1 नवंबर 1965 को मुंबई के एक महाराष्ट्र परिवार में जन्मी पद्मिनी कोल्हापुरी का नाता बचपन से ही कला और संगीत से रहा। उनके पिता पदरीनाथ कोपुरी एक शास्त्रीय गायक थे। बहुत कम लोग जानते हैं कि संगीत सुर की रानी लता मंगेशकर और आशा भोंसले पद्मिनी के पिता की चचेरी बहनें थी। इस नाते लता जी और आशा जी उनकी बुआ लगती हैं। बचपन से ही पद्मिनी को आशा भोंसले जी का भरपूर प्यार और मार्गदर्शन मिला। आशा जी का चुलबुलापन और संगीत के प्रति उनका जुनून पद्मिनी के व्यक्तित्व में साफ दिखाई देता था। आशा जी की प्रेरणा से ही पद्मिनी जी ने बहुत कम उम्र में गाना शुरू किया। उन्होंने अपनी बहन शिवांगी के साथ मिलकर यादों की बारात और किताब जैसी फिल्मों के गानों में कोर्स भी गाया था।
संगीत के साथ-साथ पद्मिनी की मासूमियत और अभिनय क्षमता ने निर्देशकों का ध्यान खींचा। उन्होंने 1970 के दशक में बतौर बाल कलाकार चाइल्ड आर्टिस्ट अभिनय करना शुरू किया। सत्यम शिवम सुंदरम 1978 राज कपूर की इस महान फिल्म में पद्मिनी जी ने जीनत अमान के बचपन का किरदार निभाया। इस फिल्म के गाने यशोदा का नंदलाला में उनकी मासूमियत और अभिनय ने पूरे देश का दिल जीत लिया। 1980 का साल पद्मनी जी के जीवन की दो बड़ी घटनाएं लेकर आया। एक तरफ उनकी एक्टिंग की तारीफ हो रही थी। दूसरी तरफ एक ऐसी घटना घटी जिसने भारत से लेकर ब्रिटेन तक हंगामा मचा दिया। ब्रिटेन के प्रिंस चार्लस भारत दौरे पर आए हुए थे और मुंबई में फिल्म आहिस्ताआहिस्ता के
सेट पर पहुंचे थे। उस समय पद्मनी जी सिर्फ 15-16 साल की थी। जैसे ही प्रिंस चार्लस आरती की थाली लेकर स्वागत के लिए खड़ी पद्मनी के पास पहुंचे उत्साह में आकर पद्मिनी जी ने प्रिंस चार्ल्स के गाल पर किस कर दिया। 80 के दशक में भारत के लिए यह बेहद चौंकाने वाली बात थी। अखबारों और पत्रिकाओं की सुर्खियां बन गई। एक भारतीय लड़की ने ब्रिटिश राजकुमार को चूमा। हालांकि समय के साथ लोगों को समझ आया कि वह सिर्फ एक मासूम और दोस्ताना भाव था। 1980 में रिलीज हुई बी आर चोपड़ा की फिल्म इंसाफ का तराजू उनके करियर का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुई। इस फिल्म में उन्होंने एक संवेदनशील और गंभीर भूमिका निभाई जिसने दर्शकों को और समीक्षकों को दोनों को झकझोर कर रख दिया। महज 15 साल की उम्र में इस दमदार अभिनय के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस का फिल्म फेयर पुरस्कार मिला। 1980 के दशक में पद्मिनी कोल्हापुरी बॉलीवुड की सबसे सफल अभिनेत्रियों में शुमार हो गई।
उन्होंने उस दौर के हर बड़े स्टार के साथ काम किया। 80 के दशक की सुपरस्टार और प्रेम रोग। इसके बाद पनमनी जी ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1982 में आई राज कपूर की फिल्म प्रेम रोग उनके करियर का मिल का पत्थर बनी। ऋषि कपूर के साथ उनकी केमिस्ट्री और एक युवा विधवा के दर्द को जिस तरह उन्होंने पर्दे पर उतारा उसके लिए उन्हें फिल्मफेयर बेस्ट एक्ट्रेस का पुरस्कार मिला। सोतन में राजेश खन्ना के साथ उनका गाना शायद मेरी शादी का ख्याल और प्यार झुकता नहीं। में मिथुन चक्रवर्ती के साथ उनकी जोड़ी ने बॉक्स ऑफिस पर सफलता के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। इसके अलावा विधाता सपनों का मंदिर और स्वर्ग से सुंदर जैसी फिल्मों ने उन्हें हर घर की चहेती बना दिया। फिल्म ऐसा प्यार कहां?
1986 की शूटिंग के दौरान उनकी मुलाकात निर्माता प्रदीप शर्मा प्रदीप शर्मा से हुई। दोनों में प्यार हुआ और उन्होंने 21 साल की बेहद छोटी उम्र में शादी करने का फैसला किया। उस समय उनके परिवार वाले इस शादी के लिए तैयार नहीं थे। लेकिन अपनी बहन शिवांगी और शक्ति कपूर के सहयोग से उन्होंने शादी की। शादी के बाद उन्होंने अपने परिवार और बेटे प्रियंक को प्राथमिकता देने के लिए फिल्मों से दूरी बना ली। वर्षों बाद पद्मिनी ने पानीपत और फटा पोस्टर निकला हीरो जैसी फिल्मों में दोबारा वापसी की। आज भी वह अपनी सुरीली आवाज, संगीत और बेहतरीन अभिनय के जरिए दर्शकों के दिलों में बसी हुई है। कहानी की सीख पद्मिनी कोलापुरी की कहानी हमें सिखाती है कि अगर आपके पास हुनर, लगन और हिम्मत हो तो तो उम्र कोई बाधा नहीं बनती। उन्होंने बहुत छोटी उम्र में अपनी प्रतिभा के दम पर अपनी पहचान बनाई और अपनी शर्तों पर जिंदगी जीकर भारतीय सिनेमा में इतिहास रचा।