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इंदिरा गांधी ने अपनी बहु मेनका को आधी रात घर से क्यों निकाला दिया?

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क्या एक ज़िद ने गांधी परिवार को दो हिस्सों में बांट दिया? क्यों आधी रात को देश के सबसे ताकतवर घर के दरवाजे अपनी बहू के लिए बंद कर दिए गए? आखिर क्या हुआ था उस रात जब देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपनी बहू से कहा कि अभी के अभी इस घर से बाहर निकल जाओ। यह कहानी सिर्फ घर के झगड़े की नहीं है बल्कि उस सत्ता संघर्ष की है जिसने भारतीय राजनीति की दशादिशा बदल दी। प्रधानमंत्री आवास के भीतर हुई यह टकराहट रिश्तों, अधिकार और भविष्य की राजनीति से जुड़ी थी। उस एक रात में एक मां अपने पोते से दूर हो गई। एक युवा बहू अपने ससुराल से अलग कर दी गई और एक परिवार की एकता हमेशा हमेशा के लिए टूट गई। यह वो पल था जब ममता, रिश्ते और भावनाएं, सत्ता, अनुशासन और राजनीतिक फैसलों के सामने आ गए। जो दरवाजा उस रात बंद हुआ वह सिर्फ एक घर का नहीं था बल्कि गांधी परिवार के साझा भविष्य और भरोसे का था। जिसकी गूंज आज भी भारतीय राजनीति में सुनाई पड़ती है। जून 1980 में जब विमान हादसे में संजय गांधी की अचानक मौत हुई तो इंदिरा गांधी टूट गई थी। संजय गांधी सिर्फ उनके बेटे नहीं थे बल्कि सरकार और पार्टी के सबसे शक्तिशाली स्तंभ थे। उनकी मौत के बाद एक ऐसा खालीपन हुआ जिसे भरने के लिए घर के भीतर दो अलग-अलग विचारधाराएं टकराने लगी।

एक तरफ में इंदिरा गांधी जिनकी उम्र उस वक्त केवल 23 साल की थी। युवा होने के बावजूद वह पॉलिटिक्स की गहरी समझ रखती थी। उन्हें पूरा यकीन था कि संजय की पॉलिटिकल विरासत पर सिर्फ और सिर्फ उनका हक है। वो चाहती थी कि संजय के वफादार नेता उन्हें अपना मार्गदर्शक माने और प्रधानमंत्री आवास से अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करें। उन्हें लगता था कि संजय की मेहनत से तैयार की गई युवा कांग्रेस और उनकी टीम पर उनका नैतिक अधिकार है। दूसरी तरफ इंदिरा गांधी जो एक अनुभवी राजनेता के तौर पर भविष्य की विसाद बिछा रही थी। उन्होंने मन बना लिया था कि संजय की जगह बड़े बेटे राजीव गांधी लेंगे जो उस समय तक पॉलिटिक्स को पसंद नहीं करते थे। एक पायलट की शान जिंदगी जी रहे थे। घर के भीतर एक युद्ध की शुरुआत हुई थी। सोनिया गांधी धीरे-धीरे इंदिरा के निजी जीवन और घर के कामकाज पर हाथ बटा रही थी। जिससे वह इंदिरा गांधी के करीब आ रही थी और वहीं दूसरी तरफ मेनका गांधी को हर महत्वपूर्ण फैसले से दूर रखा जा रहा था। उन्हें महसूस हो रहा था कि जानबूझकर साइडलाइन किया जा रहा है और यहीं से सदर जंग रोड के उस अलीशान बंगले में कड़वाहट की नीव पड़ी। धीरे-धीरे नाश्ते की मेज पर बातचीत बंद हुई और घर के भीतर ये गुटबाजी दिखाई पड़ने लगी। यह रिश्तों की कड़वाहट एक दिन खुली बगावत में तब बदली जब 1982 में लखनऊ में संजय विचार मंच की एक विशाल सभा बुलाई गई। यह वो समय था जब इंदिरा गांधी ब्रिटेन में आधिकारिक दौरे पर थी। जाने से पहले मेनका गांधी को स्पष्ट और कड़े शब्दों में चेतावनी दी थी कि इस सभा का हिस्सा ना बने। इंदिरा को खुफिया सूत्रों से जानकारी मिली थी कि यह सभा दरअसल राजीव गांधी के बढ़ते राजनीतिक कत के खिलाफ संजय के पुराने करीबियों का एक शक्ति प्रदर्शन है। इंदिरा गांधी इसे ना सिर्फ अनुशासन हीनता बल्कि अपनी सत्ता और अपने चुने हुए उत्तराधिकारी राजीव को दी गई एक सीधी चुनौती मानी थी।

उन्हें लग रहा था कि मेनका उनके ही घर में रहकर उनके खिलाफ मोर्चा खोल रही है। लेकिन मेनका गांधी ने अपनी सास और देश के प्रधानमंत्री की उस हिदायत को मानने से इंकार कर दिया। उन्होंने इसे अपने अस्तित्व और स्वाभिमान की लड़ाई के तौर पर देखा। लखनऊ पहुंची। वहां ना सिर्फ एक मंच साझा किया बल्कि एक ऐसा आक्रमण भाषण दिया जिसने दिल्ली की राजनीति में तूफान। मेनका ने खुद को संजय गांधी के असली उत्तराधिकारी के तौर पर पेश किया। उनके अधूरे सपनों को पूरा करने का संकल्प लिया। जब इंदिरा गांधी लंदन से लौटी तो उनके पास उस सभा की एक-ए मिनट की रिपोर्ट और भाषण की रिकॉर्डिंग थी। उनके लिए अब यह घर का साधारण मामला नहीं था। एक खुली राजनीतिक गद्दारी थी। यह मन बनाया कि अब समझौता मुमकिन नहीं है। मेनका के साथ एक छत के नीचे रहना अब उनके लिए असंभव हो गया था। 28 मार्च साल 1982 की वो तारीख भारतीय इतिहास के सबसे नाटकीय पन्नों में से एक बनने वाली थी। सफदर जंग रोड स्थित प्रधानमंत्री आवास पर उस दिन का सूरज भारी तनाव के साथ उगा। इंदिरा गांधी के गुस्से का ज्वालामुखी फटने को तैयार था। सुबह ही स्टाफ को निर्देश दिया कि मेनका गांधी को दोपहर [संगीत] खाने पर परिवार के बाकी सदस्यों के साथ नहीं बैठने दिया जाएगा। उन्हें उनके कमरे में खाना भेजने का आदेश दिया गया। जो किसी भी बहू के लिए एक अपमानजनक संदेश था। यह इंदिरा की तरफ से आखिरी चेतावनी थी कि मेनका को परिवार का हिस्सा नहीं माना जा रहा। शाम होते-होते [संगीत] तनाव एक बड़े विस्फोट में बदल गया। घर के शांत गलियारों में चीखने चिल्लाने की आवाजें गूंजने लगी। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार इंदिरा गांधी गुस्से से अपने कमरे से बाहर आए। नंगे पांव थी। उनकी आंखों में आक्रोश था। मेनका की तरफ उंगली उठाकर जोर से कहा, फौरन इस घर से निकल जाओ। तुमने मेरी बात नहीं मानी। तुमने मुझे चुनौती दी। मेरे ही घर में रहकर मेरे खिलाफ साजिश रची। जब मेनका ने पलट कर जवाब दिया कि यह उनके पति का घर है। यहां उन्हें रहने का हक है। तो इंदिरा ने वो शब्द कहे जो इतिहास बदल चुके हैं। कहा यह तुम्हारा घर नहीं है। यह भारत के प्रधानमंत्री का निवास है। तुम अभी इसी वक्त यहां से निकल जाओ। अपनी मां के घर जाओ। वहां मौजूद सुरक्षाकर्मी नौकर खामोश थे। क्योंकि इंदिरा गांधी का यह रूप कभी देखा नहीं था। उस समय इंदिरा एक प्रधानमंत्री ज्यादा एक सास की तरह व्यवहार कर रही थी। जिसका धैर्य जवाब दे चुका था। अपमान का सिलसिला यहीं रुकने वाला नहीं था। वो रात और कड़वी होने वाली थी। इंदिरा गांधी को यह गहरा संदेह था कि मेनका गांधी अपने साथ संजय गांधी के कुछ बेहद महत्वपूर्ण दस्तावेज,

गुप्त फाइलें या परिवार से जुड़ी कोई निजी डायरियां ले जा रही है। जिसका इस्तेमाल बाद में उनके खिलाफ राजनीतिक हथियार के तौर पर किया जाएगा। इसी शक के आधार पर इंदिरा गांधी ने वो आदेश दिया जिसने सबको हक्का बक्का कर दिया। अपने निजी सचिव, सुरक्षाकर्मियों को निर्देश दिया कि घर से बाहर जाने से पहले मेनका के हर एक बाग, सूटकेस और अटैची की बारीकी से तलाशी ली जाए। एक प्रधानमंत्री के घर में उनकी अपनी बहू के निजी कपड़ों, सामान को नौकरों, सुरक्षा कर्मियों द्वारा सार्वजनिक रूप से खंगाला जाना अपमान की पराकाष्ठा थी। उस समय घर के बाहर अंतरराष्ट्रीय मीडिया का हुजूम था। दर्जनों कैमरों की फ्लैश लाइट जल रही थी। मेनका की बहन अंबिका पहुंची थी। वो घर के बाहर खड़े पत्रकारों को घर के भीतर चल रहे एक अपमानजनक वाक्य की जानकारी लाइव कमेंट्री की तरह दे रही थी। पुलिस से गाड़ियां सायरन के बीच बिखरे हुए सूटकेस उस घर के बिखरते रिश्तों गवाही दे रहे थे। जब सुरक्षाकर्मियों ने मेनका के हाथ से कुछ कागजात छीनने की कोशिश की तो हंगामा बढ़ गया। वो दृश्य किसी सियासी बदले से ज्यादा व्यक्तिगत दर्दनाक और शर्मिंदगीगी से भरा था। छोटे वरुण गांधी को लेकर भी इंदिरा और मेनका के बीच में विवाद हुआ था। दरअसल उस पूरी रात की सबसे भावुक और दिल दहला देने वाली तस्वीर थी दो साल के मासूम वरुण गांधी की जो इन विवादों से बेखबर गहरी नींद में थे। इंदिरा गांधी अपने पोते वरुण से प्यार करती थी। उसे वो खोना नहीं चाहती थी। जब सारा सामान पैक हुआ। मेनका घर से बाहर निकल रही थी तब इंदिरा ने आखिरी कड़ा रुख अपनाया। सख्त आवाज में कहा वरुण यहीं रहेगा कहीं नहीं जाएगा। इंदिरा चाहती थी कम से कम परिवार का वारिस और संजय की आखिरी निशानी उनके पास रहे। वो जानती थी कि वरुण के जाने का मतलब है संजय गांधी की शाखा को हमेशा के लिए खो देना। लेकिन मेनका [संगीत] गांधी उस वक्त अपने बच्चे के लिए शेरनी की तरह थी। उनका स्पष्ट कहना था कि मां से उसका बच्चा दुनिया की कोई ताकत चाहे वो देश की प्रधानमंत्री क्यों ना हो वो छीन नहीं सकती। उस तनावपूर्ण माहौल में वहां मौजूद कानूनी सलाहकारों ने भी हस्तक्षेप किया और इंदिरा गांधी को समझाया कि कानून के मुताबिक मां का हक सबसे मजबूत होता है।

अगर वह जबरदस्ती रोकती हैं तो अपहरण जैसा मामला होगा। प्रेस में छवि बिगड़ेगी। भारी मन और आंखों में आंसू और गहरी नफरत के बीच इंदिरा गांधी का पीछे हटना पड़ा। रात के करीब 11:00 बजे जब दिल्ली की सड़कें सूनी हो गई थी। मेनका गांधी एक हाथ में अपना बचा कुचा सामान और दूसरे हाथ में वरुण को लेकर उस आलीशान बंगले से निकल गई। सरदर जंग रोड के उस भारी लोहे के दरवाजे के बंद होते ही गांधी परिवार की एकता तय कहानी हमेशा हमेशा के लिए खत्म हो गई। उस रात जो दरार पड़ी उसने भारतीय राजनीति में ऐसी विपक्षी आवास को जन्म दिया जिसने आने वाले दशकों तक नेहरू गांधी परिवार की नीति। मेनका गांधी ने उस रात के अपमान को अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाया। तुरंत राष्ट्रीय संजय मंच का गठन किया। बाद में भाजपा से जुड़कर एक सफल राजनीतिक पारी खेली। अमेठी से राजीव गांधी के खिलाफ चुनाव लड़कर साफ किया। लड़ाई पारिवारिक नहीं विचारधारा की है। खुद को एक स्वतंत्र सशक्त नेता के तौर पर स्थापित किया।

आज 44 साल बीत जाने के बाद भी उस रात की कड़वाहट और टीस खत्म नहीं हुई। आज भी संसद के भीतर किसी बड़े सार्वजनिक कार्यक्रम में राहुल गांधी और वरुण गांधी का आमनासामना होता है तो 1982 वाला सन्नाटा खिंचाव महसूस होता है। दोनों परिवारों के बीच अभी भी एक अदृश्य दीवार खड़ी है। उस एक रात ने ना सिर्फ एक परिवार के दो टुकड़े किए बल्कि यह साबित किया कि सत्ता के गलियारों में कभी व्यक्तिगत भावनाएं और ममता राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं अनुशासन के सामने हार जाती है। उस रात भारतीय लोकतंत्र के इतिहास की सबसे विवादित और भावुक विदाई के रूप में हमेशा याद रखी जाएगी। जिसने एक के खून के दो वारिसों को एक दूसरे का कट्टर राजनीतिक विरोधी बना दिया। सवाल हमारा आपसे आपको क्या लगता है इस पूरे विवाद में गलती किसकी थी? एक मां की जो घर में अनुशासन सत्ता बचाना चाहती थी या एक बहू की जो अपने पति के विरासत पर अपना हक मांग रही थी। या सियासत थी? जो खून खून में जो सोचते हैं कमेंट सेक्शन में लिखिएगा।

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