हर पेरेंट्स चाहता है कि उनका बच्चा साफ-साफ और अच्छा बोले। बच्चों का बोलना सीखना एक खूबसूरत लेकिन धीरे-धीरे आगे बढ़ने वाला प्रोसेस है। इस दौरान वह कई शब्दों का गलत उच्चारण करते हैं। कुछ आवाजों को ठीक से नहीं बोल पाते या अपनी बात कहने से अटकते हैं। आमतौर पर माता-पिता इसे उम्र का हिस्सा मानकर नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन सवाल यह है कि कब बच्चे की अस्पष्ट बोली या गलत उच्चारण पर एक्सपर्ट्स की सलाह लेनी चाहिए?
दरअसल टीवी एक्ट्रेस देवीना बनर्जी ने हाल ही में अपनी 3 साल की बेटी को स्पीच के पास ले जाकर इसी सवाल पर ध्यान खींचा है। उन्होंने अपने एक वॉग में स्पीच के साथ बेटी की मुलाकात की झलक शेयर की। देवीना ने बताया कि उनकी बेटी भी दूसरे बच्चों की तरह कई बार शब्दों का गलत उच्चारण करती है या उन्हें ठीक तरह से नहीं बोल पाती। उनका मानना था कि बच्चों को बार-बार डांटकर सही बोलने के लिए कहना उसके आत्मविश्वास को प्रभावित कर सकता है। इसलिए उन्होंने इसे किसी समस्या को ठीक कराने के बजाय सही तरीके से गाइड पाने का जरिया माना। अब सवाल यह है कि 3 साल में कितनी अस्पष्ट बोली नॉर्मल है? बच्चों का लैंग्वेज डेवलपमेंट एक जैसी गति से नहीं होता। कुछ मामलों में बोलने की परेशानी इस उम्र में नॉर्मल हो सकती है।
लेकिन एक्सपर्ट्स के मुताबिक सिर्फ यह देखना जरूरी नहीं कि बच्चा कितने शब्द बोल रहा है। यह देखना भी जरूरी है कि उसकी बात दूसरे लोग कितनी आसानी से समझ पाते हैं। एक्सपर्ट्स के मुताबिक अगर उम्र के हिसाब से बच्चे की बात समझना लगातार मुश्किल हो रहा है। वो बार-बार कुछ आवाजों का गलत उच्चारण करता है या बात समझने में ना आने पर निराश होने लगता है तो इस पर ध्यान देना चाहिए।
लगभग 3 साल की उम्र में आमतौर पर अनजान व्यक्ति भी बच्चे की कही ज्यादातर बातें समझ लेता है। डॉक्टर्स के मुताबिक 2 साल के बच्चे की करीब आधी बात अनजान व्यक्ति समझ सके। 3 साल की उम्र में करीब 3/4 और 4 साल तक लगभग पूरी बात समझ में आनी चाहिए। हालांकि हर बच्चे की विकास की गति अलग होती है।
बच्चे के उच्चारण में लिस यानी कुछ आवाजों के अलग तरीकों से निकलने पर भी माता-पिता घबरा जाते हैं। एक्सपर्ट्स के मुताबिक सामने की ओर जीभ रखकर निकाले जाने वाला फ्रंटल लिस्प करीब 4 साल की उम्र तक विकास का सामान्य हिस्सा हो सकता है। लेकिन जीभ के किनारे से निकलने वाली आवाज जिसे लेटरल लिस कहा जाता है और जो कुछ हद तक स्लशी या गीली आवाज जैसी लगती है। नॉर्मल नहीं मानी जाती और इसकी जांच करानी चाहिए। अगर बच्चा बार-बार गलत समझे जाने की वजह से बोलने से बचने लगे या किसी से बातचीत करते वक्त निराश होने लगे तो एक्सपर्ट से सलाह लेने में ज्यादा देर नहीं करनी चाहिए।
देवीन बनर्जी की चिंता का एक इंपॉर्टेंट पहलू यही है कि बच्चे को सही बोलना सिखाने का तरीका क्या हो। एक्सपर्ट्स भी सलाह देते हैं कि बच्चे के हर गलत उच्चारण पर उसे रोक कर ऐसे नहीं ऐसे बोलो कहना सही तरीका नहीं है। के मुताबिक स्पष्ट बोलने, बच्चे के साथ जोर से पढ़ने और उसे बिना गलती के डर के संवाद करने के लिए इंस्पायर करने की सलाह देती है। घर पर बार-बार उसकी बोली सुधारने से बचना चाहिए। बच्चे के उच्चारण का मजाक उड़ाने या उस पर दबाव बनाने से भीबचना चाहिए।
3 साल के बच्चे के लिए स्पीच भी खेल खेल में और सहज तरीके से होनी चाहिए। एक्सपर्ट्स एडवाइस यह है कि डेली सिर्फ 5 से 10 मिनट की एक्टिविटी भी मददगार साबित हो सकती है। कुल मिलाकर 3 साल के बच्चे का साफ-साफ ना बोल पाना कोई घबराने की वजह नहीं है।
अगर उसके बाद भी उसके उच्चारण में सुधार नहीं आता या फिर बोलने में दिक्कत आए तो स्पीच से सलाह लेना बेहतर है।