ये मौसम भीगा भीगा है। हवा भी ज्यादा ज्यादा है। क्यों ना मच दिल? आज हम उस खूबसूरत अभिनेत्री के बारे में बात करेंगे जिसे देखकर राजेंद्र कुमार कहते थे। मेरे महबूब को किसने बनाया सोचता हो। वो हीरोइन जो 60 70 और 80 के दशक में हर किसी के दिलों में राज करती थी। फिर चाहे एक्टर देवानंद हो। है अपना दिल तो आवारा ना जाने किस पे आए या फिर मनोज कुमार हो जो तू नहीं तो कुछ भी नहीं है एक जमाने में इस एक्ट्रेस का ऐसा जलवा था कि लोग उन्हें सिर्फ देखने के लिए तरस जाते थे। तो हम बात कर रहे हैं एक समय की लेजेंड्री सुपरस्टार रह चुकी वाहिदा रहमान की। आज फिर जीने की तमन्ना है। आज फिर मरने का इरादा आखिर ऐसा क्या हुआ था कि वाहिदा को अपना चमकता हुआ फिल्मी करियर छोड़ना पड़ा कि इस वजह से उन्हें गुरुदत्त की मौत का जिम्मेदार माना गया और लोगों ने उनका जीना हराम कर दिया। कैसे मुसलमान होने की वजह से उन्हें कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा और बाद में एक हिंदू पंडित ने उनकी जिंदगी बदल दी। ओ रंगीला रे तेरे रंग में यूं रंगा है और क्यों वह अचानक से मुंबई की अपनी लग्जरी लाइफ को छोड़कर एक गांव में बसने को मजबूर हो गई थी क्यों वाहिदा रहमान को एक फ्लॉप एक्टर से शादी करनी पड़ी उनके जिंदगी के वो कौन-कौन से अनसुने किस्से हैं आज वह कहां है और किस हाल में है जानेंगे और भी बहुत कुछ आप बस दिल थाम कर बैठ जाइए और इस वीडियो को एक लाइक कर दीजिए तो चलिए चलिए शुरू करते हैं वाहिदा रहमान की कहानी। नजराना पिया याद रखोगे कि भूल जाओगे। वाहिदा रहमान का जन्म 3 फरवरी 1938 को तमिलनाडु के चेंगल पट्टू में हुआ था। उनके पिता मतलब अब्बू का नाम था मोहम्मद अब्दुल रहमान और मां का नाम था मुमताज बेगम। वाहिदा के माता-पिता चाहते थे कि वे बड़े होकर डॉक्टर बने। लेकिन उन्हें नहीं पता था कि उनका जन्म दिल की धड़कन चेक करने के लिए नहीं बल्कि दिल की धड़कन बढ़ाने के लिए हुआ है। वाओ वाहिदा को बचपन से ही डांस का बड़ा शौक था। उन्होंने अपनी मां से भारत नाट्यम सिखाने के लिए कहा। हालांकि वाहिदा के पिता नाच गाने के सख्त खिलाफ थे। लेकिन मां ने सपोर्ट किया और वाहिदा को उस समय के फेमस भारत नाट्यम के गुरु कहे जाने वाले जया लक्ष्मी अलवा के पास लेकर गए। [
संगीत] जया लक्ष्मी ने जब वाहिदा रहमान का नाम सुना तो मुसलमान नाम सुनकर उसने वाहिदा को भारत नाट्यम सिखाने से इंकार कर दिया। लेकिन वाहिदा जििद पर अड़ी रही और वह सिर्फ जया लक्ष्मी से ही सीखना चाहती थी। तो जया लक्ष्मी ने वाहिदा की बात मान ली और खुद ही वाहिदा रहमान की कुंडली बनवाई और जब उन्होंने वाहिदा रहमान की कुंडली देखी तो उनके खुशी का ठिकाना नहीं रहा। वाहिदा की कुंडली देखकर जय लक्ष्मी को पता चला कि वाहिदा उनकी अब तक की सबसे बेहतरीन और होनहार छात्र निकलेगी जो आगे चलकर पूरे देश दुनिया में उनका नाम चर्चित कर देगी। पान खाए सैया हमारो बस फिर क्या था जय लक्ष्मी ने वाहिदा को भारत नाट्यम सिखाना शुरू कर दिया और वाहिदा भी भारत नाट्यम में एक्सपर्ट बन गई। भारत नाट्यम सीखने से उनकी जिंदगी बदल गई। वह अचानक से चर्चित डांसर बन गई थी और उन्हें बड़े-बड़े म्यूजिक शोज़ में काम मिलने लगा। सब कुछ अच्छा चल रहा था। लेकिन तभी अचानक वाहिदा के पिता का निधन हो गया और परिवार दानेदाने का मोहताज हो गया। घर में पैसों की कमी होने लगी तो तभी वाहिदा ने कुछ काम धंधा करके परिवार की जिम्मेदारी उठाने का फैसला किया। उस समय तमिल, तेलुगु फिल्मों में क्लासिकल डांस का बड़ा बोलबाला हुआ करता था। [संगीत] तो वाहिदा रहमान ने भी फिल्मों में काम करना शुरू कर दिया। वाहिदा ने एनटी रामा राव की फिल्म जया सिन्हा से अपने एक्टिंग करियर की शुरुआत की। हालांकि इस फिल्म में भी उन्होंने डांसर का ही किरदार निभाया था और इसके बाद उन्हें साउथ की कई फिल्मों में डांसर के छोटे-मोटे रोल मिलने लगे। से नैना लागे। वाहिदा एक डांसर के तौर पर बड़ी फेमस हो गई थी और अक्सर स्टेज शोज़ करती रहती थी। ऐसे ही एक स्टेज शोज़ पर डांस करते हुए उन पर नजर पड़ी लेजेंड्री फिल्म मेकर और एक्टर गुरुदत्त की और उन्हें वाहिदा रहमान भा गई। जो भी हो तुम खुदा की कसम लाजवाब हो। उस समय गुरुदत्त अपनी पहली फिल्म बना रहे थे जिसका नाम था सीआईडी और गुरुदत्त ने वाहिदा को फिल्म का हीरोइन बना लिया। इस फिल्म के हीरो थे देवानंद और इस तरह पहले ही फिल्म से वाहिदा रहमान देवानंद की हीरोइन बन गई। इस फिल्म के गाने बड़े हिट हुए और खासकर फिल्म का यह गाना लेके पहला पहला प्यार भर के आंखों में कुमार जादू नगरी से आया। इतना शानदार था कि आज भी यह लोगों का फेवरेट है। यह फिल्म 1956 में आई थी और इतनी बड़ी हिट हुई कि वाहिदा रातोंरात लाइमलाइट में आ गई थी। कहीं से निगाहें कहीं से निजाना गुरुदत्त को वाहिदा रहमान इतनी पसंद आ गई कि उन्होंने अगली फिल्म में भी वाहिदा को ले लिया। 1957 में आई गुरुदत्त की सबसे बेहतरीन फिल्म प्यासा और इसमें गुरुदत्त ने वाहिदा को अपना हीरोइन बनाया। जाने क्या तूने कही जाने क्या मैंने
सुनी यह फिल्म इतनी बड़ी हिट हुई थी कि इसने वाहिदा को हर तरफ चर्चे में ला दिया और उनके सामने फिल्मों की लाइन लग गई थी। इसके बाद अगली फिल्म फिर गुरुदत्त के साथ आई। 12 ओ क्लॉक और गुरुदत्त के साथ वाहिदा की जोड़ी खूब जमने लगी। देखिए मुझे बेतुका मजाक पसंद नहीं। मैं पसंद हूं। यह फिल्म भी गुरुदत्त की एक बेहतरीन फिल्म थी जिसका सब कुछ हिट था और वाहिदा हर किसी के दिल में बसती चली जा रही थी। 1958 में वाहिदा एक बार फिर से देवानंद की हीरोइन बनी। फिल्म आई 16वां साल और इस फिल्म की तो क्या ही तारीफ की जाए। यह एक ऐसी फिल्म थी जिसे सबसे बेहतरीन क्लासिकल फिल्म का दर्जा मिला। कोई अच्छा लगने लगा है। कौन है वो? है एक लड़की। कैसी है? शक्ल और सूरत की तो अच्छी है लेकिन मिजाज जरा तेज है। आप उसे कब से जानते हैं? अभी नई-नई मुलाकात है। और इसे देखकर आप समझ जाएंगे कि देवानंद को एवरग्रीन क्यों कहा जाता था। इस फिल्म में वाहिदा रहमान ने ऐसी छाप छोड़ी कि लोग उनके अदाओं के दीवाने हो गए। इस फिल्म के गाने भी ऐसे थे कि लोग उनके गानों को गुनगुनाने लगते थे। अपना दिल सो आवारा ना जाने किस पे आ 1959 में गुरुदत्त एक और बेहतरीन क्लासिकल फिल्म लेकर आए कागज के फूल और यह फिल्म सिर्फ एक फिल्म नहीं थी बल्कि असली सिनेमा था। कहा जाता है कि यह गुरुदत्त की खुद की कहानी थी और गुरुदत्त सच में लीजेंड्री थे। हम आपकी आंखों में इस दिल को बसा दे तो 2022 में सनी देओल की एक फिल्म आई थी चुप और ये फिल्म इसी कागज के फूल की कहानी पर बनाई गई थी। कागज के फुल फिल्म गुरुदत्त का सपना था लेकिन इसे बनाकर ठीक वैसे ही बर्बाद हुए जैसे जल्दी अमीर बनने के चक्कर में अनिल अंबानी हुए थे। बात तो सही है। हालांकि इस फिल्म को लोगों की खूब तारीफें मिली और वाहिदा सफलता की सीढ़ी चढ़ती चली गई और दूसरी तरफ गुरुदत्त भी वाहिदा को छोड़ना नहीं चाहते थे। तो 1960 में गुरदत्त ने वाहिदा को 14वीं का चांद बनाया। 14वीं का चांद हो या आफताब हो और गुरुदत्त वाहिदा के दीवाने हो चुके थे। वाहिदा भी गुरुदत्त के प्यार में पड़ गई थी। हालांकि यह बॉलीवुड की सबसे खतरनाक प्रेम कहानी बनी जिसकी चर्चा हम आगे करेंगे। इसके बाद फिल्म आई एक फुल चार कांटे और वाहिदा संजय दत्त के बाप यानी कि सुनील दत्त की हीरोइन बनी। इसके बाद देवानंद के साथ फिर से वाहिदा दिखाई दी। मूवी आई काला बाजार। यह मूवी भी बेहतरीन थी जिसके गाने भी बड़े हिट हुए। खोया खोया चांद खुला आसमान आंखों और मूवी भी लोगों को खूब पसंद आई। इसके बाद गर्लफ्रेंड, रूप की रानी चोरों का राजा, साहिब बीवी और गुलाम। बात एक रात की 20 साल बाद और राखी जैसी कई बेहतरीन फिल्में आई और देखते ही देखते वाहिदा हर किसी की फेवरेट बन गई। मौसम भीगा है, हवा भी ज्यादा ज्यादा है। क्यों ना मच? 1963 में वाहिदा राज कपूर की हीरोइन बनी और मूवी आई एक दिल 100 अफसाने और यह फिल्म भी बड़ी चर्चित रही। इसके बाद सुनील दत्त डाकू बने और उन्होंने कहा मुझे जीने दो। वाहिदा उनकी हीरोइन बनी और यह फिल्म भी बड़ी हिट हुई और इसके गाने भी हर किसी को पसंद आए। तुम आओ तो आंखें खोले सोई हुई पायल की छुमछुम। इसके बाद आई कौन
अपना कौन पराया मजबूर कोहरा और शगुन जैसी फिल्में आई। 1965 में देवानंद के साथ वाहिदा रहमान की मूवी आई गाइड और यह वाहिदा की सबसे बेहतरीन फिल्मों में से एक बनी। कांटों से खींच के आंचल गाइड देवानंद की पहली रंगीन मूवी थी और इतनी बेहतरीन थी कि इसे एवरग्रीन फिल्म्स का दर्जा मिला। आज फिर जीने की तमन्ना है। और इसका सब कुछ हिट था। कहा जाता है कि इस फिल्म में से पहले वाहिदा को हटा दिया गया था क्योंकि उन्हें अंग्रेजी बोलना नहीं आता था और इस फिल्म में उन्हें एक क्रिश्चियन लड़की का किरदार निभाना था जिसे अंग्रेजी में डायलॉग बोलने थे लेकिन देवानंद ने जीद पकड़ ली कि इस फिल्म की अगर कोई हीरोइन बनेगी तो वह वाहिदा रहमान ही बनेगी। नहीं तो वह खुद यह फिल्म में हीरो नहीं बनेंगे। इसके बाद वाहिदा को दोबारा इस फिल्म में लिया गया और उनके किरदार रोजी ने हर किसी का दिल जीत लिया और हर गाना लोगों की फेवरेट वाली लिस्ट में शामिल हो गया। मैं हूं या कोई बताए मैं कहां इसके बाद दिलीप कुमार को वाहिदा ने दिल दिया और दर्द लिया और इस फिल्म का नाम जितना गिमिकी था उतना ही इसका स्टोरी भी था। फिल्म के गाने भी बड़े हिट हुए। दिल दिया दर्द लिया, दिल दिया दर्द लिया। इसके बाद वाहिदा एक बार फिर से राज कपूर की हीरोइन बनी। फिल्म आई तीसरी कसम और यह फिल्म भी ठीक-ठाक रही। 1967 को वाहिदा मनोज कुमार की हीरोइन बनी। फिल्म आई पत्थर के सनम। पत्थर के सनम तुझे हमने मोहब्बत का। और इस फिल्म की तो क्या ही तारीफ की जाए। मनोज कुमार की यह सबसे बेहतरीन फिल्मों में से एक थी। फिल्म में एक तरफ जहां मुमताज थी तो वहीं दूसरी तरफ वाहिदा रहमान थी। फिल्म का हर गाना लाजवाब था और खासकर फिल्म का यह गाना जो तू नहीं तो कुछ भी नहीं है तो आज भी लोग बड़े मजे से सुनते हैं। इसके बाद दिलीप कुमार राम और श्याम बने और यह बॉलीवुड की पहली डबल रोल वाली फिल्म थी और सच में राम और श्याम फिल्म बेहतरीन थी। फिल्म का हर सीन गजब का था और खासकर फिल्म के गाने। आज की रात मेरे दिल की सलामी ले ले। इसके बाद पालकी, घर का चिराग और बाजी जैसी फिल्में आई। इसके बाद वाहिदा रहमान उस एक्टर की हीरोइन बनी जो फिल्मों में अपने डायलॉग से सबको दीवाना बना देता था। हम तुम्हें मारेंगे और जरूर मारेंगे। लेकिन वो बंदूक भी हमारी होगी, गोली भी हमारी होगी और वक्त भी हमारा होगा। यानी कि राजकुमार वो अलग बात है कि उस समय राजकुमार रोमांटिक मूड में थे और फिल्म के गानों की तो क्या ही तारीफ की जाए। फिर चाहे राजकुमार का यह दुखी वाला सॉन्ग हो मैं तो मिटा हूं तेरी चाह में तुझको पुकारे। और आज भी जब बेटी की विदाई होती है तो सबसे पहले यह बचता है। गाड़ी वाला आया घर से कचरा निकाल। गाड़ी वाला आया घर से कचरा निकाल। अरे यह वाला नहीं बाबुल की दुआएं लेती जा तुझको सुखी हां यह वाला और इस गाने के बिना तो विदाई पूरी ही नहीं होती है। इसके बाद लव ट्रायंगल पर एक बेहतरीन फिल्म आई आदमी जिसमें मनोज कुमार और दिलीप कुमार ने गजब का काम किया और वाहिदा दोनों के बीच में फंसी हुई प्रेमिका बनी और यह फिल्म भी बेहतरीन थी जिसके गानों में अलग ही दर्द झलकता था। आज पुरानी राहों से कोई इसके बाद वाहिदा मेरी भाभी बनी। क्या बात कर रहा है? अरे मतलब सुनील दत्त की मूवी आई थी मेरी भाभी और यह मूवी भी बहुत अच्छी थी और वाहिदा ने इसमें भी गजब का काम कर दिखाया। इसके बाद शतरंज और खामोशी जैसी फिल्में भी आई। यह शाम भी अजीब है। वह कल भी खामोशी वाहिदा का ड्रीम प्रोजेक्ट था जिसे उन्होंने खुद बनाया था। राजेश खन्ना ने उनसे कहा था कि यह मूवी नहीं चलेगी। फिर वाहिदा ने भी कहा कि कुछ काम अपने मन की शांति के लिए भी करने चाहिए। चाहे फिल्म चले या ना चले। इसलिए मेरा मन है कि मैं एक ऐसी फिल्म बनाऊं। फिल्म बॉक्स ऑफिस पर तो कुछ खास नहीं चली लेकिन यह इतनी बेहतरीन थी कि हर किसी ने वाहिदा की फिल्म मेकिंग की तारीफ की। हमने देखी है गुना आंखों की महकती खुशबू। 1970 में देवानंद और वाहिदा की फिल्म आई थी प्रेम पुजारी और यह भी सुपरहिट थी और यही वह फिल्म थी जिसमें पहली बार शत्रुघ्न सिन्हा ने एक छोटा सा किरदार निभाकर बॉलीवुड में कदम रखा था। हमारे पैटर्न टैंक्स इस गांव के चारों ओर खड़े हैं। यहां का बच्चा-बच्चा भून दिया जाएगा और ईंट से ईंट बजा दी जाएगी। इसके बाद वाहिदा रहमान एक बार फिर से राजेंद्र कुमार की हीरोइन बनी। फिल्म आई धरती और इस फिल्म में वाहिदा की खूबसूरती अलग ही लेवल की थी। मेरे महबूब को किसने बनाया सोच। फिल्म के गाने भी बड़े हिट हुए और वाहिदा को आज भी लोग इस फिल्म के लिए याद करते हैं। मौसम भी है। हवा भी ज्यादा ज्यादा है। इसके बाद दर्पण और मन की आंखें जैसी फिल्में भी आई। 1971 में सुनील दत्त की फिल्म आई थी रेशमा और शेरा जिसमें रेशमा का किरदार वाहिदा ने निभाया था। इस फिल्म के बनने की कहानी पर ही मूवी बन सकती है। क्या बात कर रहा है? दरअसल इस मूवी में बहुत सारी ऐसी बातें थी जो बहुत इंटरेस्टिंग थी। जैसे अपनी आवाज के लिए जाने जाने वाले अमिताभ बच्चन की आवाज को इस मूवी में रिजेक्ट कर दिया गया था और सुनील दत्त ने उन्हें एक गूंगे का किरदार दे दिया था। मूवी में संजय दत्त ने भी बाल कलाकार की भूमिका निभाई थी और अमरीश पुरी की यह पहली फिल्म थी जिसके बाद उन्हें बॉलीवुड में पहचान मिली थी। मेरी पहली फिल्म थी रेशमा और शेरा। उसमें मैंने रहमत खान की भूमिका निभाई थी। कैरेक्टर रोल था। वो अच्छा था लेकिन विलेन नहीं था। इसके बाद मन मंदिर, जिंदगी जिंदगी, दिल का राजा, सुबह और शाम, फागगुन, इंसाफ जैसी कई फिल्में आई और यह वो समय था जब वाहिदा सफलता की नाव पर सवार होकर सबको पीछे छोड़ चुकी थी। पिया याद रखोगे कि भूल जाओगे।
1976 में अमिताभ बच्चन की एक बेहतरीन फिल्म आई थी कभी-कभी और यह फिल्म अमिताभ बच्चन की एक एवरग्रीन फिल्म बनी साथ ही इस फिल्म में पहली बार वाहिदा ने एक मां का किरदार निभाया था। मेरे घर आई एक नन्ही परी। इसके बाद अमिताभ बच्चन की एक और बेहतरीन मूवी आई अदालत और इस मूवी में वाहिदा ने अमिताभ बच्चन की पत्नी और मां दोनों का किरदार एक साथ निभाया था। खाओ मां कसम। मतलब अमिताभ बच्चन इसमें बाप और बेटे के डबल रोल में थे और वाहिदा उनकी पत्नी और मां दोनों बनी। लेकिन बाद में यह किरदार निभाकर वाहिदा को बहुत पछतावा हुआ क्योंकि मां का किरदार निभाने के बाद लोगों के दिमाग में उनकी हीरोइन वाली छवि मिटने लगी थी। बहुत कम वक्त बचा है बेटा। नहीं मां। ऐसा क्यों कहते हो? ऐसा मत कमा। फिर 1978 की फिल्म त्रिशूल में भी वह मां ही बनी और इसमें भी अमिताभ बच्चन की मां के किरदार में नजर आई थी और अब वह सपोर्टिंग किरदार निभाने लगी थी। वह कभी हीरो की मां तो कभी हीरोइन की मां बनने लगी थी। नमक हलाल फिल्म भी बड़ी ब्लॉकबस्टर साबित हुई। जहां अमिताभ बच्चन यह कह रहे थे आज रबट जाए तो हमें ना उठाइयो। तो वहीं शशि कपूर भी गजब के रोल में दिखे और इस फिल्म में भी वाहिदा ने मां का ही किरदार निभाया था। इसके बाद ज्वालामुखी, सवाल, धर्म कांटा, हिम्मत वाला और महान जैसी फिल्मों में वाहिदा ने सपोर्टिंग किरदार निभाई और अमिताभ बच्चन जब कुली बने और उन्होंने अल्लाह की चादर को बुलेट प्रूफ जैकेट बनाकर गोलियां खाई, तेरे हाथ में मौत का सामान है तो मेरे सीने पे खुदा का नाम है। देखते हैं ये चादर मुझे बचाती है या कफ़न बनके मुझे कब्र तक पहुंचा देती है। क्या गोली? भाई भाई क्या? हालांकि गोलियां तो उन्हें फिर भी लग गई थी। अशद ला इलाहा इल्लल्लाह तो इस फिल्म में भी वाहिदा उनकी मां ही बनी। इसके बाद मार्शल और मकसद में भी उन्होंने काम किया और फिर आई चांदनी और इसमें भी वाहिदा ने विनोद खन्ना की मां का किरदार निभाया। वाहिदा ने 1994 में आई फिल्म उल्फत की नई मंजिले में काम किया था और इसके बाद उन्होंने फिल्मों से दूरी बना ली और वह अचानक से मुंबई छोड़कर एक गांव में बस गई। अब ऐसा क्यों हुआ इसकी चर्चा भी हम आगे करेंगे। रंगीला रे तेरे रंग में यूं रंगा है। इसके बाद वाहिदा ने सीधे 2002 में ओम जय जगदीश फिल्म में काम किया। 2006 में रंगदे बसंती में भी वह नजर आई। इसके बाद अभिषेक बच्चन की दिल्ली सिक्स में भी वाहिदा ने काम किया। छेड़ देवे ननद चुटकी लेवे ससुराल ना। 2013 में एक ऐसी फिल्म रिलीज़ हुई जिसे देखकर लोगों की यादें ताजा हो गई और हर कोई पुरानी वाहिदा को देखकर चौंक गया। यह मूवी थी लव इन मुंबई जो 1974 में बनी थी। लेकिन रिलीज 2023 में हुई। लेकिन अफसोस की बात यह थी कि अब ना तो मुंबई उस जमाने का बचा था और ना ही मुंबई के लोग। तो किसी ने भी 1974 वाला मुंबई का लव 2013 में नहीं देखा और यह फिल्म बुरी तरह से पिट गई। मुझे भुला देंगे अपने दिल से। वाहिदा आखिरी बार स्कैटर गर्ल मूवी में दिखाई दी थी जो 2021 में आई थी और यह एक सच्ची घटना पर आधारित मूवी थी।
वाहिदा को स्टार बनाने का श्रेय जाता है गुरुदत्त को। उन्होंने ही वाहिदा को पहली बार हीरोइन के तौर पर सीआईडी मूवी में लिया था। मूवी में एक सीन था जिसमें वाहिदा रहमान का दुपट्टा खींचा जाना था और उन्हें एक फटा हुआ ब्लाउज पहनना था। लेकिन वाहिदा ने इस सीन को करने से मना कर दिया। वह जिद पर अड़ी रही और उन्होंने फिल्म को छोड़ने तक का फैसला कर लिया था। लेकिन वह सीन के लिए राजी नहीं हुई। गुरुदत्त को उनके अपने इमेज और मर्यादा के लिए स्वाभिमान होना बहुत पसंद आया और उन्होंने वह सीन ही हटा दिया। इसके बाद वाहिदा गुरदत्त के दिल में जगह बना ली। गुरुदत्त अपनी हर मूवी में वाहिदा को हीरोइन बनाने लगे। वाहिदा भी गुरुदत्त को पसंद करने लगी थी और दोनों की नजदीकियां भी बढ़ने लगी। गुरुदत्त पहले से शादीशुदा थे, लेकिन फिर भी वाहिदा के प्यार के समंदर में डूब गए। दोनों ने लंबे समय तक प्यार की पतंग उड़ाई, लेकिन जब गुरुदत्त की पत्नी को यह सब पता चला, तो उसने गुरुदत्त का घर छोड़ दिया और वहां अकेली रहने लगी। वाहिदा को लगा कि उसने एक हंसता खेलता घर तोड़ दिया है। गुरुदत्त अपनी पत्नी के जाने के बाद बेचैन थे, तो ऐसे में वाहिदा ने एक औरत की मांग की पीड़ा को समझा और खुद ही गुरुदत्त से दूरी बना ली। लेकिन गुरदत्त जुदाई बर्दाश्त नहीं कर पाए। वह दोनों के बीच में फंस गए थे। पत्नी को वह धोखा नहीं देना चाहते थे और वाहिदा के बिना वह जी नहीं सकते थे। नहीं नहीं मुझे तुम तो ऐसे में उन्होंने अपने आप को देवदास बना लिया और शराब में डूब गए। उन्होंने काम करना बंद कर दिया और दिन रात बस गम में डूबे रहने लगे और 1964 में एक सुबह लोगों को पता चली कि गुरुदत्त अपने बिस्तर पर मृत पाए गए हैं। उनकी मौत का कारण अधिक शराब और नींद की गोलियों का अधिक सेवन करना बताया गया। मतलब बहुत दुखी थे और अंदर से टूट चुके थे। कई न्यूज़ पेपर और मीडिया वालों ने वाहिदा को उनकी मौत का जिम्मेदार ठहराया और यह छापा जाने लगा कि वाहिदा के धोखा देने से ही गुरदत्त की जिंदगी खत्म हुई है और सालों तक वाहिदा ने यह ताने सुने और यह इल्जाम झेली। हालांकि वाहिदा का कहना था कि गुरदत्त ने खुद ही वाहिदा से दूरी बना ली थी और उसे धोखा देकर वह अपनी पत्नी के पास लौट गए थे और गुरदत्त ने ही वाहिदा को छोड़ दिया था। जिससे वह भी बुरी तरह से टूट गई थी। मेरी बात रही मेरे मन में समय बीता और वाहिदा ने खुद को संभालते हुए एक बार फिर से अपने काम पर ध्यान दिया। इसके बाद उनकी जिंदगी में आए दिलीप कुमार जो पहले ही बॉलीवुड के दो सुंदर हीरोइन मधुबाला और विजयंती माला का इस्तेमाल करके उन्हें धोखा दे चुके थे। दिलीप कुमार के साथ भी वाहिदा ने कुछ फिल्मों में काम कर चुके थे
और दोनों की नजदीकियां भी बढ़ने लगी। दिलीप कुमार और वाहिदा की प्रेम कहानी के चर्चे भी खूब होने लगे थे। दिलीप कुमार का दो बार दिल टूट चुका था। इसलिए वह जल्द से जल्द शादी करना चाहते थे। तो वहीं वाहिदा अपने फिल्मी करियर के पीक पर चल रही थी। अभी वह शादी करके अपना करियर बर्बाद नहीं करना चाहती थी। दिलीप कुमार का कहना था कि तुम काम कम किया करो और मेरे साथ समय ज्यादा बिताया करो। तो वहीं वाहिदा दिलीप कुमार से ज्यादा काम को जरूरी समझती थी और यही कारण था कि दोनों में धीरे-धीरे मनमुटाव होने लगा और आखिरकार दोनों अलग हो गए। गुजरे हैं आज इश्क में हम उस मका इसके बाद वाहिदा ने कई बेहतरीन फिल्में की और वह टॉप की हीरोइन बन गई। 1970 आते-आते वाहिदा को भी महसूस होने लगा कि अब उन्हें घर बसा लेना चाहिए। उस समय शशि रेखी जिसे कमलजीत के नाम से भी जाना जाता था। उनकी वाहिदा के साथ नजदीकियां बढ़ने लगी थी। दोनों ने एक साथ एक-दो फिल्मों में काम किया। दोनों फिल्में तो फ्लॉप रही लेकिन दोनों की जोड़ी हिट हो गई और वाहिदा कमलजीत को पसंद करने लगी। दोनों लंबे समय तक एक दूसरे के साथ रिलेशनशिप में रहे और 1974 में दोनों ने शादी कर ली। लोगों को लगने लगा कि वाहिदा ने एक फ्लॉप एक्टर से शादी की है तो अब उन्हें ज्यादा काम करना पड़ेगा क्योंकि उनके पति की बॉलीवुड में कुछ खास पहचान नहीं है। लेकिन शादी के बाद वाहिदा ने पूरी तरह से बॉलीवुड को छोड़ दिया और वह फिल्मों से अचानक से गायब हो गई और उनके पति के साथ साउथ इंडिया के गांव में जाकर बस गई जिसका कारण यह था कि उनके घर पर दो बच्चों का जन्म हुआ था। एक लड़का और एक लड़की।
वाहिदा शूटिंग और फिल्मों से ऊब चुकी थी और अब उन्हें फिल्मों में सिर्फ छोटे-मोटे किरदार ही मिलते थे। वह दादी और मां बनकर बोर हो चुकी थी और साथ में अब उनके बच्चे भी थे और वह अपना समय अपने परिवार को देना चाहती थी। इसलिए उन्होंने मुंबई को छोड़ दिया और वह साउथ के गांव में जाकर बस गई। कई सालों तक वाहिदा फिल्मों से दूर रही। लेकिन जब साल 2000 में उनके पति का निधन हो गया तो वाहिदा अकेली पड़ गई और एक बार फिर से वह मुंबई लौट आई। उसके बाद उन्होंने वापस से फिल्मों में वापसी की और मां और दादी बनने लगी। वाहिदा को पहली बार फिल्म गाइड के लिए बेस्ट एक्ट्रेस का अवार्ड मिला था। उन्हें पद्म श्री, पद्म विभूषण और दादासाहेब फाल्के जैसी कई बेहतरीन अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है। वाहिदा बॉलीवुड की एक ऐसी बेहतरीन हीरोइन थी जिसका पूरा एक दौर रहा है और हर कोई उसके लिए पागल था। अब वाहिदा रहमान लगभग 87 साल की हो चुकी है और मुंबई में ही रहती है। तो, यह थी बॉलीवुड की लेजेंड्री हीरोइन रही वाहिदा रहमान की कहानी। आपको यह कहानी कैसी लगी? आप हमें नीचे कमेंट करके जरूर बताइए। साथ ही इस वीडियो को लाइक करके चैनल को सब्सक्राइब करना बिल्कुल ना भूलें। थैंक यू सो मच। सौदमी का चांद हो या आफताब