पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की भवानीपुर की विधानसभा की सीट पर हुए चुनाव और उसके नतीजों को लेकर कानूनी लड़ाई अब बेहद ही आक्रामक मोड़ पर पहुंच चुकी है। दरअसल भवानीपुर चुनाव मामले में कोलकाता हाईकोर्ट के भीतर एक तीखी बहस देखने के लिए मिली और उसके बाद में तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ सांसद और देश के जाने-माने अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने चुनाव प्रक्रिया पर बेहद गंभीर और चौंकाने वाले सवाल खड़े कर दिए। तृणमूल कांग्रेस ने सीधे तौर पर तत्कालीन चुनाव अधिकारियों और राज्य प्रशासन के बीच में क्विड प्रोक्यो यानी कि काम के बदले उपकार का आरोप लगा दिया।
इस मामले में कोर्ट ने टीएमसी की याचिका को स्वीकार करते हुए एक बड़ा आदेश जारी कर दिया है। जिससे आने वाले दिनों में बंगाल की राजनीति में एक नया कानूनी तूफान आना तय माना जा रहा है। हाई कोर्ट के इस बड़े आदेश का हम इस रिपोर्ट में विश्लेषण करेंगे। लेकिन उससे पहले आपसे गुजारिश है कि प्लीज चैनल को सब्सक्राइब कर लें और अगर आपको यह रिपोर्ट पसंद आए तो वीडियो को लाइक जरूर करें। कोलकाता हाई कोर्ट के बाहर मीडिया से बात करते हुए अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने उन प्रशासनिक अधिकारियों की पूरी सूची और उनकी मौजूदा पोस्टिंग का ब्यौरा सामने रखा जो उस वक्त चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा हुआ करते थे। उन्होंने दावा किया कि चुनाव के दौरान व्यापक पैमाने पर अनियमितताएं की गई। उन्होंने यह भी कहा कि भवानीपुर विधानसभा क्षेत्र से तकरीबन 44,000 से 55,000 मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से अवैध तरीके से हटा दिए गए थे। इसी का नतीजा था कि ममता बनर्जी को वहां पर 15,000 वोटों से हार का सामना करना पड़ा।
यह उनके वकील का दावा है। लेकिन, असल में ममता बनर्जी को भवानीपुर की जनता ने पश्चिम बंगाल की जनता ने नकार दिया है। यह यह लोग पचा नहीं पा रहे। चुनावी प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर गैर कानानूनी और अनियमित गतिविधियां अंजाम दी गई। यह कल्याण बनर्जी ने कहा। उन्होंने आगे कहा कि चुनावी नतीजों पर हाई कोर्ट में सुनवाई पर कहा कि ममता बनर्जी ने जो भी चुनावी याचिका दर्ज की थी उसी याचिका पर आज सुनवाई की गई। हमने कहा था कि 12 राउंड तक मतगणना ठीक थी।
13वें राउंड में जब शुभेंदु अधिकारी काउंटिंग हॉल में घुसे तो उन्होंने बीजेपी के काउंटिंग एजेंट को निर्देश दिया कि टीएमसी के काउंटिंग एजेंट को भगा दो। उन लोगों ने मार करके उसे भगा दिया। सीआईएसएफ की उन्होंने मदद ली। उन्होंने मांग की कि सीसीटीवी फुटेज को सुरक्षित रखा जाए। सीसीटीवी, वीवीपैट, कैमरे और ईवीएम मशीनें सभी सुरक्षित रखी जानी चाहिए। साल 2021 में नंदीग्राम में जो रिटर्निंग ऑफिसर थे उन्हें भवानीपुर चुनाव में रिटर्निंग ऑफिसर बनाया गया। उन्होंने सिर्फ शुभेंदु अधिकारी की बात सुनी और किसी की भी बात नहीं सुनी। यह कल्याण बनर्जी ने हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान अपनी दलीलें रखी।
जब शुभेंदु अधिकारी मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने इस रिटर्निंग ऑफिसर को सीएमओ कार्यालय का संयुक्त सचिव बना दिया। मुख्य चुनाव अधिकारी को भी बाद में मुख्य सचिव बना दिया गया। सुब्रत गुप्ता जो कि स्पेशल पर्यवेक्षक थे उन्हें भी विशेष सचिव बनाया गया। यह सब कुछ पक्षपात है। टीएमसी की दलीलों और मतगणना हॉल में हुई कथित हाथापाई व हिंसा के आरोपों को गंभीरता से लेते हुए कोलकाता हाईकोर्ट के माननीय न्यायाधीश ने मामले में सख्त रुख अपनाया है।
कोर्ट ने निर्देश दे दिया है कि मतगणना हॉल और उसके आसपास के सभी सीसीटीवी फुटेजेस जो कैमरे की फुटेजेस हैं, वीवीपैट और ईवीएम को पूरी तरीके से सुरक्षित और संरक्षित रखा जाए। संबंधित अधिकारी और विपक्षी पक्ष को 4 सप्ताह के भीतर जवाब देना होगा। कल्याण बनर्जी ने साफ कहा कि हमने अदालत को बताया कि काउंटिंग हॉल में हमारे लोगों के साथ में जो मारपीट और दुर्व्यवहार की गई थी उसे सीसीटीवी फुटेज के जरिए आसानी से साबित किया जा सकता है। कोर्ट ने हमारी इस मांग को स्वीकार कर लिया है और हाईकोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए अब 12 दिनों के बाद की तारीख को मुकरर किया है। अब कोलकाता हाईकोर्ट से इन्हें जो राहत मिली है, अभी इनको ऐसा लग रहा है कि उनकी लोकतंत्र में बहुत बड़ी जीत हुई है। लेकिन जब इस मामले पर फाइनल वर्डिक्ट आएगा 12 दिनों के बाद में तो यह लोग फिर इसी हाई कोर्ट को कोसते दिखाई देंगे।
कानूनी जानकारों का मानना है कि यदि चार सप्ताह के भीतर आने वाले हलफनामे और सीसीटीवी फुटेजेस की जांच में कोई भी गड़बड़ी या फिर प्रक्रियात्मक चूक सामने आती है तो भवानीपुर का पूरा चुनावी परिणाम सवालों के घेरे में आ सकता है।
सत्ता पक्ष जहां इसे तृणमूल कांग्रेस की खीज बता रही है कि वह चुनाव हार चुके हैं और ममता बनर्जी अपनी चुनावी हार को पचा नहीं पा रही हैं। इसलिए कोर्ट दर कोर्ट भाग रही हैं। वहीं टीएमसी का साफ कहना है कि यह लड़ाई लोकतंत्र और निष्पक्ष चुनाव प्रणाली को बचाने की है। बहरहाल कोलकाता हाईकोर्ट के इस कड़े और बड़े आदेश के बाद में अब गेंद चुनाव आयोग और उन अधिकारियों के पाले में है जिन्हें तय साय समय सीमा के भीतर भीतर कोर्ट में अपनी बेगुनाही का सबूत देना होगा। कल्याण बनर्जी ने एक-एक चुनाव आयोग के अधिकारी को लेकर के जो उन्होंने हाई कोर्ट में टीका टिप्पणी की है और उसके बाद में हाई कोर्ट का जो आदेश आया है वो इस मामले की संवेदनशीलता को कंसीडर करते हुए आया है। अगर यहां पर ममता बनर्जी या फिर उनके जो वकील है कल्याण बनर्जी अगर इसमें अपनी जीत तलाश रही हैं।
अगर उन्हें लग रहा है कि वह भवानीपुर की सीट पर पूरी तरीके से जो चुनावी परिणाम आए हैं उनको बदल देंगे या फिर वहां पर दोबारा से इलेक्शन करवा लेंगे तो यह बहुत बड़े मुगावते में जी रहे हैं। चूंकि कल्याण बनर्जी ने कोलकाता हाईकोर्ट में यह गंभीर आरोप लगाए और एक-एक करके उन तमाम अधिकारियों का जिक्र किया कि जिन-जिन अधिकारियों ने फेवर किया है शुभेंदु अधिकारी का उन्हें एक तरीके से रिवॉर्ड दिया गया। यानी कि जो प्रोकड की बात की जा रही है, काम के बदले उपकार की बात कही जा रही है और बता रहे हैं कि एक-एक अधिकारी का नाम बता करके कि उन्हें ऐसेसे प्रमोट करके उन्हें ऐसे ऐसे उपकार दे के काम के बदले कहीं ना कहीं इस चुनावी प्रक्रिया में बड़ी अनियमितताएं की गई हैं। तो चूंकि लोकतंत्र में सवाल उठाने का अधिकार सभी के पास में है। इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में खासतौर पर जो चुनावी एक पर्व होता है हमारे लोकतंत्र का सबसे बड़ा त्यौहार माना जाता है।
अगर उसमें किसी के दिमाग में अगर कुछ भी गलतफहमियां हैं और अगर उन्हें लग रहा है कि यह चुनावी प्रक्रिया ठीक से नहीं हुई है तो जो संवैधानिक संस्थाएं उनका यह कर्तव्य है कि उनके दिमाग को और खासतौर पर देश की जनता के मन में क्लेरिटी लेकर के आए और इसीलिए कोलकाता हाईकोर्ट ने तमाम सीसीटीवी फुटेजेस वीवीपैट और ईवीएम सबको सुरक्षित और संरक्षित रखने का आदेश जारी किया है और 12 दिनों के बाद में इस पर जवाब दाखिल किया जाएगा। उन तमाम अधिकारियों के द्वारा जिन अधिकारियों के ऊपर आरोप लग रहे हैं। इस तय समय सीमा के भीतर कोर्ट में उन्हें अपनी बेगुनाही का सबूत देना होगा। और आप लोग यकीन मानिए भवानीपुर की सीट ममता बनर्जी के हाथ से जब निकली और उसके बाद में हमने देखा पश्चिम बंगाल में किस तरीके से उपद्रव हुआ यह ममता बनर्जी को पच नहीं रहा है। ममता बनर्जी अपनी हार को पचा नहीं पा रही हैं।
ममता बनर्जी का हाल फिलहाल राहुल गांधी की तरह हो रखा है। अपनी चुनावी हार पर आत्मचिंतन करने के बजाय ममता बनर्जी कोर्ट में दूसरी पॉलिटिकल पार्टी और दूसरे कैंडिडेट के ऊपर सबूतों का मांग कर रही हैं और उनके ऊपर कहीं ना कहीं ठीकरा फोड़ने में लगी है कि फलाने शख्स की वजह से मेरी यह चुनावी हार हुई है। लेकिन दोस्तों कोलकाता हाईकोर्ट के फैसले बहुत अहम है। कोलकाता हाईकोर्ट में जो कुछ भी जज ने सुनवाई के दौरान कहा वो बहुत ही महत्वपूर्ण है। और अभी जब कल्याण बनर्जी इस कोर्ट के आदेश से खुश हैं। मुझे लगता है कि जब आगे भी कोलकाता हाईकोर्ट का फैसला आएगा भवानीपुर की सीट पर हुई मतगणना को लेकर के क्योंकि साफ तौर पर यह कह रहे हैं कल्याण बनर्जी कि तकरीबन 45,000 से लेकर के 55,000 तक जो वोटर हैं।
उनके नाम अवैध तरीके से मतगणना सूची से बाहर निकाल दिए गए और उन्हें ऐसा लगता है कि जो यह 45,000 से 55,000 वोटर हैं, वह एक तरफ़ा ममता बनर्जी को ही वोट करते। अब उन्होंने वहां पर आरोप तो लगा दिए।
अब है शुभेंदु अधिकारी की सरकार की बारी। जब कोलकाता हाई कोर्ट में अगली सुनवाई होगी तो इन तमाम दलीलों के जवाब में शुभेंदु अधिकारी की तरफ से पेश होंगे वकील और वो तमाम जो है दलीलें वहां पर पेश करेंगे कि कैसे भवानीपुर की सीट पर सुचारू रूप से इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया के दिशा निर्देशों के आधार पर ही चुनाव किए गए हैं। वहां पर कोई भी गड़बड़ी नहीं पाई गई। 45,000 से 55,000 अवैध वोटरों का जो जिक्र किया जा रहा है वो बिल्कुल ठीक अगर काटे भी गए हैं तो काटे गए हैं।
तमाम नियमों को फॉलो करते हुए काटे गए हैं। बहरहाल कोलकाता हाईकोर्ट से वो फैसला आ गया है जिसका कहीं ना कहीं पहले से डर सता रहा था और ममता बनर्जी को अब एक तरीके से कुछ दिनों के लिए कहीं ना कहीं बोलने का लाइसेंस कोलकाता हाईकोर्ट के इस फैसले के जरिए मिला है और अब वो लंबी-लंबी डिंगें हकती फिरेंगी। बहरहाल इस मामले पर आप क्या सोचते हैं?