नाना पाटेकर, विश्वनाथ पाटेकर की जिंदगी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। उनकी आवाज का दम, डायलॉग डिलीवरी का अंदाज और एक्टिंग का खास स्टाइल उन्हें बॉलीवुड के सबसे अलग और बेहतरीन कलाकारों में शुमार करता है। नाना पाटेकर जी का जन्म 1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के मरुड जंजीरा में हुआ था। उनका असली नाम विश्वनाथ पाटेकर है। उनके पिता कपड़ों के व्यापारी थे। लेकिन एक समय ऐसा आया जब उन्हें व्यापार में बड़ा नुकसान हुआ और परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद खराब हो गई। घर के हालात इतने कठिन थे कि नाना पाटेकर जी को छोटी सी उम्र में ही काम करना पड़ा।
उन्होंने सिनेमा के पोस्टर पेंट करने का काम शुरू किया। जिसके लिए उन्हें दिन के महज ₹5 और एक वक्त का खाना मिलता था। इस कठिन संघर्ष के बीच भी उन्होंने अपनी पढ़ाई नहीं छोड़ी और मुंबई के सर जे जे इंस्टट्यूट ऑफ अप्लाइड आर्ट से ग्रेजुएशन पूरा किया। पढ़ाई के दौरान ही नाना जी का झुकाव एक्टिंग और नाटक की तरफ हुआ। उन्होंने मराठी थिएटर में अपनी दमदार अदाकारी से सभी का ध्यान अपनी ओर खींचा। नाना पाटेकर जी को फिल्मों में पहला ब्रेक मिलने का किस्सा काफी दिलचस्प है। जिसमें मराठी थिएटर उनकी जिद्द और दिग्गज अभिनेत्री समिता पाटिल का सबसे बड़ा हाथ था। फिल्मों में आने से पहले ही नाना पाटेकर मुंबई और पुणे में मराठी थिएटर रंगमंच के एक जानेमाने और मंझे हुए एक्टर बन चुके थे। वह नाटकों में अपनी डायलॉग डिलीवरी और आक्रामक एक्टिंग शैली के लिए थिएटर जगत में मशहूर थे। दिग्गज अभिनेत्री समिता पाटिल नाना पाटेकर जी को उनके पुणे और मुंबई थिएटर के दिनों से जानती थी और उनके अभिनय की बहुत बड़ी फैन थी। जब निर्देशक मुजफ्फर अली अपनी डेब्यू फिल्म गमन 1978 बना रहे थे जिसमें फारूक शेख और स्मिता पाटिल लीड रोल में थे। तब स्मिता पाटिल जी ने नाना पाटेकर को फिल्मों में काम करने की सलाह दी।
नाना पाटेकर शुरुआत में फिल्मों में आने के लिए बिल्कुल राजी नहीं थे। वह सिर्फ थिएटर में ही खुश थे। लेकिन स्मिता पाटिल के जोर देने पर उन्होंने गमन में वासु नाम का एक छोटा सा सपोर्टिंग रोल स्वीकार किया। यही उनकी पहली फिल्म बनी। गमन के बाद भी नाना पाटेकर जी को कुछ सालों तक कोई बड़ी पहचान नहीं मिली। इसके बाद 1984 में बी आर चोपड़ा बैनर की फिल्म आज की आवाज के दौरान एक दिलचस्प मोड़ आया। समता पाटिल नाना पाटेकर जी को लेकर निदेशक रवि चोपड़ा के पास गई। मेकर्स ने शुरुआत में नाना पाटेकर जी को एक छोटा सा साइड रोल दिया। नाना पाटेकर जी को वह रोल इतना खराब लगा कि वो वो गुस्सा होकर ऑडिशन छोड़कर जाने लगे। समिता पाटिल जी ने उन्हें रोका और मेकर्स से बात की। नाना जी के कड़े रवय और आत्मविश्वास को देखकर मेकर्स ने उन्हें एक बेहतर रोल जगमोहन दास दिया। इस फिल्म में उनकी परफॉर्मेंस की बॉलीवुड में खूब तारीफ हुई। इसके बाद साल 1979 में आई विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म परिंदा। इस फिल्म में उन्होंने अन्ना सेठ का नेगेटिव किरदार निभाया। उनकी एक्टिंग इतनी जबरदस्त थी कि उन्हें इस रोल के लिए बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का नेशनल अवार्ड मिला। परिंदा के बाद नाना पाटेकर जी ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने हर तरह के किरदार निभाए। चाहे विलेन हो, पुलिस अफसर हो या कोई आम आदमी। तिरंगा 1901 में। राजकुमार जी के साथ उनकी जोड़ी
और उनका डायलॉग पिघल गई मॉम बन गया स्टील। आज भी मशहूर है। क्रांतिवीर 1994 इस फिल्म में उनका यह मुसलमान का खून यह हिंदू का खून वाला डायलॉग आज बॉलीवुड के इतिहास में सबसे आइकॉनिक सीन माना जाता है। इस बेहतरीन परफॉर्मेंस के लिए उन्हें बेस्ट एक्टर का नेशनल अवार्ड मिला। खामोशी द म्यूजिकल 1996 उन्होंने एक मूक बाधि पिता का एक संवेदनशील रोल निभाया जिसने हर किसी का दिल जीत लिया। वेलकम 2000 साल। उन्होंने उदय शेट्टी का कॉमेडी रोल निभाकर यह साबित कर दिया कि वह कॉमिक टाइमिंग में भी बेमिसाल है। फिल्म प्रहार 1991 की शूटिंग से पहले नाना पाटेकर जी ने भारतीय सेना की मराठा लाइट इनफेंट्री के साथ 3 महीने की कड़ी ट्रेनिंग ली थी। ट्रेनिंग के बाद उन्हें आर्मी के ऑन डेली कैप्टन की रैंक दी गई। बहुत कम लोग जानते हैं कि नाना पाटेकर जी को खाना बनाने का बहुत शौक है और वह एक बेहतरीन शेफ हैं। उनकी अपनी एक सीक्रेट रेसिपी है जिसे नाना कीमा कहा जाता है। जब भी शूटिंग का ब्रेक होता है, वह अक्सर पूरी फिल्म क्रू और दोस्तों के साथ खुद खाना बनाते हैं। करोड़ों की संपत्ति होने के बावजूद भी नाना मुंबई में अपने एक वन बीएचके फ्लैट में अपनी अपनी मां के साथ रहते हैं। उनके घर में कोई महंगे झूमर या आलीशान सोफे नहीं है। वह जमीन पर सोना और साधारण कपड़े पहनना पसंद करते हैं। नाना पाटेकर जी ने एक इंटरव्यू में बताया था
कि उन्होंने अपने पहले बेटे को महज 8 साल की उम्र में खो दिया था। उनके बेटे को जन्म से ही आंखों और सेहत से जुड़ी गंभीर समस्याएं थी। इस घटना ने नाना जी को अंदर से पूरी तरह बदल दिया था। नाना पाटेकर जी ने बिना स्क्रिप्ट पढ़े साइन की थी परिंदा। विधु विनोद चोपड़ा जब नाना पाटेकर जी के पास फिल्म परिंदा लेकर गए तो तो नाना जी ने उन्हें कहा कि वे स्क्रिप्ट नहीं पढ़ेंगे। उन्होंने सिर्फ एक शर्त रखी कि अगर उन्हें अपना रोल पसंद नहीं आया या डायरेक्टर ने सीन के साथ समझौता किया तो वह सेट छोड़कर चले जाएंगे। नाना पाटेकर अपनी व्यक्तिगत कमाई का लगभग 80 से 90% हिस्सा गरीब किसानों, शहीदों के परिवारों और जरूरतमंदों की मदद में दान देते हैं। महाराष्ट्र में जब किसान सूखे की वजह से आत्महत्या कर रहे थे तब नाना पाटेकर जी आगे आए और उनकी मदद की। साल 2015 में उन्होंने अभिनेता मकरंद अनासपुर के साथ मिलकर नाना फाउंडेशन की शुरुआत की। यह संस्था सूखाग्रस्त किसानों की आर्थिक मदद देती है। नदियों तालाबों को साफ करवाती है और किसान परिवारों को आत्मनिर्भर बनाने का काम करती है। अपनी मेहनत, कला और समाज सेवा के दम पर नाना पाटेकर ने जो मुकाम हासिल किया है, वह हर किसी के लिए प्रेरणादायक है।