Cli

वो कां!ड जिसे छिपाने में बिहार से दिल्ली तक की सरकार लग गई !

Uncategorized

बिहार विधानसभा में काम करने वाली एक लड़की बला की खूबसूरत कहने वाले कहते हैं कि विधानसभा में बड़े-बड़े नेता उसकी एक निगाह भर को तरसते थे। पसंद का आलम यह था कि उसके घर नेताओं का आना-जाना हर वक्त लगा ही रहता था। अचानक एक रात उस लड़की की तबीयत खराब हो जाती है। एक डॉक्टर को लिए एक नेता का बेटा उसके घर पहुंचता है। लेकिन उस कमरे में नहीं गया जहां लड़की सोई थी। बल्कि अहाते में गाड़ी लगाकर बैठा रहा। डॉक्टर कमरे में गया। घर के नौकर से गुनगुना पानी मांगा। पानी में एक दवाई मिलाई और उस लड़की को पिला दी। उसकी मां से कहा, सुबह तक बेटी ठीक हो जाएगी। घबराने की बात नहीं है। लेकिन जब सुबह हुई तो क्या नजारा था? घबराहट तो नहीं थी, लेकिन पूरे पटना की सड़कों पर एक सन्नाटा सा था और चौराहों पर चर्चाओं का भंवर। क्योंकि विधानसभा वाली उस लड़की की मौत हो चुकी थी। यह कोई आम मौत नहीं थी क्योंकि सामान्य होती तो 4 घंटे के भीतर उसकी लाश को दफन नहीं किया जाता। मौत के ठीक बाद दो-दो डेथ सर्टिफिकेट्स नहीं बनते। बिहार सरकार के दो मंत्री और 40 विधायक मुख्यमंत्री को धमकी नहीं देते। धमकी यह अगर मामला खुला तो सरकार गिरा देंगे। दाल में कुछ काला था। यह कहावत भी दम तोड़ चुकी थी क्योंकि पूरी की पूरी दाल ही काली थी। पूरी विधानसभा लपेटे में थी। बिहार के बड़े-बड़े नेताओं के कुर्तों पर धब्बा लगने वाला था। हाथ पैर फूलने लगे थे। कौन थी यह लड़की जिसकी मौत को छिपाने के लिए बिहार से लेकर दिल्ली तक की सरकार लग गई? क्या थी उस लड़की की कहानी जिसकी मरी हुई देह को जमीन खोदकर दोबारा निकाला गया? और वो अफसर कौन था? जो पूरी सरकार के दबाव को धता बताते हुए नेताओं की धरपकड़ में लग गया था। और जब सूबे के मुख्यमंत्री ने उस अफसर को फोन किया तो सामने से जवाब मिला सर इस मामले में मत पड़िए। यह ऐसी आग है कि हाथ जल जाएगा। एक ऐसा दौर जब बिहार मानो कत्लगाह बन गया हो। तब एक अदना सा एसएसपी सूबे के मुख्यमंत्री को यह बात क्यों कह रहा था कि हाथ मत लगाइए जल जाएंगे। यह कौन सी आग थी और मुख्यमंत्री इस कत्ल की जांच को लेकर इतने फिक्रम क्यों थे? क्योंकि इस आग का धुआं बिहार विधानसभा से ही निकला था और लपटें उन घरों तक पहुंच रही थी जहां कलफदार कुर्ता गांठे बड़े-बड़े नेता बैठे हुए थे। चिंगारी की जद यह थी कि डीजीपी ने कह दिया था नेताओं के बेटों को गिरफ्तार करना क्या इतना आसान है?

तो क्या किसी नेता से पूछताछ हुई? क्या 42 साल बाद भी यह राज पता चल सका कि उस लड़की की हत्या किसने की थी? कौन सा रहस्य था जिससे पर्दा उठ जाने की सूरत में लोकतंत्र का बलात्कार होने का डर दिखाया गया? नमस्कार, मैं हूं भूपेंद्र सोनी और आप देख रहे हैं खबरगांव की खास पेशकश मगध साम्राज्य। आज के एपिसोड में कहानी बिहार में हुए सबसे सनसनी केस बॉबी मर्डर केस की। एक लड़की के मर्डर की कहानी जिसे छिपाने के लिए पुलिस से लेकर सीबीआई तक के हाथ में सियासी हथकड़ी लगा दी गई। तो चलिए तफसील से उस फिल्मी मर्डर की कहानी शुरू करते हैं। [संगीत] [प्रशंसा] [प्रशंसा] इस पूरी कहानी में एक लड़की है, एक पुलिस अफसर है। थोक के भाव में विधायक है। कई मंत्री हैं। विधान परिषद की एक पूर्व अध्यक्ष हैं और हैं खूब सारे फोन कॉल्स। कहानी के हर पन्ने पर एक फोन कॉल है। जैसे ही आप सोचेंगे कि चलो अब कहानी सीधी हो चली है तब एक फोन की घंटी बज जाएगी और इस कहानी में फिर से एक नया मोड़ आ जाएगा। तो हम भी कहानी शुरू कर रहे हैं एक कॉल से ही जो आई थी 9 मई 1983 के दिन। पटना के तत्कालीन एसएसपी किशोर कुणाल को इंडियन एक्सप्रेस से जुड़े एक पत्रकार हेमेंद्र नारायण का फोन आता है। ना हेलो ना हाय। सीधे एक सवाल सर पटना में कोई सनसनीखेज मर्डर हुआ है क्या? कुणाल जवाब देते हैं मेरा वायरलेस हमेशा खुला रहता है। लेकिन ऐसी कोई सूचना नहीं है। दूसरी ओर से कुणाल को बताया जाता है कि सचिवालय थाना क्षेत्र में एक लड़की की हत्या कर दी गई है। मामले में कई बड़े नेताओं का नाम आ रहा है। एसएसपी हक्के बक्के रह जाते हैं। फोन कटा तुरंत उन्होंने इलाके के दूसरे अफसरों को फोन घुमा दिया। लेकिन उन अधिकारियों को भी किसी हत्या की जानकारी नहीं थी। निर्देश मिला कि पूरे पटना में धुआं है यानी कहीं ना कहीं आग तो जरूर लगी होगी। पता कीजिए। अधिकारियों ने अगले दिन यानी 10 मई को रिपोर्ट एसएसपी के टेबल पर रखी। पता चला कि एक लड़की थी विधानसभा में काम करती थी। नाम था बॉबी। उसकी मौत हो गई है। शब्द पर गौर कीजिए। अधिकारियों ने बताया था कि उसकी मौत हो गई है। यानी हत्या का जिक्र नहीं था। पता यह भी चला कि लड़की ईसाई थी इसलिए एक कब्रिस्तान में उसे दफन कर दिया गया है। इससे ज्यादा कोई जानकारी नहीं थी। लेकिन अगली सुबह इस केस से जुड़े कुछ दफनराज अखबारों के पहले पन्ने पर दर्ज होते हैं। 11 मई 1983 का दिन हर रोज की तरह एक सामान्य सी सुबह शहर में वही गाड़ियों की पैप चाय की टपरियों पर चै लेकिन उस सुबह इस चै का शोर कुछ ज्यादा था। क्योंकि आज और प्रदीप नाम के दो अखबारों ने फ्रंट पेज पर एक तड़कती भड़कती खबर छाप दी थी। उसी बॉबी की हत्या की खबर। खबर छपी और हड़कंप मच गया। इतना कि एसएसपी किशोर कुणाल को एक एफआईआर दर्ज करनी पड़ी। जिसमें बॉबी की मौत को अननेचुरल डेथ बताया गया। मुकदमा लिखे जाने के बाद शुरू हुई तफ्तीश। [संगीत] तफ्तीश पर तफसील से बात करेंगे। लेकिन एक नजर उस बॉबी की जिंदगी पर भी मार लेते हैं। जिस पर सियासी टोले की कितनी ही निगाहें टिकी हुई थी और जिसकी मौत पूरे पटना में गॉसिप बन चुकी थी। बॉबी का असल नाम था श्वेत निशा त्रिवेदी। उसे जानने वाले लोग बेबी कहा करते थे और पसंद करने वाले बॉबी। उम्र थी 35 साल। कांग्रेस इंदिरा गुट की विधायक और विधान परिषद की स्पीकर रही राजेश्वरी सरोज दास की गोद ली हुई बेटी। असल माता-पिता कौन थे किसी को नहीं मालूम या कहें कि जिन्हें पता था

उन्होंने कभी बताया ही नहीं। इंडिया टुडे मैगजीन में 15 जून 1983 को छपी फरजंद अहमद की रिपोर्ट के मुताबिक बॉबी कॉलेज ड्रॉप आउट थी। शादीशुदा थी। पहली शादी टूट चुकी थी। दूसरे पति के साथ उसके दो बच्चे थे। लेकिन कभी यह जानकारी नहीं मिल सकी कि यह दोनों पुरुष आखिर थे कौन। बॉबी की हत्या के बाद जितनी मीडिया रिपोर्ट्स छपी या जितनी भी चर्चाएं हुई उन सभी चर्चाओं में उसका सबसे बड़ा परिचय था उसकी खूबसूरती। सायन कुणाल द्वारा लिखी अपने पिता और पटना के तत्कालीन एसएसपी किशोर कुणाल की जीवनी दमन तक्षकों का में भी इस खूबसूरती पर ठीक-ठाक शब्द खर्चे गए हैं। वो लिखते हैं उसके अपूर्व सौंदर्य से अभिभूत होकर उसके प्रशंसकों ने राज कपूर की सुपरहिट फिल्म बॉबी की नायिका के नाम पर श्वेत निशा का नाम बॉबी रख दिया था। और तब से वो इसी नाम से जानी जाती थी। उस पर मर मिटने की तमन्ना रखने वाले कुछ एक जुनूनी शख्स आपसी बातचीत में उसे पाटलिपुत्र की नगरवधू भी पुकारते थे। विधानसभा के बहुत सारे माननीय सदस्य उसके रूप पर लट्टू हो गए थे और उसके इर्द-गिर्द चक्कर लगाते थे। उसकी एक नजर पड़ जाने पर नेता निहाल हो उठते थे। उसकी एक दृष्टि पर सृष्टि के सभी सुखों की वृष्टि हो जाती थी। श्वेत निशा के नेत्रों में भी अद्भुत मोहक शक्ति थी और उसकी वाणी में मधु सी चासनी थी। चर्चाएं चली कि यह बॉबी पर फिदा नेताओं की ही देन थी जो उसे बिहार विधानसभा ऑपरेटर की नौकरी मिली। आरोप लगे कि सिर्फ उसे नौकरी देने के लिए ही प्राइवेट बोर्ड एक्सचेंज को अस्थाई तौर पर विधानसभा में शुरू कराया गया। कुछ वक्त बाद जब यह समाप्त हो गया तो बॉबी को सचिवालय में संपादक के पद पर बहाल कर दिया गया। सोचिए एक कॉलेज ड्रॉप को सचिवालय में संपादक की नौकरी दी गई। विधान परिषद की स्पीकर रही राजेश्वरी सरोज दास की गोद ली हुई बेटी होने की वजह से उससे मिलने वालों का तांता लगा रहता था। पॉलिटिकल कनेक्शन और उसकी सुंदरता ने नेताओं का एक चक्र बॉबी के चारों तरफ बना दिया था। नेता भी एरेगैरे नहीं बल्कि बड़े-बड़े मंत्री तक इस घेरे में शामिल थे। [संगीत] जब बॉबी की मौत हुई तब वह सचिवालय में ही नौकरी कर रही थी। रोज की तरह वही विधानसभा आने जाने और इस बीच नेताओं की पार्टियों में जाने का सिलसिला चलता रहता था। बॉबी नेताओं की हर पार्टी में पॉइंट ऑफ अट्रैक्शन बन चुकी थी। जहां भी वह खड़ी होती थी, नेताओं का गोला बन जाता था। लेकिन अचानक 8 मई को उसकी कहानी बदल जाती है। बदलती क्या है? बल्कि पूर्ण विराम ही लग जाता है। पॉइंट ऑफ अट्रैक्शन हमेशा के लिए मिट गया। बॉबी की अचानक मौत हो जाती है। उसकी मौत पर पहले तो सन्नाटा छा जाता है। लेकिन यह एक सियासी तूफान के पहले का सन्नाटा था और जो तूफान आने वाला था उसमें सियासी रस्सी पर लटके कितने ही सफेद कुर्ते उड़ने वाले थे। क्योंकि यह किसी आम लड़की की मौत नहीं थी। एक हाई प्रोफाइल नाम जिसका नाम कई मंत्रियों और विधायकों से जुड़ा हुआ था और ऐसी महिला को मरने के 4 घंटे के भीतर ही दफन कर दिया गया और तो और एक ही लड़की की मौत के लिए दो डेथ सर्टिफिकेट्स भी बन गए। दोनों ही डेथ सर्टिफिकेट राजेश्वरी सरोज दास ने पुलिस को जांच के दौरान दिए थे। इनमें से पहला मृत्यु प्रमाण पत्र विधानसभा के डॉक्टर डॉक्टर के के झा द्वारा जारी किया गया था। जिनके मुताबिक मृत्यु का संभावित कारण इंटरनल ब्लीडिंग था। दूसरा सर्टिफिकेट इंदिरा गांधी हृदय रोग संस्थान के कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. अशोक कुमार ठाकुर ने बनाया था। जिसमें लिखा था कि बॉबी की मौत सुबह 4:30 बजे हार्ट अटैक से हुई थी। जबकि विधानसभा वाले डॉक्टर झा ने कहा था कि उन्होंने सुबह 4 बजे बॉबी की जांच की थी। इन दोनों के बताए समय को क्रॉस करें तो कहानी ऐसी बनती है कि जब मरी हुई बॉबी का डेथ सर्टिफिकेट डॉक्टर झा बना रहे थे तब डॉक्टर अशोक के मुताबिक वो जिंदा थी और आधे घंटे बाद उसने आखिरी सांस ली।

इस टाइमिंग के मैच ना होने से पता चल गया था कि दूध में पानी नहीं बल्कि पानी में दूध मिलाने की जुगत चल रही थी। इसी दूध का दूध और पानी का पानी करने के लिए एसएसपी किशोर कुणाल ने मामले की जांच करने का मन बना लिया। जांच के लिए सबसे जरूरी था बॉबी का पोस्टमार्टम 100स फुल प्रूफ रिपोर्ट जिससे मौत की असल वजह पता चल सके। लेकिन विडंबना यह थी कि बॉबी की लाश को पहले ही दफन कर दिया गया था। ऐसे में एसएसपी किशोर कुणाल ने बॉबी की लाश को कब्र से बाहर निकलवाया। पोस्टमार्टम के लिए भेजा। लेकिन पोस्टमार्टम की रिपोर्ट आई तो एसएसपी साहब भी सन रह गए। क्योंकि रिपोर्ट में कुछ भी असामान्य नहीं था। एसएसपी को बात समझ आई। लाश जमीन के नीचे थी इसलिए काफी हद तक डीकंपोज हो चुकी थी। इसलिए पोस्टमार्टम से कुछ खास पता नहीं चल पाया। ऐसे में एक फैसला लिया गया। तय हुआ कि बॉबी के शरीर का विसरा फॉरेंसिक लैब भेजा जाए। विरा यानी शरीर के इंटरनल और बड़े ऑर्गन्स जैसे फेफड़ा, हृदय, आमाशय और जनना। जांच हुई। एक हफ्ते बाद विसरा टेस्ट की रिपोर्ट आई तो नतीजे चौंकाने वाले थे। रिपोर्ट बता रही थी कि बॉबी को मेलाथियन नाम का एक जहर दिया गया था जो कि एक कार्बनिक फास्फोरस कीटनाशक है। इस रिपोर्ट के बाद पुलिस सोच में पड़ गई कि आखिर बॉबी को जहर किसने दिया और क्यों दिया? इन सवालों के कान चौक चौराहों पर चल रही गसिप की ओर खुल रहे थे। जहां हर सुबह शाम चाय पीते हुए बॉबी के मंत्रियों विधायकों से संबंध की थ्योरीज चल रही थी। लेकिन पुलिस की जांच गसिप से नहीं चलती। सबूतों से चलती है। ऐसे में पुख्ता सबूत तलाशने की जरूरत थी। जिसके लिए पूछताछ करनी पड़ती है। तो पूछताछ से पहले पुलिस ने मर्डर का केस दर्ज किया क्योंकि पुलिस को यह भरोसा हो चुका था कि बॉबी की सामान्य मौत नहीं हुई है बल्कि उसे मारा गया है। वह भी इसलिए कि उसके साथ ही राजनीति के कुछ घिनौने राज दम तोड़ दे। केस तो दर्ज हो गया लेकिन पूछताछ में खुद पुलिस डिपार्टमेंट के आला अधिकारी रोड़ा अटका रहे थे। किताब दमन तक्षकों का में दर्ज है कि तत्कालीन डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल यानी डीआईजी नरेंद्र नारायण सिंह की मनाही की वजह से ना किसी की गिरफ्तारी हुई और ना ही पूछताछ हुई क्योंकि इस मामले में शक के घेरे में ज्यादातर नेता ही थे। इसलिए तत्कालीन डीजीपी ने कहा कि जब तक पुख्ता केस नहीं बन जाता किसी नेता से पूछताछ नहीं की जा सकती। स्टेट पुलिस के टॉप अधिकारियों का यह रवैया साफ बता रहा था कि वह कानून के लंबे हाथों को नेताओं के गिरेबान से दूर रखना चाहते थे। भले ही उनके खिलाफ सबूत क्यों ना हो, भले ही इंसाफ दम क्यों ना तोड़ दे, लेकिन पुलिस यह जान चुकी थी कि बॉबी को जहर देकर मारा गया है और यह सब एक साजिश के तहत हुआ है। लेकिन उसे अभी दो सवालों के जवाब तलाशने थे। कौन और क्यों? [संगीत] इन्हीं सवालों का जवाब तलाशने की जुगत शुरू होती है और कहानी में एंट्री होती है तीन लड़कों की जो राजेश्वरी सरोज के आउट हाउस में रहते थे। पटना एसएसपी ने तय किया कि नेताओं से भले पूछताछ ना हो पाए लेकिन इस केस से जुड़े बाकी दूसरे लोगों से पूछताछ जरूरी होगी और फिर यह तीनों लड़के तो उसी घर में रहते थे जहां पूरी कहानी को अंजाम दिया गया था। तो पुलिस को लगा इन्हीं से पूछताछ करेंगे तो नेताओं के खिलाफ ठोस सबूत मिल सकेगा और इसलिए उन तीनों लड़कों की खोज भी शुरू हुई। पता चला कि वो तीनों अपने गांव चले गए हैं। लेकिन किसी को यह पता नहीं था यह तीनों लड़के आखिर किस गांव के हैं।

यह काफी अजीब बात लगती है। जो लड़के किसी के घर में रहते हो। उस घर के हर काम में मदद करते हो। उन्हें ही नहीं पता था कि यह लड़के आखिर कहां के रहने वाले थे। पूरा प्लॉट फिल्मी जहां गवाह गायब सबूत पर्याप्त नहीं और पुलिस के हाथों में सियासी हथकड़ी तो कहीं आप यह तो नहीं सोच रहे कि कहानी फिर से सीधी हो गई है। पुलिस के लिए यह केस अंधेरी सुरंग बन गया। तो जब ऐसा लगने लगा ठीक उसी वक्त एक और फोन बच गया। पता चला कि उस तीन में से एक लड़का आउट हाउस में लौट आया है। 15 दिनों तक बाढ़ जोह होने के बाद एक लड़का मिल गया। लड़के का नाम था निर्भय कुमार। निर्भय पटना के अनुग्रह नारायण कॉलेज यानी एएन कॉलेज में 12वीं क्लास का स्टूडेंट था। पुलिस ने निर्भय को धर लिया। पूछताछ शुरू हुई। पहला और सबसे अहम सवाल पूछा गया बताओ 7 मई की रात हुआ क्या था? निर्भय ने उस रात की पूरी कहानी बयां की। निर्भय ने जो कहानी पुलिस को सुनाई उसमें एक नया किरदार जुड़ गया। नाम त्रिशूलधारी सिंह जो एक टेलीफोन ऑपरेटर था। पुलिस ने उसे भी पकड़ लिया। अब उससे पूछताछ शुरू हुई। दो प्रत्यक्षदर्शी पुलिस के हाथ लग चुके थे। केस मजबूत हो चुका था। पुलिस ने दोनों गवाहों को जुडिशियल मैजिस्ट्रेट सूर्यकांत मिश्र के सामने पेश किया। 25 मई 1983 की तारीख दोनों गवाहों ने कोर्ट में अपना बयान दर्ज करवाया जिससे पता चला कि आखिर 78 मई की दरमियानी रात को हुआ क्या था। त्रिशूलधारी सिंह ने बताया 7 मई की शाम 7:00 बजे की बात है। राजेश्वरी सरोज दास से फोन पर बात हुई। उनसे मैंने पूछा कि मेरे भाई की नौकरी का क्या हुआ? उन्होंने इस बारे में कुछ नहीं बताया और कहा कि तुम्हारी बेबी दीदी की तबीयत खराब है। इस बीच हमारे रिसेप्शन पर फोन आया कि कोई दोस्त आया है। मैं तुरंत बाहर गया तो देखा कि डॉक्टर विनोद कुमार गाड़ी लेकर खड़े हैं। डॉक्टर विनोद ए एन कॉलेज के सामने रहते थे। मैं उन्हें पहले से ही जानता था। डॉक्टर साहब ने हमसे कहा कि आपकी दीदी बेबी की तबीयत खराब है। साथ चलिए। एंबेसडर कार से हम दोनों निकले। स्पीकर साहब के डेरे के सामने पहुंचे। वहां स्पीकर के बेटे रघुवर झा इंतजार कर रहे थे। फिर रघुवर झा भी हमारे साथ गाड़ी में बैठ गया। वहां से हम लोग स्ट्रेन रोड क्वार्टर नंबर 11 पर पहुंचे। यह राजेश्वरी सरोज दास का एड्रेस था। त्रिशूलधारी के बयान के मुताबिक रघुवर झा गाड़ी में बैठा रहा। डॉक्टर और वो घर के अंदर गए। डॉक्टर ने घर के नौकर निर्भय कुमार से पानी मंगाया। पानी में ग्लूकोज घोला। साथ में एक दवाई मिलाई। पानी बेबी को पिला दिया। डॉक्टर ने कहा कि सुबह तक बेबी ठीक हो जाएगी। इसके बाद तीनों वहां से चले गए। लेकिन सुबह जब हुई तो बेबी ठीक नहीं हुई बल्कि मर गई। त्रिशूलधारी ने कोर्ट को बताया था कि 11 मई को मैंने बेबी की खबर आज अखबार में पढ़ी। मैं सरोज दास के घर गया। उन्होंने मुझसे कहा कि देखो जमाना बहुत खराब है। तुम मेरे यहां मत आया जाया करो। शाम में रघुवर झा ने टेलीफोन किया और हमसे कहा कि बेबिया का नाम पेपर में आ गया है।

कहीं भी कोई पूछे तो हमारे बारे में कुछ नहीं कहना। रघुवर झा ने मुझे काफी धमकी दी और कहा कि अगर बात खुल गई तो या तो हम रहेंगे या तुम। बकौल त्रिशूलधारी 5 मई को बेबी यानी बॉबी ने फोन पर रोते हुए उसे बताया था कि आजकल उसकी पहचान करुणेश्वर सिंह नाम के शक से बढ़ गई है। इस वजह से रघुवर झा उसे काफी तंग कर रहा था। त्रिशूलधारी सिंह ने जो बातें कोर्ट में कही वही बातें निर्भय कुमार ने बताई। दोनों का बयान मैच कर रहा था। निर्भय ने कोर्ट में ही बताया था कि इस घटना के करीब 1/2 महीने पहले स्पीकर साहब के लड़के रघुवर झा के साथ बेबी का झगड़ा हुआ था। यह झगड़ा क्यों हुआ था पता नहीं लेकिन बेबी ने खुद हमसे कहा था कि रघुवर झा से उनकी बाताती हो गई है। निर्भय ने यह बयान भी दिया कि राजेश्वरी सरोज दास के घर में मंत्री विधायक आते जाते रहते थे। बेबी से भी मिलते थे। बेबी स्पीकर के घर भी कभी-कभी जाती थी। [संगीत] निर्भय और त्रिशूलधारी ने जो गवाही दी उसमें एक नाम सामने आया रघुवर झा। यह शख्स आखिर कौन था? रघुवर झा कांग्रेस के बड़े नेता और बिहार विधानसभा के स्पीकर रहे राधा झा का बेटा था। राधा झा 1980 से 85 के दौरान बिहार विधानसभा के स्पीकर थे। दोनों गवाहों ने बॉबी मर्डर केस में बताया था कि बॉबी कई बार स्पीकर के घर जाया करती थी। जहां रखबर रहता था। इसके ठीक उलट भी होता था। कई मंत्री और विधायक बॉबी के घर भी आते थे। बहाना होता था राजेश्वरी से मिलने का लेकिन मिलते वो बॉबी से भी थे। यह सारे डॉट्स कनेक्ट होकर जो कहानी करते हैं उसका मतलब यही बनता है कि इस केस में सत्ताधारी पार्टी के सफेद पोश शामिल थे। यही वजह थी कि तब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने कहा था कि मुख्यमंत्री पुलिस को अपराधियों को गिरफ्तार करने की अनुमति नहीं दे रहे हैं क्योंकि वह सत्तारूढ़ पार्टी के राजनीतिक आका है। इसी वजह से बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रहे कर्पूरी ठाकुर ने उस वक्त इस हत्या की जांच सीबीआई को सौंपने की मांग की थी। लेकिन दिलचस्प है कि जब विपक्षी नेताओं से लेकर खुद आईपीएस किशोर कुणाल सीबीआई जांच की मांग कर रहे थे तब इस मांग को इग्नोर कर दिया गया। लेकिन जैसे ही पुलिस ने कोर्ट में गवाहों का बयान दर्ज करा दिया। एसएसपी कुणाल ने राजेश्वरी सरोज दास का भी बयान कोर्ट में दर्ज करा दिया और यह मामला एकदम पानी की तरह साफ हो गया। यानी अब आरोपियों की गिरफ्तारी करने की बारी थी। तब अचानक बिहार सरकार ने बॉबी मर्डर केस की जांच सीबीआई को सौंप दी। आखिर क्यों? सवाल है कि जब स्टेट पुलिस की जांच पूरी हो चुकी थी तब इसे सीबीआई के पास ट्रांसफर क्यों किया गया? पहले तो खुद सरकार ने सीबीआई जांच की मांग को ठेंगा दिखा दिया था। लेकिन जैसे ही जांच पूरी हुई इसे सीबीआई के डेस्क पर पटक दिया गया।

लेकिन क्यों? किसे बचाने की कोशिश हो रही थी और बचा कौन रहा था? क्या यह सब बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र के इशारे पर हो रहा था। वाकया है कि कोर्ट में गवाहों के बयान दर्ज होने के ठीक बाद दो मंत्री और 40 विधायक पहुंच गए मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र के दफ्तर। सीएम पर दबाव डाला गया। कहा गया कि मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी जाए। किशोर कुणाल की किताब से पता चलता है कि उन्हें एक पत्रकार ने फोन कर बताया था कि मंत्रियों और विधायकों ने सीएम को धमकी दी है। मिश्र को धमकाया गया कि अगर जांच सीबीआई के हवाले नहीं की गई तो उनकी सरकार गिरा दी जाएगी। अब यहां एक सवाल और पैदा होता है। इन मंत्रियों और विधायकों को यह कॉन्फिडेंस कैसे मिला कि सीबीआई जब मामले की जांच करेगी तो यह लोग बच जाएंगे। क्या सेंट्रल एजेंसी के ऊपर कोई था जिस पर इन नेताओं को पूरा यकीन था? यकीन यह कि ऊपर बैठा वो किरदार उनके कुर्ते पर धब्बा लगने से बचा लेगा। बहरहाल बॉबी मर्डर केस सीबीआई के हवाले कर दिया गया। जांच को तब लीड कर रहे थे एजेंसी के जॉइंट डायरेक्टर रामचंद्रन। रामचंद्रन पटना पहुंचे। बिहार डीजीपी और पटना एसएसपी किशोर कुणाल के साथ मीटिंग की। मीटिंग के दौरान रामचंद्रन ने कुणाल की जांच प्रक्रिया की तारीफ की। इस मीटिंग के बाद पता चला कि जांच से रामचंद्रन को किनारे कर दिया गया। उनके बजाय आईपीएस विजय शंकर इस जांच को लीड करने लगे। विजय शंकर का एक परिचय यह था कि वह बिहार के पूर्व आईजीपी और डीजीपी एपी मिश्र के दामाद थे। यानी तत्कालीन मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र के हम गोतिया। खैर, सीबीआई की जांच की रिपोर्ट सामने आई जिसमें दर्ज था कि बॉबी की हत्या किसने की थी? सीबीआई की रिपोर्ट जब बाहर आई तो सब चौंक गए। क्योंकि सीबीआई की इस रिपोर्ट में बॉबी की मौत को आत्महत्या बताया गया था। लगभग 1 बरस बाद डिप्टी सुपरिटेंडेंट के एन तिवारी ने 14 मई 1984 को सीबीआई कोर्ट में रिपोर्ट पेश कर दी। सीबीआई की इस पूरी रिपोर्ट में क्या दर्ज था उसे पॉइंट द पॉइंट समझते हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक बॉबी को उसके एक प्रेमी ने धोखा दिया जिससे वह काफी परेशान चल रही थी। धोखे से परेशान होकर उसने एंटी डिप्रेशन दवाई का ओवरडोज ले लिया। बॉबी ने एक सुसाइड नोट लिखा था

जिसे सरोज दास के कहने पर निर्भय ने जला दिया। रिपोर्ट में आगे दर्ज था कि सरोज दास ने बॉबी से जुड़े काफी दस्तावेज जला दिए ताकि बड़े लोगों के नाम ना आए। पुलिस ने त्रिशूलधारी सिंह और निर्भय कुमार को कस्टडी में रखकर टॉर्चर किया। सीबीआई के मुताबिक टॉर्चर की वजह से ही दोनों गवाहों ने रघुवर झा का नाम लिया। रघुवर झा 7 मई को पटना से बहुत दूर एक गांव में शादी के कार्यक्रम में मौजूद था। यानी सीबीआई के मुताबिक रघुवर झा का इस कत्ल में कोई हाथ नहीं था। इस तरह एक साफ-साफ दिख रहे केस पर धूल झोंक दी गई। जिस केस को बिहार पुलिस ने मर्डर केस साबित किया था उसे ही सीबीआई ने सुसाइड केस बना दिया था। और तर्क ऐसे जो हमेशा शक के घेरे में रहे। सीबीआई ने बॉबी की मौत को एक सुसाइड केस बताकर फाइल को बंद कर दिया। लेकिन आज भी बिहार में यह चर्चा आम है कि इस केस में बिहार के कई बड़े-बड़े नेता नब चाहते और उन्हें बचाने के लिए इस पूरे मामले पर ही मिट्टी डाल दी गई। और इस तरह इंसाफ की आंखों पर काली पट्टी बांध दी गई। न्याय के तराजू पर बट्टा मार दिया गया। लेकिन दिलचस्प है उस दौर के एक विधायक की बात जो उन दिनों मीडिया रिपोर्ट्स में छपी थी। विधायक ने कहा था गनीमत है इस केस में सच सामने नहीं आया। वरना बिहार की सरकार गिर जाती। सिर्फ सरकार ही नहीं गिरती बल्कि लोकतंत्र बदनाम हो जाता। क्योंकि हमाम में सब नंगे थे। तो यह थी बॉबी मर्डर केस की पूरी कहानी जिसके अंतिम पन्ने पर लिखा है कि बॉबी की हत्या नहीं बल्कि उसने आत्महत्या की थी। भले ही सच्चाई कुछ भी हो। मगध साम्राज्य की इस किश्त को यहीं समाप्त करते हैं। अगले एपिसोड में कहानी बिहार के उस दशक की जो लालू प्रसाद यादव के समर्थकों के लिए सामाजिक न्याय का दौर था और लालू यादव के विरोधियों के लिए जंगल राज का जमाना। पूरी कहानी देखिएगा जरूर मगध साम्राज्य पर। आप देख रहे थे खबर गांव। शुक्रिया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *