उस रात मैनचेस्टर के एक बड़े हॉस्पिटल के में जो हुआ उसने एक ऐसी औरत की जिंदगी बदल दी जो मौत को सिर्फ दी एंड समझती थी। एक ऐसी नर्स जो पूरी जिंदगी खुदा का मजाक उड़ाती रही जिसके लिए मजहब सिर्फ लोगों का वहम था। लेकिन फिर एक मुस्लिम फैमिली ने उसे ऐसा सबक दिया जिसने उसके दिल की दुनिया हिला कर रख दी। और फिर वही ब्रिटिश नर्स जिसे इस्लाम से कोई मतलब नहीं था।
एक दिन खुद कलमा पढ़कर मुसलमान बन गए। लेकिन सवाल यह है आखिर उस रात आईसीयू में ऐसा क्या हुआ था? क्या उसने कोई मौजजा देखा? क्या [संगीत] उसने मौत के बाद की कोई सच्चाई महसूस की? या फिर उसने मुसलमानों के अंदर वह चीज देखी जो आज दुनिया खो चुकी है। वीडियो को आखिर तक जरूर देखिएगा क्योंकि यह सिर्फ एक कहानी नहीं बल्कि ईमान, मौत और आखिरत की ऐसी हकीकत है जो शायद आपके दिल को भी बदल दे।
और अगर आप भी अल्लाह पर ईमान रखते हैं तो कमेंट में जरूर लिखिए। अल्हम्दुलिल्लाह। मेरा नाम सारा मिशेल था। मैं मैनचेस्टर के सेंट अनीता हॉस्पिटल में आईसीयू नर्स थी। 8 साल तक मैंने लोगों को मरते हुए देखा। किसी का दिल अचानक बंद हो जाता।
किसी की सांस मशीनों तक अटक जाती। किसी की फैमिली आईसीयू के बाहर टूट कर रो पड़ती और मैं मैं बस खड़ी रहती। चेहरे पर कोई एहसास नहीं क्योंकि यही मेरा काम था। धीरे-धीरे मौत मेरे लिए एक रोजमर्रा की चीज बन गई थी। मैं एथस्ट थी। मुझे लगता था इंसान सिर्फ एक बायोलॉजिकल मशीन है। दिल बंद, दिमाग खत्म और कहानी खत्म। मेरे लिए जन्नत, जहन्नुम यह सब सिर्फ इंसानों को तसल्ली देने वाली बातें थी। लेकिन नवंबर की एक सर्द रात मेरी सारी सोच बदलने वाली थी।
रात के करीब 11:00 बजे थे। मैं नाइट शिफ्ट में थी। थकी हुई हाथ में खराब कॉफी और बस यह दुआ कर रही थी कि आज रात कोई बड़ा केस ना आए। तभी अचानक इमरजेंसी कॉल आया। एक 60 साल का आदमी जिसे एंबुलेंस में दो बार घोषित किया जा चुका था। लेकिन पैरामेडिक्स उसे वापस ले आए थे। मैं तुरंत रूम तैयार करने लगी। मशीनंस, ऑक्सीजन, मॉनिटर यह सब मेरे लिए नया नहीं था। जब उस आदमी को अंदर लाया गया, तो उसकी हालत देखकर मुझे समझ आ गया था। वो शायद रात नहीं निकाल पाएगा। उसका नाम थाअहमद हसन।
चेहरा बिल्कुल पीला। सांस मशीन पर, हार्ट बीट बहुत वीक। मैंने ट्रीटमेंट शुरू किया और फिर इंतजार करने लगी। करीब 1 घंटे बाद उसकी फैमिली हॉस्पिटल पहुंची। अब तक मैंने सैकड़ों फैमिलीज देखी थी। आमतौर पर लोग में आते ही टूट जाते हैं। चीखना, रोना, डॉक्टरों से लड़ना। लेकिन अहमद की फैमिली अलग थी। बहुत अलग। उनकी बीवी सबसे पहले अंदर आई। नाम था फातिमा सर पर हिजाब, चेहरे पर सुकून। वह में ऐसे चल रही थी जैसे दिल के अंदर तूफान नहीं बल्कि कोई अजीब सा इत्मीनान हो। उन्होंने अपने शौहर का हाथ पकड़ा।
धीरे से अरबी में कुछ पढ़ा और फिर मेरी तरफ देखकर मुस्कुरा दी। मैं अंदर से हिल गई। उनका शौहर से लड़ रहा था। लेकिन उनके चेहरे पर नहीं था। उन्होंने मुझसे कहा, थैंक यू फॉर टेकिंग केयर ऑफ हिम। मैंने हमेशा की तरह जवाब दिया। वी आर डूइंग एवरीथिंग वी कैन। उन्होंने हल्के से सिर हिलाया और कहा जो होगा अल्लाह की मर्जी से होगा।
मैंने यह जुमला पहले भी बहुत बार सुना था। लेकिन उस रात इन अल्फाज़ में कुछ अलग था। वो अल्लाह से सौदा नहीं कर रही थी। वह डर नहीं रही थी। बल्कि वो अल्लाह के फैसले पर राजी थी। धीरे-धीरे पूरी फैमिली आ गई। बेटे बेटियां सब अहमद साहब के पास बैठ गए। कोई जोर-जोर से नहीं रो रहा था। कोई शिकायत नहीं कर रहा था। बल्कि वह लोग दुआ कर रहे थे। और सबसे हैरान करने वाली बात यह थी इतने दर्द के बावजूद उनके अंदर सुकून था। एक वक्त ऐसा भी आया जब मैंने उन्हें अपने वालिद की पुरानी बातों पर हल्का सा हंसते हुए देखा। मैं सोच में पड़ गई। यह लोग टूट क्यों नहीं रहे?
रात के करीब 2:00 बजे अहमद साहब की हालत अचानक बहुत खराब हो गई। मशीनंस अलार्म देने लगी। मैं वेटिंग रूम में आई और फैमिली से कहा अब आप लोग उनके पास जा सकते हैं। मैंने सोचा अब शायद सब रो पड़ेंगे लेकिनऐसा नहीं हुआ। वो सब चुपचाप उनके कमरे में आए और उनके चारों तरफ खड़े होकर दुआ पढ़ने लगे।
अरबी में धीमी आवाजें के उस ठंडे कमरे में गूंज रही थी और मैं एक कोने में खड़ी उन्हें देख रही थी। 8 साल में मैंने पहली बार मौत को इस तरह देखा। बाकी लोग मौत से लड़ते हैं। लेकिन यह लोग अहमद साहब को प्यार से रुखसत कर रहे थे। जैसे कोई मुसाफिर सफर पर जा रहा हो।
फिर रात 2:47 पर मॉनिटर की लाइन सीधी हो गई। अहमद साहब इस दुनिया से चले गए। कमरे में खामोशी छा गई। फैमिली ने आखिरी दुआ पढ़ी। एक-एक करके उनका माथा चूमा और आखिर में फातिमा मेरे पास आई। उनकी आंखों में आंसू थे। लेकिन वो आंसू मायूसी के नहीं थे। उन्होंने कहा आपने उनका बहुत ख्याल रखा। मैंने कहा आई एम सॉरी फॉर योर लॉस।
उन्होंने मुस्कुरा कर जवाब दिया। सॉरी मत कहिए। उन्होंनेअच्छी जिंदगी गुजारी और इंशाल्लाह अब वह बेहतर जगह पर हैं। पता नहीं क्यों लेकिन उस रात मैं खुद को रोक नहीं पाई। मैंने उनसे पूछा क्या आप सच में यह मानती हैं? उन्होंने कहा हां खत्म होना नहीं है।
बस एक दरवाजा है। हम उनसे फिर मिलेंगे। उनकी बात सुनकर मेरे पास कोई जवाब नहीं था। क्योंकि पहली बार मैंने किसी इंसान को मौत के सामने इतना मजबूत देखा था। उस रात के बाद कुछ बदलने लगा। मैं घर जाती लेकिन फातिमा का चेहरा फूल नहीं पाती। आखिर वो सुकून आता कहां से है? कुछ हफ्तों बाद एक और मुस्लिम लड़की आईसीयू में लाई गई। नाम था आयशा। भयानक कार एक्सीडेंट। हालत बेहद क्रिटिकल। लेकिन उसकी फैमिली भी बिल्कुल वैसी ही थी। डर था, आंसू थे। लेकिन अल्लाह पर भरोसा उससे भी बड़ा था। आयशा की मां ने मुझसे कहा अगर वो बच गई तो अल्हम्दुलिल्लाह अगर नहीं बची तो इंशाल्लाह जन्नत में होगी।
मैंने पूछा आप इतनी काम कैसे रह सकती हैं? उन्होंने जवाब दिया क्योंकि अल्लाह वही जानता है जो हम नहीं जानते। उस दिन के बाद मैंने पहली बार इस्लाम को समझने की कोशिश की। मैं रात-रात भर कुरान के बारे में पढ़ती, आखिरत के बारे में पढ़ती, नमाज, सब्र, तवकक्कुल और धीरे-धीरे मेरे दिल में एक सवाल पैदा होने लगा। क्या सच में मौत सब कुछ खत्म नहीं करती? क्या सच में इस दुनिया के बाद भी कुछ है? 3 महीने बाद एक मौजजा हुआ। डॉक्टर्स ने उम्मीद छोड़ दी थी। लेकिन आयशा बच गई। जब वो होश में आए तो उसकी मां रोते हुए मेरे गले लग गई और बोली देखा अल्लाह जो चाहता है वही होता है और उसी पल मेरे दिल के अंदर कुछ टूट गया या शायद कुछ पैदा हुआ। मैंने पहली बार सजदा किया। पहली बार मैंने अल्लाह को पुकारा और कुछ महीनों बाद मैंने कलमा पढ़ लिया।
आज मैं वही सारा मिशेल हूं। लेकिन अब मैं सिर्फ नर्स नहीं बल्कि एक मुसलमान हूं। मैंने में हजारों लोगों को मरते देखा। लेकिन मुसलमानों ने मुझे सिखाया कि खत्म होना नहीं बल्कि असल जिंदगी की शुरुआत है।