिक अब्दाली अफगान मिजाज का बड़ा सटीक नमूना था। सकम था। हिम्मती था। लेकिन राज चलाना उसको आता नहीं था।

वो सुबह जीतता था। फिर खो देता था। फिर जीतता था। फिर खोता था। जैसे उसका वजूद ही सिर्फ इस काम के लिए हो। अब्दाली और सिखों का आमनासामना जब हुआ तब क्या हुआ? उससे पहले लखपत राय की कहानी का लास्ट चैप्टर आपको बता देते हैं। कल उघारा को अंजाम देने वाले लखपत राय की किस्मत जल्द ही दगा दे गई। जुलाई 1745 में लाहौर के गवर्नर जकरिया खान की मौत हुई। उसके बाद जो दो बेटे थे उनके बीच लाहौर की गद्दी का बंटवारा हुआ। या खान को लाहौर मिल गया और शाहनवाज खान को मुल्तान मिला जो दूसरा बड़ा शहर लखपत राय या खान का दीवान बना रहा। वही या जिसने उसे 1746 का कत्लेआम करने की इजाजत दी थी। लेकिन दोनों भाइयों में बहुत जल्द अपने बाप की जायदाद को लेकर झगड़ा हो गया। शाहनवाज खान ने अपने भाई आया को हरा दिया और उसे जेल में डाल दिया और लखपत राय भी उसी जेल में गया। कुछ महीनों बाद अहमद शाह अब्दाली का पहला हमला होता है। जनवरी 1748 में उसने लाहौर पर कब्जा किया और जेल में बंद कैदियों को रिहा किया तो लखपत राय भी रिहा हुआ और अब्दाली ने उसे फिर से दीवान बनाया। लेकिन यह मौका भी ज्यादा दिन टिका नहीं। उसी साल मार्च में मुगल फौज ने मानूपुर की लड़ाई में अब्दाली को हराया और लाहौर पर मुगल गवर्नर मीर मन्नू को बैठाया। मीर मन्नू ने लखपत राय को फिर से जेल में डाला और उससे ₹ लाख का हर्जाना मांगा जो वो कभी चुका पाया नहीं। अब यहां वक्त की करवट देखिए। कौरामल नाम का एक हिंदू अफसर था जिसने 1746 में लखपत राय को कत्लेआम रोकने की गुजारिश की थी। लेकिन उसकी बात मानी नहीं गई। उसी कौरामल ने अब मीर मन्नू से कहा कि बाकी हरर्जाना मैं देता हूं। बस लखपत राय को आप मुझे दे दीजिए। मीर मन्नू मान गया। उसको पैसा मिला और कौरामल ने लखपत राय को किसी और को नहीं दल खालसा को सौंपा। यानी खुद सिखों को जिस आदमी ने कसम खाई थी कि सिखों का नाम दुनिया से मिटा देगा। वो अब उन्हीं सिखों के हवाले था। उसे एक कैदखाने में डाला गया और 6 महीने बाद 1748 में उसकी मौत हुई। अब्दाली के अटैक्स पर वापस लौटते हैं। अब्दाली वर्सेस सीख में क्या हुआ? यह हमने आपको बताया। अब्दाली वर्सेस मुग़ल जो लड़ाई थी, उसमें क्या हुआ? क्योंकि इसमें लखपत राय का चैप्टर यहीं आता है। अब हम वापस अब्दाली की रेट्स पर आते हैं कि अब्दाली जब सिखों से आमनासामना करता है तब क्या होता है? उसी में आपको जवाब मिलेगा कि 1746 के नरसंहार को जिसमें तिहाई आबादी खत्म हो गई सिखों की, उसे छोटा कल्लूहारा क्यों कहा गया? यह 1757 की बात है। उस साल अब्दाली अपने चौथे हमले के बाद लूट का माल लेकर लौट रहा था। अब जो रास्ता था पंजाब से जाता था तो सिखों ने उस पर धावा बोला, बहुत सा माल छीन लिया और कई कैदियों को भी छुड़ाया। इसका बदला अब्दाली ने सिखों के सबसे पवित्र स्थान पर निकाला। लौटते वक्त उसने पंजाब की कमान अपने बेटे तैमूर शाह और अपने सिप सालार जहान खान के हाथ में सौंपी। यही दोनों 1757 में अमृतसर पहुंचे। हरमंदिर साहब को नुकसान पहुंचाया और उसके पवित्र सरोवर को एक बार फिर गंदगी और जानवरों के शवों से पाट दिया। इस घटना का बदला जिस शख्स ने लिया उनका नाम था बाबा दीप सिंह। मंदिर के अपमान की खबर सुनकर उन्होंने कसम खाई कि या तो वह हरमंदिर साहब को आजाद करा लेंगे या वहीं अपनी जान दे देंगे। अमृतसर के पास गोहलगढ़ गांव में जहान खान की फौज से उनका आमनासामना हुआ। 11 नवंबर 1757 के बाद से लड़ाई भयंकर थी और इसी लड़ाई में बाबा दीप सिंह की जान गई। कैसे जान गई? उसे सिख परंपरा एक खास तरीके से याद करती है। कहा जाता है मान्यता है सिखों की कि जब बाबा दीप सिंह की गर्दन पर वार लगा तब किसी साथी ने याद दिलाई कि आपने कसम खाई थी कि हरमंदिर साहब तक पहुंचेंगे। बाबा दीप सिंह ने इसके बाद अपना सिर एक हाथ में और खंडा दूसरे हाथ में लेकर लड़ाई की और जब तक हरमंदिर साहब की परिक्रमा तक वह नहीं पहुंचे उन्होंने आखिरी सांस नहीं ली वहां जाकर प्राण दिए। यह सिखों और दुर्रानी फौज के बीच लड़ाई का पहला मेजर इंसिडेंट है। इसके बाद 1761 की शुरुआत में पानीपत के मैदान में अब्दाली और मराठों की लड़ाई होती है। जिसमें मराठे अंततः हारते हैं। लेकिन इस लड़ाई के बाद जब अब्दाली लूट कमाल वापस अफगानिस्तान ले जाने की कोशिश करता है। तो सतलज पार करते ही सिख फिर से पीछा करना शुरू करते हैं। खुशवंत सिंह लिखते हैं कि 20-30 घोड़सवारों की छोटे-छोटे टोलियां अचानक रेड करती अब्दाली के काफिले पर और फिर गायब हो जाती लूट के साथ। अब्दाली के लिए यह एक नूसेंस था लेकिन एक बहुत बड़ी लड़ाई से लूटते हुए जिसमें बहुत माल उसने इकट्ठा किया था। रुकने का जोखिम वो नहीं लेना चाहता था। इसलिए अब्दाली रुका नहीं सिखों से लड़ने के लिए अफगानिस्तान लौट गया। अब्दाली के लौटते ही 1761 की दिवाली पर अमृतसर में सिखों की फिर एक बड़ी सभा हुई जिसे सरबत खालसा कहा गया। यहां दो फैसले होते हैं। पहला लाहौर पर कब्जा पंजाब की कैपिटल पर और दूसरा अब्दाली के मुखबिरों को और साथियों को जो कोलैबोरेटर्स थे उनकी नजर में उनको सजा देना। सिखों ने लाहौर पर हमला किया। वहां का गवर्नर उबैद खान किले में जाकर छिप गया और बाकी शहर पर सिखों का कब्जा हो गया। जस्सा सिंह अहलवालिया को सुल्तान उल कौम घोषित किया गया। जिनके बारे में हमने आपको कहा था। अब यहां थोड़ा हम विषयांतर करेंगे। एक दिलचस्प ट्रिविया कमल जी बता रहे हैं। अब्दाली से सिखों के इस टक्कर की एक निशानी आज भी मौजूद है। एक तोप है। अब्दाली ने लाहौर में एक विशाल तोप बनवाई थी जिसका नाम था जमजमा। इसे बनाने का तरीका भी अपने आप में कहानी। लाहौर के गैर मुसलमान परिवारों पर जजिया लगता था। अब जो नकद टैक्स नहीं दे सकता उसके तांबे पीतल के बर्तन लिए जाते थे। इन्हीं बर्तनों को पिघलाकर फिर यह तोप ढाली गई जिसका वजन था 4 1/2 टन और लंबाई 14 फुट से ज्यादा। कहा जाता है कि इसी तोप ने पानीपत की लड़ाई में अब्दाली को बढ़त दिलाई थी। अब्दाली तो पानीपत की लड़ाई के बाद इसे काबुल ले जाना चाहता था। लेकिन इतनी भारी तोप इतने बड़े डिस्टेंस पर ढोना जहां आपको पाससेस भी पार करने आसान नहीं था। तो उसने इस तोप को लाहौर के गवर्नर के पास छोड़ दिया। 1762 में जब मिसल के सरदार हर सिंह ने लाहौर के पास एक आमरी को लूटा तो यह तोप भी सिखों के हाथ में पड़ी और इससे एक नया नाम मिला भंगिया वाली तोप। आगे चलकर यह तोप महाराजा रणजीत सिंह तक पहुंची और आज लाहौर के म्यूजियम में यह आपको मिल जाएगी। उसके सामने इसको रखा गया है। मुख्य घटना पर आते हैं।

सिखों ने जब लाहौर पर कब्जा किया तो यह बात अब्दाली के लिए बेइज्जती की तरह हो गई। सोचिए जो आदमी अपने समय की सबसे बड़ी शक्ति मराठों को हराकर लौट रहा हो वो एक छोटी सी सिख फौज से हार नहीं बर्दाश्त करेगा। लिहाजा अब्दाली ने एक और हमला किया सिक्स्थ अटैक। और ये जो सिक्स्थ अटैक था ये सिर्फ और सिर्फ सिखों को कुचलने के लिए था। वंस एंड फॉर ऑल। अब्दाली को लगता था कि ये पावर आगे जाकर के उसके लिए खतरा बनेगी। सिखों को खबर मिली कि अब वहां से दुरानी आ रहे हैं। अब सिखों के सामने एक बड़ा मुश्किल हिसाब था। लाहौर का किला अभी भी अफगान फौज के पास था और अगर वह लाहौर को होल्ड करने की कोशिश करते, तो एक बड़ी फौज और एक किले के बीच वो फंस जाते। जसा सिंह अहलवालिया इसके बाद फैसला करते हैं कि किले पर से घेरा उठाएंगे, लाहौर को खाली करेंगे और सबसे पहले जो परिवार हैं उनको सुरक्षित जगह पर पहुंचाएंगे क्योंकि गल्लू घारे की मेमोरी है कि ये फैमिलीज़ को भी टारगेट करते हैं। तो सिखों की जो पूरी आबादी थी यानी पूरे परिवार इसमें बूढ़े हैं, औरतें हैं, बच्चे हैं, प्रेग्नेंट लेडीज़ हैं सब एक साथ सतलज पार करते हैं और मालवा की तरफ जाते हैं। जिस इलाके में जो सदर्न पंजाब जहां सिख मिस्ले ज्यादा ताकतवर थी। मकसद था कि परिवार किसी महफूज़ जगह पर रह और उसके बाद डिसाइड करेंगे कि क्या करना है। तो यह जो चलता फिरता हुजूम बना एक बड़ा सा कारवा इसे पंजाबी में वहीर कहा गया। अब्दाली को जैसे यह खबर मिली कि एक बहुत बड़ा कारवा चला है तो वह लाहौर से निकला। खुशवंत सिंह के मुताबिक अब्दाली ने अपनी फौज के साथ सिर्फ 2 दिन में करीब 250 कि.मी. का फासला तय किया। कनिंगम भी यही लिखते हैं कि लाहौर से लुधियाना के रास्ते दो लंबी और तेज चढ़ाइयों में बादशाह ऐन उस वक्त सिखों पर आ धमका जब वो उसके एक अफसर से भिड़ने वाले थे। 5 फरवरी 1762 की सुबह जगह थी कुप जिसे कुप रहीरा भी कहते हैं। मलेर कोटला से 12 कि.मी. नॉर्थ में। मंदिर देखिए। एक तरफ अब्दाली की भारी भरकम हथियार बंद फ़ौज है। जिनको आदत है रेड्स की। दूसरी तरफ 30,000 सिख थे जिनमें ज्यादातर नॉन कंबैटेंस थे। सैनिक ये नहीं थे। खालसा पंथ के जो आपने बड़े सोल्जर्स वो देखे वैसे ये लोग नहीं थे। ज्यादातर बूढ़े थे औरतें बच्चे थे। भागने का रास्ता भी नहीं था। अब यहां पे गोरिल्ला अटैक्स जिसकी आदत सिखों को थी वो नहीं कर सकते थे क्योंकि उनके पीछे वो तो भागते अटैक करने के बाद लेकिन फिर फैमिलीज़ कहां जाती? तो सिख लड़ाकों ने फिर एक मुश्किल फैसला किया। जितने वहां पे उस कारवा में सिख लड़ाके थे उन्होंने। उन्होंने बूढ़ों, औरतों और बच्चों को बीच में किया और उनके चारों तरफ खड़े होकर के एक ह्यूमन चैन बनाई। एक इंसानी दीवार और फिर इस घेरे में लड़ते हुए वो आगे बढ़ने लगे। सिख इसी हाल में लड़ते हुए किसी तरह कुप से बरनाला की तरफ जाना चाहते थे। इस उम्मीद में कि पटियाला के जो आला सिंह है उनकी मदद के लिए आएंगे। वहां के वो चीफ थे। लेकिन आला सिंह नहीं आए। और इस बीच अफगान फौज ने कारवा को पूरी तरह से घेर लिया। कत्लेआम हुआ। पूरी तरह से घिरने के बाद सिख सैनिक बहुत देर टिक नहीं पाए और एक बार वह खत्म हुए तो आम लोग निशाने पर आए और ऐसा कत्लेआम शुरू हुआ कि सुबह से शुरू होकर शाम तक चला। खुशवंत सिंह लिखते हैं कि अब्दाली की फौज ने शाम को भी हाथ तब रोका जब मारते-मारते थक गए वो। जो सिख उस दिन बच निकले।

उनकी मुसीबत भी खत्म नहीं हुई। रास्ते में जो स्थानीय कबीले थे उन्होंने उन पर हमला किया। रतन सिंह भंगू अपनी किताब प्राचीन पंत प्रकाश में इस दिन को एक वाक्य में समेटते हैं। एक भी सिख ऐसा नहीं था जिसके बदन पर घाव ना हो। आला सिंह अब मदद के लिए क्यों नहीं आए? इसे लेकर बाद में सिख परंपरा के भीतर बहुत चर्चा हुई। इसके कई कारण हो सकते हैं। पहली बात तो यह है कि आला सिंह के पास कोई बहुत बड़ी स्टैंडिंग आर्मी थी भी नहीं जो यलगार होते ही कूच करती। अब्दाली की कैबिलरी एक दिन में सवा5 कि.मी. का मार्च कर रही थी। इफ यू बिलीव खुशवंत सिंह तो अपने पीरियड के हिसाब से रफ्तार ब्लिथ क्रीक से भी ज्यादा है। इतना अचानक सब कुछ हो रहा था कि संभलने का मौका किसी को नहीं मिला। आला सिंह ने अपने सैनिकों को कोई आदेश नहीं दिया। यह बात भी रखी जाती है कि आला सिंह के पास मदद के लिए कोई औपचारिक फरियाद भी नहीं पहुंची थी। लेकिन सिख परंपरा में जिस कौम के प्रति वफादारी को बार-बार अंडरलाइन किया जाता है उसके चलते बाद के सालों में आला सिंह की जो ये सपोजिट न्यूट्रलिटी थी उसको प्रॉब्लमैटिक कहा गया खूब आलोचना हुई खासकर इस बात के आलोक में आलोचना हुई कि उन्होंने दुरानियों से राजा का खिताब लिया था यानी डिप्लोमेटिक टाई स्थापित किए थे एक तरह से सरपरस्ती स्वीकार कर ली थी खैर हम 5 फरवरी के कत्लेआम की शाम पर थे दिन भर में कितने सिख मारे गए इसको लेकर के अलग-अलग आंकड़े कनिंघम लिखते हैं कि सिखों ने 12,000 से 25,000 तक आदमी खोए होंगे। दूसरे कई इतिहासकार ये संख्या 25 से 3000 भी बताते हैं। कुछ अनुमान इससे कम भी हैं। लेकिन एक बात पर सब सहमत हैं कि मरने वालों में ज्यादातर नॉन कॉम्बैटेंस थे। बूढ़े थे, औरतें और बच्चे थे। 5 फरवरी 1762 का यह दिन सिख इतिहास में वड्डा गल्लूगारा कहलाया। यानी बड़ा नरसंहार। अब्दाली का गुस्सा यहीं शांत नहीं हुआ। कनिंघम और खुशवंत सिंह दोनों मानते हैं कि वह लाहौर लौटा तो अपने साथ 50 गाड़ियां भरकर कटे हुए सिर ले गया था और साथ में सैकड़ों सिख भी जो जंजीरों में जकड़े गए थे। लाहौर ले जाकर यह जो कटे हुए सिर थे इनकी मीनारें बनवाई

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