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केतन अग्रवाल केस: लोहगढ़ के किले को क्यों कोई तोड़ या जीत नहीं पाता? रहस्य जानकर चौंक जाएंगे

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साल 1805 ब्रिटेन के लॉर्ड जेरार्ड लेक थक चुके थे 2 जनवरी से वह एक किले को फतह करने की जद्दोजहद कर रहे थे आज 22 फरवरी हो गई थी एक माह और 20 दिन बीत चुके थे लेकिन देश के बड़े-बड़े साम्राज्य को गिराने वाले अंग्रेज या दुनिया के बड़े-बड़े साम्राज्य को गिराने वाले अंग्रेज इस एक किले की चढ़ाई पूरी नहीं कर पा रहे थे 1798 की आयरिश बगावत को कुचलने वाले लॉर्ड लेक पलट कर देखते हैं।

ब्रिटिश सैनिकों के चेहरे उतरे हुए थे जिसके बाद लेक वापस लौटने का ऐलान कर देते हैं उस दौर में सर्व शक्तिशाली लगने वाली ब्रिटिश फौज को इस किले ने मात दे दी थी बल्कि सिर्फ ब्रिटिश ही नहीं मुगल शासक भी कितनी ही बार इस किले से हार चुके थे।

उस लोहागढ़ किले की जो कई फौजों को दफन करने के बाद भी राजस्थान के भरतपुर में सिर ऊंचा किए खड़ा है चलिए सबसे पहले आपको लिए चलते हैं 17वीं शताब्दी में जाट शासक बदन सिंह के बेटे युवराज सूरजमल को एक जगह पसंद आती है मगर यह जगह एक अन्य जाट शासक राजा खेमकरण सोगरिया के इलाके में थी तो राजा सूरजमल ने वहां करके इसे अपने रियासत में जोड़ा उस दौर में राजस्थान के सामने एक और दिक्कत हुआ करती थी सरद से लगे होने की वजह से बाहरी आक्रमण कारी जो वेस्ट से आते थे वहीं से हिंदुस्तान में घुसने की कोशिश करते थे इस तरह हिंदुस्तान में होने वाले लगभग हर हमले को पहले राजस्थान झेल था सूरजमल की दृष्टि दूर की थी अगले राजा वही बनने वाले थे तो उन्होंने सबसे पहले अपने राजपाट को सुरक्षित करने के लिए इस जगह एक किला बनाने का फैसला किया साल 1733 के आसपास इस किले की नीव पड़ी किले को बड़े-बड़े से भी बचाना था ।

दरअसल मुगलों और अंग्रेजों के आने के साथ ही जंग में नए तरह के वेपंस भी आए थे फायर आर्म्स और कैनंस बंदूकें और तोपे पहले के बने हुए किले इन हथियारों को नहीं झेल पाते थे क्योंकि उन्हें डिजाइन नहीं किया गया था कैनंस के लिए सो नीव रखने के साथ ही एक और काम किया गया किले के इर्दगिर्द खुदाई की गई बेहद गहरी एक खाई खोदी गई जिसमें आगे पानी भरा जाना था किलों के आसपास ऐसा करना आम बात थी लेकिन इस किले के पास ज्यादा गहरी खुदाई हुई माना जाता है कि यह खुदाई कुछ इस तरह थी कि किले का क्षेत्र एक मानव निर्मित आईलैंड की तरह लगने लगा था टापू की तरह वहीं किले की बाहरी दीवारों को कुछ ऐसा बनाया गया कि बड़ी-बड़ी तोपों के तगड़े हमले भी झेल सके पहले चट्टानों की मोटी चुनाई हुई और मजबूत दीवारें बनाई गई और उनके सामने मिट्टी की मोटी दीवारें बना दी गई इन मिट्टी की दीवारों का काम किले केलिए वैसा ही था जैसे इंसानी शरीर पर एक बुलेट प्रूफ जैकेट का होता है किसी भी बड़े हमले को ये दीवारें अब्जॉर्ब कर लेती थी क्योंकि जो गोला होता था वो मिट्टी में धस जाता था।

कभी दीवार तक पहुंचता नहीं था सैकड़ों लोग खजान ने का बड़ा हिस्सा और 8 साल लगे इस किले को तैयार करने में लेकिन जब यह किला बनकर तैयार हुआ तो फौलाद की तरह मजबूत था इसलिए इस किले का नाम रखा गया लोहागढ़ किला लोहागढ़ किला 2872 मीटर की परिधि में फैला हुआ है इसका आकार आयत की तरह यानी एक रेक्टेंगल की तरह है किले में 34 बुर्ज हैं माने टावर अब ये जो टावर्स होते हैं किले जैसी किसी भी डिफेंसिव पोजीशन के लिए बहुत काम के होते हैं उन पर खड़े होकर सैनिक दूर से दुश्मन को देख सकते हैं और सटीक निशाना लगा सकते हैं 34 टावर्स का मतलब 34 जगह जहां से आप निगरानी भी कर सकते हैं।

हमला भी कर सकते हैं किले के इर्दगिर्द 8 से 10 फीट तक की जमीन खुदी हुई है जिसमें पहले पानी भरा होता था इस खंदक में पानी के साथ मगरमच छोड़े जाते थे जो दुश्मन को अकेले तक पहुंचने से रोकते थे डराते थे यह खंदक कुछ जगहों पर 41 मीटर तो कुछ जगहों पर 72 मीटर तक चौड़ी है अब इसके लिए के लोहागढ़ बनने की कहानी तो हमने आपको को सुना दी अब आपको बताते हैं कि किन-किन मौकों पर इसने अपने नाम को साबित भी किया पहला किस्सा है 1763 का मगर इसकी भूमिका बन गई 461 साल पहले 1303 में दिल्ली के तत्कालीन सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़गढ़ किले प हमला किया किले को जीत लेने के कुछ दिनों बाद खिलजी वापस दिल्ली रवाना हुए पर दिल्ली जाते-जाते वह किले की नायाब चीजें अपने साथ ले जा रहे थे इन चीजों में किले के दो दरवाजे भी थे जो क्राफ्टिंग की मिसाल थे खिलजी ने दरवाजों को दिल्ली में सजा दिया भूमिका बन गई अब चलते हैं।

वापस 1763 64 पर इतिहासकार बताते हैं कि उस दौर में शाह आलम दुतीय नाम मात्र के मुगल बादशाह बच गए थे असली ताकत रोहिल के सरदार नजीब उद दौला के पास थी महाराज सूरजमल और नजीब उद् दौला के बीच एक जंग हो गई इस में महाराज सूरजमल की हुई इसके बाद भरतपुर के राजा बने महाराज सूरजमल के बेटे महाराज जवाहर सिंह लेखक दीनानाथ दुबे अपनी किताब भारत के दुर्ग में लिखते हैं नजीब दौला से अपने पिता की का बदला लेने के लिए राजा जवाहर सिंह ने दिल्ली कूज किया कूज के कुछ महीनों बाद जब नजीब उद् दौला ने राजा जवाहर सिंह से युद्ध शांत करने का आग्रह किया सूइंग फॉर पीस राजा जवाहर सिंह लगभग जीत चुके थे।

लेकिन उनके साथियों और सिप सालार ने उन्हें रोक देने की सलाह दी कि अब लड़ने में ज्यादा मतलब नहीं है हम समझौता भी कर सकते हैं यूं शर्त बैठी कि राजा जवाहर सिंह भरतपुर लौटेंगे मगर नजीब उद् दौला को युद्ध में खर्च हुए पैसे चुकाने पड़ेंगे रिपरेशंस यानी जंग की क्षति पूर्ति या मुआवजा देना पड़ेगा महाराज ने नजीब से उस समय के करीब ₹ लाख रप लिए थे आज के जमाने में इसका हिसाब लगाते लगाते कैलकुलेटर पलट जाएगा आपका उसके बाद वो वापस भरतपुर लौटने के लिए निकले लेकिन साथ में दिल्ली के किले से वह लोहिया गेट और अष्टधातु के गेट भी भरतपुर वापस ले गए यह वही दो गेट थे जिन्हें 461 साल पहले अलाउद्दीन खिलजी चित्तौड़गढ़ से दिल्ली ले गए थे ये गेट आज भी भरतपुर के लोहागढ़ किले में देख ख जा सकते हैं।

राजा जवाहर सिंह जब भरतपुर लौटे तो उन्होंने लोहागढ़ किले में जवाहर बुर्ज बनवाया यह उनकी मुगलों पर जीत की यादगार था जो आज भी किले में मौजूद है जाट वंश के राजाओं की ताजपोशी के लिए जवाहर बुर्ज का इस्तेमाल होता था भरतपुर के जाट वंश के राजाओं ने बहुत लंबे वक्त तक राज किया जिस बीच राजा जवाहर सिंह मुगलों से लड़ रहे थे उसी बीच ताकत का एक परजीवी बीज भी तेजी से हिंदुस्तान की माटी में पनप रहा था इसका नाम था ईस्ट इंडिया कंपनी अच्छे-अच्छे राजाओं और शाहों को ईस्ट इंडिया कंपनी धूल चटा चुकी थी क्योंकि बड़ी कनिंग थी और पावरफुल भी थी ट्रेनिंग थी उन दिनों हिंदुस्तान में ब्रिटेन ईस्ट इंडिया कंपनी के जरिए ही अपने पैर पसार रहा था।

इसी बीच वहां आयरलैंड में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बगावत उठती है 1798 में किंग जॉर्ज तृतीय अपने भरोसेमंद कमांडर जेरार्ड लेक को आयरलैंड भेजते हैं लेक आयरलैंड पहुंचते हैं और बुरी तरह बगावत को कुचल देते हैं इतिहासकार एंथनी एस बेनल अपनी किताब लेक जेरार्ड फर्स्ट विस्काउंट लेक ऑफ टेली में लिखते हैं आयरलैंड में ग्रेट ब्रिटेन की मुखालफत करने वालों के साथ जैरेड लेक ने बहुत तीखा रवैया तियार किया लेक ने टेक्नो प्रिजन स्टाइल में अपना अभियान चलाया किसी को बंदी नहीं बनाया गया जो मिलता था उसे मार डाला जाता था हिरासत में किसी को नहीं लेते थे वो इस तरह जेरार्ड ने आयरलैंड में का माहौल बनाया ब्रिटिश शासन ने उन्हें इसका इनाम भी दिया उन्हें भेजा गया तेजी से बढ़ रहे एक और कॉलोनियल देश हिंदुस्तान 1799 में जर्ड ले ईस्ट इंडिया कंपनी की जो फॉस्ट सतब उसके कमांडर इन चीफ बने हिंदुस्तान में फिर 1802 में फुल जनरल का पद मिलने के बाद उन्होंने निरंतर किए सेकंड एंग्लो वॉर लड़ा अलीगढ़ का लड़ा प्रतापगढ़ का युद्ध लड़ा लास वारी की लड़ाई लड़ी इन की फेरिस लंबी है जो जेरार्ड लेख ने सैन्य कप्तान रहते हुए लड़ी भी जीती भी लास वारी की लड़ाई अहम भी है क्योंकि इसमें सिंधिया घराने के दौलतराव शिंदे की लगभग सारी ही फौज ब्रिटिशर्स ने खत्म कर दी थी

2 जनवरी 1805 को महाराजा यशवंत राव होलकर को हराने की तलब लिए जरा भरतपुर पहुंचे ये इंदौर के थे मगर होलकर का साथ राजा रणजीत सिंह दे रहे थे रणजीत सिंह महाराज जवाहर सिंह के बेटे थे और उस वक्त भरतपुर के शासक थे होलकर और रणजीत सिंह अपने फौलादी किले के अंदर थे किला जेरार्ड के समझ में नहीं आया पांच दिन तक रणनीति बनाने के बाद जेरार्ड ने 7 जनवरी को पहला हमला किया 9 जनवरी को ब्रिटिश सेना किले के अंदर जाने में कामयाब तो रही और इसकी अगुवाई कर रहे थे लेफ्टिनेंट कर्नल मेटलैंड लेकिन नतीजा बड़ा खराब रहा अंग्रेजों के लिए जेरार्ड ने अपने 400 सैनिक खो दिए यहां तक कि नेतृत्व कर रहे मेटलैंड भी जानलेवा रूप से घायल हुए 16 जनवरी को दूसरा हमला हुआ इस बार महाराज के सैनिकों ने गहरे खंदक में पानी डालकर हमला बेअसर किया।

500 ब्रिटिश सैनिक और मारे गए इसमें जिनमें एक और लेफ्टिनेंट कर्नल शामिल थे हालांकि हमले जारी रखने के लिए जेरार्ड को लगातार ब्रिटिश सरकार से माल और सेना मिलती रही फिर जेरार्ड ने तीसरा हमला किया 20 फरवरी को इसका भी नतीजा ब्रिटिश शिकस्त ही रही फिर अगले दिन किले को भेदने की एक आखिरी कोशिश की गई लेकिन इन सभी हमलों में जेरार्ड को नाकामी के अलावा कुछ हाथ लगा नहीं 22 फरवरी को 3292 ब्रिटिश सैनिकों की मौत के बाद बहुत बड़ा नंबर है अपने टाइम के लिए ये जैरेट के सामने यह साबित हो गया कि इस किले को लोहागढ़ का किला क्यों कहा जाता है देश विदेश और हिंदुस्तान की जगह-जगह से फतह हासिल कराए सैन्य कमांडर सर जेरार्ड लेक लोहागढ़ किले को भेद नहीं पाए इनकी से हमने आपको अभी कुछ देर पहले ही वाकिफ करवाया था लेकिन यह क्रूरता केवल दुश्मन सैनिकों के लिए नहीं थी वो खुद के सैनिकों के लिए भी उतने ही क्रूर थे विंग मांडर मुकुंद श्रीधर नरवणे रिटायर्ड सैनिक इतिहास के एक बढ़िया स्कॉलर माने जाते हैं इनका एक और परिचय यह है कि इन्हीं के बेटे जनरल मनोज मुकुंद नरवणे रिटायर्ड भारत के 28 वें थल सेना प्रमुख थे नरवणे सीनियर का भारत में हुई लड़ाइयां और किलों पर काम जो है उसे काफी सराहा जाता है उनकी स्कॉलरशिप को उनकी एक ऐसी ही किताब है बैटल्स ऑफ द नरेल ईस्ट इंडिया कंपनी इसमें 1805 में हुई लोहागढ़ की लड़ाई का वर्णन भी है विंग कमांडर नरवणे लिखते हैं ।

चौथा हमला नाकाम होने के बाद सर जेरार्ड लेक को वापस लौटना पड़ा भरतपुर में लोहागढ़ किले की असफल कूच में कुल 3292 ब्रिटिश फौजी मारे गए इसका सबसे बुरा हिस्सा यह है कि जो ब्रिटिश सैनिक जख्मी होकर जहां गिरे थे उन्हें वहीं मरने के लिए जर्ड ने छोड़ा और बाकी लोगों के साथ वो वहां से चले गए उन्हें तड़पता देख केलिए के अंदर से लोग आए और उन्हें मार करर दर्द से आजाद किया फिर इस जीत के बाद महाराज रणजीत सिंह ने किले में एक और बुर्ज बनवाया इस बुर्ज का नाम था फतह बुर्ज फतह का अर्थ होता है जीत यह बुर्ज अंग्रेजों के ऊपर जाट शासन की जीत का यादगार बना आप फतेह बुर्ज को आज भी लोहागढ़ किले में जाके देख सकते हैं इसके अलावा भी किले में बहुत सी ऐसी जगह और कलाकृतियां हैं जो देखने लायक हैं इनमें किशोरी महल महल खास और कोठी खास शामिल है कभी छुट्टियों में राजस्थान जाएं तो भरतपुर भी होकर आ सकते हैं।

लोहागढ़ किला आपको एक बार जरूर देखना चाहिए बहरहाल आज के लिए बस इतना ही तारीख के इस एपिसोड को लिखा था हमारे साथी नावेद ने और जतिन ने इसे कैमरे पर रिकॉर्ड किया था आप देखते रहिए दलन टॉप

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