क्या आपने कभी सोचा है कि दुनिया की सबसे मुकद्दस इमारत खाना-ए-काबा की चाबी आखिर किसके पास होती है? और उससे भी बड़ा सवाल आखिर 1400 साल से यह चाबी एक ही खानदान के पास क्यों है? ऐसी क्या अमानत है जिसे ना बादशाह छीन सके, ना सल्तनतें बदलने से बदली और ना ही वक्त की गर्द इसे मिटा सकी।
काबा की उस चाबी की दिल छू लेने वाली दास्तान जिसे खुद रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो अलैह वसल्लम ने एक खानदान के हवाले किया और फरमाया कि कयामत तक इसे उनसे कोई नहीं छीनेगा।
जब हजरत इब्राहिम अल सलाम और उनके बेटे हजरत इस्माइल अल सलाम ने अल्लाह के हुक्म से खाना काबा की तामीर की तो उसकी निगेबानी और चाबी की जिम्मेदारी भी हजरत इस्माइल अल सलाम को सौंपी गई। इसके बाद यह अमानत कई कबीलों और लोगों के पास आती रही। पहले बनी इस्माइल फिर जुरहम कबीला फिर खुजा और उसके बाद कुरैश के सरदार हुसै बिन कलाब के पास वक्त गुजरता गया और आखिरकार यह चाबी उस्मान बिन तल्हा के पास पहुंची।
साल था 8 हिजरी जब रसूल अल्लाह फतेह मक्का के बाद खाना-ए-काबा के सामने पहुंचे। लेकिन काबा का दरवाजा बंद था। उस्मान बिन तल्हा जो उस वक्त तक मुसलमान नहीं हुए थे। चाबी लेकर छिप गए थे। रसूल अल्लाह ने हजरत रजिला अनू को चाबी लाने के लिए भेजा। हजरत अली ने चाबी हासिल की। दरवाजा खोला और नबी-ए करीम खाना-ए काबा के अंदर दाखिल हुए। अंदर आपने दो रकात नमाज अदा की। इसी दौरान रसूल अल्लाह ने चाचा हजरत अब्बास रजिलाहु अनो ने अर्ज किया या रसूल अल्लाह अगर काबा की चाबी हमें दे दी जाए तो हमें हाजियों को पानी पिलाने के साथ-साथ काबा की निगेबानी का भी शरफ हासिल हो जाएगा।
यह एक अहम लम्हा था। हर किसी को लग रहा था कि अब चाबी हमेशा के लिए बदल जाएगी। लेकिन अल्लाह ताला का फैसला कुछ और ही था। उसी वक्त कुरान की सूर अनसा की आयत 58 नाजिल हुई। बेशक अल्लाह तुम्हें हुक्म देता है कि अमानतें उनके हकदारों को लौटा दो। रसूल अल्लाह ने फौरन इस हुक्म को समझ लिया। आपने हजरत अली रज़्लाहु अनो से फरमाया कि चाबी वापस उस्मान बिन तल्हा को दी जाए। जब हजरत अली रज्लाहु अन्हा चाबी लेकर वापस पहुंचे तो उन्होंने उस्मान बिन तल्हा से माफी भी मांगी कि चाबी लेते वक्त सख्ती करनी पड़ी। उस्मान बिन तल्हा हैरान रह गए। उन्होंने पूछा जब मक्का अब आपके कब्जे में है तो फिर चाबी मुझे क्यों लौटा रहे हैं? जब उन्हें बताया गया कि यह अल्लाह का हुक्म है। तो उनका दिल पिघल गया। यही वो लम्हा था जब उस्मान बिन तल्हा ने इस्लाम कुबूल कर लिया। फिर रसूल अल्लाह ने उनसे एक ऐसी बात फरमाई जो आज भी पूरी दुनिया के लिए एक जिंदा मौजजा है। आपने फरमाया यह चाबी हमेशा तुम्हारे खानदान में रहेगी।
और इसे तुमसे सिर्फ जालिम इंसान ही छीनने की कोशिश करेगा। उस दिन के बाद उस्मान बिन तल्हा के इंतकाल के बाद उनके रिश्तेदार बनी शबा के पास यह जिम्मेदारी आई और हैरत की बात यह है करीब 1400 साल गुजर चुके हैं। सल्तनतें बदली, बादशाह बदले, हुकूमतें बदली। लेकिन काबा की चाबी आज भी उसी खानदान के पास महफूज़ है। आज इस खानदान को बनी शैबा या शैबी खानदान के नाम से जाना जाता है। और वहीं खाना-ए काबा के दरवाजे की निगबानी की सदियों पुरानी जिम्मेदारी निभा रहे हैं।
दिलचस्प बात यह भी है कि काबे का ताला और चाबी वक्तव पर बदले जाते रहे हैं। अलग-अलग दौर के हुक्मरानों ने नई चाबियां बनवाई। लेकिन चाबी की असली अमानत हमेशा उसी खानदान के पास रही। आज भी काबा की चाबी एक खास कढ़ाईदार थैली में महफूज़ रखी जाती है। जिस पर वही कुरानी आयत लिखी होती है। अल्लाह तुम्हें हुक्म देता है कि अमानतें उनके हकदारों को लौटा दो। यह सिर्फ एक चाबी की कहानी नहीं। यह अमानत, इंसाफ, वफादारी और अल्लाह के वादे की कहानी है। एक ऐसा पैगाम जो हमें सिखाता है कि जब कोई अमानत किसी के हवाले की जाए तो उसे उसी के हकदार तक पहुंचाना ही असली ईमानदारी है।