एक पेट्रोल पंप की कल्पना कीजिए। पीली सफेद रोशनी, मशीन पर भागते नंबर, हाथ में नोजल पकड़े कर्मचारी, बाइक पर बैठा शख्स या कार की खिड़की से बाहर निकलता एक हाथ। और एक सीधा सवाल, प्योर पेट्रोल मिलेगा क्या? जवाब आता है यहां सिर्फ E20 ही है। आप पूछते हैं E10? जवाब आता है नहीं।
यही इस पूरी कहानी का पेट्रोल है। सरकार कह रही है E20 साफ है। बेहतर है, साइंटिफिक है। हम और आप कह रहे हैं कि बातें सारी अच्छी हैं। लेकिन मेरी गाड़ी, मेरे माइलेज, मेरी जेब और मेरी चॉइस का क्या? और सरकार का फाइनल जवाब चॉइस नहीं दे सकते क्योंकि देश में 1 लाख से ज्यादा पेट्रोल पंप हैं, रिफाइनरीज हैं। टर्मिनल, डिपो और पाइपलाइंस का कॉम्प्लेक्स सिस्टम है। प्योर पेट्रोल, E10 और E20 को अलग-अलग रखना बहुत बड़ा लॉजिस्टिकल चैलेंज होगा। लागत बढ़ेगी। सिस्टम और जटिल हो जाएगा। 10 जुलाई को नरेंद्र मोदी सरकार ने लंबे चौड़े एफएक्यू में यही दलीलें दी है।
साफ कहा ई20 पेट्रोल ही अब स्टैंडर्ड है क्योंकि यह ज्यादा साफ है। कम प्रदूषण फैलाता है। इसकी ऑक्टेन रेटिंग ज्यादा है। एंटीनॉक प्रॉपर्टी बेहतर है। बेहतर पिकअप और एक्सीलरेशन देता है। इंजन बढ़िया तरीके से चलता है। इस आशय की सूचना के साथ देश के सभी पेट्रोल पंप पर बोर्ड भी लगा दिए गए हैं। लेकिन यहां पर कंडीशन अप्लाई वाला एक छोटा सा तारांकन भी है। सरकार मान रही है कि E20 के चलते कुछ गाड़ियों का माइलेज 3 से 5% तक गिर सकता है। लेकिन उनकी दलील यह भी है कि माइलेज ही सब कुछ नहीं होता। परफॉर्मेंस देखिए। पॉल्यूशन और एनर्जी सिक्योरिटी भी देखिए। सरकार की दलीलें सुनने में अच्छी लगती है।
लेकिन जनता पेट्रोल पंप पर लेक्चर नहीं भरवाती। टैंक भरवाती है। तेल देखती है और तेल की धार भी। उसे इनवॉइस पर लीटर दिखता है। ओडोमीटर पर किलोमीटर दिखता है। सर्विस सेंटर पर बिल दिखता है और महीने के आखिर में अपनी जेब दिखती है। पर सरकार को सिर्फ लॉजिस्टिकल दिक्कतें दिखती हैं। यानी दुनिया की सबसे तेज स्पीड से बढ़ रही इकॉनमी जो चांद के दक्षिणी ध्रुव पर रोअ उतार चुकी है। जहां के बाशिंदे 10 मिनट में ऑनलाइन धनिया मंगा लेते हैं।
वहां एक पेट्रोल पंप पर दो अलग-अलग नोजल से दो तरह का पेट्रोल देना हमारी कार्यकुशलता को कम कर देगा। ऐसा सरकार का कहना है मासूमियत भरे इनपुट के साथ कि जब E20 जैसा सुपीरियर ईंधन मौजूद है तो आप जानबूझकर घटिया सादा पेट्रोल क्यों मांग रहे हैं? एक इमोशनल कार्ड भी खेला गया। बताया कि सरकारी बैंकों ने एथेनॉल प्रोडक्शन और उसके इंफ्रास्ट्रक्चर में हर साल करीब ₹1 लाख करोड़ का निवेश किया है। तो अगर हम वापस लौट जाए तो इस भारी भरकम निवेश का क्या होगा? किसानों, सहकारी समितियों और सरकारी कंपनियों ने जो हजारों करोड़ रुपए भरोसे पर लगाए हैं उनका क्या होगा? आप मतलब समझिए। सरकार ने एक नीति बनाई।
उसमें बैंकों का ₹1 लाख करोड़ लगा दिया गया और अब उस निवेश को बचाना है तो ग्राहक को E20 ही खरीदना पड़ेगा। आपकी 10 साल पुरानी गाड़ी का इंजन अगर इस 20% एथेनॉल से रो रहा है तो उसे चुप कराइए क्योंकि देश के बैंकों का पैसा लगा है तो आपकी गाड़ी का इंजन थोड़ी सी कुर्बानी तो दे ही सकता है। पब्लिक पॉलिसी को बैलेंस जो करना है। पर सवाल एक और भी है। इस टॉक्सिक रिलेशनशिप का इमोशनल बर्डन सिर्फ आम जनता ही क्यों झेले? अगर इन्वेस्टमेंट की सुरक्षा जरूरी है तो ग्राहक की चॉइस कैसे गैर जरूरी होगी?
अगर किसान किसी जन कल्याणकारी योजना का हिस्सा है तो गाड़ी से चलने वाले आम लोग इससे बाहर कैसे और अगर एथेनॉल बनाने वालों का इंफ्रास्ट्रक्चर सबका साझा है तो फिर हमारी आपकी गाड़ी प्राइवेट प्रॉब्लम कैसे हो गई? इन सवालों के जवाब में सरकार ने ऑटोमोबाइल कंपनियों को अपनी ढाल बनाया। दलील सुनिए। अगर ऑटो कंपनियों को दिक्कत होती तो वे वारंटी क्यों देती? Maruti Suzuki ने वित्त वर्ष 2025-26 में 2 करोड़ 84 लाख गाड़ियों की सर्विसिंग की जिसमें 1.5 करोड़ पुरानी गाड़ियां थी। यानी E20 वाली नहीं थी। इनमें से किसी में भी E20 की वजह से रंग लगने, पुरजे घिसने या डैमेज की शिकायत नहीं मिली। Hero Mot का भी यही कहना है। यानी सरकार का सीधा सा तर्क है कि अगर रबर के पुरजे या फ्यूल लाइन खराब हो रहे होते तो लाखों के वारंटी क्लेम आते, शिकायतों का अंबार लगता जो कि बिल्कुल नहीं हुआ।
हालांकि बीते ही दिन हमारे बिजनेस एडिटर शशि से बात करते हुए ट्रांसपोर्ट मिनिस्टर नितिन गडकरी [गला साफ़ करने की आवाज़] ने कहा था कि निर्देश दिया गया है ऑटो कंपनियों को कि जो भी इस वजह से कल पुर्जों में खराबी आ रही है उसका बिना पैसे लिए उसकी सर्विसिंग की जाए उसको बदला जाए और हमारी स्वतंत्र तस्दीक में भी यह बात पाई गई ऑथराइज सर्विस सेंटर पर लेकिन बात यह है कि मैकेनिक आपको जो बता रहे हैं कि एथेनॉल पानी सोखता है और इससे इंजन में जंग लग रही है वो झूठ बोल रहा है क्या जो आप खुद महसूस कर रहे हैं कि आपकी पुरानी पुरानी गाड़ी पिकअप नहीं दे रही है।
वह आपका वहम है क्या? सरकारी डाटा कहता है ई20 से पिकअप बेहतर होता है तो आपको बेहतर महसूस क्यों नहीं हो रहा? सरकार अपने बचाव में फिर से ब्राजील को ले आई। बोली वहां भी तो एथेनॉल का धड़ल्ले से इस्तेमाल होता है। वहां तो कोई सवाल नहीं उठता। आप ब्राजील को क्यों नहीं देखते? बिल्कुल ब्राजील को देखना चाहिए। पर पूरा देखना चाहिए क्योंकि सरकार ब्राजील की मास्टर क्लास अपनी सुविधा अनुसार भूल जाती है। ब्राजील में बायोफ्यूल का इस्तेमाल भारत से कहीं ज्यादा सफल है। लेकिन क्यों? क्योंकि ब्राजील की सरकार ने वन साइज फिट्स ऑल नहीं थोपा। और ऐसा इसलिए हो पाया क्योंकि वहां पर एथेनॉल की कहानी 1970 के दशक में ऑयल क्राइसिस के साथ शुरू हुई। सरकार ने एथेनॉल को सिर्फ आदेश से नहीं इकोसिस्टम से चलाया। इंसेंटिव दिए, टैक्स ब्रेक दिए, जागरूकता अभियान चलाए। 2003 से ही फ्लेक्स फ्यूल व्हीकल्स का अंबार लगाया।
यानी ऐसी गाड़ियां जो तरह-तरह के ईंधनों से चल सके। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के मुताबिक ब्राजील में फ्लेक्स फ्यूल गाड़ियां इस तरह से बनाई गई ताकि ग्राहकों को E27 और E00 के बीच भी चॉइस मिल सके। इस फर्क को अच्छे से समझिए। ब्राजील ने पहले ग्राहक तैयार किए, फिर गाड़ी तैयार की, फिर पंप तैयार किए, फिर कीमत तय की और आखिर में एथेनॉल बढ़ाया। लेकिन जब भारत में ग्राहक पेट्रोल पंप पर पहुंचता है तो उससे कहा जाता है आपकी चॉइस लॉजिस्टिक्स में फंस गई है। यानी ब्राजील मॉडल में जल्दबाजी नहीं थी। हमारे यहां मामला उल्टा है। पहले पॉलिसी आती है, फिर पोस्टर लगता है, फिर एफए आता है और फिर जनता को बताया जाता है। आपको घबराना नहीं है। सब साइंटिफिक है। कुल जमा ये एथेनॉल और पेट्रोल की लड़ाई नहीं है। साफ ईंधन और खराब ईंधन की लड़ाई भी नहीं है।
यहां बात ट्रांजिशन की है। बात इतनी कि क्या एथेनॉल को विकल्प बनाकर आम ग्राहक का भरोसा मांगा जा रहा है या फिर मजबूरी बनाकर। जवाब नीति नियंताओं को देने हैं। क्योंकि लोकतंत्र में फ्यूल से टैंक में नहीं जाता। नीति में भी जाता है और जब नीति में विकल्प कम हो जाए तो इंजन नहीं भरोसे में जंग लगने लगती है।