दिसंबर 2024 की वो सर्द रात जब इंटरनेट की दुनिया थम सी गई थी। YouTube पर लाखों लोग एक लाइव स्ट्रीम के साथ जुड़े थे। स्क्रीन पर 29 साल की परस्तु अहमदी थी जिसकी आवाज में देश के युवाओं का दर्द और जज्बा साफ झलकता था।
वो गा रही थी ईरान का सबसे मशहूर देशभक्ति गीत अजून जवनाने वतन यानी मातृभूमि के युवाओं के लहू से रचित गीत। लेकिन उस रात परस्तु के संगीत से ज्यादा चर्चा उनके लिबास की हुई। उन्होंने सिर पर हिजाब नहीं पहना था और स्लीवलेस ड्रेस में थी।
यह कोई मामूली परफॉर्मेंस नहीं थी। यह एक ऐसा स्वर था जो ईरान की बंदिशों को चुनौती दे रहा था। पर किसी को अंदाजा नहीं था कि इस कलाकारी की कीमत उन्हें 74 करोड़ों की दर्दनाक सजा के रूप में चुकानी पड़ेगी। कैसे गाने ने ईरान की न्यायपालिका को हिला दिया और क्यों यह मामला दुनिया भर में बहस [संगीत] का विषय बना हुआ है।
ईरानी अदालत के फैसले ने पूरी दुनिया को स्तब्ध कर दिया है। परस्तु अहमदी को 74 कोड़े मारने की सजा सुनाई गई हैकेवल इतना ही नहीं उन पर 2 साल तक देश छोड़ने पर रोक लगा दी गई है और भविष्य में किसी भी तरह की कलात्मक गतिविधि करने पर भी पाबंदी है। यह सजा कोम प्रांत की एक अदालत ने सुनाई है। अदालत का तर्क है कि परस्तु ने और कंटेंट बनाकर सार्वजनिक शालीनता का अपमान किया है। उनके साथ उस प्रोडक्शन टीमlके आठ अन्य म्यूजिशियनों को भी दोषी करार दिया है जिन्होंने इस परफॉर्मेंस को मुमकिन बनाया था। परस्तु अहमदी ने करीब 27 मिनट का एक वीडियो साझा किया था। इस वीडियो में वे चार पुरुष संगीतकारों के साथताल से ताल मिलाते हुए दिख रही थी। वीडियो के कैप्शन में उन्होंने इसे काल्पनिक कॉन्सर्ट का नाम दिया था। लेकिन यह काल्पनिक सा लगने वाला कॉन्सर्ट हकीकत में ईरान के कानूनों के खिलाफ एक बड़ा कदम बन गया। YouTube पर इसे 24 घंटे के अंदर 20 लाख से ज्यादा लोगों ने देखा।
यह वीडियो वायरल होते ही ईरानी सुरक्षा एजेंसियों ने परस्तु और उनके सहयोगियों को हिरासत में ले लिया। हालांकि बाद में उन्हें रिहा किया गया लेकिन यह कानूनी कारवाई की महज शुरुआत थी। इस फैसले के खिलाफ दुनिया भर में आवाज उठ रही है। अमेरिका स्थित सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स इन ईरान की एडवोकेसी डायरेक्टर बहार गंधहारी ने इस परतीखी प्रतिक्रिया दी है।
उनका कहना है कि यह सजा साफ दर्शाती है कि ईरान में मानव अधिकार की स्थितिजस की तस बनी हुई है। उन्होंने कहा कि अधिकारी चाहे छवि सुधारने के लिए कितने भी प्रोपोगेंडा चला ले हकीकत आज भी वही है। वहीं मानवाधिकार वकील मोइन खलेजी ने कानूनी आधार को ही चुनौती दी है।
उनका कहना है कि ईरानी आपराधिक कानून में महिलाओं के गाने या संगीत बनानेको अपराध की श्रेणी में नहीं रखा गया है। फिर किस आधार पर इसे माना जा रहा है? यह ना केवल तार्किक रूप से कमजोर है बल्कि अभिव्यक्ति की आजादी का गला वाला कदम है। ईरान में महिलाओं के लिए हिजाब का नियम 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद से अनिवार्य है।
लेकिन यह मुद्दा केवल कपड़ों का नहीं है। यह अधिकार का है। 22 में 22 साल की महसा अमीनी की मौत के बाद ईरान में जो हिजाब विरोधी प्रदर्शन हुए उन्होंने इस चिंगारी को आग में बदल दिया था। परंतु अहमदी उसी दौर से सक्रिय रही हैं। उन पर हिजाब विरोधी प्रदर्शनों के समर्थन में गाना गाने के आरोप भी लगते रहे हैं। ईरान में महिलाओं का सार्वजनिक जगहों पर अकेले गाना गाना या बिना हिजाब के दिखना कानूनन जुर्म माना जाता है। इतिहास गवाह है कि ईरान में महिलाओं के अधिकारों का यह संघर्ष 1936 से चला आ रहा है। जब राजा शाह ने कश पे हिजाब लागू किया। इसे अनिवार्य किया था। जिसे बाद में शाह रजा के बेटे ने वापस लिया था।
आज परस्तु का मामला इसी पुरानी लड़ाई का एक आधुनिक और बेहद दर्दनाक अध्याय है। परस्तु का मामला केवल एक सिंगर की सजा नहीं है बल्कि यह उन हजारों महिलाओं की आवाज है जो ईरान की चार दीवारी के भीतर अपने हक के लिए लड़ रही है। इस परफॉर्मेंस को कई लोग महिलाओं के सशक्तिकरण और अभिव्यक्ति की आजादी का प्रतीक मान रहे हैं। अभिनेत्री सितारे मलिकी ने भी परस्तु के इस साहस की सराहना की है और कहा है कि उनके वीडियो ने लोगों के भीतर विरोध का जज्बा फिर से जगा दिया है।
तो यह थी ईरान की उस बहादुर सिंगर परस्तु अहमदी की पूरी कहानी जिसने अपनी कला के जरिए अपनी आवाज बुलंद की और बदले में उन्हें 74 कोड़ों की सजा मिली।