1970 का दशक मुंबई की एक रात एक ते रफ्तार कार में दो पक्के दोस्त सवार थे महेश भट्ट और उनके प्रोड्यूसर जॉनी पक्ी। जॉनी वही शख्स थे जिन्होंने भट्ट के बुरे वक्त में उनकी पहली फिल्म मंजिलें और भी हैं पर पैसा लगाया था। लेकिन उस रात कार के अंदर फिल्मों की नहीं बल्कि ओशो और सत्य की बातें हो रही थी। भट्ट ओशो के प्रभाव में आकर अपनी बातों में इतने कड़वे और बेबाक हो गए कि बहस हाथापाई तक पहुंच गई। भट्ट ने अपने उसी दोस्त पर हाथ उठा दिया जिसने उन्हें करियर दिया था और जॉनी बखशी बीच सड़क पर कार रोक कर फूट-फूट कर रोने लगे। ठीक इसी दौर की एक और बात है, एक और घटना होती है। अमेरिका के न्यूयॉर्क स्थित जॉन एफ केनेडी इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर एक रोज एक बॉलीवुड एक्ट्रेस हंगामा करती है। यह परवीन बॉबी थी जो मानसिक परेशानी से तब जूझ रही थी। एयरपोर्ट पर सिक्योरिटी चेक के दौरान उन्हें रोका गया तो उन्हें लगा कि यह उनके खिलाफ किसी इंटरनेशनल साजिश का हिस्सा है। परवीन बॉबी इतनी नाराज हुई कि उन्होंने चिल्लाकर कहा कि अगर तुमने मुझे हाथ भी लगाया तो मैं यहीं सबके सामने अपने कपड़े उतार दूंगी। एक तीसरी घटना और है। फिल्म अभिनेता कबीर बेदी और परवीन बॉबी लिव इन में रहते थे। एक रोज महेश भट्ट उनके घर पहुंचे और आध्यात्म को लेकर कुछ बात करने लगे। यह बातें सुनकर प्रवीण बॉबी इतनी घबरा गई कि डर के मारे कबीर बेदी से लिपट गई और कबीर ने महेश भट्ट को वहां से चले जाने को कह दिया। यह तीन अलग-अलग वाक्य यूं तो अलग-अलग लगते हैं लेकिन करिश्मा उपाध्याय की किताब परवीन भाभी अ लाइफ के मुताबिक यह सब उस बेचैनी का नतीजा था जिसमें 70 के दशक का जोहू गैंग फंसा हुआ था। महेश भट्ट, विनोद खन्ना और प्रवीण बॉबी यह सब एक ऐसी तलाश में निकले थे जहां सुकून का वादा किया गया था। लेकिन बदले में उन्हें मिली कड़वाहट, शक और धमकियां। नमस्ते, मैं निखिल हूं और अलीिफाला के आज के एपिसोड में हम बॉलीवुड और ओशो के उस रिश्ते की कहानी जानेंगे जो मोक्ष के वादे से शुरू हुआ। लेकिन कड़वाहट और गुमनाम मौत पर जाकर खत्म हुआ। 21 मई 1978 की तारीख थी। ओशो अपने पुणे वाले आश्रम में अपने अनुयायियों से बात कर रहे थे। अचानक उनकी बातों का सिलसिला आध्यात्म से हटा और व्यक्तिगत हो गया। एक फॉलोअर जो उस वक्त का मशहूर बॉलीवुड एक्टर था। ओशो ने उनकी ओर देखकर महेश भट्ट के बारे में पूछा। क्या पूछा इससे ज्यादा जरूरी है कि क्यों पूछा? दरअसल ओशो को पता चला था कि भट्ट ने उनकी दी हुई माला तोड़कर कमोड में फेंक दी। ओशो को इस बात से इतनी निराशा हुई थी कि उस दिन उन्होंने महेश और उनकी गर्लफ्रेंड के बारे में बहुत भला बुरा बोला। अब यह जो विवाद है, इसकी पृष्ठभूमि रची गई थी 1960 के दशक में जब बॉलीवुड आध्यात्मिक गुरुओं की तलाश में निकला हुआ था।
1960 का दशक हॉलीवुड में कुछ दोस्तों का एक गुट होता था जिसे रैट पैक कहा जाता था बड़ा मशहूर इसमें फ्रैंक सनात्रा थे डीन मार्टिन थे सैमी डेविस जूनियर थे पीटर लॉफोर्ड थे और जोई बिशप जैसे लोग करिश्मा उपाध्याय अपनी किताब परवीन बाबिया लाइफ में बताती हैं कि रैट पैक के मेंबर खूब शराब पीने वाले और ऐशो आराम में साथ एंजॉय करने वाले सेलिब्रिटीज थे। यह साथ में काम करते और खूब पार्टी भी करते। हॉलीवुड के अधिकतर ट्रेंड्स के साथ-साथ देर सवेेर यह सब लास वेगास से मुंबई पहुंच ही गया था। बंबई नाम था शहर का। उसी तरह 70 के दशक में रैट पैक का एक बॉलीवुड वर्जन तैयार हुआ जिसे नाम मिला जूहू गैंग। यह वो समय था जब बॉलीवुड की नाइट लाइफ साउथ बॉम्बे से जूहू की तरफ शिफ्ट हो रही थी। जूहू गैंग में दो गुट होते एक को लीड करते थे विनोद खन्ना और दूसरे को एक्टर इंद्रजीत सिंह जौहर के बेटे अनिल। बॉलीवुड में एंट्री करने वाले अधिकतर न्यू कमर्स इन्हीं में से किसी एक ग्रुप से होकर गुजरते थे। यह तबका चलन बन गया। इस समूह के कई लोग खूब मशहूर हुए। लेकिन आगे की कहानी के लिए अब हम कुछ नाम इसमें से छांट लेते हैं। महेश भट्ट, विनोद खन्ना और प्रवीण भाभी। कुछ साइड कैरेक्टर्स को अगर हम छोड़ दें जिनका जिक्र होता रहेगा तो यह तीन ही हमारी आज की कहानी के मुख्य पात्र हैं क्योंकि इनकी कहानी में एक कॉमन कड़ी है जो इन्हें कसकर बांधती है और वो है आध्यात्म का सफर जू गैंग तब कमजोर पड़ने लगा जब विनोद खन्ना की फिल्में हिट होने लगी लगातार वो अपने काम में व्यस्त रहने लगे बाकी लोग भी अपने-अपने करियर में मशगूल हुए कुछ ने सफलता देखी कुछ फ्लॉप हुए कुछ हिट होकर फिर से गिर गए और इसी उठापटक के बीच कुछ लोगों का मोह भंग भी हुआ और इसी तरह वह लाइफ का एक क्लियर विज़न पाने के लिए आध्यात्मिक गुरुओं की तलाश में निकल पड़े। महेश भट्ट ने विश्वासघात और मंजिलें और भी हैं जैसी फिल्में बनाई। दोनों नहीं चली। फ्लॉप रहीं और निराशा में वह भी आध्यात्मिकता की ओर निकले।
अभी जो बॉम्बे हाई सोसाइटी की आध्यात्म की तलाश है इस फील्ड में तब जिद्दू कृष्णमूर्ति मेहर बाबा रजनीश जिन्हें आप ओशो के नाम से जानते हैं और जॉर्ज गुरजेब जैसे नाम आगे चलते थे मशहूर लोग थे तब महेश भट्ट ने कई गुरुओं को आजमाया लेकिन उन्हें उस ज्ञान की प्राप्ति नहीं हुई जिसकी खोज में वह निकले थे। 21 जून 2009 के टेलीग्राफ के अंत में महेश भट्ट ने इस वक्त का खांका खींचते हुए कहा मैं आश्रमों में ऐसे जाता था जैसे लोग दिल बहलाने के लिए कोठे पर या बार में जाते थे और सुकून की तलाश करते थे। भट्ट का आध्यात्मिक सफर कुछ वक्त के लिए ओशो पर भी आकर टिका और मोक्ष की तलाश में वह उनके पुणे वाले आश्रम में भी गए। एक दफा आश्रम से लौटने के बाद भट्ट, कबीर बेदी और परवीन पाबी के घर पहुंचे। डेनी डनजोंपा और परवीन की डेटिंग लाइफ तब खत्म हो चुकी थी और अब वह कबीर के साथ थी। भट्ट उनसे अपनी मोक्ष की तलाश के बारे में बता रहे थे। लेकिन उन्होंने जो कहा या जिस हावभाव से कहा उससे परवीन घबरा गई। घर से निकलते हुए कबीर ने भट्ट को काउंटर किया और उन्होंने पूछा कि तुमने ऐसा क्यों किया? परवीन बाबी अ लाइफ किताब में भट्ट इस पर अपना पक्ष रखते हैं। वो कहते हैं कबीर ने इसे मेरी ओर से अनजाने में किया गया कोई इशारा समझ लिया था। हो सकता है मैं रजनीश के पास गया हूं और एलएसडी मैंने ली हो ड्रग लेकिन सच्चाई यह है कि कुछ उसूल तब भी मौजूद थे और उनमें से एक यह था कि आप अपने दोस्त की गर्लफ्रेंड पर नजर नहीं डालते। हालांकि बाद में जब कबीर और परवीन का रिश्ता खत्म हुआ तो परवीन की जिंदगी में महेश भट्ट की ही एंट्री हुई। इससे इतना तो स्पष्ट हो ही गया था कि भट्ट की स्पिरिचुअल जर्नी का असर उनके व्यक्तिगत रिश्तों पर भी पड़ रहा था और इसमें एक अहम किरदार थे विनोद खन्ना। स्पॉटबॉय ई के 2017 के एक इंटरव्यू में महेश भट्ट बताते हैं कि उन्होंने और विनोद खन्ना ने 1971 में साथ में काम किया। मेरा गांव मेरा देश फिल्म में खन्ना ने विलन का किरदार निभाया और भट्ट उस फिल्म के प्रोडक्शन मैनेजर थे। बाद में दोनों ने लहू के दो रंग में भी काम किया जिसमें महेश भट्ट ने डायरेक्शन का काम किया था। विनोद खन्ना ने महेश भट्ट को गेरवा रंग के कपड़ों में देखा था। वो दिन में 5-प घंटे ध्यान किया करते थे और यह सब देखकर खन्ना ने भी ओशो से जुड़ने की इच्छा जताई थी। तब विनोद खन्ना की पत्नी कविता खन्ना अपने YouTube चैनल पर बताती हैं कि उस वक्त परिवार में कई लोगों का देहांत हुआ था। जिसके कारण खन्ना के भीतर निराशा पनप रही थी। जब उनकी माता का भी निधन हो गया तो वह पूरी तरह टूट गए और ओशो के आश्रम में गए जहां उन्हें माली का काम मिला। बकल कविता विनोद को कुछ ऐसी एक्टिविटी में हिस्सा लेने की अनुमति थी जो सिर्फ विदेशियों के लिए होते थे। यह उस समय की बात थी जब वो पुणे जाने से पहले बॉम्बे में थे। बॉम्बे के चौपाटी बीच पर मेडिटेशन सेशंस होते थे। लोग एक गोल घेरा बनाकर बिना कपड़ों के ध्यान भी करते थे। लेकिन विनोद वहां शारीरिक व्यायाम की तलाश में नहीं गए थे। वह आध्यात्मिकता की खोज में थे। बॉलीवुड में तब अमिताभ बच्चन की एंग्री यंग मैन वाली छवि उभर रही थी और उसी साल दीवार भी आई थी। तब विनोद खन्ना ही एकमात्र ऐसे एक्टर थे जिन्हें बच्चन की टक्कर का माना जाता था। अमर अकबर, एंथनी, परबवरी, हेराफेरी और मुकद्दर का सिकंदर जैसे फिल्म्स में दोनों ने साथ में काम भी किया था। लेकिन पर्दे के बाहर अक्सर इस बात की चर्चा होती रहती थी कि दोनों एक दूसरे के प्रतिद्वंदी हैं।
1998 में अनुराधा प्रसाद को दिए एक इंटरव्यू में खन्ना ने बेबाकी के साथ दावा किया था कि बच्चन के एकमात्र प्रतिद्वंदी वो ही थे। उनके अलावा और कोई था ही नहीं। एक तरफ खन्ना भट्ट के रास्ते पर चलते हुए आध्यात्म की खोज में निकले। लेकिन दूसरी ओर किस्मत उनके लिए कोई और ही पटका था लिख रही थी। 1978 तक खन्ना के पास सब कुछ था। बॉक्स ऑफिस पर दबदबा आलोचकों और दर्शकों दोनों का अटेंशन स्टारdस मैगजीन ने तो यहां तक लिख दिया था कि विनोद खन्ना टर्न्स नंबर वन। यानी विनोद खन्ना बॉलीवुड में नंबर एक हो गए। लेकिन जैसे ही वह सफलता के चरम पर पहुंचे, उन्होंने सब त्याग दिया। फिल्म इंडस्ट्री छोड़कर वह ओशो के आश्रम में चले गए। सालों बाद उन्होंने इंडिया टुडे को बताया कि वह नंबर वन बनना ही नहीं चाहते थे। वो बस हर पल को जीना चाहते थे। इसी की झलक आज हम विनोद खन्ना के बेटे में भी देखते हैं अक्षय खन्ना के जीवन में। धुरंधर वाले अक्षय की बात कर रहे हैं। रहमान डकैत के किरदार के लिए मशहूर हुए। विनोद ने ओशो के लिए सिर्फ अपना करियर ही नहीं त्यागा था। वह अपने परिवार से भी अलग हुए थे। अक्षय छोटे थे तब और उनके लिए यह सब प्रोसेस करना ऑब्वियसली बहुत मुश्किल था। 2022 में मिड डे को दिए एक इंटरव्यू में अक्षय बताते हैं कि उन्हें बाद में जाकर समझ आया कि सन्यास का मतलब जीवन का पूरी तरह से त्याग करना होता है और परिवार छोड़ना उसका एक हिस्सा भर है। महेश भट्ट इस बारे में कहते हैं कि 2 साल से कुछ ज्यादा वक्त के बाद ओशो से उनका मोह भंग होने लगा था। लेकिन खन्ना उनके पीछे-पीछे अमेरिका तक गए। बाद में जब रजनीश का आश्रम ही बंद हुआ और उन्हें जेल में डाल दिया गया तब खन्ना वापस लौटे। अब अमेरिका में ऐसा क्या हुआ था? इसके अलावा एक और सवाल है कि आखिर भट्ट का ओशो से मोह भंग हुआ क्यों? और मोह भंग भी ऐसा कि उन्होंने ओशो की दी हुई माला को कमोड में फेंक दिया। 2024 में अरबाज़ खान के चैट शो द इनविंसिबल्स विथ अरबाज़ खान ने भट्ट ने कहा कि उन्होंने खुद को करिश्माई गुरु ओशो रजनीश के हवाले कर दिया था। वह ध्यान करते किताबें पढ़ते। लेकिन दूसरी तरफ उन्हें यह भी महसूस होता कि यह सब करने के बाद भी उनके भीतर ईर्ष्या और लालसा जैसी भावनाएं तो बनी हुई हैं। भट्ट को लगा कि वह पाखंडी हो गए हैं यानी बोलते कुछ हैं और करते कुछ हैं। उन्हें लगा कि वह पूरी दुनिया से तो झूठ बोल सकते हैं लेकिन अपने आप से नहीं। बकौल भट्ट उन्होंने ओशो की दी हुई माला तोड़कर कमोड में फेंक दी। फिर यह बात पुणे में रह रहे ओशो रजनीश के कानों तक भी पहुंच गई और जब उन्हें मालूम चला तब उनके आश्रम में विनोद खन्ना भी थे तो उन्होंने महेश के लिए एक धमकी भरा मैसेज भी भिजवाया महेश भट्ट के मुताबिक विनोद खन्ना ने उनसे कहा कि भगवान आपसे बहुत नाराज है भगवान ओशो को कहते थे आपने उनकी माला तोड़कर कमोड में फेंक दी इस पर भट्ट ने जवाब दिया हां बिल्कुल ऐसा किया था मैंने क्योंकि वह किसी काम की नहीं थी दिस इज अ डॉक कॉलर उन्होंने माला के लिए कहा इसके बाद खन्ना ने बताया कि वो शो चाहते हैं कि महेश पर्सनली जाकर उनकी माला उन्हें लौटा दें। बकल भट्ट खन्ना ने अपनी आवाज धीमी की और सहमते हुए कहा कि अगर भट्ट ने ऐसा नहीं किया तो ओशो ने कहा है कि वो उनको बर्बाद कर देंगे। ही सेड ही विल डिस्ट्रॉय यू। निशब्द है। भट्ट ने जवाब दिया कि एक तरफ ओशो अनकंडीशनल लव की बात करते हैं। कहते हैं कि अगर कोई आपकी गर्लफ्रेंड पर डोरे डाले तो उसे उस रिश्ते में जाने की आजादी देने में भी हर्ज नहीं है। लेकिन दूसरी तरफ जब उन्होंने ओशो को रिजेक्ट किया तो वह किसी गैंगस्टर की तरह उन्हें बर्बाद करने की धमकी भी दे रहे हैं। बात यहीं नहीं रुकी। ओशो और महेश भट्ट के रिश्ते में कड़वाहट बढ़ती ही गई। भट्ट बताते हैं कि एक बार ओशो ने विनोद खन्ना से कहा कि मैंने महेश पर इतनी मेहनत की लेकिन शायद उसमें वह बात नहीं जो तुम्हारे भीतर है। विनोद खन्ना को कह रहे हैं। तब भट्ट ने खन्ना से कहा कि ओशो रजनीश तुम्हें मेरे खिलाफ इस्तेमाल कर रहे हैं। वो तुमसे कह रहे हैं कि तुम में कुछ खास बात है और मुझ में नहीं है। महेश भट्ट यहां ओशो के एक ऐसे रूप की व्याख्या करते हैं जिस पर उनके फॉलोअर्स शायद भरोसा ना कर पाएं। उनका इशारा इस तरफ था कि ओशो उन्हें नीचा दिखाने की कोशिश कर रहे थे और खन्ना को उनसे बेहतर बताकर उन्हें अपने पास रोकने के प्रयास में थे। भट की बातों में कितनी सच्चाई है इसकी गवाह देने के लिए खन्ना अब इस दुनिया में नहीं है। 2017 में उनका निधन हो गया। लेकिन इस कहानी का एक दूसरा पक्ष भी है जो खुद ओशो के शब्दों में दर्ज है। उनकी अपनी किताब। एक तरफ भट्ट हैं जो दावा करते हैं कि आध्यात्मिकता का असल उद्देश्य ना मिल पाने के कारण उन्होंने ओशो से रिश्ता तोड़ा। तो वहीं दूसरी तरफ ओशो कहते हैं कि भट्ट ने एक लड़की के लिए अपना सन्यास दागा। कौन थी वो लड़की? ओशो अपने पुणे आश्रम के ऑडिटोरियम में प्रवचन दिया करते थे। 1978 के मई महीने में उन्होंने यहां जितने भी टॉक दिए उन सबको द 99 नेम्स ऑफ नथिंगनेस नाम की एक किताब में डॉक्यूमेंट किया गया है। इस किताब के अनुसार 21 मई 1978 को ओशो अपनी बातों के बीच में अपने एक सन्यासी की ओर देखते हैं। किताब में दर्ज है कि वह सन्यासी हिंदुस्तान का एक जाना माना फिल्म स्टार था। दरअसल अब यह बात नहीं छुपी हुई है कि विनोद खन्ना ही यह थे। ओशो ने उनसे महेश भट्ट के बारे में पूछा। कहा किताब के हिसाब से वो कैसा है? महेश भट्ट कैसा है? खन्ना ने जवाब दिया मुझे नहीं पता। इसके बाद ओशो ने कहा उससे बस एक बात कह देना अगर उसके अंदर सन्यास निभाने का साहस नहीं तो कम से कम इतना साहस दिखाए कि वो शिष्टाचार के साथ उसे वापस कर दे।
माला की बात हो रही है। ओशो को महेश के जाने से झटका तो लगा था। वह चाहते थे कि वह वापस आए। उन्हें उम्मीद थी कि एक दिन ऐसा होगा भी। ओशो की किताब के मुताबिक उन्होंने उस दिन कहा मुझे पता था कि ऐसा होने वाला है क्योंकि दो ही रास्ते थे। या तो उसकी महेश भट्ट की गर्लफ्रेंड भी सन्यासी नहीं बनती या वह सन्यास का त्याग करता। वो अपनी गर्लफ्रेंड से हार गया। एक दिन पछताएगा और जब उसे यह महसूस होगा तो वह वापस आएगा। लेकिन उसने विश्वासघात किया। उसने कुछ ऐसा तोड़ा है जो बहुत पवित्र था। एक दिन जब उसे पूरी घटना का एहसास होगा तो वह हैरान रह जाएगा। यह प्रेम संबंधों की बुनियादी त्रासदियों में से एक है। रजनीश अपनी बात को आगे बढ़ाते हैं। कहते हैं एक महिला किसी भी ऐसे पुरुष में दिलचस्पी लेने लगती है जिसके पास किसी प्रकार की मायावी शक्ति इलसिव पावर इस शब्द का इस्तेमाल हुआ है। होती है और वह शक्ति उसमें महेश में उदय हो रही थी। उसके भीतर वह शक्ति पहले से नहीं थी। वह जितना अधिक ध्यान कर रहा था उसमें उतनी ही अधिक ऊर्जा जागृत हो रही थी। कुछ सुंदर होने वाला था और मैं उस पर बहुत मेहनत कर रहा था। जितने का वह हकदार था उससे भी अधिक मेहनत। ओशो अपने पूरे टॉक में बिना नाम लिए एक औरत का जिक्र कर रहे थे जिसे शुरुआत में उन्होंने महेश की गर्लफ्रेंड कहा था। उनका कहना था कि एक ऐसी महिला ने महेश में दिलचस्पी ली थी जो खूबसूरत, समझदार और निडर थी, मॉडर्न थी और किसी महान रोमांच की तलाश में निकली थी। ओशो मानते थे कि उस महिला ने महेश भट्ट में दिलचस्पी नहीं दिखाई थी बल्कि वो उनके सन्यासी जीवन की ओर आकर्षित हुई थी। द 99 नेम्स ऑफ नथिंगनेस में ओशो आगे लिखते हैं एक महिला कभी भी किसी साधारण पुरुष में दिलचस्पी नहीं लेती। औरत की दिलचस्पी हमेशा किसी असाधारण चीज में, किसी राजसी चीज में, किसी ऐसी चीज में होती है जो उसकी पहुंच से परे हो और वो यानी कि महेश वहां था। उसके पास कुछ ऐसा था जो पहुंच से परे था। लेकिन एक बार जब कोई महिला उस पुरुष को पा लेती है जिसमें उसकी दिलचस्पी होती है तो वह उसी शक्ति को नष्ट करना शुरू कर देती है। क्योंकि तब वह डरने लगती है कि वह उस पर हावी हो जाएगा, डोमिनेट करेगा। और एक बार जब वो शक्ति नष्ट हो जाती है तो उसकी उस पुरुष में कोई दिलचस्पी रह नहीं जाती। यह ओशो के शब्द हैं। है ना? आगे और चकि वो उससे प्रेम करता है। पुरुष झुकता चला जाता है। यील्ड करता है। एक बार जब वो झुकना शुरू कर देता है तो शेर गायब हो जाता है और चूहे का जन्म होता है और किसी भी औरत की दिलचस्पी चूहे में नहीं होती। ओशो कहते हैं कि उन्होंने भट्ट से कई बार कहा था कि वह अपनी गर्लफ्रेंड को सन्यासी बनने दें। नहीं तो वह उनके सन्यास को ही नष्ट कर देगी। बकालोशो उस महिला को भट्ट के सन्यास से ईर्ष्या थी क्योंकि वो ऊर्जा उनके प्रेम प्रसंग से कहीं अधिक शक्तिशाली थी। अब यह बात किसी से छिपी नहीं रह गई कि ओशो यहां किस औरत की बात कर रहे थे। दरअसल महेश के जीवन में तब परवीन बाबी ही थी और उन्होंने अपने जीवन में ढेर सारे उतार-चढ़ाव देख भी लिए थे। नमक हलाल, जानी दुश्मन, दीवार, अमर अकबर, एंथनी और क्रांति जैसी हिट फिल्म्स देने वाली एक्ट्रेस उस वक्त गंभीर मानसिक अवसाद से गुजर रही थी। लिहाजा वह भी आध्यात्म के रास्ते पर थी। लेकिन उन्हें अपने सवालों के जवाब ओशो के पास मिले नहीं। ओशो ने उस रोज परवीन के बारे में कहा था कि महेश में उनकी दिलचस्पी कम हो रही है। उन्होंने दूसरे पुरुषों की ओर देखना शुरू कर दिया है और वह उस तरह की महिला नहीं है जो एक व्यक्ति के साथ टिकी रह सकें। बकॉल ओशो वो महेश के साथ रह सकती थी अगर वह अपने सन्यास पर टिकते और असल मर्द रियल मैन बने रहते। लेकिन अब वह किसी और की तलाश करेंगे। महेश पहले से ही एक स्पेयर पार्ट थे। अगेन हम बता दें आपको यह ओशो के शब्द हैं। रजनीश ने आगे कहा कि जब महेश उनकी माला वापस करेंगे तो वह उसे जला देंगे और उन पर किए पूरे काम को नष्ट कर देंगे और तभी उन्हें होश आएगा। इस टॉक के 3 साल बाद 1981 में ओशो यूएस में चले गए ओरेगॉन वहां उन्होंने अपने अनुयायियों के साथ मिलकर एक बहुत बड़ी बस्ती बनाई कम्यून कहा उसे है ना रजनीशपुरम लेकिन जल्द ये जगह कानूनी पछड़ों में फंसी इमीग्रेशन फ्रॉड और बायोटेर जैसे गंभीर इल्जाम लगे आश्रम चलाने वाले लोग भी आपसी विवाद में फंस गए विनोद खन्ना की पत्नी कविता अपने चैनल पर बताती हैं कि ओरेगॉन में ओशो पूरी तरह से मौन थे कम्यून के लोगों से ज्यादा बातचीत नहीं करते थे जैसे-जैसे वह खुद में सिमटते गए उनकी की सेक्रेटरी आनंद शीला ने पूरा कंट्रोल अपने हाथ में ले लिया।
उनके पास अपनी एक तरह की फौज थी। AK-47 जैसी मॉडर्न राइफल्स थी। बकल कविता कम्यून के पानी की सप्लाई में जहर मिलाए जाने की बात भी सामने आई थी। माहौल में बहुत डर था। विनोद के लिए एक बहुत ही गंभीर बात यह थी कि वह अपने बच्चों से नहीं मिल पाते थे। अक्सर रोते रहते थे और कहते थे कि वह भारत वापस नहीं आ सकते क्योंकि अगर वह लौटे तो फिर वापस जा पाना मुश्किल हो जाएगा। बाद में उनके कजिन ने उन्हें वहां से निकाला और ओरेगम से लौटने के बाद वह गहरे सदमे में रहे। सेट पर जाते, शानदार शॉट देते और फिर अपनी वैन में लौट कर फूट-फूट कर रोने लगते। 1985 में ओशो को उनकी टीम के कई लोगों के साथ अरेस्ट किया गया। बाद में उन्हें अमेरिका से डिपोर्ट भी किया गया और जब ओशो ओरेगॉन से लौटे तो दिल्ली आए। कविता बताती हैं कि विनोद उन्हें कार से मनाली ले गए और जब वह वापस लौटे तो ओशो ने विनोद से कहा कि अब मैं चाहता हूं कि तुम पुणे आश्रम की जिम्मेदारी संभालो। विनोद ने पहली और आखिरी बार अपने गुरु से ना कहा। बस वहीं पर सब खत्म हो गया और उसके बाद विनोद की ओशो से फिर कभी मुलाकात नहीं हुई। इस कहानी में ओशो का चैप्टर अब यहीं क्लोज होता है। लेकिन महेश और प्रवीण का क्या हुआ? ओशो से दूर होने के बाद उन्हें अपने सवालों के जवाब मिले भी या नहीं मिले? अब इस पर आते हैं। कभी बेदी अपनी किताब स्टोरीज आई मस्ट टेल द इमोशनल लाइफ ऑफ एन एक्टर में लिखते हैं कि परवीन गुजरात के एक छोटे से शहर से बॉलीवुड आई थी। सिर्फ एक घर और एक गाड़ी खरीदने के इरादे से उनका आना हुआ था। लेकिन इंडस्ट्री ने उन्हें सिर आंख पर बिठाया। करियर में उन्हें जितनी सफलता मिली दुर्भाग्य से उनके व्यक्तिगत रिश्ते उतने सुलझे हुए नहीं रह पाए। परवीन जब कबीर को डेट कर रही थी तब से उनके जीवन में उथल-पुथल मची हुई थी। कबीर अपने किताब में लिखते हैं कि उनकी पहली पत्नी प्रतिमा बेदी अपने बच्चों को मोहरा बनाकर परवीन को टारगेट कर रही थी। परवीन परेशान रहती थी। उन्हें लगता था कि प्रतिमा उनकी जासूसी कर रही हैं और जादू टोने के सहारे कबीर को उनसे छीनने की कोशिश कर रही हैं। बात तब और बिगड़ गई जब कबीर के करियर का ग्राफ ऊपर चढ़ता गया और परवीन को बड़े प्रोजेक्ट्स मिलने कम हो गए। आखिर में कबीर और परवीन का रिश्ता भी टूट गया। जब ब्रेकअप हुआ इनका तो वह इटली में थे और हिंदुस्तान लौटने के बाद प्रवीण और महेश भट्ट की फिर से मुलाकात हुई। बकौल महेश भट्ट ओशो के सानिध्य में रहते हुए भी उन्हें जिन सवालों के जवाब नहीं मिले थे उन्हें एड्रेस किया यूजी कृष्णमूर्ति ने। जिद्दू कृष्णमूर्ति की बात नहीं कर रहे हैं। यूजी कृष्णमूर्ति यूजी कृष्णमूर्ति उस जमाने में एंटी गुरु और नेलिस्ट फिलॉसफर कहलाते थे। सब जो कह रहे हैं मैं नहीं कह रहा। भट्ट जब अपनी आध्यात्मिक यात्रा के इस दौर से गुजर रहे थे तब परवीन की हालत और खराब हो रही थी। जुलाई 1979 में भट्ट ने परवीन का एक ऐसा रूप देखा कि वह घबरा गए। परवीन के हाथ में चाकू था और वह एक कोने में सिमटी हुई थी। उन्होंने भट्ट से कहा कि अमिताभ बच्चन उन्हें जान से मारना चाहते हैं। बकल भट्ट परवीन पैरानॉइड सिसोफ्रेनिया के शिकार हो गई थी जिसके कारण उन्हें भ्रम रहता था।
भट्ट को लगा कि शायद यूजी कृष्णमूर्ति परवीन की कुछ मदद कर पाए और इसी उम्मीद में वह परवीन को लेकर यूजी के पास गए। पहले बोर में और फिर बाद में स्विट्जरलैंड में उनके साथ रहे जहां यूजी ने उन्हें एक बहुत ही सख्त हिदायत दी। यूजी के मुताबिक महेश भट्ट और परवीन की जोड़ी एक डेडली कॉम्बिनेशन थी इन द लिटरल सेंस ऑफ द वर्ल्ड। इसलिए उन्होंने महेश से कहा कि अगर तुम परवीन से सच में प्यार करते हो तो उसे छोड़ दो। यूजी मानते थे कि भट्ट फिल्म इंडस्ट्री को रिप्रेजेंट करते थे और वही फिल्मी दुनिया परवीन की बीमारी का कारण भी थी। आखिरकार 1980 में महेश और परवीन की जोड़ी भी टूटी। परवीन बाबिया लाइफ किताब में करिश्मा उपाध्याय महेश भट्ट के हवाले से लिखती हैं कि ब्रेकअप के बाद महेश जब उनके अपार्टमेंट से बाहर निकले तो परवीन उनके पीछे-पीछे भागती हुई आई। वो भट्ट को आवाज लगा रही थी। लेकिन जैसे ही उन्हें आभास हुआ कि उनके शरीर पर पूरे कपड़े नहीं हैं। परवीन वहीं रुक गई। बाहर बारिश हो रही थी और महेश ने पलट कर उनकी ओर देखा तक नहीं और कहानी का यह चैप्टर भी यहीं खत्म हो गया। लेकिन जैसा यूजी ने कहा था क्या इसके बाद परवीन की सेहत ठीक हुई? जवाब है नहीं। अपने जीवन के आखिरी दिनों में उन्होंने खाना तक छोड़ दिया था। इसलिए नहीं कि पैसे नहीं थे बल्कि इसलिए कि उन्हें डर था, भ्रम था कि अमेरिका की खुफिया एजेंसी एफबीआईए, सीआईए उनके खाने में जहर मिलाने वाली हैं और उनकी नजर में एफबीआईए, सीआईए के ये एजेंट थे अमिताभ बच्चन। साल 2005 की 20 तारीख को जूहू के एक अपार्टमेंट से खूब बदबू आ रही थी। पड़ोसियों के लिए रहना मुश्किल हो गया। लोगों ने दरवाजा खटखटाया तो कोई जवाब नहीं मिला। अंत में बिल्डिंग के सेक्रेटरी ने दरवाजा तुड़वाया और अंदर परवीन भाभी का शव पड़ा था जो अब सड़ने लगा था। उनके बिस्तर के पास ही एक व्हीलचेयर थी। कपड़े, पेंटिंग, पुराने अखबार और दवाइयां सब कुछ