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क्या थी रफी साहब की आखरी इच्छा?इंतकाल के दिन हुई थी बड़ी अजीब घटना।

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चढ़ाए जाने से पहले कैदी ने अपनी अंतिम इच्छा के रूप में रफी साहब के कौन से गाने की फरमाइश की थी जिसे पूरा करने के लिए पूरा जेल अमले को मशक्कत करनी पड़ गई थी। इस में बताएंगे रफी साहब के जाने के बाद नौशाद साहब ने क्यों कहा कि खुदा सिर्फ एक घंटे के लिए रफी साहब को मेरे पास भेज देना।

रफी साहब का गाया हुआ कौन सा था वो गाना जिसे सुनते ही प्रधानमंत्री कार्यालय से उन्हें फोन आ गया। अमिताभ बच्चन के साथ का वो कौन सा किस्सा है जिसे रफी साहब जिंदगी भर हर किसी को सुनाया करते थे। उस गाने के पीछे की कौन सी कहानी थी जिसे तीनों महानतम गायक यानी रफी साहब, किशोर कुमार और मुकेश साहब ने एक साथ गाया था और फिर कभी साथ गा नहीं पाए। और कौन सा था वो गाना जिसके रियाज में रफी साहब की आवाज टूट गई और लोग कहने लग गए थे कि आवाज आना अब मुश्किल है।

और किस देश ने आजाद होते ही सबसे पहले रफी साहब को अपने देश में गाने के लिए बुलाया। उस दौरान इतनी भीड़ जमा हुई कि वर्ल्ड रिकॉर्ड बन गया था। क्या आप जानते हैं कि पहले राजेश खन्ना की सुपरहिट फिल्म आराधना के सारे गाने रफी साहब गाने वाले थे। तो फिर गाने की रिकॉर्डिंग से एक रात पहले क्या हुआ था? कि सब कुछ पलट गया। रफी साहब की कौन सी हॉलीवुड फिल्म उन्हें पसंद थी वो भी बताएंगे। तो चलिए शुरू करते हैं रफी साहब के अनसुने किस्से मेरे यानी आदेश सिंह राठौर के साथ। अपनी मीठी और दिल में उतर जाने वाली सुरीली आवाज में अनगिनत गीतों से रफी साहब भारत के जन मन के जगह वो पहुंचते गए।

24 दिसंबर 1924 को पंजाब के अमृतसर जिले के मजीठा गांव में कोटला सुल्तान में रफी साहब का जन्म हुआ। उनकी यादगार के नाम पर स्कूल का कमरा है जहां वो पढ़े थे और स्कूल में ही उनका बुत लगाया गया। रफी साहब को बचपन में फीकू नाम से बुलाया जाता था। साल 1947 में जब भारत का विभाजन हुआ तो रफी साहब ने भारत में ही रहने का फैसला किया।

रफी साहब को बंबई में सबसे पहले ब्रेक दिया था संगीतकार नौशाद साहब ने। 70 के दशक में नौशाद साहब ने एक रेडियो इंटरव्यू में कहा था कि मैंने बड़े से बड़े गायक को सुरों से हटते हुए देखा। एक तरह मोहम्मद रफी हैं जिनको कभी सुरों से हटते हुए नहीं देखा। इन दोनों ने कुल 41 फिल्मों में एक साथ काम किया। एक बार एक रेडियो इंटरव्यू में नौशाद साहब से पूछा गया कि अगर आपको अपनी जिंदगी की सबसे अच्छी संगीत रचना करनी हो तो आप क्या करेंगे? नौशाद साहब का जवाब था रफी साहब और मैं हमेशा एक हुआ करते थे।

उनके जाने के बाद मैं सिर्फ 50सदी बचा रह गया हूं। मैं अल्लाह से दुआ मांगूंगा कि वो रफी साहब को इस दुनिया में सिर्फ एक घंटे के लिए दोबारा भेज दे ताकि मैं अपनी बेहतरीन संगीत की रचना कर सकूं। जब भारत विभाजन के सदमे से उभर ही रहा था कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। उस मौके पर राजेंद्र कृष्ण के लिखे गीत सुनो सुनो ए दुनिया वालों बापू की ये अमर कहानी को हुस्न राम भगत राम ने संगीत में ढाला था और उसको स्वर दिया था मोहम्मद रफी साहब ने।

इस गीत को सुनने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने खासतौर से मोहम्मद रफी को दिल्ली में अपने निवास स्थान पर आमंत्रित किया था। गीत सुनकर नेहरू की आंखों में आंसू आ गए थे। भारत की आजादी की पहली वर्षगांठ पर नेहरू ने रफी साहब को चांदी का एक मेडल भेंट किया था। सिर्फ 24 साल के मोहम्मद रफी के लिए ये एक बहुत बड़ा सम्मान था। उस गीत को पूरे भारत में बहुत सराहा गया और मोहम्मद रफी साहब की जिंदगी पहले जैसी ना रही।

मोहम्मद रफी साहब को शहंशाह तरनन्नुम की उपाधि भी दी गई है। उन्होंने अपने करियर में हजारों गाने गाए हैं। इनमें आने से उसके आए बहार बहारों फूल बरसाओ। आज मौसम बड़ा बेईमान है। लिखे जो खत तुझे बागों में बहार है। तुमने पुकारा और हम चले आए। ये दिल तुम बिन कहीं लगता नहीं जैसे हजारों गाने एवरग्रीन है। जाने अदा हम क्या करें और हम चले आए लिखे जो खत तुझे वो तेरी याद में हजारों रंग के नजारे बन गए ऐसा माना जाता है कि रफी साहब अमिताभ बच्चन के बहुत बड़े प्रशंसक थे। उन्हें अमिताभ बच्चन के दीवार मूवी काफी पसंद आई थी। साल 1980 में नसीब फिल्म में अमिताभ के साथ युगल गीत गाया।

चल चल मेरे भाई उन्हें यह मौका मिला तो इस बात से रफी साहब बहुत खुश हुए थे। जब वो घर पहुंचे तो उन्होंने इसके बारे में पूरे परिवार को बताया। उन्हें अमिताभ और धर्मेंद्र की शोले फिल्म भी बहुत ज्यादा पसंद आई थी। सिल्वर स्क्रीन पर एक फिल्म में दो या उससे अधिक अभिनेताओं की मौजूदगी का चलन काफी पुराना रहा है। उदाहरण के तौर पर आप शांत त्रिदेव बख्त और त्रिशूल जैसी कई फिल्मों का नाम ले सकते हैं। इस ट्रेंड से सिंगिंग का फील्ड भी अछूता नहीं रहा था और एक साथ मिलकर कई दिग्गज गायकों ने सुरों से सुर मिलाए। इस कड़ी में लेजेंड्री सिंगर्स रहे मुकेश, मोहम्मद रफी साहब और किशोर कुमार साहब का नाम भी शामिल है।

जब गायकी की इस त्रिमूर्ति ने पहली बार और आखिरी बार किसी गीत को अपनी-अपनी मधुर आवाजें दी वो भी एक साथ। वो गाना कौन सा है वो जानते हैं। लंबे अरसे तक बतौर गायक मुकेश, मोहम्मद रफी साहब और किशोर कुमार साहब ने हिंदी सिनेमा पर अपनी छाप छोड़ी थी। बेशक ये तीनों अब इस दुनिया में हैं नहीं। लेकिन आज भी लोग शाम ढलते, कार ड्राइविंग करते और खाली समय में इनके सदाबहार गीत सुनना पसंद करते। एक गीत ऐसा भी रहा जिसमें इन तीनों ने एक साथ मिलकर सुर छेड़े थे। वो गाना था 47 साल पहले आई फिल्म अमर अकबर एंथोनी से।

जी हां फिल्म का हमको तुमसे हो गया है वो गीत रहा जिसको मुकेश साहब, रफी साहब और किशोर कुमार ने एक साथ मिलकर अपनी जादुई आवाज दी थी। निर्देशक मनमोहन देसाई की इस फिल्म की तरह ही यह गाना सुपरहिट रहा। अमिताभ बच्चन, विनोद खन्ना और ऋषि कपूर, नीतू सिंह, शबाना आजमी और प्रवीण बॉबी जैसे कलाकारों पर यह बेहतरीन गीत फिल्माया गया था। लेकिन रफी साहब, मुकेश साहब और किशोर कुमार की जुगलबंदी के तौर पर इसे याद किया जाता है। हिंदी सिनेमा के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था जब मोहम्मद रफी साहब, किशोर कुमार और मुकेश साहब ने एक संग कोई गीत गाया था।

लेकिन दुर्भाग्य की बात यह भी रही कि यह पहला और आखिरी मौका था। जब इन तीन दिग्गजों ने एक साथ अपने-अपने सुर मिलाए थे। हालांकि निजी तौर पर इन्होंने ढेर सारे गाने गाए जो आज भी फैंस की प्लेलिस्ट में मौजूद है। मांग भर जाओ मेरा महबूब आया है। खेडन दे दिन चार निए खेडन दे दिन चार मतलब खेलने के दिन चार ओ मां खेलने के दिन चार। ये वो गाना है जिसे कोटा सुल्तान सिंह में कोई फकीर गाता था और मोहम्मद रफी उसके पीछे खींचे चले जाते थे।

ये सार कई माध्यमों से कई बार प्रकट होता है कि जीवन चार दिन का है। मुहावरे को देखें तो मोहम्मद रफी पूरे चार दिन या चार सोपान नहीं जी सके। तीसरे सोपान के आरंभ में ही कह दिया था मुझको मेरे बाद जमाना ढूंढेगा। इस बात पर सब सहमत है कि अभिनेता के लिए आधा काम रफी साहब कर चुके होते थे। शम्मी कपूर के लिए अलग अंदाज जॉली वॉकर के लिए अलग ऋषि कपूर के लिए अलग और प्रदीप कुमार या जॉय मुखर्जी के लिए अलग पार्श्व गायन को नए सिरे से परिभाषित किया तो रफी साहब ने खुशी से लेकर गम तक हर आवाज के लिए हर अवसर के लिए जैसे उनकी आवाज नए अवतार ले लेती थी।

संगीतकार नौशाद अक्सर मोहम्मद रफी के बारे में एक दिलचस्प किस्सा सुनाते थे। एक बार एक अपराधी को फांसी दी जा रही थी। उससे उसकी अंतिम इच्छा पूछी गई तो उसने ना तो अपने परिवार से मिलने की इच्छा प्रकट की और ना ही किसी खास खाने की फरमाइश की। उसकी सिर्फ एक ही इच्छा थी जिसे सुनकर जेल कर्मचारी सन्न रह गए। उसने कहा कि वो मरने से पहले रफी साहब का बैजू बाबरा फिल्म का गाना ए दुनिया के रखवाले सुनना चाहता है। इस पर एक टेप रिकॉर्डर लाया गया और उसके लिए वो गाना बजाया गया। मोहम्मद रफी कोई व्यक्ति नहीं है। आवाज की एक संस्कृति उनकी आवाज उस मुलायम शॉल की तरह है जिसके स्पर्श से हर व्यक्ति को सुख ही सुख मिलता है। ये केवल आवाज और भावना का संबंध है कि रफी की याद में हिमाचल प्रदेश के सोलन ही नहीं देश के हर कोने में नियमित कार्यक्रम होते हैं।

सुदूर दक्षिण के प्रसिद्ध गायक एसपी बाला सुब्रमण्यम इंजीनियरिंग कॉलेज के लिए जाते हुए चाय वाले की दुकान पर दीवाना हुआ बादल सुनने के लिए साइकिल रोक देते थे और रोने लगते थे। 4 फरवरी 1990 को श्रीलंका के स्वतंत्रता दिवस पर मोहम्मद रफी को श्रीलंका की राजधानी कोलंबो में एक शो के लिए आमंत्रित किया गया था। उस दिन उनको सुनने के लिए 12 लाख कोलंबो वासी जमा हुए थे जो उस समय का विश्व रिकॉर्ड था। श्रीलंका के राष्ट्रपति जे आर जयवर्धनी और प्रधानमंत्री प्रेमदासा उद्घाटन के तुरंत बाद किसी और कार्यक्रम में भाग लेने जाने वाले थे। लेकिन रफी साहब के जबरदस्त गायन ने उन्हें रुकने पर मजबूर कर दिया और वो कार्यक्रम खत्म होने तक वहां से हिल नहीं सके। मोहम्मद रफी साहब की बहू और उन पर एक किताब लिखने वाली यासमीन खालिद रफी कहती हैं कि रफी साहब की आदत थी कि जब वो विदेश के किसी शो में जाते थे तो वहीं की भाषा में एक गीत जरूर सुनाते थे। उस दिन कोलंबो में भी उन्होंने सिंघला में एक गीत सुनाया था। रफी साहब की आवाज में जो भजन तत्व था वो इतना सघन था कि मन हरि दर्शन के लिए तड़प ही उठा जैसे। उसी भजन तत्व में जब कहरवा की तेजी आती थी तो श्री कृष्ण का आह्वान हो जाता था कि बड़ी देर भई नंदलाला तेरी राह तक ये ब्रजवाला और राम जी की सवारी जैसी उनकी आवाज में निकलती है।

लगता है अयोध्या का कोई राम भक्त उसी समूह में उपस्थित है। नाथ और हम गाते हुए भी वही भजन तत्व बरकरार रहता है। उस भजन तत्व में जब गुरु गोविंद सिंह का शब्द सुनने को मिलता है तो ऐसा लगता है जैसे वाहेगुरु के नाम लिखे पत्र को पूरी शिद्दत से पढ़ा जा रहा है। बड़ी देर भई नंदलाला तेरी राह तकके भिजवा मित्र प्यारे न हाल मुरीदा कहना बहुत से लोगों को यह जानकर हैरानी होगी कि मोहम्मद रफी के ऑटोग्राफ साइन करना नहीं आता था महेंद्र कपूर के बेटे रूहान कपूर याद करते ही एक बार रफी साहब और मेरे पिता ऑल इंडिया रेडियो से लौट रहे थे कुछ लोगों ने रफी साहब को पहचान लिया और ऑटोग्राफ मांगने लगे उन्होंने पिता से पूछा पंजाबी में कि की मांग रहे मेरे पिता ने जवाब दिया कि उन्हें आपको दस्तखत चाहिए। रफी साहब तपाक से बोले तू कर दे। वास्तव में तब तक रफी साहब को अंग्रेजी में दस्तखत करना नहीं आता था। जैसे-जैसे वो मशहूर होते गए उन्होंने दस्तखत करने का बाकायदा अभ्यास किया, प्रैक्टिस की ताकि वो अपने प्रशंसकों को निराश ना करें।

उनके बेटे शाहिद रफी भी बताते हैं कि वो दस्तखत के अभ्यास के लिए बहुत सारे कागज बर्बाद कर दिया करते थे। लेकिन जब वो दस्तखत करने पर पारंगत हो गए तो एक पत्रकार ने उनके दस्तखत की तारीफ करते हुए कहा था कि पूरी फिल्म इंडस्ट्री में उनके जैसा दस्तखत नहीं है। सबसे सुंदर है। रफी साहब के करियर को झटका लगा। 1969 में जब आराधना फिल्म रिलीज हुई। राजेश खन्ना की आभा ने पूरे भारत को चकाचौंध कर दिया और आर डी बर्मन ने बड़े संगीतकार बनने की तरफ अपना पहला बड़ा कदम बढ़ाया। इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया के पूर्व सह संपादक राजू भारतीन कहते हैं आराधना के सभी गाने पहले रफी साहब भी गाने वाले थे। अगर एसडी बर्मन बीमार नहीं पड़ते और आर डी बर्मन ने उनका काम नहीं संभाला होता तो किशोर कुमार सामने आते ही नहीं और वैसे भी आराधना के पहले दो डुएट रफी साहब ने ही गाए थे। भारतन बताते हैं कि पंचम ने बहुत पहले स्पष्ट कर दिया था कि अगर उन्हें मौका मिलता तो वह रफी साहब की जगह किशोर को लाएंगे। जहां तक रफी साहब की लोकप्रियता में गिरावट की बात है, उसके कुछ कारण थे। जिन अभिनेताओं के लिए रफी साहब गा रहे थे, दिलीप कुमार, धर्मेंद्र, जितेंद्र और संजीव कुमार वो पुराने पड़ गए थे और उनकी जगह नए अभिनेता ले रहे थे और उनको नई आवाज की जरूरत थी। आर डी बर्मन जैसे संगीतकार उभर कर सामने आ रहे थे और उन्हें कुछ नया करके दिखाना था।

मोहम्मद रफी साहब को हॉलीवुड की फिल्में देखने का गजब का शौक था। उनकी पसंदीदा फिल्म थी द मैग्निफिसेंट सेवन। मोहम्मद रफी की बहू यासमीन खालिद रफी अपनी किताब मोहम्मद रफी माय अब्बा अ मेमोरियल में लिखती हैं। जब भी वो कोई हॉलीवुड फिल्म देखने बैठते थे।

उनके बच्चे फिल्म की कहानी उन्हें पहले से ही बता देते थे। जैसे-जैसे फिल्म चलती जाती थी, वो उनके डायलॉग का अनुवाद भी उनके लिए करते जाते थे। पीटर सेलर्स उनके पसंदीदा अभिनेता थे। उनके फिल्म द पार्टी उन्हें बेहद पसंद थी। कभी-कभी वो हॉल में भी फिल्म देखने जाते थे। लेकिन फिल्म शुरू होने के कुछ मिनटों के अंदर उन्हें नींद आ जाया करती थी। जाने बहार हुस् तेरा बेमिसाल है जैसा रोमांटिक गाना गाने वाले रफी साहब जब ये देश है वीर जवानों का कर चले हम फिदा जान वतन साथियों मेरे देश की धरती वतन पर जो फिदा होगा अमर वो नौजवान होगा जैसे गीत गाते हैं तो ऐसा लगता है मानो भारत माता और मां सरस्वती का पूरा दुलार अपने लाडले को मिला है।

उनके अंदर का शरारती बालक हमेशा जिंदा रहा है। विदेश में कॉन्सर्ट की एक रिकॉर्डिंग में वह कृष्णा मुखर्जी के साथ गा रहे हैं। 100 साल पहले मुझे तुमसे प्यार था। इस दौरान उनकी शरारतें भी दिखती हैं। उदाहरण के लिए सहयोगी गायिका का बोल सुनकर हाउ स्वीट कहना कमाल यह है कि लाइव गाते हुए रफी साहब की आवाज उन्मुक्त होती थी। जबकि पार्श्व गायन करते हुए नायक के व्यक्तित्व के अनुरूप होती थी। रफी साहब बड़े दिल वाले थे। इसका एक किस्सा भी है। किस्सा यूं कि एक बार किसी सहायक ने रफी साहब से पैसे मांगे तो रफी साहब ने बैग में हाथ डाला। जितने पैसे निकले वो देने लगे। उनके सचिव ज़हीर भाई जो रफी साहब की पत्नी के भाई भी थे।

उन्होंने रोका कि ऐसा बिना गिने क्यों दे रहे हैं आप? तुम मुझे यूं भुला ना पाओगे फिल्म पागल कहीं का गाना और गायक मोहम्मद रफी। इस गीत की तरह सुरों के सरताज रफी साहब को भी कभी भुलाया नहीं जा सकता। 31 जुलाई की वो तारीख थी जब 1980 में भारतीय सिनेमा की ये मधुर आवाज हमेशा के लिए खामोश हो गई।

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