[संगीत] यह 4 जुलाई 1944 की तारीख थी। जगह थी बर्मा जहां मौजूद थी हजारों भारतीयों की भीड़। इस भीड़ को संबोधित करते हुए मिलिट्री यूनिफार्म पहने नेता ने कहा, मित्रों, मुक्ति संग्राम में मेरे साथियों, आज मैं आपसे सबसे बढ़कर एक चीज मांगता हूं। मैं आपसे खून मांगता हूं। दुश्मन ने जो खून बहाया है उसका बदला सिर्फ खून से ही लिया जा सकता है। आजादी की कीमत सिर्फ खून से ही चुकाई जा सकती है। आज हमारी एक ही इच्छा होनी चाहिए मरने की इच्छा ताकि भारत जीवित रहे। शहीद की मृत्यु का सामना करने की इच्छा ताकि स्वतंत्रता का मार्ग शहीदों के खून से प्रशस्त हो सके। तुम मुझे खून दो और मैं तुम्हें आजादी देने का वादा करता हूं। यह फौज हारे हुए सैनिकों की बुनियाद पर खड़ी हुई थी। फरवरी 1942 में सिंगापुर में ब्रिटिश सेना ने सरेंडर किया तो चर्चिल ने इसे ब्रिटिश इतिहास का सबसे बड़ा डिजास्टर बताया था और इस डिजास्टर में बंदी बनाए गए थे 15000 सैनिक जिनमें आधे से ज्यादा भारतीय थे। इन्हीं सैनिकों को इकट्ठा कर बनाई गई थी आजाद हिंद फौज जिसका नेतृत्व था 47 साल के एक कमांडर के हाथ में। बंगाल के एक रसूखदार वकील का बेटा पढ़ाई लिखाई में ऐसा कि इंपीरियल सिविल सर्विज की परीक्षा पास की। पास ही नहीं की चौथे स्थान पर रहा। ब्रिटिश सरकार में आईसीएस बना। गांधी जी की लड़ाई से प्रभावित हुआ तो नौकरी छोड़ दी। अखबार शुरू किया। राजनीति में उतरा तो वहां भी गांधी जी को ही चुनौती दे डाली। उनके उम्मीदवार को हराकर कांग्रेस का अध्यक्ष बना। अंग्रेजों को चकमा दे पूरा यूरोप घूम आया और अंग्रेजों के सबसे बड़े दुश्मनों के साथ मिलकर देश के बाहर ही एक पूरी की पूरी सेना खड़ी कर डाली। आजाद भारत की सरकार बना दी जिसे नौ देशों ने मान्यता दी और वह इसके प्रधानमंत्री बने। वो नेता थे, क्रांतिकारी थे, भेष बदलने में माहिर थे, सैनिक भी थे और कमांडर भी। और बागी ऐसे कि उनकी मौत के दशकों बाद भी दुनिया की सबसे बड़ी ताकतें यह पता लगाने में लगी रही कि कहीं वह जिंदा तो नहीं। उनकी कहानी किसी फिल्मी थ्रिलर से कम नहीं जिसका नायक आखिर में अपनी मौत का रहस्य छोड़ जाता है जो 80 साल बाद भी नहीं सुलझता।
उनके चाहने वालों ने उन्हें नेताजी कहा और दुनिया ने सुभाष चंद्र बोस के नाम से जाना। तो किस्सा के इस एपिसोड में हम आपको बताएंगे 18 अगस्त 1945 को आखिर हुआ क्या था। ताईहो एयरपोर्ट से टोक्यो के लिए उड़ान भरने वाले प्लेन में कौन-कौन सवार था? यह प्लेन क्रैश आखिर हुआ कैसे था? क्या वाकई यह प्लेन क्रैश हुआ भी था या फिर यह महज एक कहानी भर थी। इस क्रैश का कोई रिकॉर्ड क्यों नहीं था? नेताजी के नाम का कोई डेथ सर्टिफिकेट क्यों नहीं बना था? टोक्यो के रेनकोजे मंदिर में रखी अस्थियां किसकी है और उसे वापस भारत क्यों नहीं लाया गया? बात होगी उस वाक्य की भी जब एक अंग्रेज पत्रकार ने बोस के जिंदा होने की बात कही तो नेहरू की प्रेस कॉन्फ्रेंस में हंगामा मच गया। कौन थे गुमनामी बाबा? आजादी के बाद बनाई गई तमाम आयोगों की रिपोर्ट में क्या-क्या पता चला और सुभाष चंद्र बोस की मौत को नकारने वाली जस्टिस मुखर्जी कमीशन की रिपोर्ट को संसद ने क्यों नकार दिया? इन सब सवालों के जवाब मिलेंगे आपको किस्सा के इस एपिसोड में। नमस्कार, मैं हूं भूपेंद्र सोनी और आप देख रहे हैं खबरगांव और यह किस्सा है सुभाष चंद्र बोस की मौत के रहस्य का। [संगीत] साल 1945 यह अगस्त का महीना था। हिरशिमा और नागासाकी में दुनिया महाप्रलय का भयावह मंजर देख चुकी थी। छ साल से चला आ रहा महायुद्ध ढलान पर था। जर्मनी सरेंडर कर चुका था और अमेरिकी परमाणु बमों ने जापान के दो शहरों को पूरी तरह से तबाह कर दिया था। रही सही कसर 8 अगस्त 1945 को रूस ने जापान पर हमला करके पूरी कर दी। 10 लाख से अधिक सोवियत सैनिक मंचूरिया की ओर बढ़े जो जापान के कब्जे में था। पस्त पड़ा जापान अब किसी भी समय सरेंडर कर सकता था और अगले दो-तीन दिनों में उसके सरेंडर की यह खबर आ भी गई। लेकिन सवाल यह था कि उस वक्त सुभाष चंद्र बोस क्या कर रहे थे? अपनी किताब नेताजी रहस्यगाथा में अनुजधर लिखते हैं, आजाद हिंद फौज के सुप्रीम कमांडर सुभाष चंद्र बोस सिंगापुर से करीब 100 मील दूर सिरिंबन नाम की जगह पर 15 दिनों से टिके हुए थे। उनके साथ उनके कई सारे सहयोगी भी थे। जापानियों की मदद से सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद की अस्थाई सरकार का गठन भी किया था। जिसे प्रोविजनल गवर्नमेंट ऑफ फ्री इंडिया कहा जाता था। सुभाष चंद्र बोस इसके प्रधानमंत्री थे। जापान के अलावा जर्मनी, इटली, चीन, कोरिया, फिलीपींस, मानचुको और आयरलैंड ने इस सरकार को मान्यता भी दे रखी थी। नेताजी को पता था कि जापान इस वक्त मंचूरिया में सोवियत सैनिकों का सामना कर पाने की स्थिति में नहीं है और यह भी कि उनका मित्र जापान ज्यादा समय तक उनकी मदद नहीं कर पाएगा। आजाद हिंद फौज और आजाद हिंद सरकार जापान और सहयोगी देशों की मदद पर निर्भर थी। लेकिन जब जापान खुद घुटने टेकने पर मजबूर हो गया था तो फिर जापानियों की मदद से दिल्ली चलो का नारा देने वाली आजाद हिंद फौज के पास भी ज्यादा विकल्प नहीं बचे थे। 13 अगस्त को नेताजी सुभाष चंद्र बोस सिंगापुर पहुंचे।
जापान के कब्जे वाला सिंगापुर आजाद हिंद फौज की गतिविधियों का केंद्र था। 14 अगस्त को एक मीटिंग हुई जिसमें नेताजी के कई करीबी सहयोगी शामिल हुए। नेताजी तक यह खबर पहुंच चुकी थी कि 15 अगस्त को जापान सरेंडर कर देगा। कुछ सहयोगियों का मानना था कि नेताजी को सिंगापुर नहीं छोड़ना चाहिए क्योंकि इस वक्त किसी और देश से मदद नहीं मांगी जा सकती थी। जबकि कुछ का मानना था कि अगर वह सिंगापुर में ही रुकते हैं तो अंग्रेजों के निशाने पर होंगे। हालांकि नेताजी अंग्रेजों की गोली तक खाने के लिए तैयार थे। उन्होंने बस इतना कहा आजाद हिंद फौज के सैनिकों का बलिदान बेकार नहीं जाएगा। तुम लोगों को इस बात का ध्यान रखना है कि हमने यहां सुदूर पूर्व में जो संघर्ष किया है उसके बारे में हमारे देश के हर व्यक्ति को पता हो। जिस दिन भारतीयों को उनके बलिदानों का पता चलेगा उस दिन आजादी की लड़ाई में एक नया उत्साह दिखाई देगा। यह आज की तरह सूचना प्रौद्योगिकी का दौर नहीं था कि सेकंड्स में कोलकाता से कैलिफोर्निया तक की ब्रेकिंग न्यूज़ पता चल जाए। बड़ी-बड़ी खबरें भी पहुंचने में 2 से 3 दिन का वक्त लग जाता था। ऐसे समझिए कि 6 अगस्त को हिरशिमा में अमेरिका ने परमाणु बम गिराया। पूरा शहर बर्बाद हो गया। 70 हजार से ज्यादा लोग मारे गए। लेकिन यह हमला कितना गंभीर था यह बात टोक्यो तक को पता चलने में दो से तीन दिन लग गए। तब तक दूसरा बम भी नागासाकी में गिराया जा चुका था। उस दौर में देश से बाहर देश की आजादी के लिए लड़ी जा रही लड़ाई के बारे में लोगों को बहुत ही कम या कहें नाम मात्र की जानकारी थी। नेताजी चाहते थे कि लोगों तक यह जानकारी पहुंचे क्योंकि उन्हें पता था कि जब लोगों को यह बात पता चलेगी तब क्या होगा और ऐसा ही हुआ भी। जब द्वितीय विश्व युद्ध खत्म होने के बाद लाल किले में आजाद हिंद फौज के अफसरों के खिलाफ ट्रायल शुरू हुआ और आजाद हिंद फौज के सैनिकों के पराक्रम की कहानियां बाहर आई तो देश भर में विरोध का एक अलग ही उबाल फूट पड़ा। लाल किले के बाहर तो लोगों का हुजूम था ही कोलकाता, बॉम्बे, लाहौर जैसे शहरों में भी आजाद हिंद फौज के समर्थन में लोग सड़कों पर उतर आए। यह दिखाता है कि नेताजी कितने दूरदर्शी थे। वह जानते थे कि जब यह खबर लोगों को पता चलेगी तो क्या होगा। वह अंग्रेजों से आजादी की लड़ाई अपने तरीके से लड़ रहे थे। जापान के खिलाफ लड़ाई में अंग्रेज भारतीय सैनिकों को लड़ा रहे थे और जापान भारत के बंदी सैनिकों को नेताजी के हवाले कर दे रहा था। इन बंदी सैनिकों की मदद से नेताजी ने पूरी आजाद हिंद फौज खड़ी कर दी थी। जो जापान के साथ मिलकर दिल्ली जीतने निकली थी। लेकिन हालात ऐसे बने कि जापान खुद सरेंडर कर रहा था। 15 अगस्त 1945 को जापान ने सरेंडर कर दिया। तय हुआ कि नेताजी खुद टोक्यो जाएंगे और सरेंडर को लेकर बातचीत करेंगे। 16 अगस्त की सुबह 9:30 बजे नेताजी और उनके सहयोगी सिंगापुर से बैंकॉक के लिए रवाना हुए। वहां सुभाष चंद्र बोस जापानी सेना के उन अधिकारियों से मिले जो आजाद हिंद फौज के साथ कोऑर्डिनेट करने वाली जापानी सैन्य यूनिट से जुड़े थे। इन अधिकारियों में शामिल थे हाचिया टेओ, लेफ्टिनेंट जनरल सबूरो इसोदा और कर्नल कागवा। बोस के साथ उनके सहयोगी एमजेड केयानी, मेजर जनरल जे के भोंसले, हबीब उर रहमान, एसए अय्यर मौजूद थे। जापानी अधिकारियों ने सुभाष चंद्र बोस को साइगोन जाने की सलाह दी। जहां फील्ड मार्शल काउंट तेराउची हिसाइची मौजूद थे। तेराची और नेताजी के बीच अच्छी दोस्ती थी। बैंकॉक में ही प्रोविजनल गवर्नमेंट ऑफ फ्री इंडिया यानी पीजीएफआई का मुख्यालय था। 16-17 अगस्त की मध्य रात्रि उन्होंने सहयोगियों के साथ बैठक की। आजाद हिंद फौज के कर्मचारियों को दो-ती महीने का अग्रिम वेतन देने की बात कही। एसए अय्यर, देवनाथ बोस, कर्नल हबीब उर रहमान, कैप्टन गुलजारा सिंह, कर्नल प्रीतम सिंह और मेजर आबिद हसन को आगे साथ चलने के लिए कहा गया। हालांकि बोस ने यह स्पष्ट नहीं किया कि वह कहां जा रहे हैं। एक अनुमान यह था कि वह सोवियत जा सकते हैं। लेकिन यह भी अनुमान भर ही था। इसके बाद नेताजी ने आजाद हिंद फौज के खजाने की जांच की। इसे चार बक्सों में पैक कराया। दो बड़े और दो छोटे बक्से थे। इस खजाने में क्या था, कितना था, यह किसी को नहीं पता था। कई रिपोर्ट्स में इसमें करीब 100 किलो सोना होने की बात कही गई। 16 अगस्त की दोपहर साइगोन में दो हवाई जहाज उतरे। एक से सुभाष चंद्र बोस, प्रीतम, एसए अय्यर, हबीबुर रहमान और एक जापानी अफसर उतरे। दूसरे से हाचिया टेओ, सबूरो इसोदा, कर्नल गुलजारा सिंह, मेजर आबिद हसन और देवनाथ दास उतरे। प्लेन से उतरते नेताजी की एक तस्वीर भी खींची गई जो उनकी आखिरी तस्वीर साबित हुई। तेराउची के पास आजाद हिंद फौज के सरेंडर को लेकर कोई निर्देश नहीं थे। ऐसे में अब टोक्यो जाना ही एकमात्र विकल्प था। लेकिन अब सवाल यह था कि जाया कैसे जाए? जापान सरेंडर कर चुका था और यह ऑर्डर था कि कोई भी जहाज बिना मित्र देशों की अनुमति के नहीं उड़ेगा। जापानी अधिकारियों ने नेताजी को बताया कि एक बॉम्बर प्लेन जा रहा है लेकिन उसमें एक ही सीट है। नेताजी ने अपने सहयोगियों से बात की। सब उनके अकेले जाने के खिलाफ थे। दोबारा बातचीत हुई। जापानियों ने एक और सीट का इंतजाम किया। नेताजी ने हबीब उर रहमान को अपने साथ लिया। 6 फुट के कश्मीरी हबीब उर रहमान अंग्रेजी सेना के कप्तान रह चुके थे जो सिंगापुर में अंग्रेजों की हार के बाद आजाद हिंद फौज में शामिल हो गए थे। रहमान नेताजी के करीबी लोगों में से थे और कहा जाता था कि कोई भी राज तब तक रहमान के सीने से बाहर नहीं लाया जा सकता जब तक नेताजी खुद ऐसा ना चाहें। हबीब उर रहमान और नेताजी के अलावा इस बॉम्बर प्लेन में जापानी सेना के एक लेफ्टिनेंट जनरल सुनामा शिदई और चार अन्य सैनिक अधिकारी भी मौजूद थे। साथ में दो पायलट भी। प्लेन में जगह की कमी थी। जहां नेताजी बैठे थे, वहीं बगल में एक फ्यूल टैंक था। यह प्लेन रात में तुरेन पहुंचा। उस रात सब तुरेन में ही रुके। 18 अगस्त की सुबह यह प्लेन टोक्यो के लिए रवाना हुआ। दोपहर 2:00 बजे यह प्लेन फ्यूल लेने के लिए फार्मूसा के ताईहोकू हवाई अड्डे पर उतरा। फार्मूसा को आज हम ताइवान और ताईहोकू को ताइपे के नाम से जानते हैं। हवाई अड्डा जजर था। इमारतों पर युद्ध के दौरान हुई बमबारी के निशान मौजूद थे। हवाई अड्डे पर सन्नाटा था। कोई प्लेन नहीं था। इक्कादुक्का लोग ही मौजूद थे। जापान सरेंडर कर चुका था और एक अजीब निराशा का माहौल था। जब प्लेन में फ्यूल भरा जा रहा था। टर्मिनल पर बैठे नेताजी और हबीब उर रहमान ने केले और सैंडविचेस खाए। रहमान ने नेताजी से पूछा, क्या वह स्वेटर पहनेंगे? नेताजी ने मना कर दिया। रहमान को ठंड लग रही थी। उन्होंने स्वेटर पहन लिया। करीब आधे घंटे के ब्रेक के बाद दोबारा प्लेन ने उड़ान भरी। यह प्लेन की आखिरी उड़ान थी। हवाई अड्डे के आसपास मौजूद लोगों ने अचानक एक तेज धमाके की आवाज सुनी और दुनिया के सबसे विवादित और रहस्यमई विमान दुर्घटना के गवाह बने। हबीब उर रहमान बुरी तरह घायल थे। उन्होंने दोनों पायलट्स और लेफ्टिनेंट जनरल शिदई को मरते देखा। बाकी अफसर किसी तरह जहाज से निकल चुके थे। नेताजी बुरी तरह घायल थे। उनके सिर पर भारी चोट लगी थी। उनके कपड़ों पर तेल गिर गया था और वह बुरी तरह आग की चपेट में थे। किसी तरह वह प्लेन से बाहर निकले। एक जापानी अधिकारी ने नेताजी से जमीन पर लेट जाने को कहा ताकि आग को बुझाया जा सके। रहमान दौड़ते हुए बोस के पीछे आए।
मदद की कोशिश की, आग बुझाई, उनकी वर्दी खोली, जमीन पर लिटाया लेकिन बोस का पूरा शरीर बुरी तरह आग में झुलस चुका था और सिर पर गंभीर चोट थी। रहमान भी बुरी तरह जख्मी थे। वह नेताजी के बगल में ही पस्त हो गए। दोनों घायल एक दूसरे के बगल में लेटे हुए थे। रहमान ने बताया कि उन्होंने नेताजी को आश्वासन देना शुरू किया कि उन्हें कुछ नहीं होगा लेकिन नेताजी ने उम्मीद छोड़ दी थी। नेताजी ने हबीब उर रहमान से कहा जब तुम अपने देश वापस जाना तो लोगों को बताना कि मैंने आखिरी सांस तक अपने देश की आजादी के लिए लड़ाई लड़ी है। उन्हें यह संघर्ष जारी रखना है। हिंदुस्तान आजाद होगा। हमें कोई गुलाम नहीं रख सकता। खैर थोड़ी देर में सहायता पहुंची। नेताजी को पास के ही एक अस्पताल ले जाया गया। हालांकि वहां बहुत ज्यादा सुविधाएं मौजूद नहीं थी। नेताजी के घायल होने की खबर पाकर कुछ जापानी सैन्य अधिकारी अस्पताल पहुंचे। जुईची नाकामूरा नाम के एक ट्रांसलेटर भी अस्पताल आए। यह ट्रांसलेटर नेताजी को अच्छी तरह जानते थे और उनके साथ पहले भी काम कर चुके थे। डॉक्टर्स के तमाम प्रयासों के बावजूद नेताजी को बचाया नहीं जा सका। जब उनका निधन हुआ तब उनके बिस्तर के पास डॉक्टर योशिमी और एक अन्य डॉक्टर, दो नर्स, एक वार्ड बॉय, ट्रांसलेटर नाकामूरा और हबीब उर रहमान मौजूद थे। हर कोई टूट गया। कर्नल हबीब उर रहमान बिस्तर के किनारे घुटनों के बल बैठ गए और उन्होंने नेताजी के लिए अंतिम प्रार्थना की। डॉक्टर योशिशमी ने एक मृत्यु प्रमाण पत्र जारी किया जिसमें मौत की वजह लिखी थी थर्ड डिग्री बर्थ। हालांकि यह मृत्यु प्रमाण पत्र कभी किसी को नहीं मिला। नेताजी के शव को एक बड़े ताबूत में रखा गया। हालांकि शव को सुरक्षित रखने का वहां कोई इंतजाम नहीं था। ऐसे में 19 अगस्त को रहमान ने नेताजी का शव सिंगापुर ले जाने की बात कही। लेकिन जापानी अफसरों ने अफसोस जताया और कहा कि बॉम्बर प्लेन में इतने बड़े ताबूत को नहीं ले जाया जा सकता। ऐसे में हबीब उर रहमान के पास अंतिम संस्कार के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था। अगली सुबह यानी 20 अगस्त को ताइपे में ही उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया। रहमान आधे घंटे तक वहीं बैठे रहे। बाद में उनकी कुछ अस्थियों को एक बॉक्स में एकत्र किया गया और सुभाष चंद्र बोस की अस्थियों को टोक्यो के रनकोजे मंदिर में रखा गया। उधर टोक्यो में जब एसए अय्यर को नेताजी की मौत की खबर मिली तो उन्होंने इसे मानने से ही इंकार कर दिया। अय्यर ने कहा कि आप मुझे उनका शव दिखाइए। मैं अपनी आंखों से देखना चाहता हूं और यह मत कहिएगा कि आपने उनका अंतिम संस्कार कर दिया है। अय्यर ने साफ कहा कि भारत या पूरे पूर्वी एशिया में बिना सबूत कोई भी इस खबर को नहीं मानेगा और ऐसा ही हुआ भी। जापानी न्यूज़ एजेंसी दोमई ने 23 अगस्त 1945 को पूरी दुनिया को सुभाष चंद्र बोस की मौत की जानकारी दी। भारत में अगले दिन 24 अगस्त को यह खबर छपी। पूरे देश में हड़कंप मच गया। कोलकाता की सड़कों पर हजारों छात्रों ने शोक सभा आयोजित की। अमृतसर, अहमदाबाद, कराची जैसे शहर भी बंद रहे। महात्मा गांधी ने राजकुमारी अमृत कौर को एक पत्र लिखा। उन्होंने सुभाष को देशभक्त बताया और उनके निधन पर दुख व्यक्त किया। गांधी ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं से झंडा झुकाने के लिए कहा। एपटा में पत्रकारों ने नेहरू को यह जानकारी दी। नेहरू ने एक जनसभा में कहा, सुभाष के निधन की खबर से स्तब्ध हूं। हालांकि उन्होंने इस बात पर संतुष्टि जताई कि सुभाष चंद्र बोस ने आजादी की लड़ाई के दौरान प्राण त्यागे और उन सभी कष्टों से बच निकले जिनका सामना उनके जैसे वीर सैनिकों को अंततः करना पड़ता है। सुभाष के बड़े भाई शरद चंद्र बोस उस वक्त कुन्नूर जेल में थे। अखबारों से उन्हें सुभाष चंद्र बोस की मौत की खबर मिली। छोटे भाई की मौत की खबर सुनकर उनका कलेजा फट पड़ा। हालांकि बाद में शरद चंद्र बोस ने इन खबरों को नकार दिया। उन्होंने कभी इस बात पर यकीन नहीं किया कि उनके छोटे भाई की मौत ताईहोकू में हुए प्लेन क्रैश में हुई थी। सुभाष चंद्र बोस की मौत का शोक मनाया जा रहा था। लेकिन उनकी मृत्यु को प्रमाणित करने के लिए ना कोई सबूत था ना ही कोई तस्वीर और ना ही कोई लाश।
इसलिए एक बड़ी आबादी ऐसी भी थी जो यह मानती थी कि अपने दुश्मनों को चकमा देकर गायब हो जाने में माहिर नेताजी सुभाष चंद्र बोस एक बार फिर से अंडरग्राउंड हो गए हैं। जैसा वो कई बार कर चुके थे। क्योंकि जापान सरेंडर कर चुका था और अंग्रेज युद्ध अपराधों की कार्यवाही के लिए सुभाष चंद्र बोस को खोज रहे थे। खोज क्या रहे थे? जापान के सरेंडर के बाद उन पर टूट पड़ने के लिए तैयार थे। सुभाष ने अंग्रेजों को खूब ठकाया था। फिर उनके खिलाफ युद्ध भी छेड़ रखा था। अब मौका अंग्रेजों के हाथ लगा था। लेकिन उससे पहले ही ताईहोकू प्लेन क्रैश की खबर आ गई। लोगों ने कहा मृत्यु ने सुभाष को अंग्रेजों से बचा लिया। लेकिन अंग्रेजों का मानना था कि नेताजी एक बार फिर से अंडरग्राउंड हो चुके हैं। यही नहीं कांग्रेस के कई नेताओं को भी यही लग रहा था। नेताजी की मौत की खबर मिलने के बाद महात्मा गांधी ने उनके भाई को एक तार भेजा और कहा कि अभी श्राद्ध ना करें। लोगों ने इस संकेत को इस तरह समझा कि गांधी जी को पता है नेताजी खेल गए हैं। अंग्रेजों को चकमा देकर निकल गए हैं। उनकी मौत की खबर आजाद हिंद फौज के साथियों ने जानबूझकर उड़ाई है क्योंकि सुभाष ऐसा ही चाहते थे। लेकिन असल खेल अभी बाकी था। 29 अगस्त को नेहरू एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे थे। अचानक हंगामा मच गया। एक अमेरिकी पत्रकार अल्फ्रेड वैग ने दावा किया कि सुभाष चंद्र बोस अभी भी जिंदा हैं और उन्हें साइगॉन में देखा गया है। अल्फ्रेड वैग अमेरिकी सेना से जुड़े हुए थे और वह शिकागो ट्रिब्यून के लिए काम कर रहे थे। दुनिया भर के अखबारों ने अल्फ्रेड वैग के इस दावे को प्रमुखता से जगह दी। यूरोप और अमेरिकी अखबार जो पहले ही मानकर चल रहे थे कि प्लेन क्रैश में नेताजी की मौत नहीं हुई। उन्होंने पूछना शुरू किया कि सुभाष चंद्र बोस पर युद्ध अपराधी के तौर पर मुकदमा क्यों नहीं चलाया जाना चाहिए? इसी बीच 2 सितंबर को पुणे में एक अजीबोगरीब घटना घटी। अमृता बाजार पत्रिका में खबर छपी कि पुणे में जहां महात्मा गांधी ठहरे हुए थे, वहां कांग्रेस स्वयंसेवकों ने सुभाष चंद्र बोस को देखा। यह खबर जंगल में आग की तरह फैल गई। पुलिस ने पूरे घर को घेर लिया। मुस्कुराते हुए एक शख्स घर से बाहर निकला जो हूबहू सुभाष चंद्र बोस की तरह दिखता था। लेकिन यह सुभाष चंद्र बोस नहीं थे। यह उनके छोटे भाई शैलेश थे। जनता यह मानने को तैयार नहीं थी कि सुभाष चंद्र बोस की मौत हो चुकी है। 5 सितंबर 1945 को इलाहाबाद नगर पालिका में उनकी मौत पर लाए गए शोक प्रस्ताव को वापस ले लिया गया। 12 सितंबर को झांसी में नेहरू ने भी प्लेन क्रैश में मौत की थ्योरी पर अविश्वास जताया। जनवरी 1946 में गांधी ने सार्वजनिक तौर पर सुभाष की मौत की
थ्योरी को नकार दिया। अगले कुछ महीनों तक लगातार सुभाष चंद्र बोस को कभी इस शहर तो कभी उस शहर में देखे जाने की खबरें उड़ती रही। चीन और रूस में भी उन्हें देखे जाने का दावा किया जाता रहा। इन खबरों के बाद अमेरिका और ब्रिटेन की एजेंसियों ने जांच शुरू कर दी। यह जांच आधिकारिक और गुप्त दोनों तरीकों से की गई। आजाद हिंद फौज और जापानी अधिकारियों से पूछताछ शुरू हुई। सिंगापुर, बैंकॉक, ताईहोकू से लेकर टोक्यो तक उन सभी जगहों का दौरा किया गया जहां नेताजी अंतिम दिनों में गए थे। नेताजी जिन लोगों से मिले उनसे भी पूछताछ की गई। एडमिरल माउंटबेटन उन दिनों दक्षिणी पूर्व एशिया में मित्र देशों के सुप्रीम कमांडर हुआ करते थे जो बाद में भारत के अंतिम वॉइसरॉय भी बने। माउंटबेटन ने 30 अगस्त 1945 को जापान में मित्र देशों के सुप्रीम कमांडर जनरल मैक ऑर्थर को एक लेटर लिखा जिसमें उन्होंने सुभाष चंद्र बोस की मौत की जांच करने के लिए कहा। 19 सितंबर को जापानी सरकार ने मैक ऑर्थर को रिपोर्ट सौंपी। इस रिपोर्ट में कहा गया कि 18 अगस्त को एक हवाई दुर्घटना में सुभाष चंद्र बोस घायल हो गए थे और उसी शाम अस्पताल में उनकी मृत्यु हो गई। एक जांच ब्रिटिश इंडिया गवर्नमेंट ने भी कराई थी। दो पुलिस अधिकारी फिनी और डेविस बैंकॉक साइगोन और ताईहो गए। इस जांच में भी यही पता चला कि बोस की मृत्यु 18 अगस्त को हो गई थी। टोक्यो में तैनात ब्रिटिश सीक्रेट सर्विज के एक सीनियर अधिकारी कर्नल फिगेस ने भी सुभाष चंद्र बोस की मौत की जांच की। छह जापानी अधिकारियों से पूछताछ की गई। अस्पताल में मौजूद डॉक्टर से भी बात की गई। फिगेस ने भी अपनी रिपोर्ट में यही बताया कि 18 अगस्त 1945 की शाम नेताजी की मौत हो गई थी। ब्रिटिश अधिकारियों ने ताईहुकू अस्पताल के इंचार्ज और नेताजी का इलाज करने वाले कैप्टन डॉक्टर योशिशमी से भी पूछताछ की। अक्टूबर 1946 में उनकी गवाही दर्ज की गई। डॉक्टर योशिशमी ने पूरे घटनाक्रम को दोहराया। कहा कि ट्रांसलेटर नेताजी को जानता था और उसे जरा भी शक नहीं था कि यह सुभाष चंद्र बोस नहीं थे। उन्होंने बाद में यह भी कहा कि जापानी सैन्य अधिकारियों ने उनसे कहा था कि यह सुभाष चंद्र बोस हैं। किसी भी कीमत पर इनकी जान बचानी जरूरी है।
हालांकि वह ऐसा कर पाने में सफल नहीं रहे। एक जांच जापान ने भी की थी जिसकी रिपोर्ट 1956 में सांझा की गई। इसमें 13 गवाहों के बयान शामिल थे। जिसमें नेताजी के साथ प्लेन में सवार यात्री और ताईहोकू के अस्पताल में मौजूद लोग शामिल थे। इसमें कहा गया कि प्लेन गिरने के बाद पीछे बैठे लोग जहाज से निकल पाने में कामयाब रहे। लेकिन आगे बैठे लोगों पर जहाज का ईंधन गिरा और वह गंभीर रूप से झुलस गए। लेफ्टिनेंट जनरल शिदई और दो अन्य लोगों की मौके पर ही मौत हो गई। जबकि सुभाष चंद्र बोस आग की लपटों में घिरे हुए जहाज से उतरे। उनकी मौत अस्पताल में हुई। इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि सुभाष चंद्र बोस के अवशेष और उनका सामान टोक्यो में एसए अय्यर और श्री राम मूर्ति को सौंप दिया गया था। खुफिया और आधिकारिक हर तरह की जांच में यही सामने आ रहा था कि नेताजी की मौत 18 अगस्त 1945 को हो चुकी थी। लेकिन ना तो ब्रिटिश अधिकारी और भारत में लोग यह मानने को तैयार थे कि उनकी मौत हो चुकी है। क्योंकि हर जांच के दौरान कुछ ना कुछ ऐसी चीजें निकल कर सामने आ रही थी जो इस तरफ इशारा कर रही थी कि नेताजी कुछ और प्लान कर रहे हैं।
जैसे 17 अगस्त की सुबह बैंकॉक में उन्होंने अपने निजी स्टाफ को छोटे-छोटे तोहफे दिए थे और इस दौरान वह काफी भावुक थे। मानो इशारा कर रहे हो कि उनका प्लान कुछ और है। कुछ लोगों से पूछताछ के दौरान यह भी पता चला कि नेताजी ने जापान की हार की स्थिति में प्लान बी भी बना रखा था। एक पॉपुलर थ्योरी यह भी थी कि नेताजी टोक्यो की बजाय सोवियत रूस निकल गए क्योंकि जापान के सरेंडर के बाद उनकी आखिरी उम्मीद सोवियत ही था और पिछले एक साल से वह इसके लिए प्रयास कर रहे थे। इस थ्योरी को और बल इसलिए भी मिला क्योंकि जिस प्लेन से सुभाष जा रहे थे उसी प्लेन में लेफ्टिनेंट जनरल शिदई भी सवार थे। जनरल शिदई को मंचूरिया में जापानी सेना का कमांड लेना था और मंचूरिया ही वो सबसे नजदीकी जगह थी जहां से रूस में एंट्री ली जा सकती थी जहां सोवियत की सेना ने जापान के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। शिदेई क