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अली खामिनई की ईरान से इराक तक 3000 KM का जनाज़ा क्यों?

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क्या कोई जनाजा 10 या 20 किलोमीटर नहीं बल्कि करीब 3000 किलोमीटर चल सकता है? क्या किसी अंतिम यात्रा को सिर्फ एक धार्मिक रस्म नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए राजनीतिक और कूटनीतिक शक्ति प्रदर्शन में बदला जा सकता है? ईरान में इन दिनों कुछ ऐसा ही होने जा रहा है।

ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर एयातुल्लाह अली खामिनई की मौत के 4 महीने बाद अब उनके [संगीत] अंतिम सफर की तैयारियां अंतिम दौर में हैं। रिपोर्टों के मुताबिक 4 जुलाई से 9 जुलाई 2026 के बीच उनका जनाजा कई शहरों और दो देशों से होकर गुजरेगा। ईरानी प्रशासन ने इस पूरे कार्यक्रम को नाम दिया है द सेंड ऑफ टू ईरान लीडर्स ऑफ मार्टियर्स यानी शहीदों के रहनुमा की विदाई। यह सिर्फ एक अंतिम संस्कार नहीं होगा। इसे ईरान की अपनी धार्मिक पहचान, राजनीतिक ताकत और क्षेत्रीय प्रभाव दिखाने के सबसे बड़े आयोजनों में से एक बनाना चाहता है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है आखिर इस जनाजे में ऐसा क्या खास होने वाला है जिसकी चर्चा पूरी दुनिया में हो रही है।

सबसे पहले इसकी टाइमलाइन समझिए। 3 जुलाई को तेहरान के इमाम खुमैनी ग्रैंड मुसल्ला में कार्यक्रम की शुरुआत होगी। इस दिन विदेशी मेहमानों, राजनिकों और दुनिया भर से आने वाले मजहबी नेताओं के लिए विशेष श्रद्धांजलि सभा आयोजित की जाएगी। इसके बाद 4 और 5 जुलाई को आम लोगों को खामने के अंतिम दर्शन का मौका दिया जाएगा। ईरानी मीडिया का दावा है कि इन दो दिनों में लाखों लोग तेहरान पहुंच सकते हैं। 6 जुलाई इस पूरे कार्यक्रम का सबसे बड़ा दिन होगा। तेहरान में इमाम हुसैन स्क्वायर से आजादी स्क्वायर तक लगभग 10 किलोमीटर लंबा मातमी जुलूस निकलेगा। ईरान को उम्मीद है कि इसमें लाखों नहीं बल्कि करोड़ों लोग शामिल हो सकते हैं। अगर ऐसा होता है तो यह 1989 में अयातुल्लाह रहहुल्लाह खुमैनी के अंतिम संस्कार में जुटी भीड़ का रिकॉर्ड भी पीछे छोड़ सकता है।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। 7 जुलाई को जनाजा तेहरान से ईरान के धार्मिक शहर कौम पहुंचेगा। कौम सिर्फ एक शहर नहीं है। इसे शिया इस्लाम की धार्मिक राजधानी माना जाता है। दुनिया भर से हजारों छात्र यहां इस्लामी शिक्षा लेने आते हैं। ईरान के बड़े-बड़े धार्मिक नेता भी यहीं से जुड़े रहे हैं। इसलिए खामने के जनाजे का कौम पहुंचना एक मजबूत धार्मिक संदेश माना जा रहा है। इसके बाद आता है इस पूरे कार्यक्रम का सबसे अनोखा और सबसे चर्चित हिस्सा। 8 जुलाई को पहली बार ईरान के किसी सुप्रीम लीडर का जनाजा देश की सीमा पार करके इराक ले जाया जाएगा। सवाल है आखिर क्यों? इसका जवाब शिया इस्लाम की आस्था में छिपा है। इराक का नफस शहर हजरत अली की मजार की वजह से शिया मुसलमानों के लिए सबसे पवित्र स्थानों में से एक है। वहीं कर्बला वह जगह है जहां इमाम हुसैन ने शहादत दी थी। शिया समाज में कर्बला सिर्फ इतिहास नहीं बल्कि अन्याय के खिलाफ संघर्ष, कुर्बानी और सब्र का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है। इसी वजह से खामने के जनाजे को पहले नफज़ और फिर कर्बला ले जाने की योजना बनाई गई है।

ईरान [संगीत] इससे यह संदेश देना चाहता है कि उसके सर्वोच्च नेता को शिया इतिहास की उसी शहादत परंपरा से जोड़ा जाए जिसका सबसे बड़ा प्रतीक इमाम हुसैन है। इसके बाद 9 जुलाई को अंतिम चरण शुरू होगा। इराक से लौटने के बाद जनाजा मशहद ले जाया जाएगा। मशहद खामने का जन्म स्थान भी माना जाता है और यहां इमाम रजा की दरगाह है जो शिया मुसलमानों के सबसे महत्वपूर्ण तीर्थ स्थलों में गिनी जाती है। रिपोर्ट के मुताबिक खामने की वसीयत के अनुसार यहीं उन्हें सुपुर्दे खाक किया जाएगा। अब सवाल है कि इस पूरे कार्यक्रम को मुहर्रम के दौरान ही क्यों रखा गया? मुहर्रम शिया मुसलमानों के लिए गम मातम और इमाम हुसैन की शहादत [संगीत] को याद करने का महीना होता है। इसी दौरान होने वाला यह आयोजन सिर्फ धार्मिक नहीं बल्कि भावनात्मक रूप से भी बेहद प्रभावशाली माना जा रहा है। ईरान के कई आधिकारिक पोस्टरों पर एक नारा भी दिखाई दे रहा है। हमें उठना ही होगा। इस नारे को कई विश्लेषक सिर्फ श्रद्धांजलि नहीं बल्कि एक राजनीतिक संदेश भी मान रहे हैं। उनका कहना है कि ईरान अपने लोगों को यह बताना चाहता है कि सुप्रीम लीडर की मौत के बाद भी व्यवस्था कमजोर नहीं हुई है और देश उसी विचारधारा के साथ आगे बढ़ेगा। यही वजह है कि दुनिया के कूटनीतिक हलकों की नजर भी इस पूरे कार्यक्रम पर टिकी हुई है। ईरान की नेशनल फ्यूनरल कमेटी का दावा है

कि 30 से ज्यादा देशों के वरिष्ठ अधिकारी और करीब 90 देशों के धार्मिक प्रतिनिधि [संगीत] इस कार्यक्रम में हिस्सा लेने की इच्छा जता चुके हैं। अगर इतनी बड़ी अंतरराष्ट्रीय मौजूदगी होती है तो ईरान इसे अपने वैश्विक प्रभाव और कूटनीतिक समर्थन के प्रदर्शन के तौर पर पेश करेगा। इसके साथ ही इराक को इस अंतिम यात्रा का हिस्सा बनाना भी सिर्फ धार्मिक फैसला नहीं माना जा रहा। विश्लेषकों का मानना है कि यह ईरान और इराक के बीच शिया नेटवर्क और क्षेत्रीय रिश्तों की सार्वजनिक ताकत दिखाने की कोशिश भी है। यानी यह संदेश कि दोनों देशों के बीच सिर्फ पड़ोसी होने का रिश्ता नहीं है बल्कि साझा धार्मिक और सामाजिक विरासत भी है। यानी तेहरान, कौम, नफज, कर्बला और फिर मशहद। करीब 3000 कि.मी. की यह यात्रा सिर्फ एक जनाजा नहीं होगी। यह एक ऐसा आयोजन होगा जिसमें आस्था भी होगी, राजनीति भी होगी, कूटनीति भी होगी और पूरी दुनिया के लिए एक स्पष्ट संदेश भी। अब दुनिया की नजर इस बात पर रहेगी कि क्या ईरान इस आयोजन को वैसा ही ऐतिहासिक बना पाता है जैसा वह दावा कर रहा है क्योंकि यह सिर्फ अपने पूर्व सुप्रीम लीडर की विदाई नहीं बल्कि मध्य पूर्व की बदलती राजनीति के बीच ईरान की ताकत उसके प्रभाव और उसके संदेश की भी एक बड़ी परीक्षा होगी। लोकमत हिंदी की इस रिपोर्ट में इतना ही। [संगीत] देश दुनिया की तमाम खबरों को देखने के लिए जुड़े रह हमारे साथ। धन्यवाद।

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