Cli

क्यों अंतिम दिनों में अपने ही पति को नहीं पहचान पाई गीता बाली? दर्दनाक कहानी रुला देगी

Uncategorized

अजय को कि गीता बाली जिन्हें हरकिरण कौर के नाम से भी जाना जाता था उनका जन्म तीस नवंबर 19 को सरदार करतारसिंह के यहां विभाजन के पूर्व अमृतसर पंजाब में हुआ था इनके पिता मदवि प्रचारक थे इस कारण इनके परिवार को बर्मा लंका महालय आदि देशों में बराबर जाना पड़ता था।

इस कारण गीता बाली की लड़ाई किसी एक स्कूल में ना होकर विभिन्न स्थानों पर हुई गीता बाली ने बतौर बाल कलाकार अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की थी लगभग 12 साल की उम्र में बतौर नायिका उनकी पहली फिल्म थी बदनामी जिसने उन्हें स्टार बना दिया था 1951 में भगवान दादा के साथ आई थी अलबेला जिसके गाने आज भी मशहूर है शोला जो भड़के दिल मेरा धड़के 1948 में प्रदर्शित सुहागरात से लेकर उन्हें 56 में प्रदर्शित रंगीन राधे तक पीता बाली केदार शर्मा के जीवन की प्रेरणा बनी रहेगी इन नौ साल में गीता बाली के बगैर फिल्म की कल्पना तक उन्होंने नहीं कि केदार शर्मा गीता बाली से किस कदर अभियुक्त और प्रभावित थे इसका अंदाजा एक घटना से सहज ही लगाया जा सकता है केदार शर्मा ने एक फिल्म बनाई थी बेदर्दी एक वेश्या की कहानी पर बनी इस फिल्म के नायक थे जसवंत जसवंत गीता के गीता बाली के सहारे फिल्मों में हीरो बनने की कोशिश में गीता बाली के अनुरोध पर केदार शर्मा को उन्हें बेदर्दी में नायक बने उस समय इधर शर्मा गीता बाली से कहा था जसवंत को अभिनय करना बिल्कुल नहीं और शायद ही फिल्मों में इस पर उन्हें समझाने के अंदाज में गीता बाली ने कहा शर्मा जी यह मेरे घर का मामला है मेरे खातिर उसे हीरो बना कर पेश कर दीजिए प्लीज इस प्लीज पर केदार शर्मा कुर्बान हो गए और उन्होंने जसवंत को बेदर्दी में जीता बालिका नायक बना दिया है कि इस दौरान गीता बाली और उनकी बहन ने अपनी फिल्म कंपनी बाली सिस्टर्स की स्थापना की और इसके बैनर में राग-रंग फिल्म शुरू की ।

यह फिल्म उन्हीं का निर्माण थी लिहाजा केदार शर्मा को लगा इसमें वह जसवंत को हीरो बनाएंगे लेकिन अपने घर के हीरो को परे रख उन्होंने फिल्म का हीरो बनाया अशोक कुमार को केदार शर्मा ने गीता वाली से कहा गीता जी मेरी फिल्में तो आपने जसवंत को नायक बनाने पर मजबूर किया लेकिन अपनी फिल्म में आपने अशोक कुमार को लिया इस पर गीता बोली क्या करें शर्मा जसवंत के नाम पर फिर बैक नहीं सकती ना मजबूरन अशोक कुमार को लेना पड़ा गीता बाली ने अपने फिल्म की मार्केटिंग का ख्याल किया और जसवंत को हीरो बनाने के लिए केदार शर्मा को काफी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा यह नुकसान उन्होंने उठाया सिर गीता बाली के खातिर मगर इसका अफसोस के दो शर्मा को बिल्कुल भी नहीं था ।

बाद में उन्होंने शम्मी कपूर से विवाह कर लिया गीता बाली और शम्मी कपूर की मुलाकात केदार शर्मा की फिल्म रंगीन रातें के सेट पर हुई गीता बाली उन दिनों हिंदी सिनेमा में अपने पैर जमा चुकी थी जब कि कपूर खानदान से ताल्लुक रखने के बावजूद शम्मी कपूर फिल्म में हासिल करने के लिए एरिया घिस रहे थे गीता बाली की सिफारिश पर ही शम्मी कपूर को यह फिल्म ली थी।

इसलिए जब सेट पर दोनों की मुलाकात हुई तो शम्मी कपूर गीता बाली के स्टारडम के कारण उनसे बात करने में हिचक रहे थे लेकिन जल्द ही दरियादिल गीता बाली ने अपने इस फ़िल्मी हीरो की हिचक को हवा में उड़ा दिया था कि गीता की दरियादिली बड़ी-बड़ी आंखें और मोहक मुस्कान में खुद को भुला बैठे समृद्धि शम्मी कपूर में एक गजब का लड़पन था यह मस्त-मौला गीता को भी रास आने लगा आउटडोर शूटिंग पर रानीखेत गई रंगीन रातें की टीम और निर्देशक केदार शर्मा की तिथि नजरों के बीच शुरू हुआ मुलाकातों का सिलसिला टीम की वापसी तक पूरा परवान चढ़ चुका था मुंबई पहुंचने तक दोनों जीने-मरने की कसमें खा चुके थे

शम्मी कपूर गीता के साथ शादी की कसम तो खा चुके थे लेकिन उन्हें बखूबी पता था कि यह इतना आसान भी नहीं होगा गीता बाली न केवल उससे उम्र में बड़ी थी बल्कि वह 920 बड़े भाई राज कपूर और आनंदमठ में पिता पृथ्वीराज कपूर की हीरोइन चुकी थी उस पर शम्मी कपूर का फिल्मी करियर जाहिर था कि कपूर खानदान को शादी की रजामंदी नहीं दे झाल लेकिन शमी थे कि गीता के लिए हर हद तोड़ने के लिए तैयार बैठे थे परिवार की नाखुशी उन्हें और बेकरार किए जा रही थी

गीता बाली शर्मा की इस परेशानी को समझ रही थी लेकिन वह कर भी क्या सकती थी समिति को इस परेशानी से निकाला उनके परम मित्र जॉनी वाकर ने खेल पांडा और मस्तमौला जॉनी उन्हीं दिनों अपनी को अपना बनाकर मुंबई लौटे थे और फिर मिलने की खुशी में जवानी का जोश पूरे शबाब पर था इसी जोश में उन्होंने शम्मी कपूर को भी अपने पदचिन्हों पर आगे बढ़ने की सलाह दे डाली थी और जॉनी ने न केवल सलाह दी बल्कि शम्मी कपूर में इतना आत्मविश्वास भर दिया कि वह कपूर खानदान के खिलाफ खिलाफत का झंडा बुलंद करने को तैयार हो गए।

शम्मी की सलाह आंवला के गीता बाली को तो नहीं जमीन लेकिन अपने प्यार को पाने का और कोई रास्ता भी उन्हें नजर नहीं आ रहा था बहरहाल वह तैयार हो गए 23 अगस्त 1955 की आधी रात को शम्मी कपूर जॉनी वॉकर और हरी वालिया के साथ मुंबई स्थित वानगंगा मंदिर में गीता से शादी करने के लिए जा पहुंचे जब मंदिर में पहुंचे तो दरवाजे बंद हो चुके थे इसीलिए पुजारी ने उनकी शादी कराने से इंकार कर दिया शमिद और हालत को देखते हुए उजारी ने उन्हें सुबह आने की सलाह दी और यह आश्वासन भी दिया कि मंदिर के कपाट खुलते ही शादी की पूरी रस्म अदा की जाएगी सवेरे 4 बजे शमी मंदिर के सामने हाजिर थे घी लोगों को अपना बनाने का उतावलापन और परिवार का डर उन पर इस कदर हावी विधा की हड़बड़ी में वह यह भी भूल गए कि शादी के लिए सबसे अहम चीज सिंदूर होती है रस्मों रिवाज निपटाने के बाद जब पुजारी ने उन्हें दुल्हन की मांग में सिंदूर भरने को कहा तो सकते में आ गए

शम्मी कपूर मौके की नजाकत को देखते हुए उन जीता बाली ने अपने लिपस्टिक शम्मी कपूर के हाथ में थमा दी और सिंदूर की जगह लिपस्टिक लगाकर ही एक-दूसरे के हो गए हैं कि फिल्म रंगीन रातें के दौरान ही शम्मी कपूर गीता बालिका साथ प्रेम में बदल गया और 24 अगस्त 1955 को गीता बाली ने शम्मी कपूर से शादी कर ली कभी-कभी पत्नी की किस्मत भी पति तकदीर बदल देती है गीता बाली से शादी करने के बाद जैसे समिति रूठी किस्मत जाग उठी शादी के बाद गीता ने न केवल श्रमिक खदान पर पर लगाम तस्वीर बल्कि उनके करियर की बागडोर भी अपने हाथों में ले ली गीता बाली के साथ ने न केवल शमी को अनुशासित किया बल्कि उनमें एक जिम्मेदारी भी पैदा की जिसकी वजह से वह करियर को लेकर काफी गंभीर हो गए हैं है 1957 में आई नासिर हुसैन की फिल्म तुमसा नहीं देखा कि धमाकेदार कामयाबी ने शम्मी कपूर के करियर का रुख ही बदल कर रख दिया शमी का बदला अंदाज लुक आरोपी ने छात्रा का म्यूजिक दर्शकों को खूब रास आया और समीर रातों-रात स्टार बन गए गीता और शमी का यह साथ ज्यादा दिनों तक नहीं रह सकता है कि 1965 में जब समरी फैंस तीसरी मंजिल की आउटडोर शूटिंग पर थे तो गीता को चेक हो गई थी गीता की बीमारी की खबर सुनकर बदहवासी में अस्पताल पहुंचे शमी जब गीता के सामने पहुंचे तो 160 डिग्री फैरनहाइट बुखार में तपती गीता उन्हें पहचानने में भी असमर्थ थी आखिरकार उन्हें बचाया नहीं जा सका गीता और शम्मी की इस प्रेम कहानी का अंत उसी मंदिर के पास हुआ जहां सात फेरे लेकर दोनों ने साथ जीने-मरने की कसम खाई थी।

इनको बचपन से ही नृत्य का शौक था नव वर्ष की उम्र में उन्होंने अपनी बड़ी बहन हरी दर्शन कौर के साथ लखनऊ में अपनी नृत्य कला का प्रदर्शन किया था इनकी जाति के मजहबी सिख लोगों ने शोर शराबा करने के पश्चात पंडाल के एक भाग को जला भी दिया था क्योंकि उनकी जाति के लोग उस समय लड़कियों को नृत्य कला क्षेत्र में लाना अच्छा नहीं समझते थे इसके पश्चात तो नहीं गीता बाली आकाशवाणी में बच्चों के प्रोग्राम में बराबर हिस्सा लेती थी आकाशवाणी के स्टूडियो में गीता बाली की मुलाकात प्रसिद्ध नृत्य निर्देशक पर ज्ञानशंकर से हुई जो पंजाबी फिल्म क्षेत्र में बहुत बड़ा नाम था सॉरी पिक्चर्स की फैन मोची में पहली बार कोरस के गायकों में उन्हें चांस मिला इसके पश्चात रूपेश्वरी कि फिल्म बदनामी में उनके सोलो नृत्य ने फिल्म निर्माताओं का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया लाहौर में महेश्वरी के यहां गए और पंचोली के पतझड़ जैसी फिल्मों में गीता बाली केंद्रित काफी पसंद किए गए एक प्रख्यात निर्देशक तथा अभिनेता ने लाहौर में इन दोनों बहनों को देखा और उनकी माता को मुंबई ले आए केदार शर्मा ने इन दोनों बहनों को देखा छोटी बहन हरभजन कौर बहुत सुंदर तो नहीं थी पर उसमें जो अभिनेत हुआ था।

वह केदार शर्मा ने देखा उससे उन्हें विश्वास हो गया कि यह लड़की एक दिन बहुत बड़ी अभिनेत्री बनेंगी हरकिरण कौर को निर्देशक केदार शर्मा ने सर्वप्रथम ओरिएंटल पिक्चर्स मुंबई की फिल्म सुहाग रात 1948 में पेश किया इसमें इन के नायक थे भारत भूषण संगीतकार थे स्नेहल भाटकर और गीत लिखे थे केदार शर्मा ने इस प्रकार केदार शर्मा ने हरकिरण कौर से इनका नाम गीता बाली रख दिया इसके पश्चात इन कि फिल्म जलसा इसके पश्चात तो उनके अभिनय से सजी फिल्मों की झड़ी सी लग गई इन्होंने हर प्रकार के रोल किए बड़ी बहन में कपटी बहन का रोल और सुहागरात में कम्मू का रोल बखूबी निभाया सुहागरात से रंगीन रातें तक गीता बाली केदार शर्मा के जीवन की प्रेरणा बनी रही है है रंगीन रातें में तो उन्होंने शुरू से अंत तक पुरुष भी यह काम किया बाजी के निर्देशक गुरुदत्त इस फिल्म के दौरान इनकी ओर आकर्षित हुए पर गीता बाली ने उनके तरफ ध्यान नहीं दिया तो गुरुदत्त ने गायिका गीता दत्त से शादी कर ली।

केदार शर्मा और गीता बाली के बीच काफी प्रेम अफवाहें फैली लेकिन गीता बाली उन्हें अपना गुरु मानती रही गीता बाली के स्वभाव की विशिष्ट अतिथि कि वह खुलकर अभिनय करती थी और खुलकर बातें करते थे कई लोग भ्रम में पड़ जाते थे कि वह उनसे प्यार करती हैं।

यह दुर्भाग्य है कि इनको बहुत बड़ी बड़ी फिल्में नहीं मिल सकी और मिली तो इनको सह नायिका के रोल से ही संतुष्ट होना पड़ा नूतन की तरह इनको भारतीय फिल्मों के अभिनेता सम्राट दिलीप कुमार के साथ नायिका बनने का मौका नहीं मिल सका ज्ञात रहे गीता बाली दिलीप कुमार के छोटे भाई ना सिर्फ उनकी नायिका बनकर कई फिल्मों में आ और सुखमय जीवन व्यतीत करते करते गीता बाली के जीवन का अचानक गंध ऐसे हुआ जो किसी भी अभिनेत्री का नहीं हुआ होगा गीता बाली को चेचक निकली और उन्हें बचाने का बहुत प्रयास किया गया पर प्रकोप कुछ ऐसा हुआ कि अंत में वह उनके प्राण ही लेकर गया गीता बाली 21जनवरी 1965 को सब कुछ छोड़कर सदा-सदा के लिए चली गई है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *