क्या आप जानते हैं कि भारतीय सिनेमा के इतिहास में जिस अभिनेत्री ने पर्दे पर हमेशा फटी हुई सफेद साड़ी पहने, आंखों में आंसू लिए और गरीबी से जूझती हुई लाचार मां का किरदार निभाकर करोड़ों दर्शकों को रुलाया, वह असल जिंदगी में मुंबई के सबसे रईस इलाके में रहने वाली एक बेहद आलीशान, ग्लैमरस और चतुर बिजनेस वूमन थी। एक ऐसी मां जिसे पर्दे पर फूटी कौड़ी के लिए तरसते हुए दिखाया गया। लेकिन असल जिंदगी में वे कीमती शिफॉन साड़ियों, चमचमाते हीरे के आभूषणों, महंगे विदेशी परफ्यूम की शौकीन थी। और उन्होंने महज 15 साल की उम्र में बिना किसी गॉडफादर के माया नगरी बंबई में कदम रखकर सफलता की एक ऐसी कहानी लिखी जिसने उन्हें गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स तक पहुंचा दिया। लेकिन इस चकाचौंध के पीछे उनके जीवन की असली सच्चाई इतनी ज्यादा हैरान करने वाली और रहस्यों से भरी है कि इसके बारे में जानकर आपके पैरों तले जमीन खिसक जाएगी। क्योंकि सिनेमा के पर्दे पर सबको आशीर्वाद देने वाली इस ममतामई मां को असल जिंदगी में अपनों की ही नफरत, खूनी पारिवारिक जंग, ससुर की खतरनाक धमकियों और सेठ पर जानलेवा हादसों का सामना करना पड़ा था। इस महान और सदाबहार अभिनेत्री की जिंदगी का सबसे पहला और वह अनसुना किस्सा इसके बारे में दुनिया बहुत कम जानती है। वह उनके ससुर द्वारा दी गई एक खौफनाक धमकी से जुड़ा हुआ है। जिसने उनके पूरे वजूद को हिला कर रख दिया था। गुजरात के एक बेहद रूढ़िवादी और कट्टर परंपरावादी परिवार में जन्मी कोकिला यानी निरूप रॉय की शादी महज 14 साल की उम्र में एक सरकारी राशन क्लर्क कमल रॉय से कर दी गई थी और उस दौर में किसी संभ्रांत गुजराती परिवार की बहू का घर की चारदीवारी से बाहर निकलना भी गुनाह माना जाता था। शादी के ठीक 1 साल बाद जब किस्मत उन्हें बंबई ले आई और महज 15 साल की उम्र में उन्हें फिल्म गुणसुंदरी के लिए मुख्य अभिनेत्री के रूप में चुन लिया गया तो उनके घर में
एक भयंकर तूफान खड़ा हो गया और उनके ससुर ने गुस्से में आग बबूला होकर साफ कह दिया था कि अगर इस घर की बहू ने नाचने गाने वाली बनकर फिल्मों की दुनिया में कदम रखा तो वह कुल की मर्यादा को कलंकित कर देगी और उसके लिए इस घर के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे। उनके ससुर ने यहां तक कह दिया था कि अगर उसने अपनी ज़िद नहीं छोड़ी तो उसे जीते जी मरा हुआ मान लिया जाएगा और उसका चेहरा तक नहीं देखा जाएगा| यह एक 15 साल की नवविवाहित लड़की के लिए बहुत बड़ा सदमा था लेकिन इस बेहद नाजुक मोड़ पर उनके पति कमल रॉय ने एक ऐसा ऐतिहासिक कदम उठाया जिसने सबको चौंका दिया। कमल रॉय ने अपने पिता के उस रूढ़िवादी फैसले और समाज के तानों के खिलाफ जाकर अपनी मासूम पत्नी का हाथ थामा और साफ कह दिया कि अगर फिल्मों में काम करने की वजह से कोकिला को यह घर छोड़ना पड़ेगा मैं भी इस घर को हमेशा के लिए त्याग दूंगा। वे दोनों बिना किसी आर्थिक मदद के और बिना किसी सहारे के बंबई की अनजान गलियों में संघर्ष करने के लिए निकल पड़े। जहां कमल रॉय ने अपनी क्लर्क की नौकरी छोड़ दी और जीवन भर निरूपा रॉय के मैनेजर बनकर उनके साए की तरह साथ रहे ताकि उनकी पत्नी को इस क्रूर फिल्म इंडस्ट्री में कभी किसी अकेलेपन या असुरक्षा का सामना ना करना पड़े। उनकी जिंदगी का दूसरा सबसे हैरान करने वाला और रोंगटे खड़े कर देने वाला किस्सा वो है जब निरूपा रॉय की लोकप्रियता इस कदर बढ़ गई थी कि लोग उन्हें साक्षात भगवान का रूप मानने लगे थे और उनके पैरों में अपने बीमार बच्चे लाकर रख देते थे। 1950 के दशक में अमिताभ बच्चन की मां के रूप में अमर होने से बहुत पहले निरूपा रॉय भारतीय सिनेमा की सबसे बड़ी और लोकप्रिय गॉडेस यानी देवी हुआ करती थी। जिन्होंने लगातार दर्जनों ब्लॉकबस्टर फिल्मों में माता सीता, मां पार्वती और देवी लक्ष्मी के ऐसे जीवंत और अलौकिक किरदार निभाए थे कि देश की भोलीभाली जनता के लिए पर्दे और असल जिंदगी का अंतर पूरी तरह मिट चुका था। आलम यह था कि लोग उनके बंबई वाले घर के बाहर बकायदा हाथ जोड़कर और अगरबत्तियां लेकर आशीर्वाद पाने के लिए सुबह से रात तक लंबी-लंबी लाइनें लगाते थे और उन्हें अपनी हर समस्या का समाधान मानने लगे थे। एक दोपहर उनके घर के बाहर अचानक चीखप मच गई जब एक गरीब और बदहवास महिला अपने मरणासन्न और बेहद बीमार बच्चे को छाती से लिपटाए भीड़ को चीरती हुई निरूपा रॉय के लिविंग रूम तक आ पहुंची और उसने बिना कुछ सोचे समझे उस तड़पते हुए बच्चे को निरूपा रॉय के पैरों में डाल दिया। वह महिला निरूपा रॉय के पैरों को पकड़ कर फूट-फूट कर रोने लगी और पागलों की तरह चिल्लाने लगी कि हे माता आप साक्षात दुर्गा हो आप जगत जननी हो डॉक्टर ने मेरे बच्चे को मृत घोषित कर दिया है लेकिन मुश्किल मुझे पता है कि अगर आपका हाथ इस पर पड़ गया तो यह दोबारा जिंदा हो जाएगा मेरे बच्चे को जीवन दान दे दो माता निरूपा रॉय उस महिला की तड़प और अपने पैरों में पड़े उस बेजान बच्चे को देखकर बुरी तरह घबरा गई उनके रोंगटे खड़े हो गए और वे खुद घुटनों के बल बैठकर रोने लगी। उन्होंने उस महिला को अपने हाथों से उठाया और रोते हुए उसे कसकर गले लगा लिया और बेहद रंधे हुए गले से समझाया कि भगवन के लिए ऐसा अनर्थ मत करो। मैं कोई देवी या चमत्कारी शक्ति नहीं हूं। मैं तुम्हारी ही तरह मांस मज्जा की बनी एक बेहद साधारण इंसान और मामूली अभिनेत्री हूं
जो सिर्फ पर्दे पर नाटक करती है। इस बच्चे को मेरे पैरों में नहीं बल्कि तुरंत अस्पताल लेकर जाओ जहां डॉक्टर इसका इलाज कर सकें। निरूपा रॉय ने तुरंत अपनी गाड़ी निकलवाई और अपने पैसों से उस बच्चे का इलाज करवाने के लिए मुंबई के सबसे बड़े अस्पताल भेजा। इस घटना ने निरूपा रॉय के दिल पर इतनी गहरी छाप छोड़ी कि वे कई दिनों तक सो नहीं सकींकी और उन्हें इस बात का गहरा डर सताने लगा कि लोग कला और हकीकत के बीच का अंतर भूलकर उन्हें भगवान का दर्जा दे रहे हैं। तीसरा बेहद दिलचस्प और अनसुना किस्सा उस दौर का है जब महान शोमैन राज कपूर की एक बहुत बड़ी फिल्म में काम करने का उनका सपना सिर्फ इसलिए टूट गया क्योंकि उनकी देवी वाली छवि उनके करियर के लिए एक बहुत बड़ा अभिशाप बन चुकी थी। साल 1954 में राज कपूर अपनी आने वाली मास्टरपीस फिल्म बूट पॉलिश की स्क्रिप्ट पर काम कर रहे थे और वे इस फिल्म में एक बेहद चैलेंजिंग और मुख्य सामाजिक भूमिका के लिए निरूपा रॉय को साइन करने के लिए पूरी तरह मन बना चुके थे क्योंकि वे जानते थे कि निरूपा रॉय के भीतर अभिनय की एक असीम क्षमता छिपी हुई है। लेकिन जैसे ही यह खबर फिल्म के डिस्ट्रीब्यूटर्स और बंबई के बड़े-बड़े फिल्म समीक्षकों तक पहुंची, तो पूरी फिल्म इंडस्ट्री में एक खलबली मच गई और राज कपूर के पास धड़ाधड़ फोन आने शुरू हो गए। फिल्म के वितर्कों ने राज कपूर को साफ-साफ शब्दों में चेतावनी दे दी कि राज साहब आप बहुत बड़ी गलती करने जा रहे हैं। निरूपा रॉय इस देश की जनता के लिए साक्षात लक्ष्मी और पार्वती हैं। जिस अभिनेत्री की तस्वीर को लोग अपने घरों के मंदिरों में रखकर पूजते हैं। जिसके थिएटर में आते ही लोग अपनी चप्पलें बाहर उतार देते हैं। उसे हम पर्दे पर किसी साधारण इंसान की तरह रोते बिलखते, रोमांस करते या सामाजिक ड्रामा करते हुए नहीं दिखा सकते। क्योंकि इससे जनता की धार्मिक भावनाएं आहत होंगी और लोग गुस्से में आकर सिनेमा हॉल में आग लगा देंगे। धार्मिक छवि के इस भयंकर और अदृश्य दबाव के कारण राज कपूर को भारी मन से अपना फैसला बदलना पड़ा और निरूपा रॉय के हाथ से वह ऐतिहासिक फिल्म निकल गई। इस घटना ने निरूपा रॉय को यह एहसास करा दिया कि देवी के किरदारों ने उन्हें लोकप्रियता तो दी है लेकिन एक अभिनेत्री के रूप में उनके पर कतर दिए हैं थे। जिसके बाद उन्होंने बेहद समझदारी से खुद को मुख्य नायिका की रेस से बाहर निकाला और मां के किरदारों की तरफ कदम बढ़ा दिए। चौथा किस्सा उन जानलेवा और दर्दनाक हालातों से जुड़ा हुआ है जिसका सामना निरूपा रॉय को उन धार्मिक फिल्मों के सेट पर हर दिन करना पड़ता था और जो उनके स्वास्थ्य के लिए एक बड़ा संकट बन गया था। आज के दौर में जहां फिल्मों में हल्के-फुल्के प्लास्टिक और कंप्यूटर ग्राफिक्स, वीएफएक्स का इस्तेमाल किया जाता है,
उस दौर में ऐसा कुछ नहीं था और माता लक्ष्मी या पार्वती के रूप में दिखने के लिए निरूपा रॉय को असली पीतल, तांबे और भारी धातुओं से बने कई किलो वजनी मुकुट और आभूषण पहनने पड़ते थे। इसके साथ ही उन्हें कड़क ज़री वाली और भारी बनारसी साड़ियां पहननी पड़ती थी, जिनका कुल वजन कभी-कभी 15 से 20 किलो तक हो जाता था और उस पर सितम यह था कि उस दौर के स्टूडियो में कोई एयर कंडीशनर नहीं होते थे बल्कि केवल तपने वाली विशालकाय पीली लाइट्स, कार्बन आर्क लाइट्स होती थी जो सेट के तापमान को 50° तक पहुंचा देती थी। ऐसी ही एक फिल्म के सेट पर जब वे माता पार्वती के रूप में एक बेहद लंबा और गंभीर दृश्य रिकॉर्ड कर रही थी, तो लगातार कई घंटों तक उस भारी मुकुट को सिर पर लादे रहने और स्टूडियो की झुलसा देने वाली गर्मी के कारण उनके सिर की नसें बुरी तरह फटने लगी और उन्हें चक्कर आने लगे। लेकिन अपने काम के प्रति बेहद समर्पित होने के कारण उन्होंने डायरेक्टर से शॉट रोकने को नहीं कहा और जैसे ही कैमरे ने रोल करना शुरू किया, वे अचानक सेट पर ही अचेत होकर गिर पड़ी और उनके सिर से भारी मुकुट गिरने की वजह से उन्हें गंभीर चोटें आई। उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाना पड़ा जहां डॉक्टरों ने बताया कि भारी वजन और अत्यधिक गर्मी के कारण वे डिहाइड्रेशन और भयंकर माइग्रेन का शिकार हो चुकी हैं। इस हादसे के बाद भी उन्होंने कभी हार नहीं मानी। लेकिन एक इंटरव्यू में उन्होंने दर्द साझा करते हुए कहा था कि उन भारी मुकुटों की वजह से उनके सिर में हफ्तों तक इतना भयानक दर्द रहता था कि उन्हें सोने के लिए भी दवाइयों का सहारा लेना पड़ता था। पांचवा और सबसे मजेदार और ऐतिहासिक किस्सा महानायक अमिताभ बच्चन की मां बनने की उस पहली हिचकिचाहट और डर का है जिसने आगे चलकर हिंदी सिनेमा का सबसे बड़ा इतिहास रच रच दिया था। साल 1975 में जब मशहूर निर्देशक यश चोपड़ा अपनी फिल्म दीवार की स्टार कास्ट फाइनल कर रहे थे तो उन्होंने मां के उस सबसे मजबूत और केंद्रीय किरदार के लिए निरूपा रॉय का नाम तय किया और जब वे उनके पास स्क्रिप्ट लेकर गए तो निरूपा रॉय पूरी कहानी सुनकर बेहद प्रभावित हुई लेकिन उन्होंने इस रोल को करने से साफ इंकार कर दिया था। उनकी इस हिचकिचाहट के पीछे एक बेहद अजीब और तकनीकी कारण था जिसे सुनकर यश चोपड़ा भी हैरान रह गए थे क्योंकि निरूपा रॉय का मानना था कि अमिताभ बच्चन की लंबाई 6 फीट से भी ज्यादा है और वे खुद कद में काफी छोटी है। ऐसे में स्क्रीन पर वे दोनों किसी भी एंगल से मां और बेटे नहीं लगेंगे बल्कि दर्शकों को यह जोड़ी बेहद अजीब और बेमेल दिखाई देगी। निरूपा रॉय को डर था कि जब वे इतने लंबे चौड़े एंग्री यंग मैन के सामने खड़ी होंगी तो उनका खुद का स्क्रीन प्रेजेंस पूरी तरह से गायब हो जाएगा और लोग उनकी ममता पर विश्वास नहीं कर पाएंगे। लेकिन यश चोपड़ा ने हार नहीं मानी और उन्होंने सिंह साहब की तरह ही निरूपा रॉय को भी एक चैलेंज दिया कि आप सिर्फ एक बार कॉस्ट्यूम पहनकर कैमरे के सामने टेस्ट देकर देखिए। जब निरूपा रॉय ने एक साधारण सफेद सूती साड़ी पहनी, अपने बालों में थोड़ा सा सफेद रंग लगाया और आंखों में वही पुरानी मां वाली करुणा लेकर कैमरे के सामने आकर खड़ी हुई तो सेठ पर मौजूद हर शख्स की आंखें नम हो गई क्योंकि उनके चेहरे की उस सादगी और ममता के सामने अमिताभ बच्चन की 6 फीट की लंबाई भी छोटी नजर आने लगी थी। इसके बाद जब फिल्म रिलीज हुई तो मेरे पास मां है का वह एक संवाद भारतीय सिनेमा के इतिहास का सबसे बड़ा सच बन गया और निरूपा रॉय ने खुद से महज 11 साल छोटे अमिताभ बच्चन की मां बनकर ऐसी केमिस्ट्री दिखाई कि आगे चलकर उन्होंने अमर अकबर एंथनी सुहाग और मुकद्दर का सिकंदर जैसी दर्जनों फिल्मों में लगातार उनकी मां का रोल किया और एक ऐसा वर्ल्ड रिकॉर्ड बना दिया जिसकी कल्पना भी कोई दूसरी अभिनेत्री नहीं कर सकती। दोस्तों, अभिनेत्री निरूपा रॉय की वह कौन सी फिल्म है जिसे आप सबसे ज्यादा पसंद करते हैं?
कमेंट में आपकी पसंदीदा फिल्म का नाम जरूर बताएं जो आपकी सबसे ज्यादा पसंदीदा है। पर्दे पर हमेशा बिखरते हुए परिवारों को जोड़ने वाली और अपने बेटों के लिए अपनी जान की बाजी लगा देने वाली इस महान मां के जीवन का आखिरी और सबसे दुखद पहलू उनकी मौत के बाद का है जो किसी भी फिल्मी स्क्रिप्ट से ज्यादा कड़वा और त्रासद साबित हुआ। साल 2004 में जब 73 वर्ष की उम्र में दिल का दौरा पड़ने से उनका बेहद शांतिपूर्ण निधन हुआ तो पूरी फिल्म इंडस्ट्री में शोक की लहर दौड़ गई थी और हर किसी को लगा था कि सिनेमा की यह ममतामई मां अपने पीछे एक खूबसूरत विरासत छोड़ गई है। लेकिन उनकी आंखें बंद होते ही उनके खुद के सगे बेटों के बीच संपत्ति के बंटवारे को लेकर एक ऐसी घिनौनी, हिंसक और कड़वी कानूनी जंग शुरू हो गई। जिसमें उनके मालाबार हिल वाले उस आलीशान और खूबसूरत सी फेसिंग आशियाने को एक अखाड़े में तब्दील कर दिया। जिसे उन्होंने अपने खून पसीने की कमाई से महज ₹10,000 में खरीदा था और जिसकी कीमत अब अरबों रुपए हो चुकी थी। उनके दोनों बेटों ने एक दूसरे पर धोखाधड़ी, मारपीट और मानसिक प्रताड़ना के इतने गंभीर आरोप लगाए कि मामला बंबई हाईकोर्ट तक जा पहुंचा और कई बार स्थिति इतनी ज्यादा खराब हो गई कि पुलिस को उनके घर के भीतर आकर बीच-बचाव करना पड़ा और कोर्ट ने उस आलीशान घर के कमरों पर बकायदा ताले लगवाकर सील कर दिया था। यह देखना पूरे देश के लिए और सिनेमा प्रेमियों के लिए बेहद दर्दनाक था कि जिस माँ ने पर्दे पर हमेशा अपने बेटों को आपस में प्यार से रहना सिखाया, जिसके एक आंसू पर बड़े-बड़े नायक अपनी जान देने को तैयार हो जाते थे। उसी मां के जाने के बाद उसके खुद के बेटे उसकी छोड़ी हुई दौलत के लिए एक दूसरे के खून के प्यासे बन गए थे। और यह कानूनी विवाद सालों तक चलता रहा जिसने निरूपा रॉय की उस पवित्र और ममतामई छवि पर एक अदृश्य और दुखद दाग लगा दिया। लेकिन इन तमाम विवादों और दुखों के बावजूद कला की दुनिया में निरूपा रॉय का स्थान हमेशा सर्वोच्च रहेगा और वे जब भी पर्दे पर सफेद साड़ी में नजर आएंगी हर दर्शक का सिर सम्मान से अपने आप झुक जाएगा। अभिनेत्री निरूपा रॉय का जन्म स्थान गुजरात के वसाड़ में स्थित उनका बेहद पारंपरिक और रूढ़िवादी पुश्तैनी घर था। जहां उनका शुरुआती बचपन बीता। शादी के बाद बंबई, मुंबई आने पर उन्होंने अपनी कड़ी मेहनत की बदौलत उस दौर में एक बहुत बड़ा और ऐतिहासिक मुकाम हासिल किया। उन्होंने अपनी सूझबूझ से मुंबई के सबसे पौश इलाके मालाबार हिल में समुद्र के ठीक सामने सी फेसिंग एक बेहद आलीशान भव्य और कीमती अपार्टमेंट खरीदा था। इसी मालाबार हिल वाले आलीशान आशियाने में अपने परिवार के साथ रहते हुए
साल 2004 में 73 वर्ष की आयु में उन्होंने अपनी अंतिम सांसे ली। निरूपा रॉय के फिल्मी सफर की शुरुआत साल 1946 में एक गुजराती अखबार में छपे विज्ञापन के जरिए हुई थी जिसके जवाब में उन्हें और उनके पति को चुना गया। उन्होंने अपने अभिनय की शुरुआत गुजराती फिल्म राणाक देवी से की। इसी साल यानी 1946 में ही उन्होंने अमर राज नाम की फिल्म से हिंदी सिनेमा में कदम रखा। 1940 के दशक के उत्तरार्ध और 1950 के पूरे दशक में निरूपा रॉय की पहचान आज की तरह किसी पीड़ित मां की नहीं बल्कि एक बेहद खूबसूरत और लोकप्रिय मुख्य अभिनेत्री की थी। इस शुरुआती दौर में उन्होंने सबसे ज्यादा प्रसिद्धि पौराणिक और धार्मिक फिल्मों से बटोरी। साल 1950 में आई फिल्म हर-हर महादेव उनके करियर की एक बहुत बड़ी ब्लॉकबस्टर साबित हुई। जिसमें उन्होंने भगवान शिव की भूमिका निभाने वाले अभिनेता त्रिलोक कपूर के अपोजिट देवी पार्वती का किरदार निभाया था। त्रिलोक कपूर के साथ उनकी जोड़ी इतनी लोकप्रिय हुई कि दोनों ने एक साथ लगभग 18 फिल्मों में काम किया, जिनमें ज्यादातर धार्मिक फिल्में थीं, उस दौर में निरूपा रॉय की देवी वाली छवि आम जनता के दिलों में इस कदर बस गई थी, कि लोग असल जिंदगी में उनके घर आकर उनके पैर छूते थे, और उनका आशीर्वाद लेते थे। इसी पौराणिक दौर के समानांतर निरूपा रॉय ने सामाजिक और यथार्थवादी फिल्मों में भी अपनी बहुमुखी प्रतिभा का लोहा मनवाना शुरू कर दिया था। साल 1953 में विमल रॉय के निर्देशन में बनी कालजई फिल्म अब दुबो बीघा जमीन निरूपा रॉय के करियर का सबसे बड़ा मील का पत्थर साबित हुई। बलराज साहनी के अभिनय से सजी इस यथार्थवादी फिल्म में निरूपा रॉय ने पार्वती यानी शंभू की पत्नी का किरदार इतनी शिद्दत और सादगी से निभाया कि देखने वाले दंग रह गए।
इस फिल्म ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ख्याति पाई और इसमें निरूपा रॉय को एक गंभीर और संजीदा अभिनेत्री के रूप में स्थापित कर दिया। इसके बाद उन्होंने भारत भूषण के साथ ऐतिहासिक फिल्मों की एक त्रई बनाई जिसमें कवि कालिदास, सम्राट चंद्रगुप्त और रानी रूपमती जैसी बेहतरीन फिल्में शामिल थी। विशेषकर साल 1959 में आई फिल्म रानी रूपमती और उसका गीत आ लौट के आजा मेरे मीत। आज भी दर्शकों के दिलों में बसा हुआ है। इस दौर में उन्होंने अशोक कुमार के साथ भाई और बेदर्द जमाना क्या जाने जैसी फिल्मों में भी मुख्य भूमिकाएं निभाई। निरूपा रॉय की फिल्मोग्राफी का एक बहुत ही शानदार पहलू यह रहा कि जब वे मुख्य अभिनेत्री के तौर पर काम कर रही थी, तभी उन्होंने चरित्र भूमिकाओं की तरफ रुख करना शुरू कर दिया। जिसने उन्हें सर्वकालिक महान अभिनेत्रियों की सूची में शामिल करवा दिया। साल 1955 में आई देव आनंद की सुपरहिट फिल्म मुनीम जी में उन्होंने एक बेहतरीन सहायक भूमिका निभाई। जिसके लिए उन्हें अपने जीवन का पहला फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का पुरस्कार मिला। इसके बाद साल 1961 में आई फिल्म छाया में सुनील दत्त और आशा पारे के साथ काम करते हुए उन्होंने अपनी अदाकारी का जादू बिखेरा और इसके लिए उन्हें अपना दूसरा फिल्म फेयर पुरस्कार मिला। दोस्तों, हमारे YouTube चैनल माय मेमोरी से जुड़ने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। अगर यह वीडियो पसंद आई हो, तो वीडियो को लाइक करना ना भूलें। साथ ही हमारे YouTube चैनल से जुड़ने के लिए चैनल को सब्सक्राइब करना ना भूलें। मिलेंगे अगली नई वीडियो में। सभी का धन्यवाद।