सात ऐसे नेता जिन्होंने अपनी मर्जी से मुख्यमंत्री का पद छोड़ा और बर्बाद हो गए। इनकी कहानियां किसी फिल्म की स्टोरी से कम नहीं है। नंबर सात बाबूलाल गौर तो शुरू करते हैं नंबर सात से और यह कहानी थोड़ी अलग है क्योंकि बाकी सब नेताओं ने कोई ना कोई गलती की। घोटाला किया, विवाद हुआ या कोर्ट केस आया लेकिन इस आदमी ने कुछ नहीं किया। बिल्कुल कुछ नहीं। कोई घोटाला नहीं, कोई विवाद नहीं, कोई केस नहीं, कोई बगावत नहीं। फिर भी इनकी कुर्सी चली गई। यह है बाबूलाल गौर की कहानी। बाबूलाल गौर का जन्म 2 जून 1930 को उत्तर प्रदेश के एक बेहद गरीब परिवार में हुआ। बचपन में इतनी गरीबी थी कि पढ़ाई करना भी मुश्किल था। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। बड़े आगे बढ़े और मध्य प्रदेश की राजनीति में आए। वो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस से जुड़े थे। जमीन से जुड़े नेता थे। वह पद में उनकी पकड़ बहुत मजबूत थी। लेकिन उन्हें पसंद करते थे। लोग उन्हें पसंद करते थे क्योंकि वह आम आदमी की भाषा में बात करते थे। 1990 के दशक से वह मध्य प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के अहम नेता थे। विधानसभा में उनकी आवाज सुनी जाती थी। 2003 में मध्य प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की लहर आई। उमा भारती के नेतृत्व में पार्टी जीती। वो मुख्यमंत्री बनी। लेकिन 2004 में उमा भारती को एक कोर्ट केस की वजह से हटना पड़ा। तो पार्टी ने किसे चुना? बाबूलाल गौर को। वो खुश हुए। उनके समय खुश हुए। जनता ने भी स्वीकार किया। अगस्त 2004 में बाबूलाल गौर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। अब सोचो यह आदमी दशकों से राजनीति कर रहा था। पूरी जिंदगी लगा दी और आखिरकार जब सबसे बड़ी कुर्सी मिली तो बस 11 महीने सिर्फ 11 महीने। नवंबर 2005 में भारतीय जनता पार्टी की दिल्ली वाली हाईकमान ने तय किया बाबूलाल गौर को हटाओ।
क्यों? कोई ठोस वजह सामने नहीं आई। बस इतना कहा गया कि पार्टी को नया चेहरा चाहिए। शिवराज सिंह चौहान को मौका दो। और गौर जी उन्हें बुलाया गया। बताया गया और उन्होंने चुपचाप इस्तीफा दे दिया। एक शब्द नहीं बोले। एक शिकायत नहीं की। पार्टी के वफादार सिपाही की तरह चुप रही। अब सोचो अगर तुम्हारे साथ ऐसा हो 40 साल मेहनत करो। पार्टी के लिए सब कुछ करो और जब सबसे बड़ा मौका मिले तो 11 महीने में छीन जाए। वो दैद कितना गहरा होगा। उसके बाद शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री बने और शिवराज जी वो 2005 से 2018 तक लगातार मुख्यमंत्री रहे। फिर 2020 में वापस आए। यानी करीब 15 साल और बाबूलाल गौर वह गृह मंत्री बने, कैबिनेट मंत्री बने, विधायक बने। लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी फिर कभी नसीब नहीं हुई। 2017 में भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें चुनाव लड़ने से भी रोक दिया। कहा आप बुजुर्ग हो गए हो। 87 साल के बुजुर्ग ने मीडिया से कहा, “मुझे बहुत दुख हुआ। बस इतना। इससे ज्यादा कुछ नहीं बोले।” 2019 में 89 साल की उम्र में उनका निधन हो गया। एक ऐसा इंसान जिसने जिंदगी भर पार्टी की सेवा की, कभी विद्रोह नहीं किया, कभी धोखा नहीं दिया और बदले में राजनीति ने उन्हें क्या दिया।
11 महीने की मुख्यमंत्री की कुर्सी और फिर गुमनामी। यह थी नंबर सात की कहानी। अब चलते हैं नंबर छह पर और यह कहानी थोड़ी ज्यादा दर्दनाक है क्योंकि यह इंसान तीन बार राजा था और फिर भी एक आंधी में सब उड़ गया। नंबर छह जगन्नाथ मिश्रा तीन बार मुख्यमंत्री। सुना तीन बार। आज के जमाने में एक बार मुख्यमंत्री बनना भी बड़ी बात होती है। और यह आदमी तीन बार बिहार की गद्दी पर बैठा। लेकिन तीनों बार कुर्सी छोटी और तीसरी बार हमेशा के लिए। जगन्नाथ मिश्रा का जन्म 1937 में बिहार के एक मैथिल ब्राह्मण परिवार में हुआ था। पढ़े लिखे थे। अर्थशास्त्र में पढ़ाई की। बिहार विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे लेकिन राजनीति का बुखार था। उनके बड़े भाई ललित नारायण मिश्रा इंदिरा गांधी के जमाने में रेल मंत्री थे। 1975 में उनकी हत्या हुई एक बम धमाके में। इस हत्या के बाद जगन्नाथ मिश्रा ने राजनीति में कदम रखा और एकदम तेजी से ऊपर चढ़े। 1975 में पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने। 1980 में दूसरी बार इस दौरान वह बिहार कांग्रेस के सबसे बड़े नाम बन चुके थे। लोगों ने डॉक्टर साहब कहते थे। उनके कार्यकाल में एक विवाद हुआ था बिहार प्रेस विधेयक। उन्होंने पत्रकारों पर अंकुश लगाने वाला कानून बनाने की कोशिश की। पूरे देश के पत्रकारों ने विरोध किया। आखिरकार वह विधेयक वापस लेना पड़ा। लेकिन इससे उनकी लोकप्रियता कम नहीं हुई। 1989 में तीसरी बार मुख्यमंत्री बने। यह उनका आखिरी मौका था और इस बार जो आंधी आई वह किसी ने नहीं देखी थी। 19890 का दौर बदलाव का दौर था। बीपी सिंह प्रधानमंत्री बने और उन्होंने मंडल कमीशन की सिफारिश से लागू कर दी। पिछड़े वर्गों को सरकारी नौकरियों में 27% आरक्षण।
इस एक फैसले ने पूरे उत्तर भारत की राजनीति पलट दी। बिहार में अचानक जाति की राजनीति हावी हो गई। यादव, कुर्मी, कोयरी यह सब एकजुट हुए और इस लहर पर सवार होकर आया। एक युवा बेलौस तेज तर्रार नेता लालू प्रसाद यादव 1990 के चुनाव में लालू की जनता दल ने जीत हासिल की। कांग्रेस बुरी तरह हारी। जगन्नाथ मिश्रा हारे। उन्होंने खुद कुर्सी छोड़ी। लालू मुख्यमंत्री बने और उसके बाद बिहार में कांग्रेस का सूरज डूब गया। जो पार्टी कभी सब पर हावी थी। वो एकदम हासिए पर चली गई। जगन्नाथ मिश्रा ने वापसी की कोशिश की। पार्टी बदली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में गए। जनता दल में गए, वापस कांग्रेस में आए। लेकिन बिहार की राजनीति में अब जगह नहीं थी। वह लोकसभा सांसद बने, राज्यसभा सांसद बने, केंद्र में मंत्री बने। लेकिन बिहार के मुख्यमंत्री फिर कभी नहीं। एक और बात उनके ऊपर चारा घोटाले से जुड़ा मामला भी था। यह वही घोटाला है जिसमें लालू प्रसाद यादव का नाम है। जगन्नाथ मिश्रा पर भी आरोप लगे। साल 2013 में अदालत ने उन्हें दोषी पाया। 4 साल की सजा सुनाई। बिहार के तीन बार के मुख्यमंत्री जेल की सजा। 2019 में उनका निधन हो गया। तीर तीन बार राजा एक बार भी सम्मान से विदाई नहीं। राजनीति सच में बेरहम होती है। लेकिन रुको नंबर पांच की कहानी इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली है क्योंकि वह इंसान उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री था। फिर देश का प्रधानमंत्री बना और फिर भी बर्बाद हो गया। नंबर पांच चरण सिंह जरा सोचो तुम प्रधानमंत्री बनते हो। देश के सबसे बड़े पद पर बैठते हो और संसद का एक भी दिन नहीं चाहते। एक भी बजट पेश नहीं करते। एक भी बड़ा फैसला नहीं लेते और फिर इस्तीफा दे देते हो। यह सुनने में हास्यास्पद लगता है। लेकिन यह सच है और यह कहानी है चरण सिंह की। चरण सिंह का जन्म 23 दिसंबर 1902 को उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के एक छोटे से गांव में हुआ था। एक किसान परिवार लेकिन वह बड़े आगे बड़े वकील बने और राजनीति में आए किसानों के लिए उन्हें किसानों का मसीहा कहा जाता था। उत्तर प्रदेश में जमींदारी प्रथा खत्म करने में उनका बड़ा योगदान था। वो किसानों की जमीन के हक के लिए लड़े। 1967 में वो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। पहले गैर पहले गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री। यह बड़ी बात थी उस जमाने में। लेकिन उनकी सरकार गठबंधन की सरकार थी और गठबंधन में दरारें आने लगी। 1968 में गठबंधन टूटा। उन्होंने खुद इस्तीफा दे दिया। ठीक है। यह तो राजनीति में होता ही है। लेकिन असली कहानी 1979 में हुई। उस वक्त इंदिरा गांधी के खिलाफ माहौल था। जनता पार्टी की सरकार थी। लेकिन जनता पार्टी में अंदर खाने झगड़े थे। मोरारजी देसाई की सरकार गिरी और चरण सिंह को प्रधानमंत्री बनाया गया। किसके समर्थन से? कांग्रेस के समर्थन से। इंदिरा गांधी ने समर्थन का वादा किया। लेकिन शर्त थी संजय गांधी के खिलाफ जो मामले चल रहे थे वो वापस लो। चरण सिंह ने मना कर दिया। मैं यह नहीं करूंगा। यह मेरे सिद्धांतों के खिलाफ है। कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया और चरण सिंह ने इस्तीफा दे दिया। बिना संसद गए। जरा सोचो। प्रधानमंत्री पद की शपथ ली और एक भी बार संसद का मुंह तक नहीं देखा। भारत के इतिहास में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था और शायद आगे भी नहीं होगा। 28 28 जुलाई 1979 को शपथ ली। 20 अगस्त 1979 को इस्तीफा दे दिया। बस 24 दिन और इन 24 दिनों में संसद एक बार भी नहीं बुलाई। उसके बाद 1980 के चुनाव में उनकी पार्टी बुरी तरह से हार गई। इंदिरा गांधी वापस आई। चरण सिंह विपक्ष में बैठी रहे। 1985 में उन्हें दौरा पड़ा। तबीयत बिगड़ने लगी। 29 मई 1987 को उनका निधन हो गया। एक ऐसा इंसान जो किसानों का सच्चा हमदर्द था जिसने कभी समझौता नहीं किया। जिसने सिद्धांतों के लिए सब कुछ ठुकरा दिया। लेकिन राजनीति में सिद्धांत बहुत महंगे पड़ते हैं। प्रधानमंत्री बने, संसद नहीं गए, 24 दिन में इस्तीफा इससे बड़ा राजनीतिक त्रासदी क्या होगी? अब नंबर चार पर आते हैं और यहां से असली ड्रामा शुरू होता है। एक ऐसा नेता जिसे पूरी दिल्ली प्यार करती थी जिसे दिल्ली का शेर कहते थे और उसी शेर को एक घोटाले ने पिंजरे में बंद कर दिया। नंबर चार मदन लाल खुराना। दिल्ली का शेर यह नाम था उनका।
लेकिन क्या कोई जानता है कि यह शेर आया कहां से था? मदन लाल खुराना का जन्म 15 अक्टूबर 1936 को लायलपुर में लायलपुर में हुआ था जो अब पाकिस्तान में है। फैसला 1947 में देश का बंटवारा हुआ। खुराना का पूरा परिवार सब कुछ छोड़कर दिल्ली आया। एक शरणार्थी के रूप में कुछ नहीं था हाथ में ना घर ना पैसा ना भविष्य लेकिन हिम्मत थी। उन्होंने कीर्ति नगर में एक शरणार्थी कॉलोनी में रहकर पढ़ाई की। दिल्ली विश्वविद्यालय से पढ़े और राजनीति में आए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े भारतीय जनता पार्टी के लिए काम किया। दिल्ली में पार्टी को खड़ा करने में उनकी बड़ी भूमिका थी। 1993 में दिल्ली को पहली बार विधानसभा मिली। पहले चुनाव हुए। भारतीय जनता पार्टी जीती और मदन लाल खुराना दिल्ली के तीसरे मुख्यमंत्री बने। पहले निर्वाचित मुख्यमंत्री दिल्ली की जनता उन्हें प्यार कहती थी। वो सड़क पर चलते थे। लोगों से मिलते थे। उनकी समस्याएं सुनते थे। एक जमीनी नेता लेकिन 1996 में एक ऐसा तूफान आया जिसने कई बड़े नेताओं को एक साथ गिरा दिया। हवाला कांड। जैन डायरी में देश के कई बड़े नेताओं के नाम थे। यह डायरी हवाला कारोबार के एक नेटवर्क से जुड़ी थी। जहां राजनेताओं को काला धन दिया जाता था। मदन लाल खुराना का नाम भी उस डायरी में था। अब ध्यान दो। उन्होंने जो कहा वह बहुत कम नेता कहते हैं। उन्होंने खुद इस्तीफा दे दिया। बिना किसी के दबाव के उन्होंने कहा जब तक मेरे ऊपर यह आरोप है। मैं पद पर नहीं रहूंगा। जनता का विश्वास मुझे सबसे ज्यादा प्रिय है। यह नैतिकता की बात थी। लेकिन बाद में क्या हुआ? जांच हुई। अदालत ने उन्हें निर्दोष पाया। कोई दोष नहीं था। लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी ने साहिब सिंह वर्मा को मुख्यमंत्री बना दिया था। दिल्ली का शेर बाहर था और नया शेर आ गया था। 1998 में वो केंद्र में मंत्री बने। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में पर्यटन और संसदीय कार्य मंत्री। 2004 में उन्हें राजस्थान का राज्यपाल बनाया गया। दिल्ली का मुख्यमंत्री फिर कभी नहीं। जो दिल्ली जो शेर दिल्ली की गलियों में पला था जिसने शरणार्थी से मुख्यमंत्री तक का सफर तय किया था। उसी शेर को एक ऐसे आरोप ने तोड़ दिया जो बाद में गलत साबित हुआ। 27 अक्टूबर 2018 को उनका निधन हो गया। सोचो नए दोस्त थे फिर भी बर्बाद हो गए। अब नंबर तीन और यह कहानी है एक ऐसी नेता की जो पूरे हिंदुत्व आंदोलन का चेहरा थी जिसकी आवाज से लाखों लोग जुड़ते थे और फिर उसी पार्टी ने उसे किनारे कर दिया। नंबर तीन उमा भारती 2003 का साल मध्य प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की भारी जीत और उमा भारती मुख्यमंत्री बनी। वही उमा भारती जो 11 साल की उम्र में संत बन गई थी जो कथा कहती थी जिनकी आवाज में एक जादू था जो बाबरी मस्जिद विध्वंस के दिन अयोध्या में मौजूद थी जिन्हें हिंदुत्व की सबसे ताकतवर महिला नेता माना जाता था लेकिन उनके मुख्यमंत्री बनने के पीछे भी एक बड़ी कहानी है। 2003 के चुनाव में उमा भारती ने जो प्रचार किया वह देखने वाला था। पूरे मध्य प्रदेश में घूमी लोगों से जुड़ी कांग्रेस की सरकार के खिलाफ ऐसा माहौल बनाया कि दिग्विजय सिंह जैसे अनुभावी मुख्यमंत्री को करारी हार का सामना करना पड़ा। भारतीय जनता पार्टी को 230 में से 173 सीटें मिली।
ऐतिहासिक जीत और उमा भारती मुख्यमंत्री बनी लेकिन उनका स्वभाव हमेशा से थोड़ा विद्रोही था। पार्टी की हाईकमान से उनकी नहीं बनती थी। वह 2004 में एक पुराना मामला उठा। 1994 का हुबली दंगा केस कर्नाटक के हुबली में एक विवाद हुआ था। उमा भारती पर आरोप था कि उन्होंने उकसावे वाला भाषण दिया था जिससे दंगे भड़के। 2004 में अदालत ने उनके खिलाफ वारंट जारी किया और उमा भारती ने एक बड़ा फैसला लिया। अगस्त 2004 में उन्होंने खुद मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। कहा, मैं इस पद पर रहते हुए अदालत में पेश नहीं हूंगी। पद और सत्ता से बड़ा सम्मान होता है। यह सुनने में बहुत अच्छा लगा। लेकिन इस एक फैसले ने उनके राजनीतिक करियर को हमेशा के लिए बदल दिया। पार्टी ने उनकी जगह बाबूलाल गौर को मुख्यमंत्री बनाया। उमा भारती को झारखंड भेजा गया। वहां पार्टी प्रभारी के रूप में। लेकिन उमा भारती का स्वभाव तो तुमने जाना ही विद्रोही। 2005 में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी से इस्तीफा दे दिया और अपनी पार्टी बनाई भारतीय जनशक्ति पार्टी। यहां अब यहां एक मजेदार बात है। उनकी पार्टी का नाम था भारतीय जनशक्ति पार्टी और चुनाव में उनकी जनशक्ति का हाल। 2007 में उत्तर प्रदेश चुनाव में उनकी पार्टी को बहुत कम सीटें मिली। 2008 में 2008 के मध्य प्रदेश चुनाव में उन्होंने खुद अपनी सीट गवाई। हां, खुद हार गई। वह जो मध्य प्रदेश का सबसे बड़ा चुनाव जिताने वाली नेता थी, वह खुद हार गई। 2011 में वह वापस भारतीय जनता पार्टी में आ गई। 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार में जल संसाधन मंत्री बनी। लेकिन मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री फिर कभी नहीं। 2018 में उन्होंने खुद कहा मुझे मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया जाए। लेकिन पार्टी ने शिवराज सिंह चौहान को फिर से मौका दिया। जो महिला कभी लाखों लोगों की प्रेरणा थी। जिसकी एक आवाज पर भीड़ उमड़ती थी, वह धीरे-धीरे सिर्फ एक मंत्री बनकर रह गई। यह है नंबर तीन। अब नंबर दो पर आते हैं और यहां पर असली दिल दहलाने वाली कहानी है। एक बुजुर्ग, एक योद्धा, एक राजा जिसे उसी के घर वालों ने बेइज्जत किया। नंबर दो कैप्टन अमरिंदर सिंह। पटियाला का महाराजा शाब्दिक अर्थ है। कैप्टन अमरिंदर सिंह पटियाला के शाही परिवार से थे। उनके पिता यादवेंद्र सिंह पटियाला के महाराजा थे। यानी यह आदमी पैदा ही राजसी ठाट में हुआ था। वह भारतीय फौज में गए। 1965 की भारतपाकि लड़ाई में शामिल हुए। कैप्टन का दर्जा मिला। उसके बाद राजनीति में आए कांग्रेस के नेता बने। 2002 में पहली बार पंजाब के मुख्यमंत्री बने। उनकी छवि एक मजबूत नेता की थी। पाकिस्तान के खिलाफ कड़ा रुख किसानों के लिए काम पंजाब को स्थता देने की कोशिश। 5 साल का कार्यकाल पूरा किया। 2017 में दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। लेकिन इस बार पार्टी के अंदर से तूफान आ रहा था। नवजोत सिंह सिद्धू क्रिकेटर ऐसे नेता बने। पंजाब कांग्रेस में उनकी धमक बढ़ रही थी और राहुल गांधी को सिद्धू पसंद थे। 2021 में कांग्रेस ने नवजोत सिद्धू को पंजाब कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया। अब सोचो तुम मुख्यमंत्री हो
और पार्टी ने तुम्हारे राज्य में एक ऐसा अध्यक्ष बिठा दिया जो तुम्हें फूटी आंख नहीं देखना चाहता। हर दिन टकराओ। सिद्धू कुछ बोलते अमरिंदर को चुपता। अमरिंदर कुछ कहते सिद्धू विरोध कहते और बीच में दिल्ली से कांग्रेस का फरमान बार-बार बैठ के बार-बार दिल्ली बुलावा। 80 साल के बुजुर्ग से यह सब बर्दाश्त नहीं हो रहा था। सितंबर 2021 में कांग्रेस विधायक दल की बैठक बुलाई गई। अमरिंदर सिंह को लगा यह बैठक मुझे हटाने के लिए है। उन्होंने पहले ही इस्तीफा दे दिया। मीडिया के सामने आए आंखों में दर्द था। बोले मुझे बार-बार अपमानित किया गया। मैं खुद जा रहा हूं। मुझे धक्का देने की जरूरत नहीं है। 80 साल का शाही खून फौजी तजुर्बा दशकों की राजनीति और आखिर में इतना अपमान। उसके बाद उन्होंने कांग्रेस छोड़ी। अपनी पार्टी बनाई बंगाल पंजाब लोक कांग्रेस। भारतीय जनता पार्टी से गठबंधन किया। 2022 के पंजाब चुनाव आए उन्नती आम आदमी पार्टी को 92 सीटें मिली। कांग्रेस को 18, भारतीय जनता पार्टी को दो और अमरिंदर सिंह की पंजाब लोक कांग्रेस को शून्य एक भी सीट नहीं। खुद अमरिंदर सिंह पटियाला से चुनाव लड़े और हार गए। जो आदमी पटियाला का महाराजा था, वह पटियाला से ही हार गया। इससे बड़ा दायद और क्या हो सकता है? इसके बाद वह चुप हो गए। राजनीति से लगभग बाहर हो गए। एक राजा का ऐसा अंत। लेकिन दोस्तों नंबर एक अभी बाकी है और नंबर एक की कहानी भारतीय राजनीति की शायद सबसे बड़ी सबसे नाटकीय कहानी है क्योंकि इस नेता ने एक ऐसा इस्तीफा दिया जो इतिहास में दर्ज हो गया और उसके बाद जो हुआ वो देखकर दिल भारी हो जाता है। नंबर एक कल्याण सिंह 6 दिसंबर 1992 यह तारीख याद रखो क्योंकि इस एक तारीख ने कल्याण सिंह की पूरी जिंदगी बदल दी। पहले जानते हैं कि कल्याण सिंह थे कौन? 5 जनवरी 1932 को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले में एक लोध राजपूत परिवार में जन्मे साधारण पृष्ठभूमि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े भारतीय जनसंघ के जरिए राजनीति में आए। उत्तर प्रदेश के विधानसभा में उनकी पकड़ मजबूत होती गई। वह लोध राजपूत समाज के सबसे बड़े नेता थे। पिछड़े वर्गों में उनकी जबरदस्त पकड़ थी और इसलिए भारतीय जनता पार्टी के लिए वह बेहद जरूरी थे। 1991 में भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश में पहली बार सत्ता में आई और कल्याण सिंह पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। यह उनके जीवन का सबसे बड़ा पल था। लेकिन उन दिनों अयोध्या में माहौल बहुत गर्म था। राम मंदिर आंदोलन अपने चरम पर था। विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सब ने मिलकर 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में एक बड़ी रैली का ऐलान किया।
लाखों कार सेवक अयोध्या पहुंचने वाले थे। इस माहौल में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से पूछा मस्जिद सुरक्षित रहेगी और कल्याण सिंह ने सुप्रीम कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दिया लिखकर दिया मस्जिद को कोई नुकसान नहीं होगा हमारी सरकार पूरी सुरक्षा का बंदोबस्त करेगी 6 दिसंबर 1992 को लाखों की भीड़ अयोध्या में उमड़ी और दोपहर होते-होते बाबरी मस्जिद ढहा दी गई। उसी शाम कल्याण से ने इस्तीफा दे दिया। कैमरे के सामने आए। बोले जो हुआ उसकी नैतिक जिम्मेदारी मेरी है। मैं मुख्यमंत्री पद पर नहीं रहूंगा। लेकिन मुझे इस बात का कोई अफसोस नहीं। यह वाक्य बहुत अहम है। कोई अफसोस नहीं। उन्होंने इस्तीफा दिया लेकिन माफी नहीं मांगी। केंद्र सरकार ने उसी दिन उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा दिया और उसके बाद कल्याण सिंह की राजनीतिक यात्रा शुरू हुई जो देखने में बहुत दर्दनाक है। भारतीय जनता पार्टी ने 1999 में उन्हें पार्टी से निकाल दिया। क्यों? क्योंकि वह केंद्र नेतृत्व से बार-बार टकराते थे। उन्होंने अपनी पार्टी बनाई राष्ट्रीय क्रांति पार्टी। 2002 के उत्तर प्रदेश चुनाव में उन्होंने अपनी पार्टी से चुनाव लड़ा। अपनी सीट जीते लेकिन पार्टी कहीं नहीं पहुंची। 2004 में वापस भारतीय जनता पार्टी में आ गए। 2009 में फिर पार्टी छोड़ी। इस बार समाजवादी पार्टी के लिए प्रचार किया। जरा सोचो वही कल्याण सिंह जो हिंदुत्व के सबसे बड़े प्रतीकों में से एक थे। वह मुलायम सिंह यादव की पार्टी के लिए प्रचार कर रहे थे। 2010 में वापस भारतीय जनता पार्टी इतनी बार पार्टी बदली कि लोगों को याद रखना मुश्किल हो गया। 2014 में उन्होंने राजस्थान का राज्यपाल बना दिया गया। यह एक संवैधानिक पद है। सम्मान का पद है लेकिन राजनीतिक पद नहीं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री फिर कभी नहीं। 21 अगस्त 2021 को 89 साल की उम्र में उनका निधन हो गया। उनके जाने के बाद नरेंद्र मोदी ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। पूरे भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। लेकिन एक सवाल रहता है क्या उन्हें वह सम्मान मिला जिसके वह हकदार थे? 6 दिसंबर 1992 को उन्होंने इस्तीफा दिया। उस एक फैसले ने उनकी पूरी राजनीतिक जिंदगी बदल दी। कभी-कभी एक दिन पूरी जिंदगी तय कर देता